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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

अन्ना हज़ारे, जन समर्थन , जन क्रान्ति व विचार क्रान्ति-----डा श्याम गुप्त ..

                                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
          एक होती है "जन क्रान्ति " जो अन्ना हजारे द्वारा की जारही है, जो महात्मा गांधी द्वारा की गयी | जिसमें जन जन, बिना अधिक सोचे हुए, विना तर्क-वितर्क के  जन-नेता के पीछे चलता है | यह सामयिक रूप से  किसी लक्ष्य  व विचार की प्राप्ति का शीघ्र -उपाय होता है, जो उचित ही है और लक्ष्य को तेजी से पाने में समाज को सक्षम करता है | जन क्रान्ति जो मूलतः राजनैतिक या किसी विशेष लक्ष्य के लिए होती है जिसमें  में सम्मिलित जन जन की विभिन्न अपेक्षाएं, इच्छाएं रहती हैं | इसमें चमक, नेतागीरी, प्रसिद्धि व प्रशंसा का भाव भी रहता है | जन क्रान्ति मूलतः दूसरे के विरुद्ध होती है, किसी विशिष्ट के विरुद्ध होती है, अतःजन जन का समर्थन शीघ्र उपलब्ध होता है | 
          परन्तु यदि  जन क्रान्ति के साथ , प्रतिक्रान्ति, वास्तविक क्रान्ति " विचार क्रान्ति " न हो तो वह क्रान्ति अधूरी ही रहती है | जैसा भारतीय स्वतंत्रता-क्रान्ति के साथ हुआ कि राजनैतिक सफलता व लक्ष्य प्राप्ति के पश्चात एक विचार क्रान्ति के लिए जन मानस को तैयार करने का कोइ ठोस कार्य नहीं किया गया | यह विज्ञ-जन, बुद्धिवादी लोगों , साहित्यकारों , विद्वानों का दायित्व होता है | परन्तु समस्त जन -जन व विज्ञ-जन भी,  स्वतन्त्रता के भोग, उपभोग में लिप्त होगये जिसका परिणाम आज समाज के हर क्षेत्र व जन जन में उपस्थित भ्रष्टाचार, अनाचार , सांस्कृतिक प्रदूषण जनित अकर्म-अनाचरण -दुराचरण व अप संस्कृति का मूल कारण है | विचार क्रान्ति चुपचाप, प्रसिद्धि से दूर व चमक रहित होती है , अतः कठिन होती है और जन-समूह का जन जन का सहयोग मिलना दुष्कर होता है , क्योंकि यह स्वयं अपने ही विरुद्ध होती है एवं  लक्ष्य दीर्घ कालीन व जन जन के, सामान्य जन के आचरण के विरुद्ध होती है |
            अतः आज भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना के जन समर्थन व सफलता से हमें अति-उत्साहित होकर -कि 'अब तो किला फतह कर लिया ' -सोचकर ,मस्त नहीं होजाना चाहिए | प्राय: सामान्य जन अपने अपने त्वरित व क्षेत्रीय लाभ के लिए भी जन नेताओं के पीछे लाम बंद होजाता  है , लक्ष्य प्राप्त होते ही अपने स्व-स्वार्थ कर्म में लिप्त हो जाता है |  
            हाँ इस प्रकरण से यह तथ्य तो सिद्ध होता ही है कि गांधी आज भी प्रासंगिक हैं | सामान्य जन में सदैव ही इच्छा तो होती है पर विचार व दिशा नहीं और सदा ही विज्ञ जनों , उच्च- पदस्थ जनों व, विद्वानों का यह दायित्व होता है कि उन्हें समय समय पर उचित ज्ञान व मार्ग निर्देशन कराते रहें |
           अतः निश्चय ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक विचार क्रान्ति  का उद्घोष होना चाहिए , जो स्व-भाव,  स्व-भाषा, स्व- देश-राष्ट्र व स्व-संस्कृति के प्रति श्रृद्धा व स्वानुशासन से होना चाहिए | यह आज बुद्धिवादी लोगों का दायित्व है कि  जन जन स्वानुशासन द्वारा स्वयं को भ्रष्टाचार , अनाचरण व सांस्कृतिक प्रदूषण से मुक्त करे |  अन्यथा यह जन क्रान्ति अधूरी व अर्थहीन होगी |

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

वेदिक साहित्य में विग्यान के तथ्य...२....डा श्याम गुप्त...

.                                                                             ...कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 
               वैदिक  साहित्य में आधुनिक विज्ञान के बहुत से तथ्य सूत्र रूप में मौजूद हैं ,  कुछ अन्य तथ्यों को यहाँ रखा जारहा है.....

प्रकाश के सात रन्ग.....ऋग्वेद  १/४/५२५---  में सूर्य की उपासना करते हुए ऋषि कहता है.....
           "सप्त त्वा हरितो रथो वहन्ति देव सूर्यः | शोचिष्केशं विचक्षण: ||"   ----हे सर्व दृष्टा सूर्यदेव ! आप तेजस्वी ज्वालाओं से युक्त दिव्यता धारण करते हुए सप्तवर्णी किरणों रूपी अश्वों के रथ पर सुशोभित होते हैं |
ऊर्ज़ा के रूप व उपयोगों का वर्णन-----   ऋग्वेद 1/66/723  के अनुसार -----
"य ई चिकेत गुहा भवन्तमा य: ससाद धाराम्रतस्य।वि ये च्रितन्त्र्प्रत्या सपन्त आदिद्वसूनि प्र ववाचास्मै ॥"
          -----जो गुह्य अग्निदेव को जानते हैं, यग्य में उन्हें प्रज्वलित करते हैं, और धारण की स्तुति करते हैं, वे अपार धन प्राप्त करते हैं ।----अर्थात.. जो विभिन्न पदार्थों में निहित --रसायन, काष्ठ, कोयला, जल, अणु आदि में अन्तर्निहित छुपी हुई अग्नि= शक्ति= ऊर्ज़ा को जानकर , उनसे ऊर्ज़ा-शक्ति प्राप्त करके उपयोग में लाते हैं वे  वे व्यक्ति, समाज, देश सम्पन्नता प्राप्त करते हैं। केमीकल, एटोमिक, हाइड्रो-, स्टीम, काष्ठ स्थित मूल अग्नि ऊर्ज़ा आदि का वर्णन है ।         
अग्नि की खोज व उपयोग--- ऋग्वेद 1/127/1432----का कथन है ---
" द्विता यवतिं  कीस्तासो अभिद्य्वो वमस्पन्त । उद वोचतं भ्रिगवो मथ्नन्तो दाश्य भ्रगव ॥"  ----भ्रगु वेष में उत्पन्न रिषियों ने मन्थन द्वारा अग्नि देव को प्रकट किया,  स्त्रोत कर्ता,( पढ्ने-लिखने वाले) स्रजनशील( वैग्यानिक उपयोग कर्ता-खोजकर्ता), विनय शील( समाज व्यक्ति के प्रति उत्तर्दायी)  भ्रगुओं ने प्रार्थनायें कीं ।
शब्द व वाणी अविनाशी- रिग्वेद १/१६४/१२१६--कहता है "तभूवुर्षा सहस्राक्षरा परमे व्योमनि॥" ...अर्थात ..वाणी सहस्र अक्षरों से युक्त होकर व्यापक आकाश , अन्तरिक्ष में संव्याप्त होजाती है ।अर्थात शब्द, वाणी, ( व सभी ऊर्ज़ायें) कभी विनष्ट नहीं होतीं , वे अक्षर हैं, अविनाशी । इसीलिये आज वैग्यानिक गीता के श्लोकों को अनन्त आकाश में से रिकार्ड करने का प्रयत्न कर रहे हैं ।



गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार व अन्ना हज़ारे का अनशन.....

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...       
          ६१ वर्ष में न जाने कितनी सरकारें आईं व गईं ...परन्तु भ्रष्टाचार बढ्ता ही गया व बढ्ता जारहा है...अतः भ्रष्टाचार कोई राजनैतिक मामला नहीं है, अपितु मानवीय आचरण का मामला है। जिस प्रकार से  कान्ग्रेस व मनमोहन सिन्ह सरकार पर आक्षेप लगाये जारहे हैं ( क्योंकि संयोग से इस सरकार के विरुद्ध ही तमाम मामले उजागर हुए हैं एवं  अधिकान्श समय कान्ग्रेस सरकार ही सत्ता में रही है, इससे क्या अन्य सरकारें क्या कर रहीं थीं ), एवं लोकपाल को सर्व-समर्थ बनाने की बात की जारही है, इससे लगता है कि इसे एक राजनैतिक मामला माना जा रहा है । क्या गारन्टी है कि लोकपाल स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हो जायगा । क्या आज कोई एसा व्यक्ति है सरकार, शासन, प्रशासन,जनता कहीं भी जिसे माना जाय कि वह भ्रष्ट नहीं हो जायगा।....साफ़-सुथरे पूर्व राष्ट्रपति कलाम/ प्रधान मन्त्री अटल बिहारी बाजपेयी-- क्यों नहीं इस मसले पर आगे आये ? 
         यद्यपि पहल को अच्छा ही कहा जायगा, कहीं से  तो  पहल हो । हां जब तक राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ ,आमूल चूल रूप में  मानवीय आचरण सुधारने के , सांस्कृतिक सुधार के, स्वयं जन जन स्वयं को सुधारने के  उपाय नहीं किये जाते ..भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता |  

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

आज के प्रेरक वाक्य....डा श्याम गुप्त.....

                                                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
             उदारता और प्रमाद ----

"अध स्वप्नस्य निर्विदेSभुन्जातश्च रेवत । उभ्राता वास्त्रिनश्यत: ॥".....  ऋग्वेद १/१२०/१३५५.....

-----असमर्थों को भोजन प्रदान करने तक की उदारता न रखने वाले धनवानों को और आलस्य प्रमाद में पड़े रहने वाले व्यक्तियों को देखकर हमें दुःख होता है क्योंकि उनका शीघ्र ही विनाश सुनिश्चित है |

                     पुरुषार्थ  


"प्र तद्वीचेयं भव्यायेन्दवे ... ॥"   --ऋग्वेद -१/१२९/१४५०.....   जो अपने स्वयम के पुरुषार्थ से प्रगतिशील होकर वृद्धि पाता है वह इंद्र के समान प्रशंसनीय व प्रार्थनीय है ||  अपने स्वयं के बल-योग्यता से कार्य करने वाला , प्रसिद्धि आदि पाने वाला  ही  पुरुषार्थी  है और  सम्मान पाने योग्य |

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

निडर...डा श्याम गुप्त की कविता....

                                                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
उस रात जब लाइब्रेरी के पास,
मैने कहा था -
"क्या तुम्हें डर नहीं लगता?
क्या तुम्हें होस्टल छोड़ दूं ?"-
'डर की क्या बात है, हाँ -
यदि तुम बार बार यही कहते रहे ,
तो मुझे डर है कि-
कहीं मैं डरने न लगूँ '-
तुमने कहा था |
मैं चाहता ही रहा कि-
शायद तुम कभी डरने लगो,
रात की गहराई से , या-
रास्ते की तनहाई से |
पर, तुम तो निडर ही रहीं,
निष्ठुरता की तह तक निर्भीक,
कि मैं स्वयं ही डर गया था ,
तुम्हारी इस निडरता से |
और, अभी तक डरता हूँ मैं कि-
अब कभी मुलाक़ात होगी या नहीं ;
और होगी तो-
मैं क्या कहूंगा, क्या पूछूंगा ?
शायद  यही कि-
क्या तुम अभी तक वैसी ही हो;
निडर और निर्भीक !
और इसी बात से  डरता हूँ  मैं ,
अभी तक ||

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

----दीपयन्ती को १००१ और खिलाडी को एक करोड...डा श्याम गुप्त...

                                                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
         बडी नाइन्साफ़ी है.... दीपयन्ती जिसने लूट कर भागते हुए बदमाश को जान पर खेल कर पकडवाने में कोशिश की उसे सिर्फ़ १००१ रु का पुरस्कार , वो भी कालोनी के नागरिकों द्वारा......और क्रिकेट के खिलाडी जो सिर्फ़ पैसे के लिये खेलते हैं, जिन्हें खेलने के पैसे मिलते हैं और जीतना उनकी जिम्मेदारी है, उन्हें सिर्फ़ एक कप जीतने पर एक-एक करोड रु ,फ़्लेट और न जाने क्या क्या .....क्यों भाई ????? क्या जान पर खेलने की कीमत इतनी कम है और पैसे लेकर खेलने की और भाग्य से जीतजाने की कीमत करोडों ( मेच फ़ीस के अलावा )...
       यूं तो जीतना सभी को अच्छा लगता है, जीत सदा ही अच्छी होती है...पर उसका क्या गुणात्मक लाभ है, आखिर क्या खास बात की है इन खिलाडियों ने, देश को क्या मिल गया, हार जाते तो देश का क्या घट जाता...??? क्या इससे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनाचार ,घोटाले,दुराचरण, कदाचरण , लूट, चोरी ,डकैती , आतन्कवाद कम होजायगा ?? वास्तव में तो और बढेगा ही...अरबों खर्च करके, आयोजनों में लूट-खसोट, बन्दरबांट,भ्रष्टाचार, अनाचार,मेच-फ़िक्सिन्ग, जनता का धन-समय बर्बाद करके....एक कप......
       और कहां से आयेगा देने को  यह धन...मेहनत कश जनता की गाढी कमाई से...... सरकार व आई सी आइ को क्या..उनके घर से थोडे ही जारहा है.......माल मुफ़्त दिले बेरहम....लुटाओ....एक तरफ़ तो जनता महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रही है दूसरी ओर करोडों लुटाये जारहे हैं उन पर जो पहले ही करोड पति हैं....
            खिलाडियों का सम्मान करना चाहिये, यदि वे लाखों रु फ़ीस लेकर देश के लिये खेले तो धन किसलिये......खिलाडियों को भी चाहिये यदि वे वास्तव में देश के लिये खेले तो उन्हें पुरस्कार की राशि लेने से इन्कार कर देना चाहिये, क्योंकि वे अपने एम्प्लोयर से नियमित वेतन व खेलने के लिये फ़ीस लेते ही हैं..... पुरस्कार का अर्थ ही निशुल्क सेवा के लिये सम्मान होता है।

माँ का आह्वान ...डा श्याम गुप्त....

                                                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


       माँ का आह्वान
परम शक्ति माँ से बढकर तो तीन लोक में कुछ भी नहीं,
अतुलनीय माँ  महिमा तेरी,  वर्णन की  मेरी शक्ति नहीं

परम-ब्रह्म के साथ युक्त हो, सृष्टि की रचना करती हो  ,
रक्षक, पालक तुम हो जग की, जग को धारण करती हो।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश,माँ तेरी इच्छा से तन धारण करते ,
महा-शक्ति तेरी स्तुति की, जग में  क्षमता-शक्ति नहीं।
                                     ----परम शक्ति मां……..
तुच्छ बुद्धि तुझ पराशक्ति के ओर-छोर को क्या जाने,
ममतामयी- रूप तेरा ही,  माता वह तो  पहचाने ।

तेरे नव-रूपों के भावों,  पर   अगाध श्रृद्धा  से भर ,
करें अनुसरण और कीर्तन, इससे बढकर भक्ति नहीं ।
                                    -----परम शक्ति मां……
मां आगमन करो इस घर में, हम पूजन,गुण-गान करें,
धूप, दीप, नैवैध्य समर्पण, कर तेरा  आह्वान  करें ।

इन नवरात्रों में मां आकर, हम सबका कल्याण करो,
धरें शीश तेरे चरणों पर, इससे बढकर मुक्ति नहीं ॥
                                  ----परम शक्ति मां……