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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

‘अगीत साहित्य दर्पण’...क्रमश:...प्रस्तावना...डा रंगनाथ मिश्र "सत्य"...

                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



डा सत्य
डा श्याम गुप्त

                              



    


                    प्रस्तावना
  
           ‘अगीत साहित्य दर्पण’ रचनाकारों के लिए एक मानक ग्रन्थ होगा |
                                              –डा. रंगनाथ मिश्र ’सत्य’....

        हिन्दी साहित्य को समर्पित, मूलतः चिकित्सक व सर्जन महाकवि डा श्याम गुप्त द्वारा लिखित ‘अगीत साहित्य दर्पण’  प्रकाशित होकर विज्ञ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होने जा रहा है| इसमें लेखक ने अगीत छंद विधा व उसका साहित्यिक पक्ष विस्तार से लिखने का समुचित प्रयास किया है| डा श्याम गुप्त ने अगीत-विधा में सृष्टि व् जीवन की उत्पत्ति पर “सृष्टि–ईशत-इच्छा या बिगबैंग” महाकाव्य तथा रामकथा पर आधारित नारी-विमर्श पर “शूर्पणखा” खंड काव्य का प्रणयन करके अगीत की स्थापना में अपना अमूल्य योगदान दिया है|
       सन १९६६ ई. में मैंने अपने कुछ सहयोगियों के साथ ‘अखिल भारतीय अगीत परिषद’ साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्था की स्थापना की| एक पत्रक प्रकाशित करके सारे देश के प्रवुद्ध रचनाकारों को भेजा, जिसमें सुझाव मांगे गए थे कि अगीत काव्य-विधा को किस प्रकार स्थापित करके समाज को नयी दिशा प्रदान की जाय| बहुत से सुझाव आये एवं सैकड़ों नए रचनाकारों ने इस विधा से जुडकर कार्य आरंभ कर दिया |  
      सन १९६०-७० के दशक में साहित्यकार-रचनाकार यह नहीं सुनिश्चित कर पाए कि कविता को कौन सी सही दिशा प्रदान की जाय | कविता के क्षेत्र में अकविता, ठोस-कविता, चेतन-कविता, अचेतन-कविता, युयुत्सावादी-कविता, खबरदार-कविता, कबीरपंथी, आदि आंदोलन चले| गीत में नयागीत, नवगीत, अनुगीत जैसे नए-नए आंदोलन आये| इन सब पर विशेष रूप से पाश्चात्य दर्शन का प्रभाव था| फ्रांस से जो आंदोलन चले वे बंगला साहित्य में आये, तत्पश्चात उन्हें हिन्दी में अपनाया जाने लगा | इन आन्दोलनों में अस्पष्टता व सर्वसाधारण के लिए दुर्वोधता झलकती रही| अतः यह आवश्यक हुआ कि कविता में ‘अगीत-काव्य’ को स्वीकार किया जाय |
       वैज्ञानिक अन्वेषणों से संसार में दूरी का महत्व सिमट गया है| विश्व ने जहां इस शताव्दी के पूर्वार्ध में दो महायुद्धों के दुष्परिणामों को नयी शक्तियों के उभरते शीत-युद्धों की सरगर्मी के रूप में देखा है वहीं एक सर्वथा नए धरातल पर प्रतिष्ठित युवा-चेतना का उन्मेष भी विभिन्न रूपों में सामने आया है| स्वतन्त्रता के पश्चात भारतीय समाज और साहित्य में भी इसी प्रकार अपनी पूर्व-परम्परा से हटकर अधिक चैतन्य व स्वाभाविक होने लगा | हम जानते हैं कि भारत को भी कई महायुद्धों का सामना करना पडा | इस संक्रांति काल में युवक-युवतियों में पाश्चात्य सभ्यता को अपनाने की होड लगी हुई थी| एसी स्थिति में मैंने २०-२५ सहयोगियों के साथ ‘हिन्दी कविता में अगीत-आंदोलन’ की शुरूआत की जो युवा चेतना के उन्मेष का दृष्टा था | तब से १९९२ तक पच्चीस वर्षों में अगीत विधा पर कई काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए| तदुपरांत हिन्दी के विद्वान समीक्षक डा विश्वंभर नाथ उपाध्याय, कुलपति कानपुर वि.वि., अ.भा. अगीत परिषद की संरक्षक डा उषा गुप्ता, पद्मश्री प.बचनेश त्रिपाठी, संगमलाल मालवीय (मास्को), डा लक्ष्मी नारायण लाल दुबे ( सागर वि.वि.), सुबोध मिश्र,संपादक सफरनामा आदि की प्रेरणा से अखिल भारतीय अगीत परिषद की की रजत जयन्ती वर्ष पर परिचयात्मक ग्रन्थ “अगीत काव्य के चौदह रत्न”  प्रकाशित कराया गया| जिसमें चौदह अगीत कवियों १०-१० अगीत प्रकाशित किये गए|
           सन १९६६-६७ में जो अगीत का मेनीफेस्टो प्रकाशित हुआ उसमें यह स्पष्ट कर दिया गया था कि अगीत खोज की और अग्रसर है उसमें नए रचनाकार बराबर जुडते रहेंगे क्योंकि खोज कभी रूढिगत नहीं होती| अगीत विधा के रचनाकार किसी ‘वाद’ में विश्वास नहीं रखते किन्तु कोई भी आंदोलन अधिक दिनों तक चलता है तो वह वाद का रूप ले लेता है | अतः आज ४५-४६ वर्षों बाद हम इसे ‘अगीतवाद’ के नाम से भी पुकार सकते हैं | अगीत विधा का आकाशवाणी , दूरदर्शन, देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं द्वारा, शोध-प्रबंधों व कानपुर व लखनऊ के विश्व-विद्यालयों में परीक्षाओं में प्रश्न पूछे जाने से व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ है| साथ ही इस विधा का विकास कई कोटियों के माध्यम से हुआ है यथा कविता के....शिल्प, मात्रा, गुणवत्ता, विविध-साहित्य, विषय, भाषा, उपादान व भाव की कोटि |
          अगीत काव्य पर दूसरा परिचयात्मक काव्य-संग्रह १९९३ में “ अगीत काव्य के इक्कीस स्तंभ”. तृतीय संग्रह अगीतोत्सव -९५ के अवसर पर ”अगीत काव्य के अष्ठादस पथी  एवं चौथा संकलन आजादी के स्वर्ण-जयन्ती वर्ष १९९७ को गांधी-शास्त्री जन्म-दिवस पर “अगीत-काव्य के सोलह महारथी” के नाम से प्रकाशित हुआ| अगीत का पांचवा संकलन “ अगीत काव्य के पैंतालीस सशक्त हस्ताक्षर “ के नाम से प्रकाशित होकर शीघ्र प्रस्तुत किया जाएगा|
         ‘अगीत काव्य के चौदह रत्न’.. व ‘अगीत काव्य के इक्कीस स्तंभ’ एवं ‘अगीत काव्य के अष्ठादस पथी’ का संपादन मेरे द्वारा किया गया जो अ.भा.अगीत परिषद की संरक्षक डा ऊषा गुप्ता, ब्रज-विभूति चौ.नबाव सिंह यादव,भू.पू. मंत्री उ.प्र व प.रामचंद्र शुक्ल पूर्व न्यायाधीश को समर्पित किये गए| ‘अगीत काव्य के सोलह महारथी’ का संपादन मेरे व डा नीरज कुमार द्वारा किया ग्याजो मेरे भतीजे युवा साहित्यकार यशशेष अरुणकुमार मिश्र उर्फ श्रीधर को समर्पित किया गया|
         वर्त्तमान दो दशकों में अगीत-विधा में महाकाव्य व खंड-काव्य भी लिखे गए हैं| ‘मोह और पश्चाताप’, सृष्टि, शूर्पणखा‘सौमित्र गुणाकर’ आदि महाकाव्य एवं खंड-काव्य  प्रकाशित हुए जो अगीतवाद की स्थापना में मील-स्तंभ का कार्य कर रहे हैं |
        मैं यह जानता हूँ कि परम्परागत काव्य में शिल्पगत विशेषताओं के अंतर्गत छंद-विधान योजना, पद्यात्मक भाषाशैली  व अलंकार सौष्ठव आदि का महत्वपूर्ण स्थान है | अगीत काव्य के कवियों ने इन परम्पराओं का त्याग किया है | तथापि काव्य-भाव होने से काव्य-सौन्द्र्यानुसार अलंकार व रस-भाव तो प्रत्येक प्रकार की कविता में स्वतः ही आजाते हैं| अगीत काव्य में परम्परागत छंदों के स्थान पर मुक्त-छंद व गद्यात्मक शैली को अपनाया है| भाषा पर भी नए प्रयोग किये हैं| अगीत-काव्य में यह स्वीकारा गया है कि संक्षिप्तता के माध्यम से कवि अपनी बात कहे| अगीत कवियों में निराशा, कुंठा, घुटन, आस्था-अनास्था, समष्टि-कल्याण की भावना व लघु-मानव की प्रतिष्ठा हेतु विद्रोह के स्वर भी अभिव्यक्त हुए हैं|
       महाकवि डा श्याम गुप्त द्वारा लिखित यह “ अगीत साहित्य दर्पण” अगीत विधा के रचनाकारों व सभी साहित्यकारों के लिए वरदान सिद्ध होगा | महाकवि ने कठिन श्रम और अध्ययन करके इसे तैयार किया है जिसमें अगीत-काव्य के सभी मानदंडों को स्थापित करने में अपनी लेखनी का प्रयोग करते हुए गतिमय सप्तपदी, लयबद्ध षट्पदी अगीत, नव-अगीत, त्रिपदा अगीत, त्रिपदा अगीत हज़ल आदि अगीत की विभिन्न विधाओं का भी उल्लेख किया है| उनके द्वारा आगे भी अगीतवाद की स्थापना में अन्य ग्रन्थ भी लिखे जायेंगे और उनके अन्य अगीत संग्रह, महाकाव्य व खंडकाव्य आदि आगे भी प्रकाशित होंगे, ऐसी मेरी आशा ही नहीं विश्वास है | मैं महाकवि डा श्याम गुप्त की लेखनी का वंदन-अभिनन्दन करता हूँ और कामना करता हूँ कि कि यह ग्रन्थ ‘अगीत साहित्य दर्पण’ अगीत विधा के रचनाकारों को अपना अमूल्य योगदान दे | मंगल कामनाओं के साथ |....मेरे दो अगीत प्रस्तुत हैं....
परिवर्तन,                                       हिन्दी के प्रति रहो समर्पित ...|
जीवन का मूल मन्त्र;                              हिन्दी ही भारत की आशा ,       
जैसा कल बीता                                   होगी यही राष्ट्र की भाषा ;          
जो आज जी रहे                                  देवनागरी को अपनाएं ,
आगे जो आएगा ,                                 प्रगति पथ पर ,     
उसमें भी होंगे –                                  बढ़ाते जाएँ |
उत्थान-पतन |                                              
                                           

  ( डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’...एम.ए,पी.एच.डी ) 
     अध्यक्ष –अखिल भारतीय अगीत परिषद, 
   सम्प्रति— अगीतायन ई-३८८५,राजाजी पुरम, लखनऊ-१७
                मो.९३३५९९०४३५ ...दूभा.०५२२-२४१४८१७   



बुधवार, 5 सितंबर 2012

अगीत का छंद-विधान ....डा श्याम गुप्त की नयी पुस्तक.....अगीत साहित्य दर्पण ...

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

      अतुकांत कविता  की एक विशिष्ट विधा---अगीत कविता---का प्रथम छंद-विधान--एक शास्त्रीय ग्रन्थ

नाम पुस्तक--- अगीत साहित्य दर्पण (अगीत काव्य एवं अगीत छंद विधान )
रचयिता ------ डा श्याम गुप्त
प्रकाशन ------ सुषमा प्रकाशन , लखनऊ  एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद , लखनऊ
प्रकाशन वर्ष --१ मार्च, २०१२ ई....पृष्ठ ---९४ ...मूल्य ....१५०/-रु.

                                                             संक्षिप्त विवरण
 समर्पण--- डा रंगनाथ मिश्र सत्य  एवं  महाकवि श्री जगत नारायण पांडे  को |

 प्रस्तावना----"'अगीत साहित्य दर्पण'  रचनाकारों के लिए एक मानक ग्रन्थ होगा"-    -डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य',  -                         संस्थापक अध्यक्ष , अखिल भारतीय अगीत परिषद, लखनऊ

शुभाशंसा ----प्रोफ. कैलाश देवी सिंह,  पीएचडी . डी लिट, विभागाध्यक्ष, हिन्दी तथा आधुनिक  भाषा विभाग, -                    लखनऊ वि. विद्यालय, लखनऊ |

दो शब्द ------  कविवर श्री रामदेव लाल 'विभोर' महामंत्री, काव्य कला मंदिर, लखनऊ |

पूर्व कथन व आभार ....  लेखक

                                               
                                                         मंगलाचरण ----           
 १.
 माँ वाणी! माँ सरस्वती |
माँ शारदे |
अगीत को नवीन सुरलय ताल का
संसार  दे |
नए  नए स्वर, छंद-
नवल विचार दे |
यह अगीत काव्य ,
जन जन में विस्तार पाए ;
मूढमति श्याम का -
माँ जीवन सुधार दे ||

२.
हे अगीत ! तुम निहित गीत में,
गीत तुम्हारे अंतर स्थित |
नए छंद , नव भाव, नवल स्वर ,
ले अवतरित हुए हे  चेतन !
वंदन  हित वाणी-विनायकौ ,
नमन श्याम का हो स्वीकार ||

                                               विषय - अनुक्रमणिका  ....

प्रथम अध्याय ....अगीत: एतिहासिक पृष्ठभूमि व् परिदृश्य ..

द्वितीय अध्याय ....अगीत : क्यों व क्या है एवं उसकी उपयोगिता ..

तृतीय अध्याय ...अगीत : वर्त्तमान परिदृश्य व भविष्य की संभावना ..

चतुर्थ अध्याय ....अगीत छंद व उनका रचना विधान ..

पंचम अध्याय ....अगीत की भाव संपदा ..

षष्ठ अध्याय ..... अगीत का कला पक्ष ......


                                       (----क्रमश ... प्रस्तावना --.)


    




आज टीचर्स डे है गुरु दिवस नहीं ....ड़ा श्याम गुप्त के दोहे....

               आज  टीचर्स डे है गुरु दिवस नहीं .... देखिये टीचर्स के स्टूडेंट्स की शानदार लेंग्वेज ......
                             





                      










और  कुछ  दोहे....



धन साधन की रेल में भीड़ खचाखच जाय |
धक्का मुक्की धन करे, ज्ञान नहीं चढ पाय ||

ज्ञान हेतु अब ना पढ़ें,  पढ़ें  नौकरी  हेतु |
लक्ष्य  चाकरी होगया, लक्ष्मी बने है सेतु ||

शास्त्र  पढ़े बिन नाम रख,शास्त्री परम सुजान |
टीचर - स्टूडेंट की,  बनी  खूब  पहचान ||

डिग्री ले शास्त्री बने, नहीं ज्ञान पहचान |
जस टीचर तस ही बनें, स्टूडेंट महान ||

चाहे पद पूजन करो, या साष्टांग प्रणाम |
शिक्षा तब ही पाओगे, चढ़े चढावा दाम  ||

बने धनार्जन सेतु सब,ध्यान ज्ञान विज्ञान |
अमरीका की चाकरी, करें जाय विद्वान ||

सींचे बिन मुरझा गयी,सदाचार की मूल |
श्याम कहाँ फूलें फलें , संस्कार के फूल ||

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

नारी और मुक्ति... कहानी.... डा श्याम गुप्त...

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...






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                               नारी विमर्श व्याख्यान-माला गोष्ठी प्रारम्भ होने में अभी कुछ समय था। पधारे हुए सभी विज्ञजन विचार-विमर्श करने लगे। पांडेजी ने अभी हाल में ही पढ़ी हुई उर्वशी-पुरुरवा की कथा पर अत्यंत तार्किकता व सतर्कता से सौन्दर्यपूर्ण समीक्षा करते हुए अंत में कहा, ’उर्वशी पुरुरवा के लिए वरदान है’।
                             ‘हाँ, निश्चय ही, क्योंकि नारी, पुरुष का मुक्ति-पथ है, मुक्ति-सेतु है।’ ड़ा शर्मा बोले।
                             ‘और नारी की मुक्ति ?’ युवा लेखक राघव ने प्रश्न उठाया।
                             ‘पथ की भी कभी मुक्ति होती है ! वह तो सदा मुक्ति हेतु दीप की भांति कार्य करता है। स्त्री तो स्वयं ही पथ है मुक्ति का, इस पथ पर चले बिना कौन मुक्त होता है। संसार के हितार्थ कुछ तत्व कभी मुक्त नहीं होते मूलतः प्रकृति-तत्व, अन्यथा संसार कैसे चलेगा।’ ड़ा शर्मा ने अपना पक्ष रखा।
                           ‘अर्थात आपका कथन है कि नारी की मुक्ति होती ही नहीं। अमित जी ने हैरानी से पूछा,’ यह तो बड़ा अन्याय हुआ नारी के साथ।’
                          'नारी प्रकृति है, माया है। स्त्री द्विविधा भाव है। वही मोक्ष से रोकती भी है अर्थात संसारी भाव में जीव अर्थात पुरुष का जीना हराम भी करती है और और वही मोक्ष का द्वार भी है जीना आरामदायक भी करती है। काली के रूप में शिव को शव बनादेती है, सती के रूप में शिव को उन्मत्त करती है तो पार्वती बन कर शिव को चन्द्रचूड बना देती है और तुलसी को तुलसीदास। नारी को गौ रूप कहा जाता है अर्थात वह प्रकृति में पृथ्वी है, गाय है, इन्द्रिय है, संसार हेतु अविद्या है तो तत्व रूप में विद्या, ज्ञान व बुद्धि। बंधन में तो पुरुष अर्थात जीव रूप में ब्रह्म या पुरुष रहता है| उसी को मुक्त होना होता है। नारी, प्रकृति, माया तो बद्ध-पुरुष को मुक्ति के पथ पर लेजाती है| ड़ा. शर्माजी ने स्पष्ट किया। तभी तो ईशोपनिषद में मोक्ष मन्त्र कहा गया है.......
                                                  ” विद्या चा विद्या यस्तत वेदोभय स:
                                                   अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृमनुश्ते।|”
                          ‘तो फिर नारी के जीवन का उद्देश्य ही क्या रह जाता है। जब मुक्ति ही नहीं ?’ राघव ने पुनः प्रश्न उठाया।
                          ‘नारी की मुक्ति पुरुष से जुड़ी है। यदि नारी पुरुष को मुक्ति की ओर लेजाती है। वह पुरुष को मुक्ति-पथ पर चलने को तैयार कर पाती है अपने प्रेम, तप, साधना, त्याग, चातुर्य से तो वह अनाचारी, अत्याचारी, समाज एवं नारी पर भी अत्याचार का कारण नहीं बनेगा। समाज सम व द्वंद्वों से रहित रहेगा। क्योंकि मूलतः द्वंद्वों का कारण पुरुष ही होता है जो माया-बद्ध जीव है माया से भ्रमित। मेरे विचार से यही नारी की मुक्ति है।’ ड़ा शर्मा कहने लगे।
                         ‘आखिर यह मुक्ति है क्या ?’ अमित जी कहने लगे, ‘ जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होना या सांसारिक बंधन से मुक्ति ...या संसार से ?’
                          ‘और ये बंधन क्या है? ड़ा शर्मा ने प्रति-प्रश्न किया, पुनः स्वयं ही कहने लगे,’ द्वेष, द्वंद्व, झगड़े, लाभ-हानि, लोभ-लालच में लिप्तता ही बंधन है। यदि नारी पुरुष को सहज रखने में सफल रहती है तो सारा समाज ही सहज रहता है। यही नारी का नारीत्व है और यही उसकी मुक्ति। पुरुष भी नारी को पूर्णता प्रदान कर उसे मुक्ति-पथ की ओर ले जाता है। अंत में मुक्ति तो जीव–तत्व की ही होती है वह न पुरुष होता है न स्त्री वह तो आत्म-तत्व है। तभी तो कहा जाता है...
                                                       ’देहरी लौं संग बरी नारि और आगे हंस अकेला।
                            ‘पर जीव तो नारी भी है , फिर वह मुक्त क्यों नहीं हो सकती ?’ पांडे जी ने पूछा।
वास्तव में तत्व व्याख्या में नारी जीव नहीं है। वह तो शक्ति का रूपांतरण है। अतः नारी तो सदा मुक्त है। वह बंधन में होती ही कब है। वह तो स्वयं बंधन है। जीव, पुरुष रूपी ब्रह्म को बांधने वाली। पुरुष ही बंधन में होता है। ब्रह्म पुरुष रूप में, जीव रूप में आकर स्वयं ही माया-बंधन में बंधता है ताकि संसार का क्रम चलता रहे। नारी तो स्वयं ही माया है, प्रकृति है। पुरुष –ब्रह्म को बाँध कर नचाने वाली| यद्यपि माया स्वयं ब्रह्म की इच्छा पर ही कार्य करती है स्वतंत्र रूप से नहीं क्योंकि वह उसी का अंश है.......
                                                        “ ब्रह्म की इच्छा माया नाचे जीवन जगत सजाये।
                                                           जीव रूप जब बने ब्रह्म फिर माया उसे नचाये।
                           ‘यह तो विचित्र सा तर्क लगता है।’ राघव ने कहा।
                           ‘हाँ, तभी तो पाश्चात्य जगत में एक समय ‘नारी जीव है भी या नहीं का प्रश्न उपस्थित था अपितु नारी को मानवी माने जाने में भी संदेह था। यह बड़ा ही क्रूड व क्रूर ढंग है वस्तुस्थिति को प्रकट करने का जो अति-भौतिकतावादी सभ्यता के अनुरूप ही हो सकता है। भारतीय सनातन सभ्यता , ब्राह्मण, जैन आदि में भी नारी को मुक्ति या मोक्ष का अधिकारी नहीं माना जाता रहा है परन्तु उसे मोक्ष के पथ पर ले जाने वाला माना जाता रहा है। इसीलिये उसे नर का, पुरुष का, ब्रह्म-जीव का बंधन कहा गया। यह कथन का तात्विक व सात्विक रूप है।’ ड़ा शर्मा जी ने बताया।
                          ‘और ये अवतारों को क्या कहेंगे आप, हमारे यहाँ सारे अवतारों के साथ सदा नारी भी होती है या कोई भी शक्ति अवश्य अवतार लेती है जिनकी सहायता की अवश्य ही आवश्यकता पडती है इन अवतारों को; उसका क्या उत्तर देंगें आप ?’ सुषमा जी पूछने लगीं।
                        ‘आपने बड़ी देर में भाग लेने का कष्ट किया बातचीत में’, ड़ा शर्मा हंसते हुए बोले ,’एक विचार भाव से वैज्ञानिक-अध्यात्म के अनुसार तो ये अवतार, चाहे सत्य हों या कल्पित.... जीवन व प्राणी की क्रमिक विकास यात्रा प्रतीत होते हैं....मत्स्य से जीवन की उत्पत्ति, जल से पृथ्वी पर आना, लघु मानव—मानव तक की उत्पत्ति, शारीरिक शक्ति-धनु, परशु, गदा आदि विविध हथियार,.. मानसिक शक्ति..तप, त्याग, मर्यादा व प्रकृति रूप के समन्वयक राम और शक्ति, ज्ञान, व्यवहार के समन्वयक कृष्ण तक। आगे अभी भविष्य के गर्भ में है।’ ये मानव प्रगति-व्यवहार की युग-संधियां भी कही जा सकती हैं|'
                      ‘आप सही कह रही हैं सुषमा जी, सभी के साथ उनकी मूल-शक्ति रूप में या नारी-पत्नी रूप में प्रकृति या माया अवश्य अवतार लेती है..जन्म लेती है। जैसे ही बद्ध-जीव या अवतार का पृथ्वी-संसार पर कार्य समाप्त हो जाता है वह मुक्ति के पथ पर अग्रसर होता है, उसकी शक्तियां, माया, प्रकृतिरूपा शक्ति-अवतार भी उससे पहले या बाद में जगत से प्रस्थान कर जाती हैं। इसीलिये तो हमारे यहाँ शक्ति-रूपा पत्नी सदैव पति से पहले मृत्यु की कामना करती है ताकि गोलोक में जाकर वहाँ की व्यवस्था भी संभाली जाय कुछ अपनी स्वेच्छा से भी और आशीर्वाद भी सदा सुहागन रहो का दिया जाता है। ड़ा शर्मा हंस कर कहने लगे।’ ....‘और सती प्रथा जैसी कुप्रथा शायद भी इस तात्विक बात का अर्थ-अनर्थ करने से उत्पन्न हुई।’ उन्होंने पुनः कहा।
                        ‘परन्तु अवतार तो सर्व-समर्थ होते हैं, ब्रह्म रूप, ईश्वर का अवतार ; तो फिर शक्तियों को, प्रकृति को साथ आने की क्या आवश्यकता ?’ राघव ने तर्क किया।
                        पुरुष या ब्रह्म या ईश्वर स्वयं अकेला कहाँ कार्य कर पाता है, वह तो अकर्मा है कार्य तो प्रकृति ही करती है। अवतार भी प्रकृति, शक्ति, योगमाया द्वारा ही कार्य कराते हैं। ड़ा शर्मा बोले।
                       ‘तो फिर प्रकृति ही सब कुछ हुई, और स्त्री भी ...फिर पुरुष, ईश्वर, ब्रह्म, अवतार की क्या आवश्यकता है यदि हैं और यदि कल्पित हैं तो भी इनकी परिकल्पना की क्या आवश्यकता है।’ पांडे जी ने तर्क दिया।
                          ‘परन्तु शक्ति स्वेच्छा से कहाँ कार्य करती है। वह तो पुरुष या ब्रह्म की इच्छानुसार ही क्रियाशील होती है। एकोहं बहुस्याम की ईषत इच्छा से ही तो प्रकृति चेतन होकर संसार रचती है| अर्थात...ब्रह्म–प्रकृति, नर-नारी, दोनों ही आवश्यक हैं सृष्टि हेतु, संसार के लिए, संसार के सहज सामंजस्य के लिए। यदि संसार के इस द्वैत, द्विविधा- भाव के तात्विक ज्ञान को सभी स्त्री-पुरुष समझ कर जीवन में उतारें यथानुसार कार्य करें तो समाज-संसार में द्वंद्वों का प्रश्न ही खडा नहीं होगा।’
                        ‘तो फिर संसार कैसे चलेगा, क्यों रचा जायेगा, क्यों बनेगा ? किसलिए, किसके लिए ?’ प्रश्न उठाया गया।
                        ‘तभी तो दोनों अलग अलग जन्म लेते हैं, आकर्षण-विकर्षण के चलते मिलते हैं..प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी बनते हैं...संसार-चक्र बनता व चलता है| एक दूसरे को मुक्ति पथ पर ले जाते हैं| तभी तो कहा गया है कि नारी के बिना मुक्ति नहीं, बिना संसार को जाने मुक्ति कैसी, बिना संसार रूपी वैतरिणी पार किये कहाँ मोक्ष और उसके लिए गाय की पूंछ अर्थात पृथ्वी का, प्रकृति का, नारी का, ज्ञान-बुद्धि का पल्लू पकड़ना अत्यावश्यक है।’ ड़ा शर्मा कहते गए।
                       “उर्वशी कहती है कि तुम सौ वर्ष तक भी प्रेम करते रहो तो भी नारी प्रेम नहीं करेगी, स्त्रियाँ निर्मोही होती हैं।” पांडेजी हंसते हुए कहने लगे।
                      ‘ वैसे तो यह स्वर्ग की अर्थात सिद्धि-प्रसिद्धि के शिखर की बात है, जहां ममता-मोह-बंधन आदि नहीं होते परन्तु संसार में, पृथ्वी पर नारी प्रेम का प्रतीक है| तभी तो उर्वशी भूलोक पर आती है परन्तु भूलोक की नारी का पूर्ण धर्म नहीं निभा पाती| प्रकृति व माया की भांति नारी भी शक्ति है, ऊर्जा है ...पावर है, और शक्ति वास्तव में निर्मोही होती है उसके साथ नाजायज़ छेड़खानी से धक्का, शाक अर्थात करेंट लगने का सदैव अंदेशा रहता है| नर को भी समाज को भी, और परिणाम ..पंगु हो जाना ..नर का भी, समाज काभी..'सावधान.’ कहते हुए ड़ा शर्मा मुस्कुराये।
                 ‘बडी देर से नारी-निंदा पुराण कहा-सुना जा रहा है।’, अमृता जी जो बड़ी देर से सोफे पर बैठी हुईं सब सुन रहीं थीं, बोलीं।
               ‘ निंदा या प्रशंसा-स्तुति, पांडे जी बोले, ’ फिर, यह तो हम पुरुषों के मंतव्य हैं। आप लोग अपने मंतव्य प्रस्तुत करें।’
                 सुना नहीं है , अमृता जी बोलीं.....
                                                 “ नारी निंदा मत करो, नारी नर की खान।
                                                    नारी से नर होत हैं, ध्रुव, प्रहलाद समान।|”
                  बिलकुल सत्य है अमृता जी, ड़ा शर्मा कहने लगे, पर इसके लिए नारी को ध्रुव, प्रहलाद की माँ के समान भी तो होना पड़ेगा।’

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

एक एतिहासिक भूल...... ड़ा श्याम गुप्त ...

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                      आज से ७५ वर्ष पहले जो भूल की गयी थी उसके दुष्परिणाम आज भी देखने को मिल रहे हैं  | मतभेद भुलाने हेतु  खान अब्दुल गफ्फार खान  को वास्तव  में अपने भाषण में   'राम सेना'  व  'खुदाई खिदमतगार' बनने की सलाह की बजाय  सभी को  " राष्ट्र सेवक"   बनकर आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने का आव्हान करना चाहिए था |  जहां राष्ट्र की बात  होती है  वहाँ राम व खुदा के नाम का प्रयोग  क्यों |  धर्म का नाम ही  नहीं आना  चाहिए |

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

मेरी खुशियों का राज ...ड़ा श्याम गुप्त....

                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                      काफी  पुराने समय की बात है ..सुना, देखा ,पढ़ा करते थे ...कभी कभी आजकल भी दिख जाते हैं ... गली-कूचों में  कुछ लोग... जो अपने को हकीम भी बताया करते थे ... बेचा करते थे.... मर्दाना ताकत की दवा...मुसली,शिलाजीत... सांडा का तेल, जिसे उसी समय किसी तेल में  छिपकली टाइप के जानवर को तल कर बनाया भी जाता था ... अखवारों आदि में विज्ञापन भी आया करते थे | उन्हें पढ़े-लिखे लोगों, वैज्ञानिक जगत के विज्ञान-विज्ञान  चिल्लाने वाले लोगों में  हिकारत की दृष्टि से देखा जाता था |



        आज के अखबारों को उठाकर जब देखते हैं तो ...हाईपावर, जापानी तेल, खुशी का होर्स-पावर , स्टे-ओन, मरदाना पावर ..आदि के विज्ञापन भरे रहते हैं |
    क्या हम ७०-८० साल में भी वहीं के वहीं हैं ....अथवा पुरातन ..को अंग्रेज़ी, पाश्चात्य या नयी बोतलों में ढाल कर वही माल बेचा जा रहा है |







                  
                     

बुधवार, 22 अगस्त 2012

ड़ा श्याम गुप्त की कहानी.....माँ और काजल पुराण.....

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 
                        
             पुस्तक पढते, कम्प्युटर पर काम करते, नोट्स बनाते जब आँखों में भारीपन व धूल-धूल से होने लगी तो मैं लेट गया और उँगलियों के पोरों से दोनों आँखों को हलके हलके दवाकर आराम देने का प्रयत्न करने लगा | लेटे-लेटे मैं सोचने लगा क्या कोई आई-ड्रॉप डाल ली जाय या लुब्रीकेंट आटीर्फिसियल टीयर्स-ड्रोप्स | तभी बगल के कमरे से मेरा मित्र रमाकांत, जो लखनऊ आया हुआ था, आकर कहने लगा, ’यार! बड़ा धाँसू उपन्यास लिखा है, एक सिटिंग में ही पढ गया, उठा ही नहीं गया बीच में | मज़ा आगया, कालिज का ज़माना याद आगया |’ मुझे लेटे हुए व आँखें मलते देख कर पूछने लगा,’ क्या हुआ ?’
             ‘कुछ नहीं, बस आँख थक गयी तो लेट गया, स्ट्रेन से हल्का-हल्का भारीपन है यूंही, मैंने हथेली से पलकें दबाते हुए कहा |
            तुम तो यार, काजल लगवा लेते थे, इस सिचुएशन में |’ रमाकांत बोला, फिर ठहाका मारकर हँसने लगा तो मैं भी मुस्कुराने लगा |
            मेरा ध्यान पत्नी की ओर चला जाता है जो बेटे के पास गयी हुई थी | जब कभी ऐसा होता है तो मैं श्रीमती जी से सरसों के तेल के दीपक का काज़ल लगवा लेता हूँ अन्यथा वह अपनी काज़ल की डब्बी से ही लगा देती है | आराम मिलता है | काज़ल के नाम से मैं हंसने लगा तो रमाकांत बोला, ’अब क्या हुआ, याद आगई क्या भाभीजी की ?’
           उसी समय टेलीफोन आगया | मैंने फोन उठाया तो पत्नी की आवाज़ सुनकर पुनः हंसने लगा |’
           क्या बात है, क्यों हंस रहे हो, पूछने पर जब काज़ल बाली बात बतायी गयी तो वह कहने लगी, ’वहीं डब्बी में होगा या बनाकर लगालो दो मिनट में |’ 
          ‘अरे, भई ! उन उँगलियों की बात और ही होती है|’ मैंने कहा तो वह भी हंसने लगी, बोली ‘दिन भर लेपटोप पर मत लगे रहा करो, ये नौबत ही क्यों आये |’
          पीछे से रमाकांत ने ..नमस्कार जी’ की आवाज़ लगाई तो अचानक चौंक कर पूछा, ’ कोई आया है क्या घर पर ?’
          हाँ, रमाकांत, मैंने कहा |
         अच्छा अच्छा, चलो अच्छा है, मन लगा रहेगा |  खाने आदि का ठीक चल रहा है न | दिन भर दोनों लोग घूमने में, बातों में, बहस में ही मत लगे रहना |
        विविध निर्देशों-अनुदेशों के पश्चात फोन तो बंद होगया परन्तु काज़ल अभी भी विचार में बना रहा | उँगलियों व काज़ल से स्मृतियों में माँ की तस्वीर उभर कर आने लगी जो बचपन में हम सब बच्चों को पकड़-पकड़ कर जबरदस्ती सरसों के तेल के दीपक की कालिख से बना सूखा काज़ल का पाउडर उँगलियों से लगाया करती थी | अपितु चुटकी से आँखों में भर भी दिया जाता था | कुछ देर तक आँखों में धूल-धूल सी लगने व पानी बहने से पश्चात आराम मिल जाता था| पिताजी भी अकाउंट का कार्य, लिखने-पढने का करते थे तो उन्हें भी अक्सर आना-कानी करने के बाद लगवाना पडता था, यद्यपि बाद में मिट्टी के तेल की लेंटर्न आजाने से तथा विद्युत आने पर काज़ल बनाना सिर्फ दीपावली के दीप तक ही सीमित रह गया| यह क्रम मेरे चिकित्सा-महाविद्यालय में चयन होने पर भी चलता रहा यहाँ तक कि कभी-कभी शादी के बाद भी | माँ का तर्क था कि पढते-लिखते-खेलते आँखों के कांच पर धूल आजाती है, काज़ल से कांच मंज जाता है अर्थात साफ़ होजाता है जैसे चश्मे के कांच को साफ़ करना पडता है |
        ‘तुम तो यार डाक्टर हो, रमाकांत की आवाज़ से मेरी विचार श्रृखला टूटती है | वह कह रहा था,  ‘डाक्टर लोग तो मना करते थे काज़ल-वाज़ल लगाने के लिए, फिर?’
        हाँ, यह तो है, मैंने कहा, ‘यद्यपि अधिकाँश हम डाक्टर लोग पाश्चात्य शिक्षा-प्रभाव वश, क्योंकि काज़ल एक भारतीय प्रथा थी, काज़ल व सुरमे की बुराई ही करते थे, न लगाने का परामर्श देते थे कि यह प्रथा आँखों के इन्फेक्शन व रोगों का कारण है | परन्तु यार, व्यक्तिगत रूप से मैंने काज़ल को कभी खलनायक नहीं माना अपितु सुरमा लगाने की सलाई, जो सुरमा प्रयोग करने वाले समाज व परिवारों में प्रयोग होती थी और एक ही सलाई से सारा परिवार लगाया करता था, को ही खलनायक मानता रहा |’
        ‘तो क्या तुम अब भी लगाते हो काज़ल ?’ उसने आश्चर्य से पूछा |
        हाँ, कभी-कभी, मैंने हँसते हुए कहा, ’काज़ल तो यार, बचपन में माँ लगाया करती थी जबरदस्ती | पर वह तो सदैव गर्म-गर्म बना हुआ काजल, उंगली को दिए पर गर्म करके और प्रत्येक आँख के लिए अलग-अलग उंगली से लगाया करती थी| हमारे यहाँ आँखों के इन्फेक्शन कम ही होते थे|’
       ‘कुछ होता भी है काज़ल-सुरमा से या यूंही आदतानुसार मन का भरम है| होता क्या है काज़ल? रमाकांत पूछने लगा |
           ऐसा नहीं है, मैंने कहा, ‘ काज़ल वास्तव में सूखा हो या गीला, एक प्रकार का ‘अधिशोषक’  (एड्जोर्बेंट) का कार्य करता है | आंसुओं की बहने की गति तीब्र करके वाह्य धूल व आतंरिक प्रक्रियाओं से बने अप-द्रव्यों, स्रावों को बहा देता है | आंसुओं की अधिकता से रेटिना व आँख की पुतली आदि पुनः नम होजाती हैं और आराम मिलता है| आज के लुब्रीकेंट, टीयर्स आदि ड्रोप्स की अपेक्षा आँखों की स्वाभाविक, सहज अश्रु-प्रक्षालन प्रक्रिया के प्रयोग द्वारा |
          विचार फिर श्रीमती जी की ओर मुड जाते हैं | शादी के पश्चात आधुनिक बहू ने कम से कम एक बात तो अपनी पुरातन सास से ज्यों की त्यों सीखी कि वह भी दीपक से काज़ल बनाकर सारे परिवार को लगाती रही वही उंगली से| और अभी भी कभी-कभी आवश्यकता अनुभव होने पर मैं स्वय ही कह कर काज़ल लगवा लेता हूँ, लाभ भी होता ही है| यद्यपि बच्चों के बड़े होने पर एवं स्कूल-कालिज जाने पर यह काज़ल-प्रथा सिर्फ दीपावली के रात भर जलने वाले सरसों के दीपक तक ही सीमित रह गयी |’
          यार, काज़ल तो महिलायें लगाती हैं, सुन्दर बड़ी-बड़ी आँखें दिखने हेतु; ‘कज़रारे नयना, मतवारे नयना..’ सुना नहीं है | भाभीजी भी तो मोटा-मोटा काज़ल लगाती हैं न, और वो पड़ोसन.....|
           हाँ, सही उपयोग तो वही है, मैंने हंसकर बात काटते हुए, हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा,  ‘महिलाओं में सौंदर्य प्रसाधन की भांति तो काज़ल का प्रयोग युगों से चला आरहा है एक प्रमुख कृत्य की भांति, नेत्रों के सौंदर्य के प्रतीक रूप में | क्या प्यारा गाना है.. ’हाय काज़ल भरे मदहोश ये प्यारे नैना ...’ हम दोनों सुर में सुर मिला कर गाने लगते हैं |
         अरे काज़ल का क्या कहते हो | रमाकांत बोला, ’कठोर अंग्-छिपाऊ वस्त्र नियमन प्रथा वाले समाज में भी सारा शरीर ढके सिर्फ आँख चमकाती हुई महिलाएं भी नकाब या लंबे घूंघट के अंदर कज़रारे नयना रखने से नहीं चूकतीं | आजकल तो आँखों के गड्ढे व कालिमा छिपाने के लिए आई-लाइनर और अब तो हरा, नीला, लाल, गुलाबी, सुनहरा आई-शेडो का ज़माना है जिसे लगा कर महिलायें जादूगरनी, लेडी-ड्रैक्यूला या कहानियों में पुरुषों को कैद करके रखने वाली खूसट रानियों-राजकुमारियों जैसी लगती हैं |
          और.... मैंने जोडते हुए कहा, ’ ये काज़ल तो सारे प्रोटोकोल- रिश्तों की दूरियां भी समेट देता है, लोग... ‘कजरारे कज़रारे तेरे कारे कारे नैना ‘...गाते हुए नाचने लगते हैं | हम दोनों हंसने लगते हैं |

          वाह ! आज तो सुबह-सुबह “काज़ल-पुराण” वाचन होगया | आँख तो स्वस्थ हो ही गयी होगी बिना काज़ल के ही | इस पर भी एक कहानी लिख देना, रमाकांत ठहाका लगाते हुए बोला |
         ‘अच्छा सुझाव है | चलो लंच का जुगाड किया जाय’, मैंने उठते हुए कहा |