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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

बाल गीत -----विष्णु भगवान .....डा श्याम गुप्त....

                                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
चित्र-- गूगल साभार
शंख-चक्र औ गदा-पद्म कर,
रूप चतुर्भुज सदा सुहाए |
मृदु मुस्कान सदा आनन पर,
सदा ध्यान-रत मुद्रा  भाये ||

शेषनाग की शैया स्थित,
श्यामल छवि मन को मोहे |
नीलकमल से लोचन जिनके ,
बैजंती माला उर सोहे ||

बच्चो ! ये भगवान विष्णु हैं ,
जो सब जग का पालन करते |
रहें  ध्यान-मुद्रा में  बहुधा,
सारे जग को देखते रहते ||

जब जब दुष्ट अधर्मी पापी,
करते जग में अत्याचार |
उन्हें मिटाने तब तब ये ही,
लेते पृथ्वी पर अवतार ||

सत्य घोष है अर्थ शंख का,
दुष्ट दमन बल गदा बताए |
सृष्टि नियामक-भाव चक्र, कर -
पद्म,  श्री-समृद्धि सुहाए ||

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

आलेख--हिन्दी साहित्य व आज का समाज .....डा श्याम गुप्त ....

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                         हिन्दी  साहित्य और आज का  समाज ....पर क्या कहा जाय !  विशद भाव में कोई  अति उत्साह जनक स्थित नहीं है |  आज हिन्दी साहित्य ही नहीं अपितु  साहित्य ही समाज के हाशिये पर है |  इस स्थिति के यद्यपि विभिन्न कारण गिनाये जा सकते हैं  परन्तु मूल दोषी तो हम ही हैं...स्वयं साहित्यकार ही हैं | इसे हम नकार नहीं सकते | स्वयं के सामाजिक व साहित्यिक दायित्व से स्वयं  साहित्यकार ही दूर होगये हैं | 
                      यद्यपि आज  काव्य व सभी साहित्य लिखा तो खूब जारहा है परन्तु पढ़ा नहीं जारहा ;  क्योंकि आज कवि व साहित्यकार में काव्य-कौशल व गुणवत्ता की कमी   है |  धैर्य  की कमी है |  वह प्राय:  अल्पज्ञता व मूल्यहीनता  की स्थिति में है |  समर्पण भाव की अपेक्षा  निज हित लाभ प्रधान  हो चला है |  मूल्य हीन .......न तो अच्छा साहित्यकार हों सकता है  न घास छीलने वाला |
                   कठिन शब्दावली, दूरस्थ भाव, शब्दाडम्बर, अमूर्तता , रहस्यमयता , चमत्कारिकता, उक्ति वैचित्र्य मय भाषा , क्लिष्ट -भाषा ....कला का चमत्कार तो होसकता है परन्तु  जन जन, जन सामान्य से मुक्त  भाव-सम्प्रेषण योग्य  नहीं, साहित्य की उन्नयन कारक  नहीं |  इसी प्रकार अशुद्ध भाषा,  शब्दावली व व्याकरण, अस्पष्ट  भाव , कथ्य व विषय भाव ...साहित्य की अवनति कारक के साथ साथ जन सामान्य में असम्प्रेषण के कारण  भ्रम, अनास्था   व अरुचि उत्पन्न करती है |
                 आज कविता व साहित्य को न कोई पढ़ता है न सुनता है | स्थिति यह है कि कवि व साहित्यकार स्वयं  ही लिखते हैं, प्रकाशित कराते हैं, स्वयं ही पढते, सुनते -सुनाते हैं |  स्वयं साहित्यकार ही अन्य साहित्यकार के समारोह में उपस्थित होकर उत्साहवर्धन नहीं करते  जब तक कि वहाँ  स्वयं उनका मंचीय योगदान न हो | जब तक साहित्यकार निजी-हित वाली प्रवृत्ति से उभरकर साहित्य-समाज-संस्कृति हित की प्रवृत्ति का पोषण  नहीं करेंगे ..समाज में साहित्य का प्रसारण नहीं होगा |  आज के मूल्यहीनता के युग में यह आवश्यक भी है एवं साहित्यकार का नैतिक दायित्व भी |
                       हिन्दी साहित्य की इस स्थिति के अन्य कारण भी हैं |  पाश्चात्य शिक्षा-संस्कृति शैली  का उन्मुक्त फैलाव | राजनैतिक उठा-पटक,  लोलुपता  में किसी को साहित्य-समाज पर ध्यान देने का भान ही नहीं है |  गली-गली में खुले समाचार-पत्र, राजनैतिक , व्यक्तिगत, संस्थागत समाचार पत्रों व पत्रिकाओं की भीड़  का उद्भव ; जहां साहित्यिक-भाव पोषण की अपेक्षा निज-हित, स्व-समाज हित, स्व-संस्था हित, स्व-संगठन, स्व-भाषा  जैसे अनेकों स्व-हित-भाव प्रमुख होजाते हैं | साहित्य का अर्थ पत्रकारिता, समाचार-लेखन, अंग्रेज़ी-हिन्दी जासूसी उपन्यास लेखन , समाचार पत्र-पत्रिकाओं का सर्कुलेशन  ही रह जाता है  |
                   राज्यों के हिन्दी संस्थानों की कार्यशैली -क्रियाविधि भी काम चलाऊ ही है |  साहित्य के प्रोत्साहन हेतु ठोस योजनाओं, कार्यों व कार्यान्वन की इच्छा का अभाव है |  साहित्यिक संगठनों की गुट बाज़ी,  विशिष्ट वर्गों,  विषयों के खाँचों में बंटा साहित्य , यथा...नारी विमर्श, नारी साहित्य, बाल साहित्य, दलित साहित्य, दलित-विमर्श ...छंदीय काव्य संगठन, नव-गीत संस्था , प्रगतिशील साहित्यिक संस्था आदि अलगाव वादी साहित्य व साहित्यिक सोच ने मूल्यहीनता, गुण हीनता  द्वारा पाठक वर्ग में -जन सामान्य में -स्वयं कवि-साहित्यकार  वर्ग में , विज्ञ जनों में ...समाज में एक भ्रम, अनिश्चितता  की स्थिति द्वारा एक वैचारिक व भाव शून्यता उत्पन्न की है | साहित्य कब दलित होता है ? क्या हम दलित वर्ग को समाज से पृथक करके देखना चाहते हैं ? सामाजिक -सांस्कृतिक समन्वय यदि साहित्यं , या समाज के  बुद्धिवादी व विज्ञजन में सर्वोच्च पायदान  पर स्थित साहित्यकार ही नहीं करेगा तो फिर कौन करेगा ?  क्या नारी  या नारी पर कोई गाथा समाज व पुरुष के बिना लिखी कही व सोची जा सकती है  स्त्री-पुरुष कब पृथक पृथक जाने , कहे, गाये व सोचे गए या सोचे जा सकते हैं ? फिर नारी विमर्श का क्या अर्थ ?  क्षेत्रीय बोलियों  को हिन्दी भाषा से पृथक रचना -संसार के प्रचलन  का प्रश्रय देने से , हिन्दी भाषा व साहित्यं की गतिमयता  रुकी है | उर्दू-फारसी प्रधान गज़ल की हाला-प्याला वाली लुभावनी शैली ने भी हिन्दी कविता को हानि  पहुंचाई है |  प्रकाशकों, विक्रेताओं द्वारा बाजारवाद के प्रभाववश काव्य व साहित्यिक प्रकाशनों की उपेक्षा एक महत्वपूर्ण कारण है |
                      हिन्दी सिनेमा ने हिन्दी भाषा को प्रसारित तो किया है परन्तु समाज को  साहित्य व साहित्यिकता से दूर किया है \ आज कल्पित विज्ञान कथाएं , फंतासी, अमेरिकन/योरोपियन अनूदित कथाओं पर आधारित चलचित्रों, नाटकों ,काव्य-कलाओं  व अप-साहित्य ने भारतीय व हिन्दी साहित्य को चोट पहुंचाई है |अपने एतिहासिक , पौराणिक व जन जन में बसे साहित्य के निरूपण व पुनर्लेखन की उपेक्षा, जन जन के, जन सामान्य के व पाठक वर्ग के साहित्य से दूर होने का एक प्रमुख कारण है | यद्यपि अभी हाल में ही व यदा-कदा कुछ टीवी सीरयल अपने प्राचीन गौरव के प्रतिस्थापक बने व प्रसारित हुए हैं , जो एक शुभ लक्षण है |
                  इस प्रकार हिन्दी साहित्य के प्रचार प्रसार व गुणवत्ता का सारा भार विभिन्न व्यक्तिगत साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं पर आजाता है जो प्राय: अर्थाभाव, समाज व स्थानीय शासन-प्रशासन के असहयोग के कारण क्रियाशील नहीं रह पातीं |  फिर भी कुछ संस्थाएं विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा यह गुरुतर दायित्व उठाये जारही हैं यह अँधेरे में आशा की किरण तो है ही |

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

छिद्रान्वेषण ----ये कहाँ जारहे हैं हम......ड़ा श्याम गुप्त ...

                                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                       प्रायः प्रगतिवादी विज्ञजन आंग्ल संस्कृति/ वैचारिक प्रभाव वश ..पोज़िटिव  थिंकिंग, आधे भरे गिलास को देखो ....आदि कहावतें कहते पाए जाते हैं  ...परन्तु गुणात्मक ( धनात्मक + नकारात्मक ) सोच ..सावधानी पूर्ण सोच होती है..जो आगामी व वर्त्तमान खतरों से आगाह करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |  देखिये  आज के छिद्रान्वेषण  ....
१-  वैज्ञानिक व प्रगतिवादी समाज का असत्याचरण ----अभी तक तो हम सिगरेटों के पैकों / विज्ञापनों पर छोटे छोटे महीन अक्षरों में  .." सिगरेट / तम्बाकू स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है"....के विज्ञापन देकर ही अपनी कर्तव्य की इतिश्री मानते रहे हैं........   अब देखिये इस विज्ञापन को ...न्यूनतम ई एम् आई  १७२५  बड़े अक्षरों में और प्रति लाख छोटे में --क्या इससे कार की न्यूनतम किश्त १७२५/ का भ्रम  नहीं होता | बहुत छोटे अक्षरों में ...नियम व शर्तें लागू ...भी लिखा होगा .....क्यों ?? क्या यह धोखा देने की मूल नीयत नहीं प्रदर्शित होती.....कहाँ है सरकारी नियामक तंत्र...सामाजिक संस्थाएं.....समाचार पत्रों का सामाजिक दायित्व ...
            माना कि यह व्यावसायिक मेनेजमेंट -कौशल है....उन्हें अपनी कार बेचनी है ...इसीलिये तो बाज़ार में पूंजी लगाकर बैठे हैं......पर क्या उनका कोई सामाजिक दायित्व नहीं .....फिर नटवर लाल ,  बेईमानी में पकडे जाने वाले उठाईगीरे  व इनमें क्या अंतर है ......हम सोचेंगे ???
२- साहित्यिक  जगत में --दायित्वहीन, विचारहीन  सोच के कुछ उदाहरण ----
       एक-कवि सम्मलेन में  कोई कवि . पढते हैं------
                             "राम तो बस चुनाव जीतने के लिए भुनाए जाते हैं,
                              रावण तो जलाकर भी सैकड़ों चूल्हे जला जाते हैं ||"  ----- क्या यह राजनैतिक पक्षधरता का साहित्य नहीं है, क्या यह  सदियों की , जन जन की आस्था पर प्रहार नहीं है , क्या आप रावण को राम के ऊपर प्रश्रय देना चाहते हैं ??   इसी प्रकार एक और कवि  पढते हैं---
                               राजनीति हमारे देश का राष्ट्रीय उद्योग है ,
                              जनता की आशाओं पर रेत के महलों का अजूबा प्रयोग है ||........क्या हम बिना राजनीति के देश चलाना चाहते हैं ...क्या यह संभव है ?.... एसी कवितायें सामयिक वाह  वाह --तालियां  तो बटोर सकती हैं पर सामाजिक दायित्व से परे अनास्था उत्पन्न करती हैं | .आखिर इन सब अतार्किकताओं से जन जन का संस्थाओं पर  अनास्था, अविश्वास  उत्पन्न करके हम क्या पाना चाहते हैं ---
      दो--केसर कस्तूरी ---कथा वाचन में --बेटी कहती है ---"राजा जनक ने सीता को दुःख सहने के लिए छोड़ दिया था | यही औरतों का भाग्य है |".......सुनाने में बड़ा भावुक-करुण  लगता है ... इसे अपराध बोध की कहानी व स्त्री विमर्श ..कहा जाता रहा  है पर यह हमें कहाँ लिए जारहा है....... क्या चाहती हैं महिलायें / तथाकथित प्रगतिशील समाज / साहित्यकार ......क्या जनक सीता को राम के साथ जाने देने की अपेक्षा ...स्वयं अपने महलों में रखलेते ......क्या हम चाहते हैं कि जिस पत्नी/ नारी  ने सुख के दिनों में ...जिस पुरुष /पति के साथ मज़े  लिए, सुख भोग किया ...वह दुःख के दिनों में पिता के घर ...आनंद भोगे और पति को जंगल में दुःख सहने को छोड़ दे ...बिना  उसके किसी कसूर के....
    तीन--लन्दन में स्थापित --प्रगतिशील लेखक मंच --का कथन है कि वामपंथी विचारधारा से ही छोटे छोटे शहरों के  महत्वपूर्ण लेखकों का निर्माण व विकास हुआ है...उदाहरण---सज्जाद ज़हीर , फैज़, जोश, फिराक, सरदार जाफरी, ताम्बा , साहिर, कैफी आज़मी , कृष्ण चंदर, मंटो, नागार्जुन, मुक्तिबोध , केदार नाथ , त्रिलोचन, यशपाल ,नंबर सिंह ...आदि ..भारतीय विचार धारा के विरोधी ....विदेशी वामपंथी सोच के साहित्यकार ही साहित्यकार  हैं...... भारतीय विचार धारा के साहित्यकारों --मैथिली शरण गुप्त, निराला, दिनकर, महादेवी, प्रसाद, की कोई अहमियत नहीं है, न आज के भारतीय विचार धारा पर लिखे जारहे साहित्य -साहित्यकारों ने कुछ किया है..........तो फिर आज जन-समाज में साहित्य व कविता के प्रति अरुचि का   कारण कहाँ स्थित है .....शायद इसी  प्रगतिशीलता की जिद में  स्व-समाज..संस्कृति, सदियों से प्रतिष्ठित भारतीय संस्कृति के  पतनोन्नयन में ....
                         ये सारे कारण, साहित्यिक / सामाजिक अवैचारिकता, अतार्किकता,  मूल्यहीनता, --समाज में जन जन को भ्रम, अतार्किकता, अवैचारिकता, अनास्था, मूल्यहीनता के स्थिति में डालते हैं....और जन जन -- साहित्य, सामाजिकता,  नैतिकता  से आस्थाहीन होकर ..उससे दूर होकर ...फिर उसी सदा  सुलभ भौतिकता के चरणों में जा बैठता है .....शान्ति खोजने लगता है ...अनाचरण ...भ्रष्ट-आचरण ...व  आज के द्वंद्वों का यही मूल कारण है ||




मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

एक नव गीत ----ड़ा श्याम गुप्त...

                                      ...कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

       भरी  उमस में ....

आओ आज लगाएं घावों पर,
गीतों के मरहम ||

 मन में है तेज़ाब भरा पर,
 गीतों का भी डेरा |
मेरे गीतों में तल्खी  है,
दोष नहीं है मेरा |
मेरा अपना काव्य बोध,
अपनी दायित्व ठसक है |
मेरी अपनी ताल औ धुन है,
अपनी सोच समझ है |
भरी उमस में कैसे गायें ,
प्रेम प्रीति प्रियतम |   

             आओ आज लगाएं घावों पर,
             गीतों के मरहम ||

जो कुछ देखा वही कहा है,
कल्पित भाव नहीं है |
जो कुछ मिला वही लौटाता ,
कुछ भी नया नहीं है |
हमको थी उम्मीद खिलेंगे,
इन बगियों वे फूल |
किन्तु हर जगह उगे हुए हैं,
कांटे और बबूल |
टूट चुके हैं आज समय की,
साँसों के दमखम |

             आओ आज लगाएं घावों पर,
            गीतों के मरहम ||

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

माता के गुणगान में दो हरिगीतिका छंद....

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                  माँ शारदे ! 
( हरिगीतिका छंद -- २८ मात्रा , चार चरण, चरणान्त में लघु -गुरु , तुकांत )


माँ शारदे आराधना ही  ज्ञान का आधार है |
माँ वाग्देवी,वीणा-वादिनि ज्ञान का भण्डार है |
माता सरस्वति,मातु वाणी ज्ञान का आगार है |
मातु अर्चन-साधना ही साहित्य का संसार है ||



हम  हैं शरण में आपकी माँ ज्ञान के स्वर दीजिए |
सुख-शान्ति का वातावरण जग में रहे वर दीजिए |
कवि हों सुहृद समर्थ सात्विक सौख्य स्वर परिपूर्ण हों |
साहित्य हो सुंदर शिवं सत-तथ्य शुचि  सम्पूर्ण हों ||

 

बुधवार, 28 सितंबर 2011

प्रथम नवरात्र पर माँ का आह्वान ----- ड़ा श्याम गुप्त

                                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


   
     माँ का आह्वान
परमशक्ति मां से बढकर तो तीन लोक में कुछ भी नहीं,
अतुलनीय मां महिमा तेरी, वर्णन की मेरी शक्ति नहीं

परम-ब्रह्म के साथ युक्त हो, श्रिष्टि रचना करती हो ,
रक्षक-पालक तुम हो जग की,जग को धारण करती हो।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश मां तेरी इच्छा से तन धारण करते ,
महा-शक्ति तेरी स्तुति की, जग में क्षमता-शक्ति नहीं।
                                     ----परम शक्ति मां……..||
तुच्छबुद्धि तुझ पराशक्ति के ओर-छोर को क्या जाने,
ममतामयी रूप तेरा ही, माता वह तो पहचाने ।

तेरे नव-रूपों के भावों परअगाध श्रद्धा से भर,
करें अनुसरण और कीर्तन, इससे बढकर भक्ति नहीं ।
                                     -----परम शक्ति मां……||
मां आगमन करो इस घर में, हम पूजन,गुण-गान करें,
धूप, दीप, नैवैध्य समर्पण, कर तेरा आह्वान करें ।

इन नवरात्रों में मां आकर, हम सबका कल्याण करो,
धरें शीश तेरे चरणों पर, इससे बढकर मुक्ति नहीं ॥

                                    ----परम शक्ति मां…… ||
          

सोमवार, 26 सितंबर 2011

वेद व गीता पर दुरभिसंधि ..पर प्रत्युत्तर....ड़ा श्याम गुप्त...

                                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                         धर्म की बात ...ब्लॉग पर हिदू धर्म व गीता के विरुद्ध कुछ प्रश्न व शंकाएं खड़ी की गयी हैं जो निम्न हैं... इन सर्वथा असत्याचरण पूर्ण, अज्ञानतापूर्ण शरारत पूर्ण  बातों का  हम साथ ही साथ प्रत्येक का बिन्दुवार निराकरण करेंगे....
 धर्म की बात-
Monday, May 16, 2011 --''वेदों की निंदक गीता''

          पुस्‍तक ''क्‍या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्‍दू धर्म?'' डा. सुरेन्‍द्र कुमार शर्मा 'अज्ञात' विषय ''वेदों की निंदक गीता'' में लिखते हैं कि वेद और गीता के अतिरिक्ति सभी धर्म ग्रंथ मानव रचित माने जाते हैं ...वेदों और गीता का विषयगत विश्‍लेषण इस निर्णय पर ले जाता है कि ये दोनों धर्म ग्रंथ एक ही 'धर्म' के नहीं हो सकते और न ही इन का र‍चयिता एक ही तथाकथित परमात्‍मा हो सकता है-----
-वेदों में जगह जगह इच्‍छा और कामना पर बल दिया गया है-
      कुर्वन्‍नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्‍छतं समाः
     एवं त्‍वयि नान्‍य‍थेतोऽस्ति न कर्म लिप्‍यते नरे- यजु 40/2
       ---अर्थातः हे मनुष्‍यों, कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्‍छा करो

जबकि गीता कहती है-----मा कर्मफलहेतुर्भूः - गीता 2/47.....अयुक्‍त- काकारेण फले सक्‍तो निबध्‍यते - गीता 5/12
अर्थात फल की इच्‍छा रखने वाले व्‍यक्ति फल में आसक्‍त होते हैा और बंधन में पड़ते हैं..

---निराकरण ---कोई  बच्चा भी उपरोक्त को पढकर जान सकता है कि वेदों में इच्छाओं व कामनाओं पर नहीं अपितु उचित सत्कर्म करने पर बल दिया गया है ...न कर्म लिप्यते नर..अर्थात कर्मों  में लिप्त नहीं होना है ....वही भाव गीता में है .......कर्म तो करना है पर फल की इच्छा से नहीं ....

-वेदों की ऐसी खाल तो नास्तिकों ने भी नहीं उतारी होगी जैसी गीता ने उतारी है, गीता -में वेदों के नाम पर गलत बयानी की गई है, वेदों में कहीं भी ईश्‍वर को 'पुरूषोत्‍तम' नहीं कहा गया, लेकिन गीता के 15 वें अध्‍याय में गीता का वक्‍ता स्‍वयंभू ईश्‍वर कहता हैः
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित- पुरूषोत्तमः - 15/18
अर्थात में लोक और वेद में 'पुरूषोत्तम' के नाम से प्रसिद्ध हूं


----निराकरण -- वेदों में प्रसिद्द ..श्लोक ... अणो अणीयान, महतो महीयान ...कहा गया है ईश्वर को .......श्वेताश्वेतरोपनिषद में ....समाहुग्रयं पुरुष महान्तं ....कहा गया है  इन का अर्थ 'पुरुषोत्तम ही है.....
 
-वेदों में  अवतारवाद का सिद्धांत है, वेदों में परमात्‍मा के अवतार धारण करने का कहीं उल्‍लेख नहीं मिलता, पर गीता का यह एक प्रमुख सिद्धांत है......
यदा यदा हि धर्मस्‍य ग्‍लानिर्भवति भारत
अभ्‍युतथानमधर्मस्‍य तदात्‍मानं सृजाम्‍यहम
परित्राणाय साध्‍ूनां विनाशाय च दुष्‍क़ताम्
धर्म संस्‍थापनार्थाय संभवामि युगेयुगे - गीता 4/7-8-अर्थात जब जब धर्म की ग्‍लानि होती और अधर्म की उन्‍नति होती है, तब तब मैं अर्थात (भगवान कृष्‍ण) पैदा होता हूं, साधुओ की रक्षा और पापियों के विनाश के लिए तथा धर्म को स्थापित करने के लिए मैं हर युग में पैदा होता है |

 -निराकरण ---  सही है गीता व सभी अवतार  वेदों के बहुत बाद की बातें है .... वेदों में अवतारका वर्णन  कैसे होगा ........सृष्टि के समय ब्रह्मा द्वारा. सृष्टि रचना पर ऋग्वेद में कहा गया  है........उन्होंने --- यथा पूर्वम अकल्पयत ....अर्थात प्रत्येक कल्प में, युग में नवीन सृष्टि ....पूर्व के समान ही होती है......यह सूत्र रूप में अवतारवाद की अवधारणा है |.....
४-क धर्म के दो धर्मग्रंथों में ऐसा पारस्‍पारिक विरोध हिन्‍दू धर्म की ही विशेषता है, हम दोनों धर्म ग्रंथों में से एक को पूरी तरह अस्‍वीकार करें, विद्वानों का एक विशेषतः आर्यसमाजियों ने पिछली शताब्‍दी में ही वेद और गीता के इस पारस्‍पारिक विरोध को पहचान कर अपने अपने ढंग से इस का परिहार करने की कोशिशें शुरू कर दी थीं
स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती के शिष्‍य प. भीमसेन शर्मा ने इस और सब से प्रथम ध्‍यान दिया और कदम भी उठाया, उन्‍होंने देखा कि गीता का ईश्‍वर साकार है जो वेदों में कथित निराकार ईश्‍वर के सिद्धांत के विपरीत है अत- उन्‍होंने जिस जिस श्‍लोक में भी 'अहं' या पद 'मा' पद देखा उस उस श्‍लोक को झट अर्ध चन्‍द्र दे कर बाहर निकाल दिया और लगभग 238 श्‍लोकों को प्रक्षिप्‍त बता कर निकाल बाहर किया,
आर्यसमाजियों के विद्वतापूर्ण् प्रयासों से वेद और गीता के मध्‍य की खाई और गहरी हो गयी है, लगता है गीता भक्‍तों और वेदानुयायियों में ध्रुवीकरण हो जायेगा, इस के साथ ही जनता में फैलाया व फैला यह अंधविश्‍वास कि 'वेद और गीता एक ही चीज हैं' भी समाप्‍त हो जाएगा

---निराकरण----तेत्तिरीयोपनिषद में ( यथा -यजुर्वेद )---कथन है... असद इदमग्रे  आसीत, ततौ वे सदजायत ....वह निराकार था उससे साकार की उत्पत्ति हुई........ईश्वर-ब्रह्म   दोनों रूप है, अपने मूल रूप में ..निराकार और लौकिक ..संसारी माया रूप -जीव रूप में... साकार ..ज्ञानी लोग ही यह जान पाते हैं ......यही गीता में भी दर्शाया गया है, वेदों की शिक्षा का मूल सार ही गीता में प्रतिपादित किया गया है | सत्यार्थ प्रकाश में भी यही समन्वयवाद है |
..........
-५-गीता ---सब एक ही ब्रह्म के रचे हुए हैं सुनिए कृष्‍ण के द्वारा ही-
ॐ तत्‍सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्‍पृतः
ब्राह्मणास्‍तेन वेदाश्‍च यज्ञाश्‍च विहिता पुरा - गीता 17/23
अर्थात हे अर्जुन, ओम् तत, सत ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानंदधन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेदा यज्ञ आदि रचे गए हैं
  ...गीता में कृष्‍ण स्‍्पष्‍ट घोषना कर रहे हैं कि सब से प्रमुख वेद सामवेद में ही हूं-
वेदानां सामवेदास्मि - गीता 10/22

---निराकरण --- सत्य ही तो है श्री कृष्ण ...आत्म-ब्रह्म के रूप में यह घोषणा कर रहे हैं ...तो प्रत्येक वस्तु ब्रह्म ही तो है....तत सत् ...का अर्थ है ....तू वही  ब्रह्म है.... चार महा वेद - वाक्य हैं ...हं ब्रह्मास्मि, तत्वमसि, सर्व खल्विदं ब्रह्म, सोहं...=मैं, तू, वह सभी ब्रह्म हैं ---
-पुस्‍तक ''कितने अप्रासंगिक हैं धर्मग्रंथ'' में स. राकेशनाथ विषय 'गीता कर्मवाद की व्‍याख्‍या या कृष्‍ण का आत्‍मप्रचार'' में लिखते हैं गीता में कृष्‍ण्‍ ने अधिकांश समय आत्‍मप्रचार में लगाया है, गीता के अधिकांश श्‍लोकों में 'अस्‍मद' शब्‍द का किसी न किसी विभक्ति में प्रयोगा किया गया है, 'अस्‍मद' शब्‍द उत्तम पुरूष के लिए प्रयोग किया जाता है हिन्दी में इसका स्थानापन्‍न शब्‍द 'मैं' है

गीता में कुल 700 श्‍लोक हैं, कृष्‍ण ने 620 श्‍लोक कहे
375 बार 'मैं' का प्रयोग किया, इससे यह निष्‍कर्ष निकाला जा सकता है पूरी गीता में कृष्‍ण में, मुझ को, मैं ने, मेरे लिए, मेरा आदिा शब्‍दों द्वारा अपनी ही बात कहते रहे हैं, अर्जुन के लिए जो कुछ कहा वह अपनी बात समझने का जोर डालने के लिए

सातवें अध्‍याय में 30 श्‍लोक हैं, इन में से दो श्‍लोकों (20 व 26) को छोड कर शेष सब के साथ 'मैं' मौजूद है, कुछ पंक्तियां देखिए-
श्रीमद् भगवद् गीता 7/6/11 का अनुवादः
अर्थात में सारे संसार का उत्‍पत्त‍ि और प्रलय सथान अर्थात मूल कारण हूं, मेरे (6)अतिरिक्‍त दूसरी वस्‍तु कुछ भी नहीं, यह सारा संसार मुझ में इस प्रकार गुंथा हुआ है जैसे धागे में मणियां पिरोई रहती हैं (7) है अर्जुन में जल में रहस हूं तथा सुर्य चंद्रमा में प्रकाश हू, मे सारे वेदों में ओंकार हूं, मैं आकाश में शब्‍द हूं, मैं मनुष्‍यों में पुरूषार्थ हूं (8) मैं धरती में पवित्र गंध हूं और में अग्नि में तेज हूं, मैं सारे प्राणियों में जीवन तथा तपस्वियों में तप हूं (9) है पार्थ मुझे सारे प्राणियों का सनातन कारण समझ में बुद्ध‍िमानों की बु‍द्धि‍ और मैं तेज वालों का ते जूं (10) में बलवानों का काम तथा राग रहित बल हूं,मैं प्राणियां में र्ध्‍मानुकूल कामवासना हूं (11)

कया कृष्‍ण जी से यह पूछा जा सकता है कि जब आपके सिवा सारे संसार में कुछ है ही नहीं तो ये बढिया वस्‍तुएं छांटने से क्‍या लाभ?

---निराकरण--- वेदिक वाक्य है...अणो अणीयान् महतो महीयान ....वह ब्रह्म कण कण में  है ....कृष्ण .... ब्रह्म का विराट रूप दिखाते समय....स्वयं ब्रह्म -जीव की भांति चर्चा कर रहे हैं तो अस्मद का प्रयोग क्यों नहीं होगा....वेदों में  स्वयं ब्रह्म कहता है----एकोहं बहुस्याम .... अहं = मैं शब्द का प्रयोग है....

६-अगर आजकल कृष्‍ण किसी को गीता का उपदेश दें तो उन्‍हें अपनी विभूतियों में निम्‍नलिखित तत्‍व और बढाने पडेंगे, ''है अर्जुन में आयुधों में परमाणु हूं, रेलगाडियों में डीलक्‍स हूं, नेताओं में जवाहरलाल नेहरू हूं, सिने गाय‍िकाओं में लतामंगेश्‍कार हूं, होटलों में 'अशोका होटल' हूं, चीनियों में माओत्‍से तुंग हूं, प्रधान मंत्रियों में चर्चिल हूं, फिल्‍मों में 'संगम' हूं, मदिराओं में ह्वि‍स्‍की हूं, पर्वतारोहियों में तेनसिंह हूं, ठगों में नटरलाल हूं''
निराकरण-- सत्य है.कण कण में ब्रह्म है तो यह भी कहना असत्य नहीं होगा..
परन्तु लौकिक रूप में, सांसारिक-मायिक-व्यावहारिक रूप जो श्रेष्ठ है उसी में 'मैं'..यथा .आपके ही दिए उदाहरण में--मैं प्राणियां में धर्मानुकूल कामवासना हूं|(11)...मैं कहने, होने के लिए ..योगेश्वर बनना पड़ता है...कृष्ण बनना पडता है...ब्रहम -रूप में आत्मसात होना पड़ता है तब कोई बन पाता है...ब्रह्म का ...'मैं' ....
 
-न जाने कैसा विचित्र समय था और कैसे अज्ञानी लोग थे, ईश्‍वर को भी जानने वाला कोई नहीं था उसे अपना परिचय स्‍वयं कराना पडा, अपनी एक एक बात विस्‍तारपुर्वक बतानी पडी नीति तो यह बताती है कि अपने गुणों का स्‍वयं बखाने करने से इंद्र भी छोटा बन जाता है
'इंद्रोऽपि लघुतां याति स्‍वयं प्रख्‍यापितैर्गुणै'
---निराकरण--निश्चय ही यह नियम  इंद्र (समस्त देव गण)= इद्रियाँ, सांसारिक-भाव युक्त ...जीव के लिए है .....ब्रह्म --प्रत्येक बिंदु पर ..अपना परिचय देता है ..कि मनुष्य मेरे गुणों पर चले ...परन्तु इन्द्रियों से भ्रमित मानव अपनी महत्ता को प्रख्यापित करने में मग्न ..कुकर्म करता है तो ब्रह्म को चेताना पडता है....यही  वेद , उपनिषद, गीता,ब्राह्मण, पुराण, शास्त्रों की समान रूप से शिक्षा है...उनमें कतई अंतर व द्विविधाभाव नहीं है.....वे सभी वेदों से ही अवतरित हैं, होते हैं ...सामाजिक सामयिकता लिए हुये  ....... यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति .....निश्चय ही जो इतने सम्पूर्ण, इतने सुंदर ढंग से जीवन को व्याख्यायित करने वाले ग्रन्थ लिख सकता है ...वह परमात्मा ही  हो सकता है....परम-आत्मा... भगवान -भर्ग वान...ऐश्वर्यपूर्ण -ईश्वर ......