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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

रविवार, 18 मार्च 2012

इन्द्रधनुष.....अंक छह -----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का उपन्यास.....

                           
     


                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास
 (शीघ्र प्रकाश्य....)....पिछले अंक चार  से क्रमश:......
   

                                                      अंक छह 

                               द्वितीय  प्रोफेशनल परीक्षा के बाद क्लास रूम में  प्रोफ. नलिनी पंडित ने पूछा --
        ' हू वाज़ द लास्ट टापर?' ( पिछला टॉपर  कौन था )
        ' सावित्री शर्मा ', एक आवाज़ आई ।
        'कितने मार्क्स मिले हैं अब ?
        '२७६' - सावित्री ने बताया ।
        ' सर्वाधिक किसके हैं ?'
       ' डा कृष्ण गोपाल गर्ग के '  अचानक सावित्री बोल पडी ।
       ' हाऊ मैनी ?'
       ' २७८ ' - सावित्री फिर बताने लगी ।
       ' व्हेयर इज ही ?'.....( वह कहाँ है ) ।
         मैं अपने स्थान पर खडा हुआ तो प्रोफ. पंडित ने कहा , ' बधाई , डा कृष्ण ।'
                   'पर मैडम , न तो अभी मुझे अपने मार्क्स ज्ञात हुए हैं, और न मैं एसा समझता हूँ ।' , मैंने कहा तो सारी क्लास आश्चर्य से देखती रह गयी ।
                ' बट आई हैव सीन इन यूनिवर्सिटी लिस्ट' ,( पर मैंने यूनीवर्सिटी की मार्क्स-लिस्ट में देखा है ) सावित्री ने कहा ।
               ' बट आई डोंट हैव दैट प्रिविलेज ' ( मुझे तो ये सुविधा नहीं है ),  मैंने कहा ।  सारी क्लास हँसने लगी ।  सावित्री का चेहरा झेंप से लाल होगया था ।
       ' बैठ  जाइए ' - प्रोफ. पंडित ने असमंजस में कहा ।
                          सावित्री, नगर के राजनीतिज्ञ- नेता  व विधायक, के एल शर्मा की पुत्री थी ।  क्लास के बाद सुमित्रा ने कहा , 'तुमको कुछ कहने की क्या आवश्यकता थी । जबदस्ती छेड़ने में मज़ा आता है ?'
        ' मुझे पक्का  कहाँ पता था, कैसे मान लेता । '
       ' वाह ! क्या सत्यवान से पाला पडा है । मज़े हैं तुम्हारे तो..... सावित्री  भी..... भई वाह ! '
       'हाउ कम ' ( कैसे पता ),  वैसे क्या ये तुम्हारी ईर्ष्या बोल रही है  या.......।
       'कोई क्यों यूंही दूसरे के मार्क्स देखेगा और भरी क्लास में बताएगा भी ।' सावित्री ने क्यों तुम्हारे नंबर देखे ?
       ' यह सिर्फ टॉपर की कौतूहलवश  जिज्ञासा है और कुछ नहीं । कोई लड़का होता तो वह भी यही करता । और तुम हर एक का नाम मेरे साथ जोड़ने के चक्कर में क्यों रहती हो ?'
      ' पर तुमने उसे बहुत नर्वस कर दिया ।' वह टालती हुई बोली ,' क्या तुम्हें उससे बात नहीं कर लेनी चाहिए ?'
       ' ओ के ' ठीक है ।
       ' चलो हमें उससे बात कर लेना चाहिए ।' सुमि उठते हुए बोली ।
       ' पर तुम क्यों गवाह बनना चाहती हो ? क्या मुझे अकेले बात नहीं करना चाहिए ?'
       ' ओह !  ओह !  हाँ,  बिलकुल ।'  वह हंसते हुए बैठ गयी ।

                          **                    **                        **

         'क्या अपना वृन्दावन - मथुरा नहीं दिखाओगे ?' 
         'मेरा वृन्दावन ! क्या मतलब ?'  मैंने पूछा ।
         'हाँ, हाँ.. कृष्ण गोपाल महाराज जी ।'
          ' तो चलो, कल ही चलते हैं ।'
         ' इतनी शीघ्र फैसला ले लेते हो ?'
         'राधारानी की आज्ञा, फैसले का प्रश्न ही कहाँ उठता है ।'
         'तो  ए. के.  व  सुधा से भी पूछ लिया जाय ?'
         'हाँ अवश्य, क्यों नहीं ।' मैंने  स्वीकृति में कहा ।
                              बिहारी जी के मंदिर में मुझे यूं ही आराम से हाथ बांधे खडा देखा कर सुमित्रा कहने लगी,       'हाथ तो जोड़ लो बिहारी जी के ।'
               'क्यों, क्या हाथ जोड़ने से वास्तव में हमारे सारे दुःख दूर व कार्य बन जाते हैं ? ' मैंने हाथ जोड़ते हुए पूछा।
              ' यह आस्था का विषय है ' ,  सुमित्रा समझाते हुए कहने लगी,   'आस्था एक व्यक्तिगत व समाजगत मनोवैज्ञानिक स्थिति है जो मनुष्य के मन में आत्मविश्वास उत्पन्न करती है ।  स्वयं पर निष्ठा रखना सिखाती है, कि यदि मैंने अपना कार्य पूर्ण निष्ठा व श्रम से किया है तो आगे आप को समर्पित,  अब जो भी हो ।  तभी तो सामान्यत: अपना कार्य सिद्ध न होने पर भी सामान्यजन की श्रृद्धा कम नहीं होती । वह भगवान को व अन्य को दोष न देकर  अपने कर्मों की कमी व भाग्यफल को मानकर पुनः सहज भाव में आगे अपने कार्य में लग  जाता है ।'
            ' तभी  तो  मैं मन में आस्था रखता हूँ ।'
           ' परन्तु व्यक्त होना भी आवश्यक है,  इससे पीछे आने वाले व अन्य लोग प्रभावित, उत्साहित व प्रेरित  होते हैं ।'
          मैं मुस्कुराते हुए चुप रह गया ।
                                   गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर एक ग्रामवासी ने बताया कि  इन्हीं रास्तों पर जब ये पगडंडियाँ  होंगी,  कृष्ण बांसुरी बजाते  तथा  राधा एवं गोपियाँ नृत्य करते हुए,  ग्रामबासियों को नयी नयी बातें व गतिविधियाँ बताया करते थे ।
          मैंने सुमि से पूछा,  ' सुमि ! क्या कहीं से कृष्ण की वंशी की ध्वनि सुनाई दी ?'
        ' इतनी  देर से और क्या सुन रहे हैं ?  रनिंग कमेंट्री,... ये कुसुमा बाग़- जहां कृष्ण-राधा मिला करते थे, कुसुमा-ललिता के साथ ।  यह उद्धव ताल - जहां ऊधो जी ठहरे थे गोपियों से हारने के लिए ।  ये गोवर्धन पर्वत- जहां गोपाल ने गाँव को शरण में लेकर रोज-रोज की चख-चख अति-वृष्टि से बचाया था ।  ये सीधी-सादी राधा का, "राधा-ताल " और यह त्रिभंगी कन्हैया का टेढा -मेढ़ा  नौकुचिया "कृष्ण ताल "। तुम्हारी वंशी तो अनंत काल से बज ही रही है ।' सुमित्रा बोली ।
           'क्या बोर हो रही हो ? '
          ' हूँ ',.....
                                 " कान्हा तेरी मुरली मन हरषाए ।
                                  कण कण ज्ञान का अमृत बरसे, तन मन सरसाये ।
                                  या तन-मन की बात कहूं क्या, सागर उफना जाए ।
                                  बैरन  छेड़े  तान अजानी,   मोहनि-मन्त्र  चलाये ।
                                 मानहु  मर्यादा  मोरी  मोहन, मुरली  मन भरमाये । 
                                                       कान्हा तेरी मुरली मन हरषाए ।।  "

           ' वाह ! वाह ! सुमित्रा, तुम तो कवयित्री बनती जा रही हो ।'  ए.के. ने ताली बजाते हुए कहा ।
            'सब सोहबत का असर है।'  सुधा ने जड़ा ।
           ' अब में क्या कहूं ।  कुसुम बोली , ' जब मन की वंशी बजे तो सब ओर  वंशी-धुनि सजे ।'
            ' मैं धन्य हुआ, कैसे कैसे गुणी, विज्ञ व कलाकारों की संगत में हूँ ।'  मैंने प्रणाम मुद्रा में कहा  । '
           ' हम भी हैं यहाँ, डाक्टर साहब ..' पीछे से आवाज़ आई ।
            मैंने पीछे मुड़कर देखा तो उछल पडा , ' अरे श्री ! तुम, यहाँ ।'
           ' गोवर्धन परिक्रमा देने आये हैं, पिताजी के साथ ।'
           'क्या मन्नत माँगने आये हो कि इस बार तो पार लगा ही दो, हे मुरली बजैया !'
           श्री घूरकर देख ने  लगा, 'क्यों बेइज़्ज़ती करते हो, महिलाओं के सामने ।'
           'अरे हम भी हैं' , सुमि ने नज़दीक आते हुए कहा, 'परिचय तो कराओ ।'
           'हाँ, श्रीनाथ गुप्ता, मेरा इंटर का मित्र ।'
          'आप सब  तो डाक्टर लोग होंगे ।' श्री बोला, 'क्या कलियुग के कृष्ण के प्रबचन सुन कर बोर नहीं होरहे ?'
          ' ये परिक्रमा क्यों करते हैं ?' सुधा पूछने लगी ।,
          'यही आपके ज्ञानी जी बताएँगे । मैं क्या बताऊँ ।' अब बताओ, उसने मुझे इशारा किया ।
                            ' परिक्रमा. अर्थात परिक्रमण या परिभ्रमण, एक अर्थशास्त्रीय- समाज शास्त्रीय क्रमिक व्यवस्था है ।  किसी स्थान, पीठ या दैवीय शक्ति के उद्गम, विस्तार, उसकी महत्ता, वहां की सामाजिक- आर्थिक  स्थिति के बारे में पूरा देश जान सके - वह क्यां क्यों है, कब से है, उसके युक्ति-युक्त अर्थ व प्रयोजन का सम्पूर्ण परिक्रमित ज्ञान;   न कि सिर्फ चक्कर लगा कर चल देना;  ताकि देश का प्रत्येक नागरिक देश के उस प्रदेश, क्षेत्र व सभी स्थानों की स्थिति के जानकार हों तथा उसकी उन्नति में सुझाव व सहायता से योगदान कर सकें  और सामाजिक एकता  व राष्ट्रीय समरसता बढे ।  लगभग सभी धार्मिक पीठों का यही क्रम है ताकि वहां देश भर के लोग आयें,  उस स्थान का आर्थिक  विकास हो । उसी के साथ समाज, देश व मानवता का विकास जुड़ा हुआ है ।' मैंने विस्तार से बताया ।
           ' मान गए गुरू' ,  श्री बोला,  ' लगे रहो, लगे रहो ।  मैं चलता हूँ,  नहीं तो साथ के लोग अधिक आगे निकल जायेंगे ।  जब चक्कर में पडा  ही  हूँ तो चक्कर लगा ही लूं ।'
          ' ये क्या करता है?',  अचानक सुमित्रा ने पूछा ।
          'रोड-इंसपेक्टरी ',  'बी ए में दो बार फेल होकर धक्के खारहा है ।'
          'वाह ! क्या कृष्ण-सुदामा की जोड़ी है ।'  और ऐसे कितने मित्र हैं तुम्हारे ?
          ' लोकल हूँ भई,  और चुंगी वाले स्कूल से ।  धोबी, नाई, सब्जी वाले, दुकानदार, दूधवाले, पड़ोसिनें, बचपन की सखियाँ - सभी को झेलना-निभाना होता है ।  अपनी तो आदत ही ख़राब है, अब भी वही हाल है ।'
          सब हँसने लगे, सुमित्रा मुस्कुराकर चुप होगई ।
         ' क्या हम सब चलने ही चलने आये हैं या बैठकर आपस में कुछ हंसें बोलें भी ।'  कुसुम ने थकी थकी आवाज में कहा ।
        ' तो अब तक क्या होरहा था?' मैंने कहा,  ' हाँ. जिन्हें आपस में स्पेशल हंसना-बोलना हो तो करें ।'
        ' चलो थर्मस निकालो, चाय पीते हैं, बैठकर' , पेड़ तले बैठती हुई सुमित्रा बोली  ।

                **                                     **                                        **

                               प्रोफ़ेसर सचान बहुत धीमे बोलते थे, परन्तु उनके व्याख्यान बहुत महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर होते थे ।  सभी पढ़ाकू छात्र उनकी क्लास में आगे बैठना चाहते थे ।  यहाँ तक कि कभी-कभी तो आधी से अधिक क्लास आठ बजे के लेक्चर के लिए सात बजे ही  आकर बैठ जाती थी ।  लड़कियों-लड़कों,  होस्टलर -डे स्कोलर ..में क्लास में जल्दी पहुँचने की प्रतियोगिता रहती थी  और कभी सब आगे कभी पीछे होते रहते थे ।
                 जब सुमि और मैं तेजी से आकर आगे की सीट पर बैठ गए तो पीछे से ए.के. जैन ने कमेन्ट मारा,        'चुंगी के स्कूल वालों की समझ में देर से आता है,  आगे बैठना आवश्यक है ।  कान्वेंट में पढ़ने से अक्ल की आँखें खुल जाती हैं और दौड़कर आगे बैठने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।'
            ' हुज़ूर, बड़े बाप के बेटे हो, पढ़ कर करोगे भी क्या ?  बाप की चलती हुई क्लिनिक चला लेना ।'  मैंने कहा,  ' वैसे अंग्रेज़ी बोलने और टाई लगाने के अलावा वहां पढ़ाया ही क्या जाता है ,  कान्वेंट में,  बहुत सी फीस लेकर ।'
            'सुमित्रा दार्शनिकों के से अंदाज़ में कहने लगी,  'मेरे ख्याल से सभी इंगलिश स्कूल बंद कर दिए जाने चाहिए ।  सारे प्राइमरी स्कूल सरकारी नियंत्रण में या सामाजिक संस्थाओं द्वारा  या सरकार द्वारा बिना फीस के चलाये जाने चाहिए ।  कोई प्राइवेट स्कूल नहीं होना चाहिए ।  सभी स्कूलों में समान कोर्स,  समान पढाई व फीस होनी चाहिए ।  नहीं तो क्या पता आगे चलकर ये प्राइवेट स्कूल भी एक व्यवसाय ही बन जाय ।'
         ' अपने ख्याल अपने पास ही रखो, हेड मास्टरनी जी ।'  किसी ने पीछे से कमेन्ट किया ।
        ' चुप चुप '  पीछे से अन्य आवाज़ आई,  ' प्रोफ़ेसर साहब आगये ।'

               ....................  अंक छः समाप्त ......क्रमश: अंक सात .... अगली पोस्ट में .....


शुक्रवार, 16 मार्च 2012

हाउस वाइफ......डा श्याम गुप्त का आलेख ....

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...        

----क्या आपकी पत्नी भी कहीं काम करती हैं ......अरे नहीं , वे तो हाउस वाइफ हैं।
----क्या आप भी कहीं काम करते हैं ......नहीं मैं तो घरेलू स्त्री ..हाउस वाइफ हूँ ।
---- क्या  आप भी हाउस वाइफ हैं   ....... अरे नहीं  मैं तो बैंक में अफसर हूँ ।
              अर्धांगिनी,  घर की लक्ष्मी, मालकिन, महारानी,  "बिनु घरनी घर भूत का डेरा.... " आदि उपाधि धारी, दिन भर घर-आंगन सुधारने-बुहारने  में हड्डी-मांस गलाने वाली  या  झाडू लगवाने, खाना बनवाने, धोबी का हिसाब, किफायत से मार्केटिंग  करने, दिन भर  घर-द्वार की कुंडी-दरवाज़ा खोलने-बंद करने में   रक्त-सुखाने वाली,  बच्चे पैदा करके- पालन-पोषण में शरीर को होम करने वाली, रूखा-सूखा खाकर संतुष्ट रहकर......आगे आप ही सोचिये ......यह ऐसा सर्वश्रेष्ठ व कठिनतम श्रम करने वाली "हाउस वाइफ" की सुन्दर-असुंदर तस्वीर है.......।
               कैश व काइंड... तो भ्रष्टाचार व रिश्वत में भी खूब चलता है.......परन्तु जब महिला-श्रम  की बात होती है तो बस कैश की ही बात की जाती है ....श्रम उसे  ही कहते हैं जिसमें कैश मिलता है...धन मिलता है...तनखा- पे-पर्क्स मिलते हैं ...तब हम  मैन-काइंड  के लिए...काइंड पर श्रम करती ..."हाउस वाइफ"... को भूल जाते हैं .जिसका मूल्य यह मनुष्य, मानव, समाज, विश्व इतिहास, भूत-भविष्य-वर्तमान...पूरे जीवन में व इतिहास में नहीं चुका सकता।
           आखिर कब तक घरेलू महिला, हाउस-वाइफ गयी-गुज़री, "घर की मुर्गी दाल बराबर" बनी रहेगी ? क्या हाउस वाइफ का श्रम.. श्रम नहीं ?....क्या नौकरी करती महिला 'हाउस वाइफ. नहीं  तो क्या.....।                    

बुधवार, 14 मार्च 2012

इन्द्रधनुष.....अंक पांच -----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का उपन्यास.....

       


                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास (शीघ्र प्रकाश्य ....)....पिछले अंक चार  से क्रमश:......
    
                                                  अंक पांच  

                       'कालिज डे' मनाया जाना था । सुमित्रा लगभग दौड़ते हुए आई ।  'कृष्ण ! एक गीत बनाना है  और गाना भी पडेगा ।  मैं नृत्य में अपना नाम  दे रही हूँ ।  कब दोगे ।'
         'परन्तु मैं चिकित्सा विषय पर सेमीनार के लिए अपना आर्टीकल तैयार कर रहा हूँ ।'  मैंने असमर्थता जताने का प्रयत्न किया ।
        'वह तो तुम कर ही लोगे । कौन सा नवीन रिसर्च करके लिखोगे । इस स्टेज पर तो सभी विशेषज्ञ-व्याख्यान व लेख इधर-उधर से जोड़ तोड़ के ही लिखे जाते हैं । चिकित्सा विषयों पर अपना ओरिजिनल पेपर लिखने में तो ज़िंदगी भर का अनुभव चाहिए ।'
         मैंने उसे घूर कर देखा,  फिर कहा, ' पर मुझे गाना कहाँ आता है ?'
        'मैं रिहर्सल करा दूंगी । गीत बनाते हो तो गा भी सकते हो.... चलेगा ।' 
       'किसी अच्छे गाने वाले को क्यों नहीं लेती?'  मैंने सुझाया ।
       ' नहीं, अधिक लोगों को मुंह लगाना ठीक नहीं । सब तुम्हारे जैसे सुलझे हुए थोड़े ही होते हैं ।  कौन सी शास्त्रीय प्रतियोगिता है, जो गाओगे चलेगा ।'  वह सिर हिलाकर मुस्कुराई ।
       ' इस सुलझन में ही तो मैं उलझ कर रह गया हूँ ।'  मैं भी मुस्कुराया ।
       " शट अप । ",  शाम को गीत लाकर दो।  कल रिहर्सल है,  तैयार होके आना।   देखूं कैसे सर्वगुण संपन्न बनते हो।'
       ' मुझसे तो अच्छे द्वापर के कन्हैया ही थे । कम से कम गोपियों के साथ रास तो रचा लेते थे ।'
        " क्या मैंने कभी मना किया है गोपियों के साथ रास रचाने को ?",  वह पलट कर कहने लगी, ' और रास !... हूँ .... शास्त्रों के ज्ञाता होने का दम भरते हो ।  ये बार बार भटकने-भटकाने का स्वांग क्यों रचते हो, मैं सब समझती हूँ ।  क्या ये प्रोग्राम 'रास' नहीं होगा ?  आखिर रास क्या था।  किसी विशेष उद्देश्य के लिए किया गया सामूहिक क्रिया-कलाप,  जिसे रसमयता का रूप देदिया जाय ।  राधाकृष्ण का रास भी तत्कालीन नारी को समाज सेवा के लिए प्रतिबद्ध करके, पुरुषों में उत्साहवर्धन, अत्याचारी शासन के विरुद्ध खडा करने की मंत्रणाएं , सामाजिक उत्थान की मंत्रणाएं, गुप्त बैठकें , आम सभाएं आदि था । क्या ये सब भी तुम्हें, केजी को, बताना पडेगा ?"
        ' वाह ! तो बताओ उस काल में  भी आखिर राधा अर्थात एक नारी,  इतनी एडवांस कैसे होगई,  तथा राधा के चरित्र की क्या अर्थवत्ता है ?'
       " दैट्स इट ",  'तो ये चल रहा है खुराफाती मस्तिष्क में ।'  वह हंसकर कहने लगी, 'वास्तव में भारत में नारी सदैव स्वतंत्र सत्ता रूप रही है । परन्तु समय के साथ उस स्वतन्त्रता पर अज्ञानता की धूलि जम गयी फलस्वरूप  नारी को पुरुष के बंधन में रखे जाने की साज़िश रची जाने लगी थी ।  अतः वैदिक युग के पश्चात आई सामाजिक जड़ता की प्रतिक्रया थी,  राधा व राधाकृष्ण का प्रेम ।  तत्कालीन नारी को जड़ता, अज्ञानता, अकर्मण्यता, सामाजिक कर्तव्यहीनता व दौर्वल्य की परिधि से बाहर निकालने का अभिकल्प था, उपादान था राधा का चरित्र ।  श्री कृष्ण जैसे बलशाली, बुद्दिमान, चतुर, नीतिज्ञ, विद्वान्  व समाज सुधार के लिए नव व पुरा विचारों में संतुलन रखने वाले मित्र का साथ व नेतृत्व पाकर वह जननेत्री व स्त्रियों की सामाजिक चेतना तथा  स्वतंत्रता का बोधक हुई । जो तत्पश्चात प्रेम व त्याग-तप  की उच्चतम स्थिति में पहुँचने के कारण जन- जन की पूज्य व आराध्य देवी रूपा हुई । यही राधा के चरित्र की अर्थवत्ता है ।"
          मैं मुस्कुराने लगा तो सुमि कहने लगी,  ' होगया.... अब चलूँ ? ' 
         ' जय हो राधारानी की, प्रस्थान करें ।'  मैंने हंसते हुए हाथ जोड़कर कहा । 
                         
                       **                          **                                      ** 
                          
                                रिहर्सल पर मैंने अपना पार्ट सुनाया -----
                                             " तुम श्यामल-घन, तुम चंचल मन,
                                              तुम जीवन  हो , तुमसे जीवन ।
                                              प्रीति भी तुम हो, रीति भी तुम हो,
                                              तुम श्यामल-तन, तुम जीवन-धन ।
                                              तेरी  प्रीति  की रीति पै  मितवा,
                                              मैं गाऊँ , मैं  बलि-बलि जाऊं ।। "
                सुमि ने अपना पार्ट गाकर सुनाया -----
                                            " तेरे गीतों की सरगम पर,
                                             मस्त मगन मैं नाचूं गाऊँ । 
                                             तेरी वीणा की लहरी पर,
                                            बनी मोहिनी मैं लहराऊँ ।
                                            तेरी प्रीति की रीति पै मितवा ,
                                            बलहारी मैं बलि-बलि जाऊं । "
                सुमित्रा ने कई बार  गाकर - नृत्य करके बताया, समझाया ।  डांस, स्लो, मध्यम फिर द्रुत रिदम में करूंगी,  फिर मद्धम में । अंतरा को दो-दो बार रिपीट करना है,...आदि...आदि ।  
              कार्यक्रम काफी सफल रहा ।  सुमि तुनक कर बोली,  ' बड़े खराब हो केजी ! सीखने का नाटक करते रहे,  बहुत अच्छा गा लेते हो । लगता था जैसे पैरों को पंख लग गए हों । आज मैं बहुत  बहुत  बहुत खुश हूँ ।' 
             ' नृत्यांगना और नृत्य दोनों ही  'सुपर्व'  हों तो संगीत फूट ही पड़ता है,  गूंगे मन में भी ।',  मैंने हंसकर कहा ।
            ' गूंगे, और केजी ? '  क्या गुड़ की मिठास बता नहीं पारहे हो ?...  खैर, प्रशंसा का तुम्हारा निराला अंदाज़, अच्छा है ।  वह खिल खिला कर हंसी,  फिर अचानक चुप होकर बोली ,  ' अच्छा, ये -श्यामल घन और श्यामल तन-  से क्या अभिप्राय है तुम्हारा ?  मैं सांवली हूँ तो मेरा मज़ाक तो  नहीं बना रहे थे कहीं ।'  वह मुस्कुराते हुए घूर कर कहती  गयी।
            नहीं जी, श्याम सखी द्रौपदी,  अप्रतिम सुन्दरी,  भी  सांवली ही थी ।
            मुझे द्रोपदी कह रहे हो ?   
            नहीं,  अप्रतिम सुन्दरी...... हे श्यामान्गिनि !  मैं हंसते हुए बोला ।
           खींच लो....खींच लो....।  आज सब माफ़ है तुम्हें ।  मैं आज बहुत अच्छे मूड में हूँ ।
           ' पर क्या द्रोपदी के बारे में कोई भ्रांत धारणा ?।'
           नहीं,  के जी जी,  तुम्हारी तो लगभग हर बात ही सटीक लगती है ।  मैं तो खुद को भी द्रौपदी कहती  हूँ ।
मेरे भी पांच पति हैं ...वह अनायास ही कह गयी ।
          मैंने आश्चर्य से उसे देखा तो कहने लगी,  'पति क्या है ? जो पत रखे...पतन से बचाए....मान रखे...सम्मान दिलाये....।' वह मुस्कुराकर बोली, ' शास्त्र बचन  है---- "  रक्ष्यते सख्यते पतनात स पति: ...।" 
         किस शास्त्र का है ?,  मैं पूछने लगा ।
         'मेरे शास्त्र का  ।'  वह खिलखिलाई ।
         'तब ठीक है।  और पांच पति ?'   मैंने प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा  । 
        जो पतन से बचाएं ।  'शास्त्र  व माता-पिता की शिक्षा एवं   संस्कार, मेरी अपनी सामयिक शिक्षा-दीक्षा व संस्कार,  मेरा चरित्र व आचरण,  रमेश और.....र.र. ...तुम .....।'
          मैं अवाक ......देखता रह गया ।  
        ' चकरा गए न ज्ञानी-ध्यानी.......? '  वह खिलखिलाकर हंसी,  फिर भाग खड़ी हुई ।

                       **                                **                                   **   

                             " डा कृष्ण गोपाल जी आपकी वह कहानी पढी,  जिसमें एक प्रसंग में है कि मेढक के  दो दिल,  किसी के दो स्टमक ( आमाशय--खाने की थैली ) , एक बार एक बढे मेंढक के पेट में अन्य छोटा मेंढक था एक दम श्वेत त्वचा वाला जो शायद आमाशय के एच सी एल अम्ल में घुल गयी थी । क्या ये सब सच घटनाएँ हैं ? हमें तो कभी नहीं मिला ।  
           ' कहानी  तो कल्पना ही होती है ।'  मैंने बताया । 
           ' अरे नहीं, डाक्टर साहिबा जी, यह सच बात है ।'  राकेश ने पीछे से आकर नमस्कार करते हुए  डा .वीना को बताया ।  'मैं डा कृष्ण जी का इंटर का क्लास-फेलो हूँ और मेरे सामने की ही ये बातें हैं । शायद  ' स्पेशिमेंन' स्कूल की लैब में रखे भी हों । ये आपको टरका रहे हें ।' 
            ' ओ पंछी !  इतनी हिम्मत ।  दो लोगों की बातें सुनते हो ?  बुरी बात,  निगाहें कमीज़ के तीसरे बटन पर .....'   वीना मेरी तरफ  देखकर मुस्कुराती हुई बोली ।
           ' पर बुजुर्गों की बातें तो बच्चे सुन कर ही सीखेंगे ..।'   राकेश पूरी तरह से साष्टांग दंडवत की मुद्रा में वीना के कदमों में झुकता हुआ बोला । वह घबराकर दो कदम पीछे हट गयी ।
           ' राकेश, यार !  तुम तो बड़े सीधे साधे लडके थे,  बड़े स्मार्ट होगये हो ।  तुम्हारे तो पर निकलने लगे हैं, अभी से ।'  मैंने हंसते हुए पीठ पर धौल जमाते हुए कहा ।  
           ' पंछी जो ठहरा, वो भी किस का खास ।' सुमित्रा निकट आते हुए बोली,  'तो तुम केजी के ख़ास क्लास-फेलो हो , इंटर के ।  इस वर्ष सिलेक्ट हुए हो ?'
           ' जी हाँ,  ये तो कुछ जल्दी ही साथ छोड़ कर चले आये ।'
           'अच्छी आदत है, बहुत काम आती है।', सुमि वीना के साथ जाते हुए बोली, 'शाबाश, रौब में मत आना।" 
           ' जलवे हैं यार तुम्हारे तो, केजी ! क्या नाम है और क्या गहराई है कथन में ? राकेश पूछने लगा ।
           " त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति .......... । "   
           ' टाल रहे हो ।'
          ' चलो चलो, ज्यादा दिमाग न खपाओ । पढ़ने में लगो, डिसेक्टर का दूसरा पेज कल रटकर सुनाना ।'
           ' ओ के बॉस ।'  राकेश सेल्यूट ठोक  कर  हंसते हुए  चलने लगा,  फिर लौट कर बोला , ' शाम को पिक्चर चलें, ब्लो हॉट ब्लो कोल्ड, इम्पीरियल में ।'
           यूं फूल !  तभी उन्हीं लोगों से पैसे क्यों नहीं मांगे ?   इन्फोर्मेशन भी देते हो वो भी फ्री । दौड़कर जाओ और दो टिकट के मांग कर लाना ।  

                            -----अंक पांच समाप्त ...क्रमश: अंक छह ..अगली पोस्ट में .....
           
             
                                       

मंगलवार, 13 मार्च 2012

हमें सोचना होगा...महिला दिवस के परिप्रेक्ष्य में आलेख....डा श्याम गुप्त ..

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

           अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ८ मार्च के दिन पर विभिन्न कार्यक्रमों, भाषणों, उद्घोषणाओं आलेखों आदि मध्य उन पर गहन विचार करता हूँ तो कुछ यक्ष-प्रश्न  मन में आकार लेते हैं, घुमड़ते हैं, मन को मथते हैं ।  पुरा व प्राचीन व अर्वाचीन  काल में भी महिलायें ...यथा पार्वती, दुर्गा अनुसूया , सीता ,राधा ,द्रौपदी,  वेदों की मन्त्रकार महिलायें, व पद्मिनी , जीजाबाई , लक्ष्मीबाई जैसी महिलायें भी सौन्दर्य की प्रतिमान  थीं परन्तु वे  अपने ज्ञान, कुशलता, शौर्य, ताप भक्ति आदि के बल पर अपना लोहा मनवाने में सफल, चर्चित व प्रशंसित हुईं  न की सौन्दर्य के बल पर । परन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाय तो आज कौन महिलाओं की विद्वता, ज्ञान, शौर्य, भक्ति, तप आदि  सद्गुणों पर मुग्ध होरहा है? सभी  बालों के सौन्दर्य, बालों की सुगंध , साबुन-सर्फ़ की खुशबू , सुन्दर ड्रेस, जूते, स्कूटर-गाडी के रंग की तारीफ़ करती हुई महिला, मोडल, हीरोइन जिसकी नर्म व चिकनी  स्किन ग्लो करती है  उसी पर मुग्ध हैं।  कच्छा  पहन कर फूल खिलाने वाली नारी पर मुग्ध हैं, वे ही  सेलेब्रिटी हैं ..महान महिलायें हैं अर्थात शारीरिक सौन्दर्य पर सभी मुग्ध हैं .....विद्या बालन को डर्टी-रोल के लिए अवार्ड दिया जाता है न कि किसी विद्वतापूर्ण कार्य के लिए। इसमें स्वयं स्त्रियाँ ही सम्मिलित हैं उनके सहयोग, लालसा,लोलुपता, अनियमित, अवांछित, आकाशी  आकान्छाएं, शोर्ट-कट द्वारा शरीर-सौन्दर्य  के बल पर प्रसिद्धि पाने की इच्छा  के बिना यह नहीं होसकता । इसीलिये  आज हम प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं के साथ अभद्रता, वलात्कार , शोषण जैसी बातें  आये दिन सुनते है-देखते हैं ।  राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा, साहित्य ,कला, लेखिका ,कारपोरेट जगत, शासन, आई इ एस, जज , मजिस्ट्रेट, सेना,  साध्वियां सभी उच्च से उच्च क्षेत्र की अफसर  महिलाओं के भी शोषण, अभद्रता का समाचार सुनते हैं ।  जाने कितनी मधुमिताएं, कवितायें, आई इ एस, जज, चिकित्सक  महिलायें भी  शिकार हुईं हैं । कुछ  बदमाश दुष्ट लोग हर युग में होते हैं परन्तु इस युग में तो सभी उच्च पदस्थ, उच्च कोटि के व्यक्ति रत  हैं  महिलाओं के  शोषण में । लगता है की महिला चाहे जितनी पढी-लिखी हो वह सिर्फ औरत है, जिस्म है शोषण के लिए । यद्यपि सिर्फ एसा ही नहीं है, तमाम महिलायें आज भी अपने ज्ञान , विद्वता सशक्त आचरण के कारण आदरणीय भी हैं ।
          यदि पुरा, पूर्व, मध्य व वर्तमान  काल में महिलाओं के स्वयं के व्यवहार  एवं उनके प्रति पुरुष व समाज के व्यवहार  पर  एक विहंगम दृष्टि डाली जाय तो   पर कुछ  विशिष्ट तथ्य सम्मुख आते हैं ।
         सतयुग  आदि  पुराकाल में  महिलायें अपेक्षाकृत काफी स्वतंत्र थीं । इस काल में महिलाओं से अभद्रता के उदाहरण प्राय नहीं मिलते । महिलायें स्वयम के कठोर अनुशासन में ही रहतीं थीं । वैदिक ऋषिकाओं का ज्ञान , पार्वती  का तप  व भक्ति, दुर्गा की शक्ति महिलाओं के आदर का कारण होता था। हम देखते हैं कि जहां नहुष के सत्ता मदांध होजाने पर इंद्राणी से सम्बन्ध बनाने की बात पर इंद्राणी  अपनी चतुरता से उसे श्राप का भागी बनाकर अपने से अभद्र व्यवहार नहीं होने देती । अनुसूया  अपने त्याग, ज्ञान व भक्ति  के बल पर स्त्रियों में श्रेष्ठ की भाँति प्रशंसित होती है, उससे कोई  अभद्रता नहीं कर पाता ....त्रिदेव भी नहीं । अपाला, घोषा, गार्गी , लोपामुद्रा आदि जहां वैदिक -ऋषिकाएँ  अर्थात ज्ञानी होने के कारण  उनसे कोई अभद्रता नहीं कर पाया इसीलिये  वे आदरणीय व अनुकरणीय हैं ......वहीं अहल्या अपने अज्ञान व भक्ति की कमी  तथा शायद  स्वयं ही  इंद्र का साथ देने के लिए अपने से अभद्रता को न रोक पाई   अतः आदर का पात्र नहीं हुई ।
                परवर्ती काल में देखें तो  कैकेयी , कौशल्या आदि राजनीति में निपुण व ज्ञानवान होने के कारण उनसे कोई अभद्रता नहीं कर पाया वे प्रसिद्द व श्रद्देय हुईं  वहीं ताड़का व शूर्पणखा स्वयं ही ज्ञान भक्ति तप की कमी व कमजोर चरित्र की होने के कारण अभद्रता की शिकार हुईं व समाज द्वारा त्याज्य ।  सीता  मर्यादा के उल्लंघन के कारण कष्ट की भागी हुई यद्यपि ज्ञान, जन जन  नेत्रित्व गुण, भक्ति, तप के कारण अभद्रता का शिकार नहीं हुई  और आदरणीय व अनुकरणीय है । कैकसी जैसी  महिला  विश्रवा जैसे महान ऋषि की पत्नी व रावण जैसे विश्वविजयी पुत्र की मन होने पर भी सम्मान की पात्र नहीं हुई क्योंकि वह स्वयं अमुहूर्त में अमर्यादित तरीके से ऋषि से सम्बन्ध बनाती है एवं ज्ञान, तप, भक्ति से सर्वथा हीन होती है ।
                वहीं द्वापर काल में राधा अपने जन जन नेतृत्व क्षमता, ज्ञान, त्याग व तप की विद्वता के कारण कभी अभद्रता का शिकार नहीं  हुई   और देवी रूप में विश्व में प्रतिष्ठित हुई । द्रौपदी  अपने कुशल संचालन, तीब्र बुद्धि कौशल, ज्ञान एवं तप व भक्ति के कारण ....इतने झंझावात झेलती हुई, अभद्रता का दंश ( जो उसके आचरण के कारण  नहीं अपितु दुश्मनी के कारण हुआ) झेलते हुए  भी समाज में आदरणीय का स्थान रखती है जबकि वहीं चित्रांगदा, उलूपी, हिडिम्बा आदि  अपने स्वतंत्र आचरण के कारण कष्ट की भागी हुईं एवं  इतिहास पुरुषों की पत्नियां होने पर भी  इतिहास में आदर का पात्र नहीं बनीं । यहाँ तक की सुभद्रा भी कोई विशिष्ट ज्ञान अदि न होने के कारण एवं अपहरण का भाव होने के कारण समाज में इतनी प्रतिष्ठित नहीं हुई ।  अपहृत -विवाहित कोई भी स्त्री समाज के आदर व अनुकरण का पात्र नहीं हुई, यद्यपि अपहरण करके विवाह की सामाज में मान्यता थी ।
                   वर्तमान  मुग़ल व  अंग्रेजों  के काल में भी सशक्त, ज्ञानी, तप भक्ति युक्त महिलाओं लक्ष्मी बाई, जीजाबाई ,पद्मिनी , मीरा , कर्मावती दुर्गावती से कोई कब अभद्रता कर पाया । राय प्रवीण जैसी नर्तकी भी अपनी चतुरता के बल पर अकबर जैसे सम्राट को  'झूठी पातर खात हैं, वायस, वारी, श्वान ' , सुनाकर अपने से अभद्रता नहीं होने देती ।
                 यदि उपरोक्त अध्ययन को संज्ञान में लिया जाय तो कुछ तथ्य इस प्रकार दृष्टिगत होते हैं....
१-यह सब हर काल में होता रहा परन्तु कभी कभी, कहीं कहीं दुर्घटनाओं वश परन्तु  आज के आधुनिक काल में यह एक प्रायोजित कर्म की भींति दृष्टिगत होता है ।
२- पुरुष तो सदैव ही सौन्दर्य, शरीर, मांसलता से आकर्षित होता है यह एक स्वाभाविक चारित्रिक दौर्बल्य है परन्तु ऐसे पुरुषों को भी समाज में स्वाभाविक भाव-रूप से अधिक आदर नहीं मिल पाता।
३- स्त्रियों का स्वयं का व्यवहार, ज्ञान, कुशलता, तप, त्याग भावना, चारित्रिक दृड़ता ही उसकी रक्षक है ।
४- शारीरिक सौन्दर्य का उपयोग व चारित्रिक दृड़ता की कमी के कारण  असंगत व्यवहार व चारित्रिक दर्बलता वाली संतति -पुत्र ( कैकसी-रावण) पैदा होने पर समाज में ..पुरुषों-स्त्रियों में चारित्रिक दुर्बलता  आती है जबकि सबल चरित्र वाली माताओं की संतान सबल चरित्र( जीजाबाई- शिवाजी ) की एवं चारित्रिकता की उन्नायक  होती है ।
                       अतः निश्चय ही नारी ही सदैव समाज की रीढ़ है पुरुष नहीं । इसीलिये पुरुषों  के लिए यह स्पष्ट आदेश हैं कि ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ।'  अर्थात नारियों का सम्मान पुरुषों का  मूलभूत कर्तव्य है ।   आज की वर्तमान स्थिति के लिए निश्चय ही  'कच्छा पहन कर फूल खिलाने वाली ' नारी स्वयं जिम्मेदार है नारी को यह  समझना होगा तथा  नारी के शारीरिक सौन्दर्य का उपयोग करने वाला पुरुष व समाज भी  ।  अतः महिला दिवस के अवसर पर नारी को यह सोचना होगा साथ ही साथ पुरुषों को और सारे समाज को भी ।
                 
                    
                                                        

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

इन्द्रधनुष.....अंक चार का शेष -----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का उपन्यास.....

             


                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास (शीघ्र प्रकाश्य ....)....पिछले अंक तीन  से क्रमश:......
                                       
                                                        अंक चार का शेष

                     अगले दिन  लाइब्रेरी के सामने सुमित्रा को एक सीनियर छात्र डा नारंग  से बात करते हुए देखा । मुझे देखते ही वह मुस्कुराकर माथे पर बल डालते हुए चली आयी ।
          ' भई,  डा नारंग क्या गुरुमंत्र देरहे थे ?'  मैंने हंसते हुए पूछा ।      
           ही....ही....ही.....वह हंसते हुए  बोली , 'प्रशंसा कर रहे थे कि क्या भाषण दिया है, क्या मार्के की बात कहती हो ।' चलो काफी पिलायें ।    
           फिर...?
           ' मैंने कहा, कृष्ण मेरे इंतज़ार में है आप चलिए मैं उसे लेकर आती हूँ ।'  ....ही...ही ... ही .... वह हंसने लगी ।
           फिर क्या बोले ...!
          ' तेरे से कौन टक्कर ले,  रे त्रिभंगी ! '
           व्हाट ! ये कौन सी भाषा है ? ये उन्होंने कहा ।
          'दैया रे दैया, अपनी ही बोली-बानी भुलाय दई, रे नटवर ! नगर में आय कै।'......ही .ही.... ही ......ही..... ही ... जैसे उसे हंसी का दौरा पड़  गया हो ।
          अब कहो भी, क्या भीड़ इकट्ठा करने का इरादा है ।
         ' क्या कहूं ? '   वह हंसते हंसते वोली, ' फिर कभी कह कर फूट लिए ।'
          भई उनका भी दिल रखलेना चाहिए था ।
         'दिल से कह रहे हो?', फिर किस किस का दिल रखती रहूँगी, क्यों पचड़े में पडूँ ।'  हाँ तुम बताओ ये क्या होगया है तुम्हें ?
          अब मुझे क्या हुआ ?
          कुमुद से तुमने क्या उलटा-सीधा कह दिया ?
         अरे हाँ, उसे अचानक क्या हुआ था, अब ठीक है ?
         'ठीक तो है महाज्ञानी जी,परन्तु तुमने उसे बहुत निराश कर दिया ।'
         क्यों ? मैंने क्या किया ? जो कुछ कहा था तुम्हारे सामने ही तो कहा था, और उससे उसे क्या ।
         अरे बावा ! वह तुम पर लाइन मार रही थी ।' चाहती थी ।
         'तो अब ?'
         तुम्हारी बातें सुन कर सहम गयी ।  बोली, 'बड़े विचित्र विचारों वाला निर्मोही व नीरस व्यक्ति है।'  
         मैं हंसने लगा,  'चाहत बड़ी गहरी और ऊंची शय है' ,  है न सुमि ?  'जो इतनी जल्दी उतर जाय वह चाहत ही क्या । जो चंद बातों से घबरा जायं वो क्या जानें चाहत क्या है ।'
         हूँ,  सो तो है ।  सुमि ने सीरियस होकर सिर हिलाया । 
                              **                             **                               ** 
                          छुट्टियों के बाद सुमित्रा जब दिल्ली से लौट कर आई तो कुछ उदास व चुप चुप थी। मैंने पूछा,
         ' क्या बात है,  क्या किसी से लड़कर आई हो ? '
         ' नहीं भई ।',   सुमित्रा बोली ।
         'तो फिर क्या बात है ?'
         सुमि चुप रही तो सुमन उपाध्याय ने बताया ।  कृष्ण जी, वो श्रुति की डेथ हो गयी है न ।
         कौन श्रुति ? मैंने पूछा ।
         केजी,  भूल गए।  अपने साथ फर्स्ट ईयर में  एक लड़की थी  श्रुति, जिसने बाद में  दिल्ली मेडीकल कालिज  में ट्रांसफर करा लिया था ।
         अच्छा, वो एक दम गोरी, सुन्दर सी गोल-मटोल लड़की जो किसी  आईऐएस  की बेटी थी ।
         हाँ, हाँ  वही, उसकी मृत्यु होगई ।
         कैसे ?
        उसे  'पिट्यूटरी ट्यूमर'  होगया था न,  इसीलिये तो दिल्ली ट्रांसफर कराया था । पिछली बार अचानक मुलाक़ात हुई थी । वह  'स्टीरोइड'  पर थी। आपरेट भी किया गया था। परसों ही बह चल बसी। 'सुमि ने बताया।'
        'रियली सैड' तभी वह इतनी सुन्दर गोल-मटोल थी ।'
         ' हाँ, मेरी  रूम-पार्टनर थी न' , सुमि डबडबाई आँखों से बोली ,  ' खूब हंसमुख व खूब बोलने वाली ।'    
         चलो काफी लेलो, जी ठीक होजायगा ।' मैंने कहा ।
         नहीं मन नहीं है, मैं चलती हूँ ।  
         ठीक है,  टेक केयर, ईश्वर की मर्जी । मैंने कन्धों पर हाथ रखते हुए कहा ।
         वह सिर हिलाते हुए जबरदस्ती मुस्कुराई और सुमन के साथ चली गयी ।
                                            -----अंक चार समाप्त ....क्रमश: ...अंक पांच ...अगली पोस्ट में ..... 
                      
                            
 

गुरुवार, 8 मार्च 2012

पिचकारी के तीर ...

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
 
     पिचकारी के तीर  

गोरे गोरे अंग पै, चटख चढि गये रंग,
रंगीले आंचर उडैं, जैसें नवल पतंग

चेहरे सारे पुत गयेचढे सयाने रंग,
समझ कछू आवै नहीं, को सजनी को कंत

लाल  हरे  पीले रंगेरंगे   अंग - प्रत्यंग ,
कज़्ज़ल-गिरि सी कामिनी, चढौ कोऊ रंग।

चन्चुमुखी पिचकारि ते, वे छोडें रंग धार,
वे घूंघट की ओट ते , करें नैन के वार ।

लकुटि लिये सखियां खडीं, बदला आज चुकायं,
सुधि-बुधि भूलीं श्याम जब ले पिचकारी धायं ।

आज न मुरलीधर बचें, राधा मन मुसुकायं,
दौडी सुधि बुधि भूलकर, मुरली दयी बजाय ।

भये लज़ीले श्याम  दोऊ, गोरे गाल गुलाल,
गाल गुलाबी होगये, भयो गुलाल रंग लाल ।

होली खेली लाल नै, उडे अबीर गुलाल,
सुर,मुनि,ब्रह्मा,विष्णु,शिव,तीनों लोक निहाल।

भरि पिचकारी सखी पर, वे रंग बान चलायं,
लौटें नैनन बान भय, स्वयं सखा रंगि जायं

भ्रकुटि तानि बरजै सुमुखि, मन ही मन ललचाय,
पिचकारी ते श्याम की, तन मन सब रंगि जाय

भक्ति ग्यान प्रेम की, मन में उठै तरंग,
कर्म भरी पिचकारि ते, रस भीजै अंग-अंग

एसी  होली  खेलिये, जरै त्रिविधि संताप,
परमानन्द प्रतीति हो, ह्रदय बसें प्रभु आप

यह वर मुझको दीजिये, चतुर राधिका सोय,
होरी खेलत श्याम संग, दर्शन श्याम को होय ॥

होली है.....डा श्याम गुप्त .......

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...                 

 होरी  के हुरदंग को,  होरा भूने  हूर ।
हूर-हूर पर चढ रहा,देखो नूर-शुरूर ॥
देखो नूर-शुरूर, चहुं तरफ़ हैं हुरियारे,
तक-तक कर रंगधार,बदन पर मारें प्यारे।

श्याम,भीग कर हुईं,रंगीली सब ही गोरी,
  

  सखी री मोहे रंगि दीन्हो गोपाल |
भरि  पिचकारी  प्रीति  भरे  रंग, नीलो  पीलो  लाल |
तकि तकि अंग-अंग रंग रस डारौ अंग-अंग भये निहाल |
भींजी अंगिया, भींजी सारी, सकुचि  हिये  भई  लाल |
बरबस  बरजूं लोक लाज वस, नहिं  मान्यो  गोपाल |
अंग-अंग रंग  टपकै  झर-झर, मुसुकावैं  लखि ग्वाल
श्याम ' श्याम ऐसी रंगि दीन्ही, तन मन भयो गुलाल ||