ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 5 सितंबर 2012

अगीत का छंद-विधान ....डा श्याम गुप्त की नयी पुस्तक.....अगीत साहित्य दर्पण ...

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

      अतुकांत कविता  की एक विशिष्ट विधा---अगीत कविता---का प्रथम छंद-विधान--एक शास्त्रीय ग्रन्थ

नाम पुस्तक--- अगीत साहित्य दर्पण (अगीत काव्य एवं अगीत छंद विधान )
रचयिता ------ डा श्याम गुप्त
प्रकाशन ------ सुषमा प्रकाशन , लखनऊ  एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद , लखनऊ
प्रकाशन वर्ष --१ मार्च, २०१२ ई....पृष्ठ ---९४ ...मूल्य ....१५०/-रु.

                                                             संक्षिप्त विवरण
 समर्पण--- डा रंगनाथ मिश्र सत्य  एवं  महाकवि श्री जगत नारायण पांडे  को |

 प्रस्तावना----"'अगीत साहित्य दर्पण'  रचनाकारों के लिए एक मानक ग्रन्थ होगा"-    -डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य',  -                         संस्थापक अध्यक्ष , अखिल भारतीय अगीत परिषद, लखनऊ

शुभाशंसा ----प्रोफ. कैलाश देवी सिंह,  पीएचडी . डी लिट, विभागाध्यक्ष, हिन्दी तथा आधुनिक  भाषा विभाग, -                    लखनऊ वि. विद्यालय, लखनऊ |

दो शब्द ------  कविवर श्री रामदेव लाल 'विभोर' महामंत्री, काव्य कला मंदिर, लखनऊ |

पूर्व कथन व आभार ....  लेखक

                                               
                                                         मंगलाचरण ----           
 १.
 माँ वाणी! माँ सरस्वती |
माँ शारदे |
अगीत को नवीन सुरलय ताल का
संसार  दे |
नए  नए स्वर, छंद-
नवल विचार दे |
यह अगीत काव्य ,
जन जन में विस्तार पाए ;
मूढमति श्याम का -
माँ जीवन सुधार दे ||

२.
हे अगीत ! तुम निहित गीत में,
गीत तुम्हारे अंतर स्थित |
नए छंद , नव भाव, नवल स्वर ,
ले अवतरित हुए हे  चेतन !
वंदन  हित वाणी-विनायकौ ,
नमन श्याम का हो स्वीकार ||

                                               विषय - अनुक्रमणिका  ....

प्रथम अध्याय ....अगीत: एतिहासिक पृष्ठभूमि व् परिदृश्य ..

द्वितीय अध्याय ....अगीत : क्यों व क्या है एवं उसकी उपयोगिता ..

तृतीय अध्याय ...अगीत : वर्त्तमान परिदृश्य व भविष्य की संभावना ..

चतुर्थ अध्याय ....अगीत छंद व उनका रचना विधान ..

पंचम अध्याय ....अगीत की भाव संपदा ..

षष्ठ अध्याय ..... अगीत का कला पक्ष ......


                                       (----क्रमश ... प्रस्तावना --.)


    




आज टीचर्स डे है गुरु दिवस नहीं ....ड़ा श्याम गुप्त के दोहे....

               आज  टीचर्स डे है गुरु दिवस नहीं .... देखिये टीचर्स के स्टूडेंट्स की शानदार लेंग्वेज ......
                             





                      










और  कुछ  दोहे....



धन साधन की रेल में भीड़ खचाखच जाय |
धक्का मुक्की धन करे, ज्ञान नहीं चढ पाय ||

ज्ञान हेतु अब ना पढ़ें,  पढ़ें  नौकरी  हेतु |
लक्ष्य  चाकरी होगया, लक्ष्मी बने है सेतु ||

शास्त्र  पढ़े बिन नाम रख,शास्त्री परम सुजान |
टीचर - स्टूडेंट की,  बनी  खूब  पहचान ||

डिग्री ले शास्त्री बने, नहीं ज्ञान पहचान |
जस टीचर तस ही बनें, स्टूडेंट महान ||

चाहे पद पूजन करो, या साष्टांग प्रणाम |
शिक्षा तब ही पाओगे, चढ़े चढावा दाम  ||

बने धनार्जन सेतु सब,ध्यान ज्ञान विज्ञान |
अमरीका की चाकरी, करें जाय विद्वान ||

सींचे बिन मुरझा गयी,सदाचार की मूल |
श्याम कहाँ फूलें फलें , संस्कार के फूल ||

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

नारी और मुक्ति... कहानी.... डा श्याम गुप्त...

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...






image
                               नारी विमर्श व्याख्यान-माला गोष्ठी प्रारम्भ होने में अभी कुछ समय था। पधारे हुए सभी विज्ञजन विचार-विमर्श करने लगे। पांडेजी ने अभी हाल में ही पढ़ी हुई उर्वशी-पुरुरवा की कथा पर अत्यंत तार्किकता व सतर्कता से सौन्दर्यपूर्ण समीक्षा करते हुए अंत में कहा, ’उर्वशी पुरुरवा के लिए वरदान है’।
                             ‘हाँ, निश्चय ही, क्योंकि नारी, पुरुष का मुक्ति-पथ है, मुक्ति-सेतु है।’ ड़ा शर्मा बोले।
                             ‘और नारी की मुक्ति ?’ युवा लेखक राघव ने प्रश्न उठाया।
                             ‘पथ की भी कभी मुक्ति होती है ! वह तो सदा मुक्ति हेतु दीप की भांति कार्य करता है। स्त्री तो स्वयं ही पथ है मुक्ति का, इस पथ पर चले बिना कौन मुक्त होता है। संसार के हितार्थ कुछ तत्व कभी मुक्त नहीं होते मूलतः प्रकृति-तत्व, अन्यथा संसार कैसे चलेगा।’ ड़ा शर्मा ने अपना पक्ष रखा।
                           ‘अर्थात आपका कथन है कि नारी की मुक्ति होती ही नहीं। अमित जी ने हैरानी से पूछा,’ यह तो बड़ा अन्याय हुआ नारी के साथ।’
                          'नारी प्रकृति है, माया है। स्त्री द्विविधा भाव है। वही मोक्ष से रोकती भी है अर्थात संसारी भाव में जीव अर्थात पुरुष का जीना हराम भी करती है और और वही मोक्ष का द्वार भी है जीना आरामदायक भी करती है। काली के रूप में शिव को शव बनादेती है, सती के रूप में शिव को उन्मत्त करती है तो पार्वती बन कर शिव को चन्द्रचूड बना देती है और तुलसी को तुलसीदास। नारी को गौ रूप कहा जाता है अर्थात वह प्रकृति में पृथ्वी है, गाय है, इन्द्रिय है, संसार हेतु अविद्या है तो तत्व रूप में विद्या, ज्ञान व बुद्धि। बंधन में तो पुरुष अर्थात जीव रूप में ब्रह्म या पुरुष रहता है| उसी को मुक्त होना होता है। नारी, प्रकृति, माया तो बद्ध-पुरुष को मुक्ति के पथ पर लेजाती है| ड़ा. शर्माजी ने स्पष्ट किया। तभी तो ईशोपनिषद में मोक्ष मन्त्र कहा गया है.......
                                                  ” विद्या चा विद्या यस्तत वेदोभय स:
                                                   अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृमनुश्ते।|”
                          ‘तो फिर नारी के जीवन का उद्देश्य ही क्या रह जाता है। जब मुक्ति ही नहीं ?’ राघव ने पुनः प्रश्न उठाया।
                          ‘नारी की मुक्ति पुरुष से जुड़ी है। यदि नारी पुरुष को मुक्ति की ओर लेजाती है। वह पुरुष को मुक्ति-पथ पर चलने को तैयार कर पाती है अपने प्रेम, तप, साधना, त्याग, चातुर्य से तो वह अनाचारी, अत्याचारी, समाज एवं नारी पर भी अत्याचार का कारण नहीं बनेगा। समाज सम व द्वंद्वों से रहित रहेगा। क्योंकि मूलतः द्वंद्वों का कारण पुरुष ही होता है जो माया-बद्ध जीव है माया से भ्रमित। मेरे विचार से यही नारी की मुक्ति है।’ ड़ा शर्मा कहने लगे।
                         ‘आखिर यह मुक्ति है क्या ?’ अमित जी कहने लगे, ‘ जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होना या सांसारिक बंधन से मुक्ति ...या संसार से ?’
                          ‘और ये बंधन क्या है? ड़ा शर्मा ने प्रति-प्रश्न किया, पुनः स्वयं ही कहने लगे,’ द्वेष, द्वंद्व, झगड़े, लाभ-हानि, लोभ-लालच में लिप्तता ही बंधन है। यदि नारी पुरुष को सहज रखने में सफल रहती है तो सारा समाज ही सहज रहता है। यही नारी का नारीत्व है और यही उसकी मुक्ति। पुरुष भी नारी को पूर्णता प्रदान कर उसे मुक्ति-पथ की ओर ले जाता है। अंत में मुक्ति तो जीव–तत्व की ही होती है वह न पुरुष होता है न स्त्री वह तो आत्म-तत्व है। तभी तो कहा जाता है...
                                                       ’देहरी लौं संग बरी नारि और आगे हंस अकेला।
                            ‘पर जीव तो नारी भी है , फिर वह मुक्त क्यों नहीं हो सकती ?’ पांडे जी ने पूछा।
वास्तव में तत्व व्याख्या में नारी जीव नहीं है। वह तो शक्ति का रूपांतरण है। अतः नारी तो सदा मुक्त है। वह बंधन में होती ही कब है। वह तो स्वयं बंधन है। जीव, पुरुष रूपी ब्रह्म को बांधने वाली। पुरुष ही बंधन में होता है। ब्रह्म पुरुष रूप में, जीव रूप में आकर स्वयं ही माया-बंधन में बंधता है ताकि संसार का क्रम चलता रहे। नारी तो स्वयं ही माया है, प्रकृति है। पुरुष –ब्रह्म को बाँध कर नचाने वाली| यद्यपि माया स्वयं ब्रह्म की इच्छा पर ही कार्य करती है स्वतंत्र रूप से नहीं क्योंकि वह उसी का अंश है.......
                                                        “ ब्रह्म की इच्छा माया नाचे जीवन जगत सजाये।
                                                           जीव रूप जब बने ब्रह्म फिर माया उसे नचाये।
                           ‘यह तो विचित्र सा तर्क लगता है।’ राघव ने कहा।
                           ‘हाँ, तभी तो पाश्चात्य जगत में एक समय ‘नारी जीव है भी या नहीं का प्रश्न उपस्थित था अपितु नारी को मानवी माने जाने में भी संदेह था। यह बड़ा ही क्रूड व क्रूर ढंग है वस्तुस्थिति को प्रकट करने का जो अति-भौतिकतावादी सभ्यता के अनुरूप ही हो सकता है। भारतीय सनातन सभ्यता , ब्राह्मण, जैन आदि में भी नारी को मुक्ति या मोक्ष का अधिकारी नहीं माना जाता रहा है परन्तु उसे मोक्ष के पथ पर ले जाने वाला माना जाता रहा है। इसीलिये उसे नर का, पुरुष का, ब्रह्म-जीव का बंधन कहा गया। यह कथन का तात्विक व सात्विक रूप है।’ ड़ा शर्मा जी ने बताया।
                          ‘और ये अवतारों को क्या कहेंगे आप, हमारे यहाँ सारे अवतारों के साथ सदा नारी भी होती है या कोई भी शक्ति अवश्य अवतार लेती है जिनकी सहायता की अवश्य ही आवश्यकता पडती है इन अवतारों को; उसका क्या उत्तर देंगें आप ?’ सुषमा जी पूछने लगीं।
                        ‘आपने बड़ी देर में भाग लेने का कष्ट किया बातचीत में’, ड़ा शर्मा हंसते हुए बोले ,’एक विचार भाव से वैज्ञानिक-अध्यात्म के अनुसार तो ये अवतार, चाहे सत्य हों या कल्पित.... जीवन व प्राणी की क्रमिक विकास यात्रा प्रतीत होते हैं....मत्स्य से जीवन की उत्पत्ति, जल से पृथ्वी पर आना, लघु मानव—मानव तक की उत्पत्ति, शारीरिक शक्ति-धनु, परशु, गदा आदि विविध हथियार,.. मानसिक शक्ति..तप, त्याग, मर्यादा व प्रकृति रूप के समन्वयक राम और शक्ति, ज्ञान, व्यवहार के समन्वयक कृष्ण तक। आगे अभी भविष्य के गर्भ में है।’ ये मानव प्रगति-व्यवहार की युग-संधियां भी कही जा सकती हैं|'
                      ‘आप सही कह रही हैं सुषमा जी, सभी के साथ उनकी मूल-शक्ति रूप में या नारी-पत्नी रूप में प्रकृति या माया अवश्य अवतार लेती है..जन्म लेती है। जैसे ही बद्ध-जीव या अवतार का पृथ्वी-संसार पर कार्य समाप्त हो जाता है वह मुक्ति के पथ पर अग्रसर होता है, उसकी शक्तियां, माया, प्रकृतिरूपा शक्ति-अवतार भी उससे पहले या बाद में जगत से प्रस्थान कर जाती हैं। इसीलिये तो हमारे यहाँ शक्ति-रूपा पत्नी सदैव पति से पहले मृत्यु की कामना करती है ताकि गोलोक में जाकर वहाँ की व्यवस्था भी संभाली जाय कुछ अपनी स्वेच्छा से भी और आशीर्वाद भी सदा सुहागन रहो का दिया जाता है। ड़ा शर्मा हंस कर कहने लगे।’ ....‘और सती प्रथा जैसी कुप्रथा शायद भी इस तात्विक बात का अर्थ-अनर्थ करने से उत्पन्न हुई।’ उन्होंने पुनः कहा।
                        ‘परन्तु अवतार तो सर्व-समर्थ होते हैं, ब्रह्म रूप, ईश्वर का अवतार ; तो फिर शक्तियों को, प्रकृति को साथ आने की क्या आवश्यकता ?’ राघव ने तर्क किया।
                        पुरुष या ब्रह्म या ईश्वर स्वयं अकेला कहाँ कार्य कर पाता है, वह तो अकर्मा है कार्य तो प्रकृति ही करती है। अवतार भी प्रकृति, शक्ति, योगमाया द्वारा ही कार्य कराते हैं। ड़ा शर्मा बोले।
                       ‘तो फिर प्रकृति ही सब कुछ हुई, और स्त्री भी ...फिर पुरुष, ईश्वर, ब्रह्म, अवतार की क्या आवश्यकता है यदि हैं और यदि कल्पित हैं तो भी इनकी परिकल्पना की क्या आवश्यकता है।’ पांडे जी ने तर्क दिया।
                          ‘परन्तु शक्ति स्वेच्छा से कहाँ कार्य करती है। वह तो पुरुष या ब्रह्म की इच्छानुसार ही क्रियाशील होती है। एकोहं बहुस्याम की ईषत इच्छा से ही तो प्रकृति चेतन होकर संसार रचती है| अर्थात...ब्रह्म–प्रकृति, नर-नारी, दोनों ही आवश्यक हैं सृष्टि हेतु, संसार के लिए, संसार के सहज सामंजस्य के लिए। यदि संसार के इस द्वैत, द्विविधा- भाव के तात्विक ज्ञान को सभी स्त्री-पुरुष समझ कर जीवन में उतारें यथानुसार कार्य करें तो समाज-संसार में द्वंद्वों का प्रश्न ही खडा नहीं होगा।’
                        ‘तो फिर संसार कैसे चलेगा, क्यों रचा जायेगा, क्यों बनेगा ? किसलिए, किसके लिए ?’ प्रश्न उठाया गया।
                        ‘तभी तो दोनों अलग अलग जन्म लेते हैं, आकर्षण-विकर्षण के चलते मिलते हैं..प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी बनते हैं...संसार-चक्र बनता व चलता है| एक दूसरे को मुक्ति पथ पर ले जाते हैं| तभी तो कहा गया है कि नारी के बिना मुक्ति नहीं, बिना संसार को जाने मुक्ति कैसी, बिना संसार रूपी वैतरिणी पार किये कहाँ मोक्ष और उसके लिए गाय की पूंछ अर्थात पृथ्वी का, प्रकृति का, नारी का, ज्ञान-बुद्धि का पल्लू पकड़ना अत्यावश्यक है।’ ड़ा शर्मा कहते गए।
                       “उर्वशी कहती है कि तुम सौ वर्ष तक भी प्रेम करते रहो तो भी नारी प्रेम नहीं करेगी, स्त्रियाँ निर्मोही होती हैं।” पांडेजी हंसते हुए कहने लगे।
                      ‘ वैसे तो यह स्वर्ग की अर्थात सिद्धि-प्रसिद्धि के शिखर की बात है, जहां ममता-मोह-बंधन आदि नहीं होते परन्तु संसार में, पृथ्वी पर नारी प्रेम का प्रतीक है| तभी तो उर्वशी भूलोक पर आती है परन्तु भूलोक की नारी का पूर्ण धर्म नहीं निभा पाती| प्रकृति व माया की भांति नारी भी शक्ति है, ऊर्जा है ...पावर है, और शक्ति वास्तव में निर्मोही होती है उसके साथ नाजायज़ छेड़खानी से धक्का, शाक अर्थात करेंट लगने का सदैव अंदेशा रहता है| नर को भी समाज को भी, और परिणाम ..पंगु हो जाना ..नर का भी, समाज काभी..'सावधान.’ कहते हुए ड़ा शर्मा मुस्कुराये।
                 ‘बडी देर से नारी-निंदा पुराण कहा-सुना जा रहा है।’, अमृता जी जो बड़ी देर से सोफे पर बैठी हुईं सब सुन रहीं थीं, बोलीं।
               ‘ निंदा या प्रशंसा-स्तुति, पांडे जी बोले, ’ फिर, यह तो हम पुरुषों के मंतव्य हैं। आप लोग अपने मंतव्य प्रस्तुत करें।’
                 सुना नहीं है , अमृता जी बोलीं.....
                                                 “ नारी निंदा मत करो, नारी नर की खान।
                                                    नारी से नर होत हैं, ध्रुव, प्रहलाद समान।|”
                  बिलकुल सत्य है अमृता जी, ड़ा शर्मा कहने लगे, पर इसके लिए नारी को ध्रुव, प्रहलाद की माँ के समान भी तो होना पड़ेगा।’

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

एक एतिहासिक भूल...... ड़ा श्याम गुप्त ...

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                      आज से ७५ वर्ष पहले जो भूल की गयी थी उसके दुष्परिणाम आज भी देखने को मिल रहे हैं  | मतभेद भुलाने हेतु  खान अब्दुल गफ्फार खान  को वास्तव  में अपने भाषण में   'राम सेना'  व  'खुदाई खिदमतगार' बनने की सलाह की बजाय  सभी को  " राष्ट्र सेवक"   बनकर आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने का आव्हान करना चाहिए था |  जहां राष्ट्र की बात  होती है  वहाँ राम व खुदा के नाम का प्रयोग  क्यों |  धर्म का नाम ही  नहीं आना  चाहिए |

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

मेरी खुशियों का राज ...ड़ा श्याम गुप्त....

                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                      काफी  पुराने समय की बात है ..सुना, देखा ,पढ़ा करते थे ...कभी कभी आजकल भी दिख जाते हैं ... गली-कूचों में  कुछ लोग... जो अपने को हकीम भी बताया करते थे ... बेचा करते थे.... मर्दाना ताकत की दवा...मुसली,शिलाजीत... सांडा का तेल, जिसे उसी समय किसी तेल में  छिपकली टाइप के जानवर को तल कर बनाया भी जाता था ... अखवारों आदि में विज्ञापन भी आया करते थे | उन्हें पढ़े-लिखे लोगों, वैज्ञानिक जगत के विज्ञान-विज्ञान  चिल्लाने वाले लोगों में  हिकारत की दृष्टि से देखा जाता था |



        आज के अखबारों को उठाकर जब देखते हैं तो ...हाईपावर, जापानी तेल, खुशी का होर्स-पावर , स्टे-ओन, मरदाना पावर ..आदि के विज्ञापन भरे रहते हैं |
    क्या हम ७०-८० साल में भी वहीं के वहीं हैं ....अथवा पुरातन ..को अंग्रेज़ी, पाश्चात्य या नयी बोतलों में ढाल कर वही माल बेचा जा रहा है |







                  
                     

बुधवार, 22 अगस्त 2012

ड़ा श्याम गुप्त की कहानी.....माँ और काजल पुराण.....

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 
                        
             पुस्तक पढते, कम्प्युटर पर काम करते, नोट्स बनाते जब आँखों में भारीपन व धूल-धूल से होने लगी तो मैं लेट गया और उँगलियों के पोरों से दोनों आँखों को हलके हलके दवाकर आराम देने का प्रयत्न करने लगा | लेटे-लेटे मैं सोचने लगा क्या कोई आई-ड्रॉप डाल ली जाय या लुब्रीकेंट आटीर्फिसियल टीयर्स-ड्रोप्स | तभी बगल के कमरे से मेरा मित्र रमाकांत, जो लखनऊ आया हुआ था, आकर कहने लगा, ’यार! बड़ा धाँसू उपन्यास लिखा है, एक सिटिंग में ही पढ गया, उठा ही नहीं गया बीच में | मज़ा आगया, कालिज का ज़माना याद आगया |’ मुझे लेटे हुए व आँखें मलते देख कर पूछने लगा,’ क्या हुआ ?’
             ‘कुछ नहीं, बस आँख थक गयी तो लेट गया, स्ट्रेन से हल्का-हल्का भारीपन है यूंही, मैंने हथेली से पलकें दबाते हुए कहा |
            तुम तो यार, काजल लगवा लेते थे, इस सिचुएशन में |’ रमाकांत बोला, फिर ठहाका मारकर हँसने लगा तो मैं भी मुस्कुराने लगा |
            मेरा ध्यान पत्नी की ओर चला जाता है जो बेटे के पास गयी हुई थी | जब कभी ऐसा होता है तो मैं श्रीमती जी से सरसों के तेल के दीपक का काज़ल लगवा लेता हूँ अन्यथा वह अपनी काज़ल की डब्बी से ही लगा देती है | आराम मिलता है | काज़ल के नाम से मैं हंसने लगा तो रमाकांत बोला, ’अब क्या हुआ, याद आगई क्या भाभीजी की ?’
           उसी समय टेलीफोन आगया | मैंने फोन उठाया तो पत्नी की आवाज़ सुनकर पुनः हंसने लगा |’
           क्या बात है, क्यों हंस रहे हो, पूछने पर जब काज़ल बाली बात बतायी गयी तो वह कहने लगी, ’वहीं डब्बी में होगा या बनाकर लगालो दो मिनट में |’ 
          ‘अरे, भई ! उन उँगलियों की बात और ही होती है|’ मैंने कहा तो वह भी हंसने लगी, बोली ‘दिन भर लेपटोप पर मत लगे रहा करो, ये नौबत ही क्यों आये |’
          पीछे से रमाकांत ने ..नमस्कार जी’ की आवाज़ लगाई तो अचानक चौंक कर पूछा, ’ कोई आया है क्या घर पर ?’
          हाँ, रमाकांत, मैंने कहा |
         अच्छा अच्छा, चलो अच्छा है, मन लगा रहेगा |  खाने आदि का ठीक चल रहा है न | दिन भर दोनों लोग घूमने में, बातों में, बहस में ही मत लगे रहना |
        विविध निर्देशों-अनुदेशों के पश्चात फोन तो बंद होगया परन्तु काज़ल अभी भी विचार में बना रहा | उँगलियों व काज़ल से स्मृतियों में माँ की तस्वीर उभर कर आने लगी जो बचपन में हम सब बच्चों को पकड़-पकड़ कर जबरदस्ती सरसों के तेल के दीपक की कालिख से बना सूखा काज़ल का पाउडर उँगलियों से लगाया करती थी | अपितु चुटकी से आँखों में भर भी दिया जाता था | कुछ देर तक आँखों में धूल-धूल सी लगने व पानी बहने से पश्चात आराम मिल जाता था| पिताजी भी अकाउंट का कार्य, लिखने-पढने का करते थे तो उन्हें भी अक्सर आना-कानी करने के बाद लगवाना पडता था, यद्यपि बाद में मिट्टी के तेल की लेंटर्न आजाने से तथा विद्युत आने पर काज़ल बनाना सिर्फ दीपावली के दीप तक ही सीमित रह गया| यह क्रम मेरे चिकित्सा-महाविद्यालय में चयन होने पर भी चलता रहा यहाँ तक कि कभी-कभी शादी के बाद भी | माँ का तर्क था कि पढते-लिखते-खेलते आँखों के कांच पर धूल आजाती है, काज़ल से कांच मंज जाता है अर्थात साफ़ होजाता है जैसे चश्मे के कांच को साफ़ करना पडता है |
        ‘तुम तो यार डाक्टर हो, रमाकांत की आवाज़ से मेरी विचार श्रृखला टूटती है | वह कह रहा था,  ‘डाक्टर लोग तो मना करते थे काज़ल-वाज़ल लगाने के लिए, फिर?’
        हाँ, यह तो है, मैंने कहा, ‘यद्यपि अधिकाँश हम डाक्टर लोग पाश्चात्य शिक्षा-प्रभाव वश, क्योंकि काज़ल एक भारतीय प्रथा थी, काज़ल व सुरमे की बुराई ही करते थे, न लगाने का परामर्श देते थे कि यह प्रथा आँखों के इन्फेक्शन व रोगों का कारण है | परन्तु यार, व्यक्तिगत रूप से मैंने काज़ल को कभी खलनायक नहीं माना अपितु सुरमा लगाने की सलाई, जो सुरमा प्रयोग करने वाले समाज व परिवारों में प्रयोग होती थी और एक ही सलाई से सारा परिवार लगाया करता था, को ही खलनायक मानता रहा |’
        ‘तो क्या तुम अब भी लगाते हो काज़ल ?’ उसने आश्चर्य से पूछा |
        हाँ, कभी-कभी, मैंने हँसते हुए कहा, ’काज़ल तो यार, बचपन में माँ लगाया करती थी जबरदस्ती | पर वह तो सदैव गर्म-गर्म बना हुआ काजल, उंगली को दिए पर गर्म करके और प्रत्येक आँख के लिए अलग-अलग उंगली से लगाया करती थी| हमारे यहाँ आँखों के इन्फेक्शन कम ही होते थे|’
       ‘कुछ होता भी है काज़ल-सुरमा से या यूंही आदतानुसार मन का भरम है| होता क्या है काज़ल? रमाकांत पूछने लगा |
           ऐसा नहीं है, मैंने कहा, ‘ काज़ल वास्तव में सूखा हो या गीला, एक प्रकार का ‘अधिशोषक’  (एड्जोर्बेंट) का कार्य करता है | आंसुओं की बहने की गति तीब्र करके वाह्य धूल व आतंरिक प्रक्रियाओं से बने अप-द्रव्यों, स्रावों को बहा देता है | आंसुओं की अधिकता से रेटिना व आँख की पुतली आदि पुनः नम होजाती हैं और आराम मिलता है| आज के लुब्रीकेंट, टीयर्स आदि ड्रोप्स की अपेक्षा आँखों की स्वाभाविक, सहज अश्रु-प्रक्षालन प्रक्रिया के प्रयोग द्वारा |
          विचार फिर श्रीमती जी की ओर मुड जाते हैं | शादी के पश्चात आधुनिक बहू ने कम से कम एक बात तो अपनी पुरातन सास से ज्यों की त्यों सीखी कि वह भी दीपक से काज़ल बनाकर सारे परिवार को लगाती रही वही उंगली से| और अभी भी कभी-कभी आवश्यकता अनुभव होने पर मैं स्वय ही कह कर काज़ल लगवा लेता हूँ, लाभ भी होता ही है| यद्यपि बच्चों के बड़े होने पर एवं स्कूल-कालिज जाने पर यह काज़ल-प्रथा सिर्फ दीपावली के रात भर जलने वाले सरसों के दीपक तक ही सीमित रह गयी |’
          यार, काज़ल तो महिलायें लगाती हैं, सुन्दर बड़ी-बड़ी आँखें दिखने हेतु; ‘कज़रारे नयना, मतवारे नयना..’ सुना नहीं है | भाभीजी भी तो मोटा-मोटा काज़ल लगाती हैं न, और वो पड़ोसन.....|
           हाँ, सही उपयोग तो वही है, मैंने हंसकर बात काटते हुए, हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा,  ‘महिलाओं में सौंदर्य प्रसाधन की भांति तो काज़ल का प्रयोग युगों से चला आरहा है एक प्रमुख कृत्य की भांति, नेत्रों के सौंदर्य के प्रतीक रूप में | क्या प्यारा गाना है.. ’हाय काज़ल भरे मदहोश ये प्यारे नैना ...’ हम दोनों सुर में सुर मिला कर गाने लगते हैं |
         अरे काज़ल का क्या कहते हो | रमाकांत बोला, ’कठोर अंग्-छिपाऊ वस्त्र नियमन प्रथा वाले समाज में भी सारा शरीर ढके सिर्फ आँख चमकाती हुई महिलाएं भी नकाब या लंबे घूंघट के अंदर कज़रारे नयना रखने से नहीं चूकतीं | आजकल तो आँखों के गड्ढे व कालिमा छिपाने के लिए आई-लाइनर और अब तो हरा, नीला, लाल, गुलाबी, सुनहरा आई-शेडो का ज़माना है जिसे लगा कर महिलायें जादूगरनी, लेडी-ड्रैक्यूला या कहानियों में पुरुषों को कैद करके रखने वाली खूसट रानियों-राजकुमारियों जैसी लगती हैं |
          और.... मैंने जोडते हुए कहा, ’ ये काज़ल तो सारे प्रोटोकोल- रिश्तों की दूरियां भी समेट देता है, लोग... ‘कजरारे कज़रारे तेरे कारे कारे नैना ‘...गाते हुए नाचने लगते हैं | हम दोनों हंसने लगते हैं |

          वाह ! आज तो सुबह-सुबह “काज़ल-पुराण” वाचन होगया | आँख तो स्वस्थ हो ही गयी होगी बिना काज़ल के ही | इस पर भी एक कहानी लिख देना, रमाकांत ठहाका लगाते हुए बोला |
         ‘अच्छा सुझाव है | चलो लंच का जुगाड किया जाय’, मैंने उठते हुए कहा | 

सोमवार, 20 अगस्त 2012

डा.श्याम गुप्त की कहानी : ....अब पोते को पालती...

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


-

अब पोते को पालती...

                                           
                     “अब पोते को पालती, पहले पाली पूत” ...वाह! क्या सच्चाई बयान करती कविता है।’ सत्यप्रकाश जी कविता पढ़कर भाव-विभोर होते हुए कहने लगे, ’आजकल यही तो हो रहा है, बच्चे माँ-बाप को आया बनाकर ले जाते हैं, रखते हैं, अपनी संतान के पालन हेतु। बेचारी माँ पहले ... पुत्र-पुत्रियों को पालती रही अब इस उम्र में पोतों को; स्वयं लिए कब समय मिलेगा।’ वे क्लब-हाउस में मित्रों के साथ बैठे पत्रिका पढ़ रहे थे।
                      ‘अरे ! क्या पोते–पोतियों को पालना स्वयं का कार्य नहीं है, ‘साथ में बैठे जोशी जी बोले, ‘वह भी तो स्वयं का कार्य ही है, अपनी संतान का। कवि भ्रमित-भाव है, अनुभव की कमी है अभी।’
                      पर ठीक तो है जी, इस प्रकार माँ को अपने स्वयं के लिए समय मिला ही कब। कवि तो वर्त्तमान का यथार्थ, भोगा हुआ, देखा हुआ यथार्थ लिखता है।’, सत्यप्रकाश जी ने कहा।
                       हाँ ... हाँ, वर्तमान का वर्णन तो कवि का सामयिक दायित्व है, परन्तु अनुचित भाव-कथ्य या बिना विषय की गंभीरता पर सोचे विचारे तथ्य कवि को नहीं रखने चाहिए, जैसे इस कविता में। भई, अपने लिए समय क्या ? क्या नाती-पोतों को पालना आयागीरी कहलायेगी। यह तो सदा से ही होता आया है, कोई नयी बात थोड़े ही है। पहले कभी तो यह प्रश्न नहीं उठा। सम्मिलित परिवारों में भी नाती-पोते सदा बावा-दादी ही तो पालते हैं। पुत्र- जो इस समय पिता है व घर का मुखिया रूप में है – को तो कार्य से समय ही कब मिल पाता है। तभी तो पोते में सदा दादा के संस्कार जाते हैं। कहावत भी है...”मूल से अधिक ब्याज प्रिय होती है।” पोते–पोतियों को पालना, खिलाना सबसे बड़ा सुख व मनोरंजन है।’ जोशी जी बोले।
                 ‘परन्तु एक सच बात को लिखने में क्या बुराई है ?’
                       हाँ..sss, पर एक बुराई को दृश्यमान करने हेतु क्या आप एक अन्य सामाजिक प्रथा को बुरी बनने में सहायक होंगे? जोशी जी बोले।
                      कैसे ?
                     ‘माँ-बाप’ को, जो स्वच्छंदता पसंद हैं, कुछ पैसा भी है या पाश्चात्य विचार-धारा से प्रभावित हैं, उनको यह सन्देश जाता है कि अरे! जब सब मौज कर रहे हैं तो हम भी क्यों न मौज मस्ती में गुजारें ये दिन। आजकल यूं भी हर बिंदु पर–चाहे टीवी सीरियल व विज्ञापन हो, या सिनेमा, समाचार-पात्र, ट्रेवल एजेंसी के विज्ञापन आदि...सभी मौज-मस्ती कराने के विज्ञापनों से भरे रहते हैं। वे अपने लिए तो कमाने का ज़रिया, धंधे का ज़रिया ढूँढते हैं और वरिष्ठ–जनों को ललचाते रहते हैं इस उम्र में भी मौज-मस्ती – मनोरंजन हेतु, घूमने हेतु। नाती-पोतों में फंसने से बचने हेतु। यह स्थिति समाज को विभक्त करती है। पीढ़ियों के मध्य दूरी, जेनेरेशन गैप, को अधिक चौड़ा करती है। समाज में और अधिकतम कमाने की प्रवृत्ति और आपसी वैमनस्यता, विषमता के बीज फैलाती है।’ जोशी जी ने अपना कथन स्पष्ट किया।
‘तो कवि क्या लिखे, पौराणिक कथाएं ?’ मेज के दूसरी ओर बैठे सुरेश जी ने वार्तालाप में भाग लेते हुए कहा तो सत्य प्रकाश जी व अन्य सब हंसने लगे।
                    ‘ हाँ, लिख सकते हैं, लिखना चाहिए’, जोशीजी भी हंस कर कहने लगे,’ परन्तु अद्यतन सन्दर्भ के साथ, आज की परिस्थितियों की विवेचना, पुरा से तुलना करके यथा-तथ्य बताना सार्थक साहित्य का दायित्व है।’
                      ‘क्या पुरा साहित्य सब सच होता है ?’ अस्थाना जी पूछने लगे।
                      ‘हो भी सकता है, परन्तु वही साहित्य इतने लंबे समय तक जीवित रहता है जो सत्य के निकट हो अथवा जो सत्य को एवं समाज हेतु आवश्यक तथ्यों को उद्घाटित करता है चाहे वह रचना में वास्तविक हो या कल्पित। साहित्य वास्तव में है क्या, साहित्य समाज का इतिहास होता है। साहित्यिक कथाओं के पात्र सदैव समाज में होते हैं भले ही कथा में वे कल्पित हों। जैसे ये कविता, जोशीजी सत्य प्रकाश जी की ओर उन्मुख होकर कहने लगे, जो अभी आपने पढ़ी, वह भी यह बताने में तो समर्थ है ही कि आज के समाज में ऐसा भी सोचा जाता था, होता भी था। यदि कविता दीर्घजीवी हुई तो।’
                        ‘तो क्या जो समाचार मिल रहे हैं या मिलते हैं कि माता-पिता के साथ बेटे दुर्व्यवहार कर रहे हैं....यह स्थिति उचित है या समाचार असत्य हैं।’ सत्य जी ने प्रश्न उठाया।
‘ उचित कैसे कहा जा सकता है ? समाचार सत्य हो या असत्य। देखिये, दुर्व्यवहार तो श्रवणकुमार के माता-पिता के साथ भी हुआ था सतयुग में। वास्तव में आज ये घटनाएँ मूलतः स्वार्थ, अति-भौतिकता वाली धन आधारित सोच व जीवन शैली व्यवस्था के कारण हैं। मुझे लगता है अधिकाँश बच्चे सामयिक वस्तु-स्थिति के दबाव व मज़बूरी वश ऐसा करते हैं, मन ही मन वे अवश्य ही आत्म-ग्लानि व पीड़ा से ग्रस्त रहते हैं। तभी तो वे प्राय: नर्वस, चिडचिडे हो जाते हैं और इससे पति-पत्नी झगड़े..व अन्य द्वंद्वों के कारक उत्पन्न होते हैं। क्या दया, प्रेम, सांत्वना व उचित सुझाव की अधिकारी नहीं है आज की पीढ़ी ?’            
                     ‘क्या आज की पीढ़ी हमारे सुझाव मानती है ?’ अस्थाना जी कहने लगे।
                    ‘हाँ, यह भी एक पृथक समस्या है परन्तु वे दया, प्रेम, सांत्वना व उचित सुझाव के अधिकारी तो हैं ही।’ सत्य प्रकाश जी ने कहा।
                      ‘माता-पिता भी यदि उन्हें अपने समय की दृष्टि से तौलते हुए चलाना चाहते हैं तो भी द्वंद्व बढ़ते हैं। जब तक नाती-पोते छोटे होते हैं तभी अधिक आवश्यकता होती है दादा-दादी की, परिवार की। यदि ऐसे समय पर आप उनके साथ नहीं होंगे, घूम-फिर रहे, मस्ती कर रहे होंगे, अपनी ज़िंदगी जी रहे होंगे तो और आपकी अधिक उम्र होने पर वे क्यों आपके काम आयेंगे। हाँ,आप काफी धनपति हैं तो अलग बात है|’ जोशी जी हंस कर बोले।
                      अरे ! तब तो वे आपके आगे-पीछे भी लगे रहेंगे परन्तु सिर्फ स्वार्थ हेतु ...या फिर एकदम किनारा कर लेंगे।’ सुरेश जी बोले।
                       ‘जहां तक विदेश में बसे भारतीयों के माँ-बाप की बात है। वहाँ न साथी, न समाज, न कोई अपना तो आराम भी बंधन हो जाता है और मशीन की भांति पोते-पोतियों को पालना-खिलाना भी बंधन लगने लगता है। उनके स्कूल जाते ही वे नितांत अकेले हो जाते हैं| किसके पास समय है उन्हें पूछने के लिए। वहाँ की कल्चर भी प्रभावित करती है व्यवहारों को, जिसे आधुनिक से आधुनिक भारतीय माँ-बाप नहीं झेल पाते। वही सब बंधन, उपेक्षा, शोषण, पीड़न लगने लगता है।’ जोशी जी ने कहा।
                       ‘यह सब तो अब यहाँ भी होता है।’, अस्थाना जी बोले।
                         ‘सही कहा’, यह सब साहित्यकारों, कवियों व समाज शास्त्रियों को सिर्फ कहने की अपेक्षा इसका युक्ति-युक्त समाधान भी प्रस्तुत करना चाहिए।’ जोशी जी कहते जा रहे थे।
                         तभी जोशी जी की पत्नी, कुसुम जी, आ जाती हैं, और कहने लगीं,’ मुझे भी कहाँ समय मिलता है अपने लिए, दिन भर राघव की देखभाल में लग जाता है। एक फुल-टाइम आया भी रखी हुई है उसके लिए फिर भी।’
                      ‘आपको किसलिए टाइम चाहिए ?’ जोशीजी मुस्कराते हुए पूछने लगे।
                       ‘कथा, सत्संग, भजन-कीर्तन मंडली में मन बहलाने के लिए। वहाँ अपने शहर में तो किटी, सहेलियों, पडौसी ...आना-जाना लगा ही रहता था, सब छूट गया।’  
                       वह भी एक महत्वपूर्ण काल-खंड था जीवन का, आप भोग चुके। वैसे पोते को पालने-खिलाने-बड़ा करने-पढाने-लिखाने से बड़ा कीर्तन क्या होगा। भविष्य की संतति, बाल-रूप भगवान की सेवा से बढकर क्या भजन, पूजा व दुनिया की सैर होगी ? अपने पुत्र-पुत्री पालते समय भी तो कभी-कभी एसा अनुभव हुआ होगा कि क्या-क्या छूटा जा रहा है जीवन में ...क्यों..| जोशी जी ने हंसते हुए पत्नी से पूछने लगे।
                        ‘हाँ.. लगता तो था, पर दायित्व-बोध था’, कुसुम जी बोलीं, ’ आजकल के बच्चे तो अपने बच्चों को समय देने की अपेक्षा नौकरी, पार्टी, मीटिंग को अधिक समय देते हैं। यदि वे बच्चों के प्रति अपना दायित्व ठीक से निभाएं, कुछ ऐसा रहे कि वे भी अपने बच्चों को और अधिक समय दें तो दादा-दादी को अखरेगा नहीं, दिन भर जुटना नहीं पड़ेगा| उन्हें भी स्पेस चाहिए। संयुक्त परिवार की भांति घर में ही दायित्व निर्वहन के साथ–साथ खेल-कूद, पार्टी, मनोरंजन सब करें।’
                    ‘पर वह तो संयुक्त परिवार की बात है। वहाँ तो दायित्व व कार्य का विभाजन हो जाता है। पर यहाँ आजकल तो पति-पत्नी दोनों ही काम पर जाते हैं अन्यथा परिवार की आय कैसे बढ़ेगी। पत्नियां भी व्यावसायिक व्यस्तता के चलते घर व बच्चों पर कम समय दे पाती हैं| ‘ जोशीजी ने कहा।
                  ‘हाँ, यही तो सच है आज का, अधिक और अधिक कमाई, अर्थ-युग की मेहरबानी।’ कुसुम जी कहने लगीं,’ जिन बच्चों के माँ-बाप नहीं है पोतों की देखभाल हेतु, या नहीं उपलब्ध हैं किसी कारण वश, वे आया रखते हैं बच्चों के लिए। आया पर जहां सिर्फ दस हज़ार खर्च होते हैं तो पत्नी पचास हज़ार कमाकर लाती है।’
                    हूँ, जोशी जी बोले, ’अर्थ लाभ तो है ही, परन्तु बच्चों का भाग्य...जो बच्चे पचास हज़ार की क्षमता वाली से पलने चाहिए व दस हज़ार वाली से पल रहे हैं।' सब हंसने लगे तो वे पुनः कहने लगे, ‘‘मैं समझता हूँ ऐसे में जो बावा-दादी अपने पोते-पोतियों को पाल रहे हैं वे बहुत बड़े सामाजिक, साथ ही साथ राष्ट्रीय व मानवीय दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।’
                    ‘हाँ,बहुत से बच्चे बावा-दादी के होते हुए भी बच्चे के लिए आया रखते हैं ताकि उनके माता-पिता को अधिक कष्ट न हो|’ सुरेश जी ने कहा|
                     ‘पर आया, उन्हें लिफ्ट कहाँ देती है। स्वयं को मेम-साहब की अनुपस्थिति में मालकिन समझती है| वह तो बावा-दादी को ही बच्चे पालना सिखाने लगती है। कभी-कभी बच्चों की दुर्गति देखकर उन्हें और अधिक कष्ट होता है। शिशुगृहों (क्रेच) में भी बच्चे पलते हैं परन्तु वहाँ के हालात सब जानते हैं| भई ! असली-नकली में अंतर तो होता ही है।’ जोशी जी ने कहा।
                    ‘रोने गाने से क्या लाभ ?' सत्यप्रकाश जी कहने लगे, ’न आप कुछ कर पाते हैं न हम। यह युग चलन है। नाती-पोते खिलाते रहो, पुण्य कमाते रहो, समय मिले कविता पढ़ते रहो, गुनगुनाते-गाते रहो, मस्त रहो।’ सत्य प्रकाश जी ने जैसे अपना निर्णय सुनाया।
                     ‘ सच है, पर कवि को तो कविता में दुविधा-भाव वाले तथ्यों व अनुचित बात पर तूल देने की अपेक्षा समस्या का समाधान भी देना चाहिए न।’ कहकर जोशी जी हंसने लगे।