समस्त संसार के प्रथम पूज्य ,विघ्न विनाशक गणेश स्वयं किसको भजते हैं? यों तो लौकिक रूप में वे अपने माता -पिता, शिव-पार्वती की पूजा करते हैं; वे गणनायक,पूजन योग्य उपासकों द्वारा भी पूजित हैं। वे सगुण -ब्रह्म पञ्च देवों में एक हैं, तथा भगवद-शक्त्याविष्ट आधिकारिक देव हैं। परन्तु उनकी सारी महिमा भी आदि-पुरूष ,पर-ब्रह्म की कृपा पर ही आधारित है। ब्रह्म-संहिता में सृष्टि आरम्भ के लिए ब्रह्माजी प्रार्थना करते हैं,--
" यत्पादपल्लवम युगं विनिधाय कुम्भ्द्वान्द्वे प्रणामसमये स गणाधिराज |
विघ्नान विहंतुमल्मस्य जगत्त्र्यस्य गोविन्द्मादिपुरुष तमहं भजामि॥ "
-----तीनों लोकों के समस्त विघ्नों का विनाश करने हेतुशक्ति प्राप्त करने के लिए , जिनके चरण कमलों को श्री गणेश अपने मस्तक के दोनों कुम्भों पर धारण करते हैं , उन आदि-पुरूष गोविन्द का में भजन करता हूँ॥
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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
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- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
शनिवार, 5 सितंबर 2009
सोमवार, 31 अगस्त 2009
सलाम नौजवान -७३ साल से --हाल वही का वही ?

अब और देखिये ---ये अखवार वाले ७३ साल से बदलाव का सपना नव जवानों के साथ देखरहे हैं ,अब सलाम भी कर रहे हैं परन्तु देश वहीं का वहीं है।अपितु नीचे और नीचे जा रहा है । ये कहानियां हम ६२ वर्ष से सुन रहे हैं।ये जितने भी युवाओं के चित्र अखवार दे रहे हैं,सब मुंह में चांदी -सोने की चाम्मच लेकर पैदा हुए हैं ,कोई संघर्ष करके नहीं आए है "विक्रम टीले पर चढ़ा ,ग्वालाविक्रम होय"; क्या हुआ जो आज बड़ी-बड़ी मंजिलें हैं,माल्स हैं,मोबाइल,टीवी,ऐ सी हैं,--कीचड,गन्दगी,बदबूदार नालियां,रास्ते ,पानी भरी सड़कें,उफनते सीवर ,मुख्य सडकों पर कूदे के ढेर पर घूमते सूअर तो वही हैं बल्कि पहले से अधिक (मैंने बचपन में शहरों में इतनी गन्दगी नहीं देखी ,सड़कें ,गलियाँ साफ़-सुथरी होतीं थीं। आपको भी याद होगा) ही हैं। वही राजनीति की दशा व दिशा? अतः ये सब कहानियां भ्रामक हैं ।
हमें न युवा,न प्रोढ़ ,न वृद्ध --हमें चाहिए संसकारित,संयमी,स्वयं को,आत्म व संसार दोनों को समुचित रूप से जानने वाले अच्छे इंसान। वे चाहे युवा हों,प्रोढ़ या वृद्ध ---अच्छे इंसान चाहिए। वस्तुतः होना ये चाहिए----युवा ,कार्य करें ;प्रौढ़ ,निर्देशन करें वअनुभवी वृद्ध लोग मंतव्य,मन्त्र,व दिशा ज्ञान दें।
किसी कार्य के क्रितत्व की प्रक्रिया यह होनी चाहिए---गुरुजन ( माता,पिता, गुरु )-ज्ञान का प्रकाश ,राह दिखाते हैं; मनुष्य को स्वयं दीपक लेकर चलना होता है (अप्प दीपो भव) ;एवं स्वयं के अनुभव,पठन-पाठन व शास्त्रादि के ज्ञान से नियमित (कन्फर्म) करके कर्तव्य निर्धारण करना होता है। कक्षा में भी शिक्षक दिशा देता है ,क्षात्र को स्वयं ही आगे बढ़कर, पुस्तकों से परामर्श से विषय पक्का करना होता है।

धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष की अवधारणा ---यूँही थोथा ज्ञान या दर्शन नहीं हैं ,ये पूर्ण वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक तथ्य हैं । ये मनुष्य के मानस पर गहन वैज्ञानिक प्रभाव छोड़ते हैं ,उन्हें नियमित,संयमित करते हैं। जीवन,राष्ट्र,समाज व व्यक्ति को संयमित व सुचारू रूप से चलने ,उन्नति की और अग्रसर होने ,दशा व दिशा निर्देशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लोग जीवन की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं देते रहते हैं ,परन्तु ये अवधारणा जीवन काविज्ञान है,वास्तविक ज्ञान है जो तमाम अंधविश्वासों ,भ्रांतियों,कुंठाओं आदि की दीवारों को ढहा देता है। मानव को संसार व ज्ञान दोनों में सामंजस्य के साथ जीने की कला सिखाता है। जैसा ईशोपनिषद में कहा है-"विद्यान्चाविद्या च यस्तद वेदोभाय्ह सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाम्रितमनुश्ते ॥ "अर्थात जो संसार व ज्ञान दोनों को समान रूप से जानता है वह मृत्यु को पार करके अमृतत्व (मोक्ष)प्राप्त करता है।
धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष चारों पुरुषार्थों का कितना सरल विवेचन व वैज्ञानिक व्याख्या दी गयी है ललिता सहस्रनाम के संलग्न आलेख में,पढ़ें ।
रविवार, 30 अगस्त 2009
क्या होगया है मीडिया की समझ को --

डाक्टरों ने पकडी हार्ट अटैक की नब्ज़ -शीर्षक से लगता है कि हार्ट अटैक पर काबू पालिया गया ,जबकि आप समाचार पढेंगे तो पता चलता है कि ,शरीर में दवा प्रवेश कराने का नवीन तरीका ईजाद किया गया है ,नसें (खून ले जाने वाली शिराए ) न मिलाने की स्थिति में दवाएं सीधा बोने-मेरो में डाली जा सकती है। अब इस भ्रामक समाचार का क्या किया जाय ?अन्य समाचार में दूल्हे के साथ बैठने वाले "सह वाला " में श्री योगेश प्रवीण जिन्हें इतिहासविद बताते हैं (अखवार वाले) उन्हें 'सह ' और 'शाह' में अन्तर ही नही पता ,जो सह शब्द की उत्पत्ति बादशाह से कहने लगे। सह का सीधा अर्थ हिन्दी का साथ रहने वाला है । पर दूर की कौडी जो लानी है। हद है भई | आप ही सोचिये।
रविवार, 23 अगस्त 2009
गणपति वन्दना --
शनिवार, 22 अगस्त 2009
दो टूक-पाकिस्तान-जनता और दोस्ती--हि.२२-८-०९
अक्सर लोग ,मीडिआ ,नेता आदि कहते रहते हैं--खेल,कला आदि दोस्ती बढाते हैं आदि-आदि । आज ’दो तूक’ में यही कहा है। पर दो टूक तो यही है कि--यदि यही बात है तो ६२ वर्षों से पाकिस्तान से खेल रहे हैं, अब तक क्या हुआ???? हुज़ूर ! वालीवूड, क्रिकेट ,यास्कूल के बच्चों केडेलिगेसनों क्या होता है, ये सब तो घूमने,पैसे कमाने के धन्धे हैं, दोस्ती से क्या मतलव -अपना मतलव गांठना ही है। दोस्ती के लिये तो राज्नैतिक व नैतिक साहस,और आत्म-विश्वास व आत्मिक साहस की आवश्यकता है ,वो कब आयेगी????
मंगलवार, 18 अगस्त 2009
आहार-विचार -,मांसाहार --अनहद,हिंदुस्तान -दैनिक --०९-०८-०९ --------
आहार-विचार के बारे में श्री अखिलेश आर्येंदु का आलेख विचारणीय है -->कुछ डा श्याम गुप्त के दोहे भी पढ़ें ---
है उपलब्ध निरोग-हित,विविध शाक आहार |
क्यों खाएं रोगी बनें,निन्दित मांसाहार|
यम् ओ नियम शरीर हित,आचार-व्यवहार।
रहे चिकित्सा-ज्ञान ही,इन सबका आधार।
परम अपावन प्राप्ति विधि,प्राणी बध संताप ।
बध की क्रिया देखकर,कभी न खाएं मांस।
कूड़ा-करकट खाँय हम, कुक्कुट यों बतरायं ।
क्या मज़बूरी मनुज की ,जो वे हम को खायं।
जंगल तजि गाँवों बसे, भाये शाकाहार।
नगर बसे पुनि शाक तजि , रुचै मांस आहार।
अनुमोदक,क्रय-विक्रयी,चीरे,बधे,पकाय ।
खायं,परोसें ये सभी,घातक पाप कमायं ।
अति आहार महान दुःख,अनाहार अति कष्ट ।
रितभुक,मितभुक,हितभुक,सदा रहें संतुष्ट ।
अन्न जो जैसा खाइए, तैसी संतति होय।
दीप भखे अंधियार को ,काजल उत्पति होय॥
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