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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

रिश्ता सारमेय सुत का...डा श्याम गुप्त की कहानी..

























---चित्र साभार...

रिश्ता सारमेय सुत का...

कालू कुत्ते ने झबरीली कुतिया का गेट खटखटाया और बोला,-
'भौं .s.s.भौं ऊँ भुक -अरे कोई है। '
झबरीली ने गेट की सलाखों के नीचे से झांका और गुर्राई, 'भूं ऊँ ऊँ भौं, कौन है ?'
भूं s भुक , मैं कालू ।
ओ s sभूं अक , क्या है, क्यों आये हो?
रिश्ता लाया हूँ , कालू बोला,मेरी बेटी शरवती की आपके झबरू बेटे के साथ जोड़ी अच्छी रहेगी। क्या ख्याल है। झबरू भी शरबती के आगे पीछे घूमता रहता है।
झबरीली इन्जीनियेर शर्मा साहब की कोठी में रहने वाली बड़े बड़े बालों वाली सफ़ेद अच्छी नस्ल की कुतिया थी। इठला कर गुर्राई,'भूं .s.s.भौं s sऔं भूट, तो इससे क्या , कालू कहीं का । चल हट, मेरा बेटा कोठी में पला-बढ़ा , साहबों की सोहबत में है, तू फटेहाल झौंपडी में रहने वाला कुत्ता! तेरी क्या मजाल । बड़ा आया। तेरे पास क्या है देने को? क्या दहेज़ देगा? कल ही नीलू कुतिया अपनी मिंकी बेटी का रिश्ता लाई थी। शगुन पर ही चांदी का पट्टा देने की बात कर रही थी।
भौं s s अंग.. भट, दो हड्डियां है मेरे पास, दावत के लिए, झोंपड़ी के पीछे दबा कर रखी हैं । पर ये दहेज़ क्या होता है? कालू असमंजस में पड़कर बोला।
भूं .s.s..s भू...अक:॥, अरे तभी तो। तुम गली के छोटे लोग हो, बड़े घरों की बातें कहाँ जानते हो। चल हट, बड़ा आया।
बातें सुनकर इधर-उधर के कुछ कुत्ते भी एकत्र होगये थे । अरे, ये आदमियों के चोंचले हैं । पड़ोस के सिल्की कुत्ते ने भों भों करके बताया। आदमी लोग बेटों की शादी में खूब माल काटते हैं सोना, चांदी,कार, नकद रुपया-पैसा के साथ ही बेटे की शादी करते हैं। जो भी अधिक से अधिक दे सके..... ।
हाँ हाँ , 'उस दिन जब में कोठी न. सोलह के साहब के यहाँ दावत में फैंकी हुई मिठाई, पूड़ी, सब्जी के मज़े लेरहा था तो मैंने भी सुना कि साहब को खूब माल व इम्पोर्टेड कार मिली है। कोई पच्चीस लाख की शादी थी । ' ब्राउनी कुत्ता बोला।
' पर जो देते हैं वे इतना सारा माल लाते कहाँ से होंगे। ' कालू ने पूछा।
'कुछ . दो का चक्कर है मैंने कुछ लोगों को यह भी कहते सुना था।' ब्राउनी बोला।
;यार ! ये आदमी भी अजीब , वेवकूफ जानवर है, मिठाई, पूड़ी आदि खाना, आखिर ये लोग फैंकते ही क्यों हैं? क्या मिलता इन्हें इसमें । '
'चलो हमारे लिए तो मज़े ही रहते हैं। '
' हाँ सो तो है। पर हमारे साथ कुछ दुबले-पतले किस्म के इंसान भी तो टूट पड़ रहे थे उस खाने पर। क्या उन लोगों के पास इतना खाना नहीं होता।' ब्राउनी बोला।
'पता नहीं, ये इंसान भी विचित्र प्राणी है। कोई खूब खाना फैंकता है, कोई फैंके हुए को उठाता है। इसमें भी उसका कुछ मतलब ही होगा। क्योंकि मैंने सुना है कि आदमी बड़ा चतुर जानवर होता है, कोई काम बिना मतलब के नहीं करता।' सिल्की ने बताया।
' हो सकता है कोठी वाले आदमी लोग भी किसी के पालतू होते होंगे, जैसे झबरीली कुतिया और ये दुबले-पतले इंसान हमारी तरह गली झौंपडी वाले जानवर।' पप्पी पिल्ले ने अपना दिमाग लड़ाया ।
'हो..हो..हो॥, सब हंसते हुए भोंके, ये आदमी की लाइफ भी हम कुत्तों जैसी ही है ' पर इनके गले में पट्टा तो नहीं दिखाई देता। ' ब्राउनी हंसते हुए बोला। 'शायद इनको पालने वाला जानवर इनसे भी अधिक चतुर होता होगा'
'भुक..भुक...भुक .s.s.और हम कुत्ते दहेज़ भी तो नहीं माँगते,बेटियों को नहीं जलाते। इसमें तो आदमियों से अच्छे ही हैं। अब सोलह न. वाले साहब को शादी में इतना मिला फिर भी साल भर बाद ही बहू को जलाने की कोशिश में जेल में हैं। ' ब्राउनी ने बताया।
' वो तो भला हो भूरा का,' लंगडाकर धीरे धीरे आता हुआ चितकबरा कुत्ता बोला,'जो रात में भौंक भौंक कर सारा मोहल्ला जगा दिया, और बहू-बिटिया बच गयी। पड़ोस की पढी-लिखी सुमन दीदी, जो समाज-सेवा का काम करती है ; और वो जाने क्या होता है, नारी जागरण, के भाषण देती रहती है; अचानक जाग गयी और कुत्ता क्यों जाने लगातार भोंक रहा है, यह देखने दौड़ी चली आई। वरना ये लोग तो महीनों से हरकत कर रहे थे कोई आदमी बीच में पड़ने नहीं आया। '
' कृष्णा ..कृष्णा..एसा नीच कुकर्म, कमीना कुत्ता कहीं का। '
' भों.s..s.भौं .sss.. क्यों कुत्तों को गाली दे रहा है।' सिल्की गुर्राया।
'भूं.n.n..भूं..n.अक..सारी' , कालू सकपका कर बोला, 'मेरा मतलब था आदमी कहीं का'
'अजीव है ये आदमी भी' , कालू सोचते हुए बोला, 'अपने भाई बंधुओं से ही दुश्मनी निकलता है,अपनी ही बहू-बेटियों को बिकने, जलने, मरने देता है। और कहावत बना रखी है,'क्यों कुत्तों की तरह लड़ते हो'; 'क्या इनका राजा या मुखिया नहीं होता,वो कुछ नहीं कहता?'
राजा..s..s..s.चितकबरा सोचते हुए बोला,' आदमी लोग स्वयं अपने राजा होते हैं,आज कल इनके यहाँ वो न जाने क्या है...मन्त्र या तंत्र व्यवस्था ; बड़ी अजीब सी चीज है। ये लोग स्वयं को वोट जैसी कुछ चीज देते हैं और खुद ही राजा बन जाते हैं। कोई भी राजा बन जाता है। न कोई पराक्रम ,न विद्वता मंडली की या गुरु मंडली की कोई सलाह ली जाती है। न राजा का बेटा ही राजा होता है। भीड़ जिस तरफ होती है वही राजा बन जाता हैऔर कई बार तो साल में चार चार बार राजा बदल जाता हैकौन किसे मना करे, कौन किसे दंड दे। '
' ये तो अंधेर नगरी वाली बात हुई। पर हम क्यों उनकी हरकतों को अपना रहे हैं?' सिल्की बोला।
' अरे भाई! एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। अपनी जाति या समाज के पतन के लिए स्वयं हमारे काम ही तो जिम्मेदार होते हैं। ' अब देखलो साहबों के यहाँ रहने के कारण ही वो झबरीली को घमंड व दहेज़ जैसी बीमारी लग गयी है। मनुष्य तो कुत्तों को अपने स्वार्थ के लिए पालता है,गुलामी कराने को और उनकी गंदी आदतें
कुत्तों में आ जाती हैं। अगर इसे शीघ्र ही नहीं रोका गया तो देखा-देखी अन्य कुत्तों में भी यह बीमारी फ़ैल सकती है। ' भूरा बोला,' आदमी शायद सभी जानवरों से बुरा है। '
' झबरीली तो बुरी तरह से बिगड़ गयी है। बस आदमियों के पीछे पीछे घूमती रहती है। उन्हीं की तरह बात करने की कोशिश करती है। अपने को आदमी ही समझने लगी है। बिस्कुट का नाश्ता,दूध-रोटी का लंच-डिनर, आदमी के खाने की अच्छी अच्छी चीज़ों के स्वाद में लालच ने इसे पागल कर दिया है। साहब ने कोट भी बनवा दिया है,साहब बनी घूमती है और गुलामी का पट्टा व ज़ंजीर गले में बांधे अपनी शान समझती है। अच्छा खाना, पहनना, सोने के लालच में अपना कुत्तापन भी भूल गयी है। और बिगडैल आदमी की तरह बनती जारही है। कुत्तों से तो बात ही नहीं करती, नकचढी कहीं की। ' ब्राउनी कुत्ता बोला।
' राम...राम ..एसा दुष्कृत्य और नीचता की बात कर रही है ये झबरीली। कमीनी आदमी कहीं की। ' कालू कुत्ता जोर से गुर्राया। ' इससे अच्छे तो हम कुत्ते ही हैं,आदमी तो कुत्तों से भी गया बीता है। कान पकडे जो अब झबरीली की तरफ पूंछ भी करूँ तो। कराले अपने बेटे की शादी आदमियों में ही। '
' अरे जब कोई इसकी और मुंह उठाके देखेगा ही नहीं तो अपने आप झख मारकर कुत्तों की और दौड़ेगी। आदमी तो इसके काम आयेगा नहीं,जब वह अपने आदमियों का ही नहीं होता , अपने लोगों को ही सताता है,उन्हें जलने मरने देता है तो कुत्तों का क्या होगा। अगर सभी कुत्ते एकजुट होजाएं और इसका बायकाट करदें अपने आप ही सातवें आसमान पर चढ़ा दिमाग उतर जायगा। ' मरियल सा झबरीला कुत्ता बोला, ' मैंने इसे बहुत समझाया था पर इसने मुझे ही दौड़ाकर कोठी से बाहर निकलवा दिया। '
अच्छा भी कुत्तो! जय सारमेय , कालू बोला,' आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद, जो मुझे पाप में पड़ने से बचा लिया। आप सब यहाँ बायकाट कराकर कुत्ता समाज सुधार संघर्ष में रत रहें , मैं अन्य कालोनियों में भी इसका बायकाट कराऊंगा। तभी एसे कुत्ते लोग ठीक होंगे। '

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

शाबास सचिन---युवाओं को आव्हान ...डा श्याम गुप्त...


शाबास सचिन--- यद्यपि क्रिकेट के बदशाह सचिन तेन्दुलकर की ५०वीं सेन्चुरी पर फ़िर उन्हें”भारत-रत्न’ प्रदान करने की आवाजें उठने लगी हैं, परन्तु हम इस बात पर उन्हें इस सम्मान के अधिकारी नहीं समझते, यह उनका अपना केरियर व प्रोफ़ेशन है अतः क्रिकेट जगत के सभी सम्मान पाने का उन्हें हक है। भारत रत्न का नही जो देश भक्ति के लिये दिया जाता है, सारे समाज व देश के संदर्भ में,---------हां, क्रिकेट के बाद्शाह सचिन रमेश तेन्दुलकर द्वारा शराव व तम्बाकू का ( २० करोड वार्षिक...) विग्यापन को ठुकराने का फ़ैसला का स्वागत योग्य तो है ही ,एतिहासिक एवं सामाजिक क्षेत्र में साहसिक व मील का पत्थर कहा जाना चाहिये....यद्यपि कहा जासकता है कि इतना अधिक धन जमा होने के पश्चात यह फ़ैसला लेना बहुत आसान है... परन्तु फ़िर भी धन लालसा, लोलुपता, घुटालों के युग में इसे स्तुत्य ही माना जाना चाहिये...जो देश के नेताओं, अधिकारियों अन्य खिलाडियों, कार्पोरेट जगत के लिये एक नवीन द्रष्टि होनी चाहिये..... ---पिछले दिनों सचिन को "भारत रत्न " देने के लिये उनके लाखो क्रिकेट प्रशन्सकों ने काफ़ी दबाव व शोर मचाया था, तब भी हमने लिखा था कि सचिन ने कौन सा देशभक्ति का कार्य किया है , पैसे लेकर खेलना देश भक्ति नहीं अपना धन्धा है....
---यदि सचिन के साथी, समर्थक व देश-विदेश के युवा वास्तव में सचिन को ’भारत रत्न’ सम्मान दिलाना चाहते हैं तो वे उनका अनुसरण करके एक मिशाल रखें । यदि सचिन की इस कदम से युवा व अन्य प्रसिद्ध लोग उद्बोधित होकर शराव, तम्बाकू आदि के विरोध में खडे होने लगें तो यह समाज के लिये एक पुनीत आव्हान होगा.....और तब निश्चय ही सचिन तेन्दुलकर ...भारत रत्न...के अधिकारी हो सकते हैं ....
-----तो हम आव्हान करते हैं युवाओ को जागने के लिये ----अपने प्रिय खिलाडी को ..सम्माम्नित करने के लिये.........


सोमवार, 20 दिसंबर 2010

आई फिर से शीत सुहानी ---डा श्याम गुप्त की घनाक्षरी ....

शीत - ऋतु----
१. (श्याम घनाक्षरी --३० वर्ण , १६-१४, अंत दो गुरु -यगण)
थर थर थर थर , कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु , सखि वो सुजानी |
सिहरि सिहरि उड़े ,जियरा पखेरू सखि ,
उर मांहि उमंगाये , पीर वो पुरानी |
बाल वृद्ध नारी नर, धूप बैठे तापि रहे ,
धूप भी है कुछ , खोई सोई अलसानी |
शीत की लहर तीर भांति तन बेधि रही,
मन उठै प्रीति की ,वो लहर अजानी ||


२.( श्याम घनाक्षरी -३० वर्ण ,१६-१४, अंत दो गुरु - मगण)
बहु भांति पुष्प खिलें, कुञ्ज क्यारी उपवन,
रंग- विरंगी ओढे, धरती रजाई है |
केसर अबीर रोली,कुंकुंम ,मेहंदी रंग,
घोल के कटोरों में, भूमि हरषाई है |
फैलि रहीं लता चहुँ और मनमानी किये,
द्रुम चढीं शर्मायं ,मन मुसुकाई हैं |
तिल मूंग बादाम के लड्डू घर घर बनें ,
गज़क मंगोड़ों की बहार सी छाई है ||


३.( मनहरण घनाक्षरी -३१ वर्ण ,१६-१५,अंत लघु-गुरु -रगण )
ठंडी ठंडी भूमि नंगे पाँव लगे हिमशिला ,
जल छुए लगे छुआ बिजली का तार है |
कठिन नहाना नल लगे जैसे सांप कोई,
काँप रहा तन चढ़ा जूडी का बुखार है |
शीत में तुषार से है मंद रवि प्रभा हुई,
पत्तियों पै बहे ओस जैसे अश्रु धार है |
घर बाग़ वन जला आग बैठे लोग जैसे,
ऋषि मुनि करें यज्ञ विविधि प्रकार हैं ||
-----डा श्याम गुप्त , के--३४८, आशियाना , लखनऊ-२२६०१२ .

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

हल्दी, कढ़ी, फोटोथीरेपी,..विज्ञान और अंधविश्वास ...डा श्याम गुप्त

<------ नीले प्रकाश से पीलिया का इलाज़...फोटोथीरेपी यूनिट... हल्दी , ,कढी, फोटोथीरेपी --विज्ञान व अंधविश्वास..... इन में आपस में क्या सम्बन्ध हो सकता है ! वस्तुतः यह पोस्ट लिखने का मुझे अचानक ही विचार आया क्योंकि मैंने अनुभव किया कि--
- जब भी कोई जन- समस्या व आन्दोलन की बात चलती है तो हर व्यक्ति समाज का ठेकेदार बन कर उसे भुनाने लगता है बिना उसके दूरगामी निहितार्थ व प्रभाव जाने , चाहे बात नारी आन्दोलन की हो, या एन जी ओ या भारतीय ज्ञान , धर्म , शास्त्रों की बातों की , प्रथाओं की, अंधविश्वासों की हो , चाहे वह उसका ज्ञान व उचित विषय भाव रखता हो या नहीं ।
२- आजकल वैसे भी भारतीयता, शास्त्र , धर्म की बातें तुरंत अंधविश्वास के दायरे में आजाती हैं , खासकर हिन्दू धर्म ,शास्त्र, पुराण , दादी नानी के नुस्खे , पुरा ज्ञान की बातें आदि...(अब राहुल गांधी की हिन्दू-कट्टरता के वक्तव्य पर कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि यह राजनैतिक आलेख नहीं है। )
३-पिछले काफी समय से विज्ञान के प्रसार व तथाकथित अंधविश्वास के उन्मूलन हेतु साहित्य, समाचार-पत्र, संस्थाएं, स्वयंभू ब्लोग्स आदि मेरे संज्ञान में आते रहे हैं जो मूलतः हिन्दू आस्थाओं व विश्वासों के अंधविश्वास की बातें होती हैं, पाश्चात्य प्रभाव के अनुकूलन सहित ।
वास्तव में पाश्चात्य विचार धारा --प्रत्येक नवीन वस्तु- विचार -तथ्य को तीब्रता से अपना लेने व उसी शीघ्रता से छोड़ देने की है जो आकर्षण की प्रमुखता व अनुभव की अप्रमुखता के कारण है....जबकि पौर्वात्य भारतीय विचार धारा प्रत्येक नवीन को लम्बे समय तक देख- परखकर , अनुभव सिद्ध करके स्वीकार करने की है
और उसी प्रक्रिया से तुरंत की अपेक्षा लम्बे समय बाद छोड़ने की भी है इस विचार धारा का प्रभाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर दिखाई पड़ता है और इस मूल अंतर में सदियों व युगों में भी ताल-मेल नहीं होता हाँ कुछ पाश्चात्य प्रभावित लोग अवश्य प्रभावित दिखाई पड़ते हैं और सभी भारतीय -बातों को दकियानूसी समझ कर उस पर नाराजी प्रकट करते दिखते हैं | इसीलिये किसी विचारक ने सही कहा है --"ईस्ट इस ईस्ट , वेस्ट इस वेस्ट नेवर ट्विन शेल मीट"...अब हम एक अंधविश्वास के बारे में बात रखेंगे....
-----अब ---हल्दी , कढी, फोटोथीरेपी --विज्ञान अंधविश्वास..... इन में आपस में क्या सम्बन्ध हो सकता है ? यह एक अंधविश्वास माना जाता है कि पीलिया ( जांडिस )के रोगी को पुरातन-पंथी या दादी केनुस्खे के हिसाब से पीली बस्तुएं( हल्दी की, बेसन की व अन्य पीले रंग की खाद्य व कपडे आदि का प्रयोग ) खाने / पहनने को मना किया जाता है । मैं स्वयं आधुनिक प्रभाव वश फिर विज्ञानका क्षात्र , फिर चिकित्सा विग्यान का क्षात्र , फिर चिकित्सक होने तक इसे पीलिया पीली वस्तु के खाने में आपस में कोई सम्बन्ध नहीं
समझता रहा हूँ। यद्यपि इस प्रकार के तथ्य को जो लोग सदियों से मान रहे हैं सदैव मेरी उत्कंठा व मनन का विषय रहे । इसीके साथ विज्ञानं के आधुनिक आविष्कार पीलिया रोग के इलाज़ में सूर्य का प्रकाश फोटोथीरेपी का खूब प्रयोग भी करता रहा व होते हुए जानता रहा हूँ , परन्तु दोनों बातों को कभी एक करके नहीं देख पाया ।
अभी हाल में ही एक नवजात शिशु को फोटोथीरेपी के दौरान नीले प्रकाश को देखकर अचानक ही जब मैंने दोनों बातों को सम्मिलित किया देखा। पीलिया में बिलीरूबिन के पीले रंग के कणों को रक्त में से निकालने में नीले रंग का प्रकाश ही सबसे अधिक प्रभाव कारी क्यों है। ( यह आधुनिक चिकित्सकीय सिद्ध खोज है और फोटोथीरेपी का मूल सिद्धांत )। .....तो स्वतः ही पुरातन बात -पीलिया में पीली वस्तु खाने के परहेज़ का कारण समझ में आने लगा ।
अवश्य ही यह रंग -विज्ञान के गहन गूढ़ वैज्ञानिक तथ्य हैं जो अभी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान नहीं जान सका है। पीले रंग का खाद्य-पदार्थ अवश्य ही मोलेक्यूलर चिकित्सा विज्ञान का उन्नत ज्ञान है जो आयुर्वेद केअनुभव ज्ञान द्वारा भारतीय मानस में पैठ कर गया , जिसका कोई कारण आदि उन्हें ज्ञात नहीं । नीला रंग अवश्य ही पीले रंग का विरोधी होने के कारण रक्त से पीले कण हटाता है और पीले खाद्य पदार्थ उसे बढाते होंगे। प्राकृतिक चिकित्सा का एक भाग--रंग चिकित्सा -जिसमें विभिन्न रंग के कांच की बोतलों में सूर्य के जल से चिकित्सा की जाती है उसका भी शायद यही आधार है ।
अतः यह वास्तव में हमें हर पुरातन तथ्य को अंधविश्वास की भांति-अंधविश्वास नहीं कह देना चाहिएअपितु उन्हें जानकार, व्याख्या व अनुभव द्वारा परख कर उसे आधुनिक तथ्यों से तादाम्य द्वारा समझना चाहिए ।

ग़ज़ल...डा श्याम गुप्त..

ग़ज़ल---परम सत्ता ...

बड़े बड़ों के सुर- तेवर ढीले हो जाते हैं।
क्या तिनका, क्या गर्वोन्नत गिरि, नत होजाते है।

कुछ भी तेरे हाथ नहीं है, रे नर! तू क्यों ऐंठा,
उस असीम के आगे, सबके सिर झुक जाते हैं।

हमने बड़े बड़े बलशाली पर्वत-गिरि देखे,
बरसे पानी, कड़के बिजली सब ढह जाते हैं।

आंधी बिजली तूफानों ने तेवर खूब दिखाए,
मन की दृड़ता के आगे वे क्या कर पाते हैं।

चाहे जितना राग द्वेष छल छंद करे कोई,
सत्य राह के आगे सब नत सिर हो जाते हैं।

तूफानों के बीच भंवर में नैया डग मग डोले,
मांझी के मजबूत इरादे , खेकर लेजाते हैं।

सत पौरुष बल मन की दृड़ता अपने निज पै भरोसा,
हो ईश्वर पर श्रृद्धा तब ये गुण मिल पाते हैं।

वही भरोसा, बल है सत है,वही आत्म विश्वास,
उसे भूलते, अहं भाव रत , कष्ट उठाते हैं।

जिसके आगे बड़े बड़ों की अकड़ नहीं चल पाए,
श्याम' परम सत्ता के आगे शीश झुकाते हैं॥

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

ऋतु श्रृंगार...हेमंत...डा श्याम गुप्त...


हेमंत...
आई फिर प्रिय शीत सुहानी,
घिर
घिर आये प्रीति अजानीतन मन काँपे शीत पवन से,
उभरे
कोई , प्रीति कहानी । ...आई फिर से....॥

अपने
अंतर्मन के तम को -
दूर
करो, प्रिय बचन सुनादोमेरे मन की फुलवारी में,
कुछ
पल बैठो ,हिय हुलसादो

मन
के सारे भेद भुलाकर,
प्रीति प्रेम के बोल सुनादो
याद
करो वह प्रेम कहानी,
याद
करो वह शाम सुहानी । ....आई फिर से.... ॥
शीत पवन तन मन सिहराए,
पीर
पुरानी . मन- लहराएमन में जगे प्रीति की इच्छा ,
ऐसी
गर्म बयार बहा दो

आस
और विश्वास भरे पल,
बीतें
संग संग हिल मिल कर शिशिर घात से जड़ तन मन को ,
प्रेम
अगन से तुम सहला दो

मिल
जुल कोई गीत सजाएं,
इक दूजे में हम खोजायेंमन महकाए प्रीति सुजानी,
नूतन
-नित चिर प्रेम कहानी। ....आई फिर से.... ॥

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

डा श्याम गुप्त की कविता...मीरा ..

मीरा

जब जब इन गलियों से गुजरूँ
तब तुम बहुत याद आती हो।
दरवाजे के पार पहुंचकर ,
मुड़कर अक्सर मुस्काती हो।।

जोगन बनकर थाल सजाकर,
जब जब तुम मंदिर जाती हो।
सचमुच की मीरा लगती हो,
वीणा पर तुम जब गाती हो॥

मेरे ख्यालों में आकरके,
अब भी मुझको भरमाती हो।
घर के अन्दर जा कर के तुम,
पीछे मुड़कर मुस्काती हो॥

तेरे गीतों की सरगम से,
हे प्रिय! में कवि बन पाया हूँ।
पर तुम तो बस इतना समझो,
तेरे गीतों का साया हूँ॥

तेरे ही संगीत हे प्रियवर!
मेरे गीत बना जाते हैं।
तेरी यादें, तेरे सपने,
नए नए स्वर दे जाते हैं॥

मेरे मन मंदिर में आकर,
बनी मोहिनी तुम गाती हो।
सचमुच की मीरा लगती हो,
सचमुच मीरा बन जाती हो॥