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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

मंगलवार, 10 मई 2011

भ्रष्टाचार के कारण---५... समाज, संस्कृति व साहित्य --- .डा श्याम गुप्त ....

                                                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

          यूं तो  मानवीय लिप्सा ही प्रत्येक बुराई , अनैतिकता का मूल होती है |   जब -"एक मछली सारे तालाब को गंदा करदेती है" -जैसी कहावत के अनुसार  अधिकांश जन , जन समुदाय इस लिप्सा में सम्मिलित होजाता है तो वह भ्रष्ट आचरण समाज में समाहित होजाता है | धीरे धीरे वह एक नवीन अप-संस्कृति की स्थिति प्राप्त करने लगता है और उस समाज, देश , राष्ट्र की सु-संस्कृति का अध:पतन होने लगता है | इसीके साथ पुरातन संस्कृति के वाहक सत-साहित्य का  धीरे धीरे महत्त्व कम होने लगता है---"-जिमि पाखण्ड विवाद तैं लुप्त होंय सदग्रंथ "  और हास्य-व्यंग्य, चुटुकुले, स्थानीय-वर्णन, स्थानीय-समस्याओं , दैनिक समाचारों युक्त, दैनिक  कलापों ,व्यक्ति- प्रशंसा युक्त  व अश्लील  अप-साहित्य प्रश्रय पाने लगता है जो पुनः एक चक्रीय क्रम में भ्रष्ट-आचरण , अनैतिकता व भ्रष्टाचार को जन्म देता है | 
           आज वही स्थिति है | टीवी , रेडियो, समाचार पत्र, इंटरनेट, ब्लोग्स, बेव साइट्स  जहां भी देखिये ...मूर्खतापूर्ण , भौंडे हास्य वाले, व्यर्थ की कचहरियाँ , करोड़पति, डांस-डांस जैसे अनावश्यक दृश्य-श्रव्य व  पठित साहित्य की भरमार है | राम , कृष्ण आदि के सीरियल अदि भी उल-जुलूल कल्पित कथानकों सहित पेश किये जारहे हैं , जो अनास्था, अश्रृद्धा के साथ अप-संस्कृति को बढ़ावा देते हैं|  कविता  भी समाचार की भाँति दैनिक समाचारों से युक्त बिना किसी सामाधान के परोसी जारही है | सत्साहित्य कहीं लिखा ही नहीं जारहा है , कहाजाता है कि धर्म, समाज, दर्शन आदि पर बहुत लिखा जाचुका अब क्या लिखना है | समाज में यह होरहा है, वह होरहा है आदि बताया/गाया जारहा है, वही लूटमार, दंगे, फसाद, करुणा, भावुकता उत्पन्न करने बाली कथाये , कहानियां, कवितायें  ; क्या व क्यों होना चाहिए वह सत्साहित्य रचा ही नहीं जारहा |  स्व-भाषा, स्व -संस्कृति, स्व-देशी बातें पुरातनपंथी कही जारही हैं | विदेशी रहन सहन, चल-चलन, खान-पान के अपनाने से और अधिक और अधिक धन प्राप्ति/ खर्च की लालसा भ्रष्टाचार का कारण बनरही  है | आज स्व-भाषा हिन्दी की अपेक्षा प्रकाशक गण अंगरेजी की या कोर्स की, कुंजी, सरकारी पुस्तकें आदि छपने व प्रकाशन को  अधिक महत्त्व देरहे हैं , सिर्फ मोटी कमाई की खातिर | सत्साहित्य , काव्य-ग्रन्थ, आदि कोइ भी प्रकाशित करने में रूचि नहीं दिखा रहा |  इस प्रकार विदेशी संस्कृति, विदेशी बाज़ार, विदेशी पूंजी के खुले बाज़ार व मुक्त हस्त आमद-प्रभाव से अनाचार, भ्रष्ट-आचरण को अधिकाधिक प्रश्रय मिलता जारहा है |
          संस्कृति व सांस्कृतिक एवं सामाजिक/ पारिवारिक  आयोजनों के नाम पर  भी तमाम ताम-झाम वाले खर्चीले आयोजन, दिखावा, पार्टियां , दावतें , अनावश्यक सजावटें  आदि में धन-बल   का मनमाना दिखावा बंद होना चाहिए | ये सभी भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करते हैं |
                

पुरा-भारतीय वैदिक साहित्य में आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य---क्रमश :--डा श्याम गुप्ता ....

                                                                                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
१--पृथ्वी का सूर्य के चारों और घूमना ...... पुरा वैज्ञानिक ज्ञान के  भूल जाने के कारण  सूर्य द्वारा पृथ्वी का चक्कर लगाने जैसी अज्ञानपूर्ण  भ्रांतियां उत्पन्न होगयीं थीं -----ऋग्वेद  -३/५४/२९५० में ऋषि कहता है----
"कविर्न्रिचक्षा  अभिषीमचष्ट ऋतस्थ योना विधृते मदन्ती |
नाना चक्राते सदने  यथा  वे:  सामानें क्रतुना संविदाने  || "  ----अर्थात दूरदर्शी लोगों ( विद्वानों ) के दृष्टा --सूर्यदेव-, पृथ्वी को चारों ओर से देखते हैं |  नियम पूर्वक कर्म से परस्पर संयुक्त यह द्यावा-पृथ्वी, पक्षियों के घोंसलों की भाँति जल के गर्भ स्थान अंतरिक्ष में चक्कर लगाते हुए अपने लिए विभिन्न  स्थान बनाती है | 
-----पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण जहाँ तक है वहां तक आकाश पृथ्वी से संयुक्त है अतः द्यावा-पृथ्वी कहागया है ----पृथ्वी अपने वायुमंडल सहित अपनी धुरी पर घूमती हुई सूर्य के चारों ओर विभिन्न स्थितियां बनाती हुई,(ईक्वीनोक्स आदि ) अपनी जगह बनाती हुई चक्कर लगाती है( अतः आवास बनाना कहा गया है )  अतः सूर्य उसे चारों ओर से देखता है |
२-ऋतु परिवर्तन का कारण सूर्य --- ऋग्वेद  ३/५६/२९८९- के अनुसार --
"षड्भारा एको अचरंती भर्त्युतं वर्शिष्ठ्मुप  गाव आगु: | 
तिस्त्रो मही रूप रास्त  स्थुरत्या गुहाद्वे निहिते दर्श्येका ||"     ----एक स्थायी संवत्सर छ : ऋतुओं को वहन करता है | ऋत ( अर्थात निश्चित सत्यानुशासन ) पर चलने वाले अतिश्रेष्ठ आदित्य ( सूर्य ) रूपी संवत्सर( सौर वर्ष) का प्रभाव सूर्य-किरणों से प्राप्त होता है | सतत गतिशील एवं विस्तृत तीनों लोक ( स्वर्ग, अंतरिक्ष , पृथ्वी )क्रमश : उच्चतर स्थानों पर स्थित हैं , उनमें स्वर्ग व अंतरिक्ष सूक्ष्म ( अदृश्य ) व पृथ्वी प्रत्यक्ष ( दृश्य ) है |
-----  ऋतु परिवर्तन का , सौर चक्र का  श्रोत सूर्य है --यह प्रभाव किरणों द्वारा पृथ्वी पर दिखाई देता है परन्तु वास्तव में वह अंतरिक्ष व द्युलोक में हुए परिवर्तनों का प्रतिफल होता है |

रविवार, 1 मई 2011

मार्ग... डा श्याम गुप्त.....

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...  
    मार्ग...


कहा जाता है,
मध्यम मार्ग ही श्रेष्ठ है |
हाँ -
यथास्थिति ,साम्यता व ठहराव -
के लिए यथेष्ठ है |

ठहरी हुई सभ्यता ,
ठहरा हुआ समाज , 
ठहरा हुआ इतिहास,
 ठहरा हुआ व्यक्तित्व-
तालाब के ठहरे-
पानी की तरह होते हैं; जिसमें  -
मेढक , कछुए एवं ,
लिज़लिजाते  हुए कृमि-कीट से अन्यथा-
जीवन नहीं पनपता |

युग परिवर्तन, नव चेतना एवं-
नव सर्जना ;
सत्यानुशासन वादी,
क्रान्तिवादी,
चरम आदर्शवादी ,
अतिवादी, कठोर -
मार्ग ही  लाता है |
क्रांति-दर्शियों को लीक से हटकर,
सत्य के लिए टकराव का ,
अतिवादी मार्ग ही भाता है |

मनु, मूषा, ईशा,
राम कृष्ण हरिश्चंद्र,
लक्ष्मीबाई शिवा प्रताप,
गौतम, गांधी ,दयानंद,
यदि -कठोर सत्य का मार्ग न अपनाते , तो-
कैसे महान कहलाते ?
कहाँ होते फिर,
हमारे पास, हमारे लिए -
वेद  उपनिषद्  महान ,
रामायण गीता पुराण,
महाभारत बाइबल कुरआन ;
इंसान कैसे बनता इंसान,
इंसान कैसे बनता महान || 



शनिवार, 30 अप्रैल 2011

गज़ल---डा श्याम गुप्त....

                                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
इक शब्द बोलने में वो यारो बड़े मगरूर |
क्या पढेंगे ख़त को मेरे कह दीजिये हुज़ूर |

दिल तोड़ना ही सदा जिनकी दास्ताने -दिल,
,दिल जोड़ने की देखिये, नाजो-अदा -गुरूर |

वो समझते हैं भला कब हुश्न का एसा भरम ,
खुश हैं वो ख्वावो-ख्याल में, 'वो हैं बड़े मशहूर' |

जिसने आँखों से न पी हो,वो भला समझे भी क्या ,
प्यास में कैसा नशा है,  इश्क में कैसा शुरूर  |

चाहत है दिल को तोड़ने की,  तोड़ दीजिये,
 श्याम तो इश्के-भरम में डूब के  मजबूर  |।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

बैठे ठाले... आलेख...डा श्याम गुप्त....

                                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                 भला बताइये शून्य क्या है ? आप छूटते ही कहेंगे कि, अजी ,ये क्या बात हुई ! शून्य एक अंक है जो '०' से प्रकट किया जाता है . जिसका अर्थ है -कुछ नहीं, कोइ नहीं, रिक्त स्थान आदि | पर हुज़ूर ! आप यह न समझें कि शून्य एक निरर्थक राशि है या कोइ राशि ही नहीं है |   साहिबान! यह अंक, शब्द या जो भी है, है अत्यंत महत्वपूर्ण व महान | क्या कहा ? क्यों ?  तो लीजिये आपने किसी को १०००० रु दिए और लिखे -'१०००/- दिए ' | अरे ! आप परेशान क्यों हैं ? क्या कहा ? ९००० रु ही रफूचक्कर होगये ! अब रोइए उस महान  शून्य को सिर पकड़ कर |
              इसे बिंदी भी कहा जाता है | अब बिंदी की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह न लगाइए वरना समझ लीजिये बस श्रीमतीजी .......| और कहीं महिला संगठनों को पता चल गया आपकी इस विचार धारा का तो बस ...बेलन-थाली-चिमटा, धरना -प्रदर्शन ..और आप पर महिला-विरोधी होने का.....| अरे तभी तो अपने बिहारी जी भी बहक गए --
"कहत सबै बेंदी दिए , आंकु दस गुनों होत |
तिय लिलार बेंदी दिये, अगणित बढ़त उदोत ||"
                 और याद है वह हिन्दी की बिंदी का कमाल जब स्कूल में इमला सत्र में  -" इत्र बेचने वाले को गंधी कहते हैं "..से बिंदी गायब कर देने पर ....मास्टर जी के .झापड़ ही झापड़ ..|
                 पर इस शून्य का अर्थ कुछ नहीं और महत्त्व बहुत कुछ है...इस विरोधाभास से न तो हम ही संतुष्ट होंगे , न आप ही | इसका अर्थ कुछ और भी है | यदि न जानते हों तो बताये देते हैं कि हिन्दी के प्रश्न- पत्र  में शून्य का अर्थ सिर्फ कुछ नहीं , कोई  नहीं न लिख दीजिएगा, नहीं तो निश्चिन्त रहिये, शून्य ही नसीब होगा | अब जरा आकाश के पर्ययाबाची तो दोहराइए ...समझ गए न | अरे  तभी तो कबीर जी  भी  रहस्य की बात कह गए---
        " सुन्न भवन  में अनहद बाजे,
          जग का साहिब रहता है ||  "
               प्रिय पाठक ! परन्तु इस '0' चिन्ह वाले शून्य को शून्य ही  क्यों कहते हैं | सोचिये | क्योंकि शून्य को आकाश भी कहते हैं और आकाश  है भी शून्य -निर्वात, सुन्न भवन | वह गोल भी है और अनंत भी , जैसे शून्य भी गोल है और अनंत भी | इसकी परिधि पर चक्कर लगाने वाले को छोर कहाँ मिलता है | जैसे क्षितिज की और दौडने वाले को क्षितिज नहीं मिलता | 
             आखिर अपने पूछ ही  लिया ; शून्य का आविष्कारक कौन है | जितने मुंह उतनी बातें , बात से बात निकालने में क्या जाता है ? परन्तु शून्य का अविष्कार एक भारतीय मनीषा द्वारा ही हुआ | इससे पूर्व विश्व- गणना सिर्फ ९ तक ही सीमित थी | इस असीम शून्य के आविष्कार के पश्चात् ही गणित व भौतिकी अस्तित्व में आये | ससीम मानव की मेधा असीम की और बढ़ी | सभ्यता को आगे चढ़ने का सोपान प्राप्त हुआ | संसार गणित पर आधारित है और गणित शून्य पर | मानव की ज्ञान व प्रकृति नियमन के चरमोत्कर्ष   की युग-गाथा  कम्प्युटर-विज्ञान भी तो शून्य आधारित सिद्धांत की भाषा-भूमि पर टिका है ; जिसके कारण आज मानव स्वयं सोचने वाले रोबोट-यंत्र-मानव बनाकर मानव के सृष्टा होने का सुस्वप्न देखकर ईश्वरत्व के निकट पहुँचने को प्रयास-रत है | और......खैर छोडिये भी....कहाँ आगये " आये थे हर भजन को ओटन लगे कपास " |
          हाँ तो आपने शून्य का अर्थ और महत्त्व समझ लिया | परन्तु श्रीमान ! यदि अप शिक्षार्थी, विद्यार्थी, परीक्षार्थी हैं तो शून्य के महत्त्व को कुछ अधिक ही अधिग्रहण करके परीक्षा में भी शून्य ही लाने  का  यत्न न करें , अन्यथा फिर एक वर्ष तक शून्य का सर पकड़ कर रोइयेगा |

                     चलिए अब तो अप शून्य का अर्थ समझ ही गए | क्या कहा ! अब भी नहीं समझे ? तो शून्य की भाँति शून्य के चक्कर लगाते रहिये , कभी तो समझ ही जायेंगे ---
           "लगा रह दर किनारे पर, कभी तो लहर आयेगी "
                       शायद अब तो आप समझ ही गए की शून्य क्या है |यदि अब भी न समझे तो हम क्या करें , आपका मष्तिष्क ही शून्य है और आपकी अक्ल भी शून्य में घास चराने चली गयी है | आपका वर्तमान व भविष्य भी शून्य का भूत ही है | हम तो उस कहावत को सोच के डर रहे हैं कि..." खाली दिमाग शैतान का घर होता है |"

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार के कारण--४....शासन, प्रशासन, बाबू-अफ़सर....

                                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
            शासन -प्रशासन में भ्रष्टाचार की गाथा तो बहुत पुरानी है  और सर्वाधिक चर्चित है। यद्यपि प्राचीन समय में प्रायः  दुश्मन के भेद लेने के लिए, किला भेदने आदि के रूप में युद्धकाल में  ही  उत्कोच के रूप में इस प्रथा का प्रयोग किया जाता था | वह भी पाश्चात्य प्रभाव से भारत में फैलना प्रारम्भ हुआ | सिकंदर व तत्पश्चात विदेशियों के आक्रमण के फलस्वरूप छल-छद्म द्वारा युद्ध जीतने की प्रथा प्रारम्भ हुई और राज्यकर्मचारियों व अधिकारियों आदि को  उत्कोच की भी ; जो मुगलों के काल में और अधिक प्रभावी हुई | भारत में शासन -प्रशासन में भ्रष्टाचार का अधिक प्रचलन ईस्ट इंडिया कंपनी के समय  अफसरों द्वारा पिटे-पिटाए भारतीय राजे- महाराजे, नबाव आदि को चुप रखने के लिए डालियाँ आदि भेजने से हुई , जो स्वयं उनके अपने अफसरों -मातहतों में ( भारत में पोस्टिंग या वापस जाने की सिफारिस हेतु ) प्रचलित होकर रस्म बन गयी | हिन्दुस्तानी चपरासी /बाबू जो बहुत कम पगार वाले होते थे  (-अफसर सदैव अँगरेज़ होते थे ) अफसरों को खुश करने के लिए , उनकी नक़ल हेतु अपना ज़लवा दिखाने के लिए सामान्य जन से भेंट लेने लगे और रिश्वत --भ्रष्टाचार का तंत्र स्थापित होने लगा | बाद में ब्रिटिश शासन में  बड़े बड़े दफ्तर, पुलिस  , मालगुजारी , चुंगी, लगान, क़ानून , अदालतें  व  भिन्न भिन्न करों आदि का क्रूरतापूर्वक बसूली व देश-संपदा दोहन के क्रम  में भ्रष्टाचार प्रगति पाता गया | शासन-प्रशासन रूपी शेर के मुंह लगा हुआ खून स्वतन्त्रता के पश्चात विज्ञजनों/ राजनेताओं  द्वारा कोई निश्चित भारतीय प्रणाली व उच्च -प्रतीकों की स्थापना की बजाय आजादी के फल बटोरना प्रारम्भ कर  देने से सभी --जन जन इसी कमाने खाने में  में जुट गया और भ्रष्टाचार बढ़ता ही गया , जो अन्य कारणों से ऊपर ..राजनेताओं और नीचे सामान्य जन जन में विषाणु की भांति प्रभावी होता गया, और रही सही कसर तथाकथित प्रगतिशीलता ,  उदारवादीनीति के तहत  विदेशी संस्कृति, अति-सुविधाभोगी जीवन पद्धति  बाज़ारवादी संस्कृति, बहु-देशीय कंपनियों के बाजार पर कब्जे से पूरी होगई ... जैसी आज स्थिति है , कोई काम किसी भी दफ्तर में बिना सुविधा शुल्क चुकाए नहीं होता |
क्या होना चाहिए---- सबसे कठिन कार्य है , क्योंकि सभी ऊपर से नीचे तक एक दूसरे से जुड़े होते हैं अतः कौन किसके विरुद्ध कहे, लिखे, गवाही दे, एक्शन ले ?
   १- भ्रष्टाचार-निरोधी संस्थाओं को कठोर कदम उठाने होंगे --  नियमों, कानूनों का कठोरता से पालन ताकि कोई भ्रष्ट बचने न पाए| 
   २-सरकारी व प्राइवेट सभी दफ्तरों आदि में पारदर्शिता के उपाय करने चाहिए, प्रत्येक कार्य के लिए समय-सीमा निर्धारित होनी चाहिए |
   ३-मानवीय लिप्सा व सुविधाभोगी संस्कृति की रोक थाम------विज्ञान, तकनीक, व आधुनीकरण के अन्धानुकरण में हर जगह वातानुकूलित संयन्त्र, हर हाथ में अनावश्यक मोबाइल, कम्प्यूटर, लेपटोप,आई-पोड आदि व पश्चिम के अन्धानुकरण में धन- शराव, शराव-शबाव का प्रदर्शन व अन्धाधुन्ध प्रयोग। परिवार तो मोलेक्यूलर होगये परन्तु हर परिवार - चार घर, चार कार, चार एसी, चार लेपटोप वाला होगय, यह सब व्यक्ति को रिश्वत खोरी की और आकर्षित करता है |
       अधिक पैसा-कमाई व अधिक मोटी-मोटी पगारशेयर, बचत, विदेशी-कर्ज़, लोन-संस्क्रिति के कारणजितने का भी मिले, जैसे भी मिले, जहां भी मिले- लेलो”  की नीति पनपने से भ्रष्ट-आचरण व भ्रष्टाचार को पैर पसारने की अनुमति मिलती है।
    ४-बहुत से अकर्मों को प्रश्रय न देना हर आदमी का शेयर में लगे रहना, अनावश्यक बचत, अधिकाधिक खेल, संगीत, मनोरंजन, फ़ूहड-हास्य, शास्त्र-धर्म-न्रीति के विरोधी प्रहसन, सीरियल, नाटक । विदेशी नकलपर नाटक, अन्ग्रेज़ी/ व हिन्दुस्तानी अन्ग्रेजों की लिखी, तथाकथित विदेशी पुरस्कार प्राप्त व्यर्थ की बडी-बडी पुस्तकें,---ईश-निन्दा-शास्त्र निन्दा पर अनावश्यक आलेख । प्रायोजित लेखकों, तथाकथित इतिहासकारों, कालम-लेखकों जो सिर्फ़ धन्धे के लिये, पैसे के लिये -–बच्चों, स्त्री, मनोविज्ञान  के नाम पर माता-पिता को सीख आदि द्वारा- आने वाली संतति में अश्रद्धा, अनास्था के बीज डालते हैंऔर सब चलता है-की सीख द्वारा उसे अनाचरण व भ्रष्टाचार के मार्ग पर जाने को जाने-अनजाने बढावा देते हैं ।
    ५ -अनाचरण-दुराचरणउपरोक्त जीवन प्रणाली का प्रभावी परिणाम, मानवीय दुराचरण होता है और भ्रष्टाचार का मूल कारक बनता है। मनुष्य के भ्रष्टाचार के कारण ही भ्रष्टाचार संस्थागत होने लगता है और समाज में पसारने लगता है ,फिर समेटे नहीं सिमटता |
        



        
       

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

एक प्रेरक सूत्र--- आत्म-बल...

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...  

 -----ऋग्वेद -मंडल ४/सू. १६/ २३२७.... में ऋषि का कथन है कि....
                        "  """""""यानि कृत्सेन सरथम वस्यु स्तोये वातस्य हर्योरीशान: |
               ऋज्रा वाजं न गध्यं युयूषांक विहर्य हन्यामपि भूयात  ||"-------  
                 अर्थात---  जब दूरदर्शी कुत्स योग्य अन्न की भाँति ऋजुता-सरलता को अपनाकर पार होने के लिए तत्पर होता है तब उसके रक्षण की कामना से इन्द्रदेव उसीके रथ पर सवार हो जाते हैं |
                 -----कुंठाग्रस्त साधक( या किसी भी कर्म में  रुकावट से आतंकित होकर रुक जाने वाला मानव ) जब अपनी दूरदर्शिता का प्रयोग करके सहज भाव से अपनी कुंठा के कारणों( मार्ग की रुकावटों को स्वयं दूर करने का प्रयत्न ) को दूर करने के लिए संकल्पित होता है( स्वयं उठा खड़ा  होता है, इच्छा शक्ति का प्रयोग करता है  ) तो इन्द्रदेव--अर्थात उसका स्वयम की शक्ति आत्म-संकल्प=आत्मबल = सेल्फ  भी उसका मनोरथ पूर्ण करने के लिए. उसके साथ होजाते हैं,  उसका साथ देने लगते हैं |