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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

गुरुवार, 8 मार्च 2012

गीत......श्याम संग होरी.....डा श्याम गुप्त ...


                                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ. 
मैं तो खेलूंगी श्याम संग होरी ।
खेलूंगी.... बरजोरी ..बरजोरी ,
मैं तो खेलूंगी श्याम संग होरी ।।

अब तक बहुत गगरियाँ फ़ोरीं,
छेड डगर में बहियाँ मरोरीं ।
अब होरी के रंग-रस छाये,
लठामार होरी...बरसाना
श्याम सखा मोरे मन भाये ।
पागल तन मन भीगा जाए,
चाहे चूनर ही रंग जाए ।
चाहे जले राधा भोरी ......
मैं तो खेलूंगी श्याम संग होरी ।।

ग्वाल बाल संग कान्हा आये,
ढोल मृदंग मजीरे लाये 
बरसाने की डगर सुहाए,
रंग रस धार बहाते आये । 
खेलन आये होरी.......
मैं तो खेलूंगी श्याम संग होरी ।।

लकुटि लिए सब सखियाँ खडीं हैं ,
सब मनमानी करने अड़ी हैं ।
बरसाने की बीच डगर में,
अब न चले बरजोरी ...बरजोरी ...
मैं तो खेलूंगी श्याम संग होरी ।।

भरि पिचकारी कान्हा मारे,
तन मन के सब मैल उतारे ।
अंतरतम तक भीजें सखियाँ ,
भूलि गयीं सब लकुटि-लकुटियाँ  ।
भूली गयीं सब राह  डगरियाँ, 
भूलि गयीं सब टूटी गगरियाँ ।
भूलीं माखन चोरी.......
मैं तो खेलूंगी श्याम संग होरी ।।

माखन चोर रस रंग बहाए ,
होगई मन की चोरी ।
तन मन भीगें गोप-गोपिका,
भीजे राधा गोरी ।
होगई मन की चोरी ......
मैं तो खेलूंगी श्याम संग  होरी ......
खेलूंगी बरजोरी...बरजोरी.....
मैं तो खेलूंगी श्याम संग होरी ।।     


                                                                                                     -- ---चित्र गूगल साभार..


 


बुधवार, 7 मार्च 2012

इन्द्रधनुष.....अंक चार -----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का उपन्यास.....

                   

                        

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास (शीघ्र प्रकाश्य ....)....पिछले अंक तीन  से क्रमश:......
                                       
                                                        अंक चार 

                " प्रेम होना या करना एक अलग बात है वह व्यक्ति के वश में नहीं है ।  अपने प्यार को प्राप्त कर लेना,  प्रेमी से प्रेम-विवाह  एक सौभाग्य की बात है ।   परन्तु एक अन्य पक्ष यह भी है कि प्रेम को भौतिक रूप में पा लेना या प्रेम विवाह कोई  इतना महत्वपूर्ण व आवश्यक भी नहीं है कि उसके लिए संसार में सब कुछ त्यागा जाय ।   माता-पिता, रिश्ते-नाते, समाज, मान्यताएं, मर्यादाएं, बंधन व नैतिकता की सीमाएं तोडी जायं ।  अपना सारा केरियर दांव पर लगाया जाय ।  यह इतनी बड़ी उपलब्धि भी नहीं है कि प्राण त्यागने को भी प्रस्तुत रहा जाय, जो ईश्वरीय देन है ।  क्योंकि  ' आत्म एव यह जगत है '  वस्तुतः हम प्रत्येक कार्य सिर्फ स्वयं के लिए ही करते हैं ।  परमार्थ में भी आत्म-सुख का भाव छुपा रहता है ।  सभी बंधन, सहयोग भी आत्मार्थ से ही जुड़े रहते हैं।  हम देंगे तभी मिलेगा भी  आत्मार्थ भाव ही है ।  अतः सिर्फ प्रेम-विवाह की जिद में सारा केरियर, सांसारिक सम्बन्ध यहाँ तक कि जीवन भी खोना पड़ता है तो शायद यह बहुत अधिक मूल्य है ।  संसार में ऐसी कौन सी प्रेम-कथा है जो इस तरह के सम्बन्ध में परिणत होकर उन्नत शिखर पर पहुँची हो,  या जो सुखान्त हो  एवं  जिससे देश व समाज या व्यक्ति स्वयं उन्नत हुआ हो ।"
             " प्रायः कहा जाता है कि महिलायें भावुक होती हैं ।  परन्तु यह सर्वदा सत्य नहीं है । वैदिक विज्ञान के अनुसार . पराशक्ति -पुरुष सिर्फ भाव रूप में शरीर या किसी पदार्थ में प्रविष्ट होता है जबकि अपरा-शक्ति नारी, प्रकृति, माया, शक्ति या ऊर्जा रूप है जो पदार्थों व  शरीर  के भौतिक रूप का निर्माण करती है । अतः पुरुष भाव-रूप होने से अधिक भावुक होते हैं , स्त्रियाँ इसका लाभ उठा पाती हैं ।"
            ' एक्सीलेंट , न्यू आइडियाज़ , नेवर हार्ड ऑफ़ '...एक दम नवीन विचार हैं, पहले कभी नहीं सुने गए ।
            ' स्टूडेंट कल्चुरल असोसिएशन ' के तत्वावधान में आयोजित वाद- विवाद प्रतियोगिता में     "नारी-जागरण के सन्दर्भ में प्रेम, प्रेम-विवाह के बढ़ते चरण व नारी-पुरुष समानता " विषय पर मेरे द्वारा व्यक्त किये गए विचारों के उपरांत साथ में बैठे विनोद ने उपरोक्त वाक्य हाथ मिलाते हुए कहे ।
            थैंक्स, मैं मुस्कुराया ।
            क्या ये आपके ओरिजिनल विचार हैं ? अचानक पीछे की सीट पर बैठी हुई कुमुद नागर ने पूछा ।
            ऑफकोर्स, मैंने हैरानी से कहा ।
           ' ओह माई गाड!' ..वह स्वयं ही बोली ।
           क्या हुआ!
           नथिंग ।
           ठीक तो हो, मैंने  पूछा ।
           हाँ, मैं चलती हूँ ।
           कुमुद की बगल में बैठी हुई सुमित्रा ने मेरी और देखा ।  फिर मुस्कुराकर बोली, 'फेंटास्टिक' , क्या बात है।  ये उम्र और ये ऊंची ऊंची बातें कहाँ से सीखते हो ?
          'पढो..पढो..और  पढो । चिंतन-मनन करो, प्रत्येक बात पर ।'  मैंने हंसते हुए कहा ।
           मैं नहीं समझती किसी के पल्ले कुछ ख़ास पडा होगा ।  अधिकाँश के तो सिर  के ऊपर से निकल गया होगा ।  ऊंची चीज़ है न ?
          ' क्या खींचने को कोई और नहीं मिला ?'
          ' मिले तो बहुत पर तुम जैसा नहीं ।'
           जाओ, अपना भाषण पढो । बुलाया जारहा है, देखें क्या तीर चलाती हो ।
                     " स्त्री -पुरुष समानता का क्या अर्थ है ? ",  सुमित्रा ने अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया , " अपने कर्तव्यों और मर्यादाओं की सीमा में रहते हुए, स्त्री-पुरुष एक दूसरे का आदर करें ।  यदि पुरुषों का एक अलग संसार है तो नारी का भी एक  'स्व'  का संसार है ।  कला, साहित्य, संगीत, गृहकार्य, सामाजिक-सांस्कृतिक सुरक्षा दायित्व में तो वे पुरुषों से आगे रहती ही हैं ।"
                   " स्त्री स्वतन्त्रता होनी ही चाहिए, पर क्या पुरुष से स्वतंत्रता ? या अपने सहज कार्यों से ?...नहीं न । तो स्त्री-जागरण व  स्वतंत्रता का क्या अर्थ हो ?  पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर समाज, देश व धर्म-संस्कृति के कार्यों में सामान रूप से भाग लेना ।  स्त्री स्वतन्त्रता सिर्फ पुरुषों के साथ कार्य करना, पुरुषों की नक़ल करना, पुरुषों की भाँति पेंट-शर्ट पहन लेना भर नहीं है ।  क्या कभी पुरुष..पायल, बिछुआ, कंकण, ब्रा आदि पहनते हैं ? सिन्दूर लगाते हैं । क्या कोई महिला पुरुषों के साथ नहाने-धोने, कपडे बदलने  में सहज रह सकती है ? तो क्यों हम पुरुषों की नक़ल करें ?  समानता होनी चाहिए, अधिकारों व कर्तव्यों के पालन में । एक व्यक्तित्व को दूसरे व्यक्तित्व को सहज रूप से आदर व समानता देनी चाहिए ।"
              'एक्सीलेंट,बहुत खूब',  सभी के सराहना के  समवेत स्वर में हाल में गूँज उठे ।  हाल से  बाहर निकलते हुए  मैंने प्रशंसा के स्वर में  कहा , ' रीयली एक्सीलेंट सुमि!  जीनियस'..और स्त्री-पुरुष संबंधों पर तुम्हारे क्या विचार हैं ?
               सुमि जोश में थी, बोली,  'मैं समझती हूँ  प्रत्येक व्यक्तित्व को एक मित्र,  राजदार, भागीदार की आवश्यकता होती है। व्यक्ति अकेला कुछ नहीं होता ।  हम इसलिए हम हैं कि अन्य हमें वह मानते हैं, समझते हैं ।   ईश्वर तभी ईश्वर है जब भक्त उसे मानता व पूजता है।   हाँ उसे स्वयं को उस स्तर तक  उठाना चाहिए। सखियाँ तो सदा बचपन से होती ही हैं, परन्तु महिला मित्रों से केवल  आधी दुनिया  को जानने  की  संतुष्टि  होती है।   शेष आधी दुनिया जो पुरुषों की है उसे जाने बिना आत्म-तत्व की पूर्ण संतुष्टि नहीं होती । इसीलिये एक वय  के उपरांत पुरुष मित्र भाने लगते हैं । यही बात पुरुषों के साथ भी है । यद्यपि इसमें हमारे शरीर-विज्ञान की मान्यताएं भी पार्ट-प्ले करती हैं ।  इसलिए महिलायें पति में सच्चा मित्र देखना चाहती हैं । पति तो कोई भी हो सकता है, परन्तु यदि सच्चा मित्र पति हो तो क्या कहना । और पति यदि सच्चा मित्र बन जाय तो दुनिया सुखद-सुहानी रहे । अतः पुरुषों को सच्चा मित्र पहले होना चाहिए ।  वैसे पुरुष की जो 'सृष्टिगत अहं या ईगो'  है  उसके कारण वह सदैव नारी का सुरक्षा कवच बनना चाहता है ।  नारी को भी यह अच्छा लगता है, क्योंकि इससे  'शक्ति' का अहं  तुष्ट होता है ।  भाई, पिता, पुत्र , पति , मित्र..सभी में यह सुरक्षा कवच बनने का भाव होता है ।  यह जेनेटिक, संस्कारगत होता है।  बस, जब पुरुष में किसी कारणवश  हीन- भावना आ जाती है तभी वह केवल पति या मालिक होने का व्यवहार करके अपने अहं की तुष्टि करता है  जो अति के रूप में अत्याचार-उत्प्रीणन में परिवर्तित हो जाता है।   हाँ, कुछ उदाहरणों में यह नारी के सन्दर्भ में भी घटित होता है।"
                 ' यूं आल्सो हैव एक्सीलेंट न्यू आइडियाज़  नैवर हार्ड ऑफ़ '...अचानक पीछे से विनोद की आवाज़ आई और  साथ में तालियाँ ।
                             **                                    **                           **

                                   -------क्रमश:..... अंक चार का शेष ..... अगली पोस्ट में.....

मंगलवार, 6 मार्च 2012

आज होली है ---ग़ज़ल..डा श्याम गुप्त ...


                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

बहारों की लहर डोली कि आज होली है ।         
रंग उडाती घूमे टोली कि आज होली है ।

रंग बिखराए थे सब और ही फिजाओं ने,
फगुनाई पवन बोली कि आज होली है ।

ढोलक की थाप पर थिरकते थे सभी लोग,
भीगे तन-मन लगी रोली कि आज होली है ।

उड़ता था हवाओं में अबीर-गुलाल का नशा ,
सकुचाये कसी चोली कि आज होली है ।

बौराई सी घूमे वो नयी नवेली दुल्हन, 
घर भर को चढी ठिठोली कि आज होली है ।,


ख्यालों में उनके हम तो खोये थे इस कदर,
कानों खबर न डोली  कि आज होली है ।


चुपके से  बोले, आज तो रंग लीजिये हुज़ूर,
मिसरी सी कानों घोली कि आज होली है ।

इतरा मल दिया जब मुख पर गुलाल श्याम,
तन मन खिली रंगोली कि आज होली है ।।  
                                                                                       -----   चित्र-गूगल साभार                                                             --
 



सोमवार, 5 मार्च 2012

आयुर्वेद... एक सारभूत वर्णन...भाग एक ---- -डा श्याम गुप्त.....



                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
 

          आयुर्वेद एक सारभूत वर्णन--- भाग एक 
         अन्य भारतीय ज्ञान व विद्याओं की भाँति भारतीय चिकित्सा विज्ञान भी अत्यंत विकसित था । गुलामी के काल में अन्य ज्ञान व विध्याओं की भाँति सुनियोजित षडयंत्र व क्रमिक प्रकार से इसका भी प्रसार व विकास भी रोका गया ताकि एलोपेथिक आदि पाश्चात्य चिकित्सा को प्रश्रय दिया जा सके । अतः भारत के इतिहास के अन्धकार काल में आयुर्वेद का कोई उत्थान नहीं हुआ अपितु निरंतर गिरावट होती रही । हर्ष का विषय है की आज भारत के  नए भोर के साथ आयुर्वेद भी नए नए आयाम छू रहा है।  आयुर्वेद के नाम से जाना जाने वाला यह आदि चिकित्सा विज्ञान है, जिसके सारभूत सिद्धांतों से विश्व के सभी चिकित्सा-विज्ञान प्रादुर्भूत हुए हैं । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लगभग सभी अंग-उपांग आयुर्वेद में पहले ही निहित हैं। यद्यपि आजकल आयुर्वेद "प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति' के संकुचित अर्थ में प्रयुक्त होता ।  इस क्रमिक पोस्ट द्वारा हम आयुर्वेद के इस विशद ज्ञान को संक्षिप्त में वर्णन करेंगे ।  
     आयुर्वेद अर्थात आयु का वेद…..जीवन की विद्या…... जीवन एवं स्वास्थ्य का ज्ञान -विज्ञान ... नॉलेज ऑफ़ सायन्स आफ़ लाइफ़... भारत व भारतीय संस्कृति की भान्ति यह भारतीय चिकित्सा विज्ञान  भी मानव इतिहास का सर्वप्रथम एवं प्रचीनतम चिकित्सा-विज्ञान  है जिसका सृष्टि से पहले ही ब्रह्मा द्वारा वेदों में प्रवर्तन किया गया और पृथ्वी पर चरक तक पहुंचा। इसके चिकित्सा सिद्धान्तों से ही विश्व की अन्य विविध चिकित्सा पद्धतियों का जन्म हुआ। इसी के उपलक्ष में बीसवीं शताब्दी में अमेरिका में ’चरक-क्लब ओफ़ मेडीकल स्कोलर्स’ की स्थापना हुई थी,
         इतिहास- आयुर्वेद के इतिहास का अभिप्रायः वस्तुतः चिकित्सा-विज्ञान  के इतिहास से ही लेना चाहिये …… संसार की  प्राचीनतम्  पुस्तक  ऋग्वेद है जो वस्तुतः अपने प्राचीनतम पुस्तक-रूप से भी युगों पूर्व पुरा-काल से मौखिक-ग्रन्थ के रूप में सतत गुरु-शिष्य परम्परा में कथ्य व श्रव्य रूप में प्रवह्मान थी, इसीलिये वेदों को श्रुति भी कहा जाता है । विभिन्न विद्वानों ने इसका निर्माण काल ईसा के ३,००० से ५०,००० वर्ष पूर्व तक का माना है ।  इस संहिता में आयुर्वेद के अतिमहत्त्व के सिद्धान्त यत्र-तत्र विकीर्ण है, तत्पश्चात अथर्ववेद मे आयुर्वेद का विस्तृत एवं क्रमिक विवरण पाया जाता है । आयुर्वेद को पन्चम वेद भी कहा जाता है । चरक, सुश्रुत, काश्यप आदि आयुर्वेद के मान्य ग्रन्थ  व चिकित्सक-ऋषि  आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद  मानते हैं।  इससे आयुर्वेद की प्राचीनता सिद्ध होती है । अतः  आयुर्वेद का रचनाकाल – यद्यपि भारतीय दर्शन के अनुसार आयुर्वेद सृष्टि की उत्पत्ति से पहले ही था जो आदि-विष्णु ( व्यक्त ब्रह्म ) द्वारा  त्रिदेवों को दिया गया । आधुनिक विज्ञान के अनुसार ..इसे ईसा पूर्व ३,००० से ५०००० वर्ष पहले यानि … सृष्टि की उत्पत्ति के आस-पास या साथ का  माना जा सकता है।

       आयुर्वेद का अवतरण—मूलतः दो मत हैं---       
       चरक मत के अनुसार-- सर्वप्रथम ब्रह्मा के मुख से पन्चम वेद की भांति ---प्रजापति ने, ---प्रजापति से--- अश्विनी कुमारों ने उनसे-- इन्द्र ने और इन्द्र से- भारद्वाज ने ... तदनन्तर पुनर्वसु आत्रेय ने.... अग्निवेश, भेल, जतू, पाराशर, हारीत और क्षारपाणि नामक छः शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश दिया । इन छः शिष्यों में सबसे अधिक बुद्धिमान अग्निवेश ने सर्वप्रथम एक संहिता का निर्माण  किया- अग्निवेश तंत्र  का, जिसका प्रतिसंस्कार बाद में चरक ने  किया और उसका नाम चरक संहिता पड़ा, जो आयुर्वेद का आधार स्तंभ है । इस प्रकार मृत्युलोक में आयुर्वेद के अवतरण के साथ- अग्निवेश का नामोल्लेख है ।
      सुश्रुत मत  के अनुसार-- काशीराज दिवोदास के रूप में अवतरित भगवान धन्वन्तरि के अनुसार ..सर्वप्रथम स्वयं ब्रह्मा  ने सृष्टि उत्पादन पूर्व ही अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद को एक सहस्र अध्याय- शत सहस्र श्लोकों में प्रकाशित किया और पुनः मनुष्य को अल्पमेधावी समझकर इसे आठ अंगों में विभक्त कर दिया । --ब्रह्मा से--- दक्ष प्रजापति, --उनसे अश्विनीकुमार द्वय तथा उनसे--- इन्द्र ने आयुर्वेद का अध्ययन किया ।
            इस प्रकार इतिहास एवं आयुर्वेद के अवतरण के क्रम में –मूलत: दो चिकित्सक-ऋषि-कुल --आत्रेय वर्ग तथा धन्वन्तरि वर्ग  मान्य है ।
     
       आयुर्वेद के अवतरण क्रम को सन्क्षिप्त में इस प्रकार रखा जा सकता है…..
     आदि-विष्णु या व्यक्त-ब्रह्म द्वारा सृष्टि से पहले… वेद व अमृत -विद्या अर्थात आयुर्वेद का प्रकटीकरण ----> प्रथम चिकित्सक  त्रिदेवों को ( ब्रह्मा, विष्णु, शिव ) —
१- शिव---चिकित्सकों के चिकित्सक… मृत-संजीवनी विद्या…के प्रवर्तक.. ----> शुक्राचार्य को.....
२- विष्णु--- अमृत-विद्या… के प्रवर्तक --->गरुड को ....
३- ब्रह्मा ..आदि ब्रह्म द्वारा स्मरण कराने पर …श्रुत शब्दों व स्मृत अर्थों से एक लाख श्लोकों  में आयुर्वेद की रचना की…..जिसे पन्चम वेद भी कहते है और अथर्व वेद का उपान्ग….ब्रह्मा द्वारा  ---->
           क---राज्य-यक्ष्मा की उत्पत्ति व उसकी चिकित्सा हेतु ..(श्राप से यक्ष्मा ग्रसित चंद्रमा की चिकित्सा हेतु ….चन्द्रमा को ..
           ख---- यम व बुध को ..
           ग----दक्ष-प्रज़ापति को …दक्ष से ---> अश्वनी कुमार द्वय से---> इन्द्र  से---> भगवान आदि धन्वन्तरि---> भारद्वाज को..(सर्वप्रथम पृथ्वी पर अवतरण..) ….. भारद्वाज द्वारा---->
     (अ)-धन्वपुत्र धन्वन्तरि मानव -काशिराज दिवोदास को -- काय-चिकित्सा—(मेडीसिन) तन्त्र एवं अष्टान्ग वैद्यक--के प्रवर्तक  से ---> जनक, च्यवन, जावालि, करल, अगस्त्य व पैल ( निदान तन्त्र--डायाग्नोसिस-- के प्रवर्तक ) से ---> नकुल-सहदेव ---> आत्रेय, पुनर्वसु, अग्निवेश( अग्निवेश तन्त्र =चरक संहिता) हारीति, जतूकर्ण आदि ---> चरक ( चरक संहिता ग्रन्थ)…..
     (ब)-कश्यप को –कौमार-भृत्य -अर्थात बाल एवं स्त्री रोग-( पेडियाट्रिक्स व ओब्सटेट्रिक्स) तन्त्र के प्रवर्तक …से ---> भृगु, अत्रि, वशिष्ठ ----> पुत्र व शिष्य…..
     (स)-काशिराज-दिवोदास को शल्य-चिकित्सा ..( सर्जरी) के प्रवर्तक से ----> सुश्रुत (शुश्रुत-संहिता), भोज…….  
 
      आयुर्वेद का उद्देश्य---आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र के अनुसार इस शास्त्र के मूलतः--दो उद्देश्य हैं ----
     १.स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना (स्वास्थ्य, प्रतिरक्षा व रोकथाम- प्रीवेन्टिव-चिकित्सा) ---      --शरीर और प्रकृति के अनुकूल ,नियमित आहार-विहार,  गृहस्थ जीवन के लिए उपयोगी शास्त्रोक्त दिनचर्या, रात्रिचर्या एवं ऋतुचर्या का पालन,  संकटमय कार्यों से बचना, प्रत्येक कार्य विवेकपूर्वक करना, मन और इंद्रिय को नियंत्रण,  शरीर आदि की शक्ति और अशक्ति का विचार कर कोई कार्य करना, मल, मूत्र आदि के  वेगों को न रोकना, .....ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, अहंकार आदि से बचना, समय-समय पर शरीर में संचित दोषों को निकालने के लिए वमन, विरेचन आदि के प्रयोगों से शरीर की शुद्धि,.... सदाचार का पालन और दूषित वायु, जल, देश और काल के प्रभाव से उत्पन्न महामारियों  (एपिडेमिक डिज़ीज़ेज़) में विज्ञ चिकित्सकों के उपदेशों का समुचित रूप से पालन, स्वच्छ और विशोधित जल, वायु, आहार आदि का सेवन और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना, ये स्वास्थ्यरक्षा के साधन हैं।
    २.रोगी व्यक्तियों के विकारों को दूर कर उन्हें स्वस्थ बनाना- ( रोग निवारण –ट्रीट्मेन्ट )-- इसके लिए प्रत्येक रोग के लिये…..तीन शाखायें हैं ----त्रिस्कन्ध…… ये तीनों आयुर्वेद के 'त्रिस्कंध' (तीन प्रधान शाखाएं) कहलाती हैं -----
            अ -हेतु (कारण---इटियोलोजी ) ,---ब -लिंग - रोग परिचायक विषय, जैसे पूर्वरूप, रूप (साइन्स एंड सिंप्टम्स),  संप्राप्ति (पैथोजेनिसिस)  तथा  उपशयानुपशय  (थिराप्युटिक टेस्ट्स)..— स -औषध (मेडीसिन) ----जिनका ज्ञान परमावश्यक है।
                                ----क्रमश: भाग दो....