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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 23 जनवरी 2013

श्री लंका यात्रावृत्त ..भाग पांच ---पोलोनरूवा .....



                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                             २४-१२-१२ को सिगीरिया फ़ोरेस्ट विलेज के रिसोर्ट में रात्रि-विश्राम के पश्चात्  २५-१२-१२ प्रातः को  नाश्ते के बाद हमारा कारवां प्री-हिस्टोरिक साइट्स  एवं एक और प्राचीन राजधानी पोलोनरूवा के लिए चल दिया जहां प्री-हिस्टोरीकल सभ्यता  व नगर के अवशेष  व  म्यूज़ियम  हैं| रास्ते में   मिन्नेरिया फारेस्ट रेंज के  वन में जंगली हाथियों का झुण्ड चरते हुए लगभग सड़क के एक दम नज़दीक आगया था | सुन्दर व दुर्लभ नज़ारा  सभी  ने कमरों में कैद किया | दम्बूला रोड पर बुटीक-कला के कारखाने  में बुटीक-छपाई कला का कारीगरों ने प्रदर्शन किया  एवं  पब्लिक रिलेशन अधिकारी द्वारा जानकारी  दी गयी, शो-रूम व विक्रय -केंद्र का भी अवलोकन किया गया |  त्रिंकोमाली रोड पर दम्बूला के निकट प्रसिद्द 'गामिनी जेम एंड ज्वेलरी'  के  शो रूम में पब्लिक रिलेशन अधिकारी द्वारा  श्रीलंका के प्रसिद्द नगर रतनपुरा ( जिसके रत्नों के कारण श्री लंका  रत्नद्वीप कहलाता था )में  विभिन्न रत्नों के खानों के  निकालने के अत्यंत जोखिमपूर्ण व श्रमसाध्य कार्य एवं उनकी प्राप्ति को फिल्म द्वारा दिखाया व समझाया गया | तदुपरांत घिसने, चमकाने, कटिंग आदि के उपकरण व कारखाना भी दिखाया गया | काफी बड़े शो-रूम में काफी मात्रा में विभिन्न प्रकार के रत्न एवं आभूषण का अच्छा भंडार था| रीना जी एवं सुषमा जी ने कई वेराइटी के रत्न एवं आभूषण खरीद डाले | शायद कुछ बाजिव दाम लगे होंगें |
मिनीरिया फारेस्ट में जंगली हाथियों का दल
सुषमा जी व रीना रतनपुरा के जेम्स खरीदते हुए
बुटीक शोरूम
        

बुटीक - कारखाना एवं सिंहली महिला सुपर वाइज़र..विशेष सिंहली स्टाइल की साडी में






विशाल पराक्रम समुद्र लेक
               दोपहर को दो बजे तक हम लोग पोलोनरूवा गाँव पहुंचे | बहुत बड़ी अथाह सागर के समान  पराक्रम समुद्र लेक के किनारे प्री-हिस्टोरिक  म्यूज़ियम है| वही नगर के लिए नालियों द्वारा  शानदार प्राचीन जल सप्लाई सिस्टम भी है |
             

 अनंत नाग पोकुना व दीप उयाना
              म्यूज़ियम के समीप ही किंग पराक्रम वाहू ११५३ एडी द्वारा बनवाया सभागार , निसान्क्मला  ११९६ एडी द्वारा निर्माण कराया गया स्नान-का तालाब 'अनंत नाग पोकुना ' ' व आइस लेंड  सभागार व बाग़ 'दीप उयाना '( द्वीप-उद्यान) है जिसे किंग पराक्रम समुद्र  ने अपनी  ग्रीष्म कालीन राजधानी  'कलिंग उयाना '( कलिंग प्राचीन भारतीय  सिंहल राज्य --आज का उडीसा... ) का नाम दिया था |
              पोलोनारूवा म्यूज़ियम -- में फोटोग्राफी मना है , टिकट २५ डालर व भारतीयों के लिए आधी १२.५ डालर है |अन्दर प्रागेतिहासिक काल के कई चिन्ह , हरप्पा सभ्यता की भांति ...मनके , टेराकोटा मूर्तियां, पके-मिट्टी के  वर्तन, आभूषण, मूर्तियाँ आदि प्रदर्शित  हैं| बौद्ध कालीन  अवशेष भी | सूर्य देव की मूर्ति -दो पत्नियां ऊषा-प्रत्यूषा के साथ प्रथम बार देखने को मिली , गज-लक्ष्मी -- जिसमें लक्ष्मी पर दोनों ओरसे हाथी जल सिंचन करके अभिषेक करते हुए...., विष्णु,  शिव का नंदी बुल , शिव-लिंग, कार्तिकेय व गणेश , गन्धर्वों, यक्षों की मूर्तियाँ , चौमुखा दीप , शिव-भक्त सुन्दर स्त्री  प्रगीतावती का कुरूप होकर  काली-कोविल बन जाने पर पति व समाज द्ववारा परित्याग एवं शिव के तांडव नृत्य से ठीक होने की कथा सहित प्रतिमा हिन्दू-धर्म के प्रतीक एवं  शिव-पूजा के होने के प्रमाण है जो यक्ष-कुबेर व रक्ष-रावण के काल का स्मरण करा सकते  हैं मूर्तियाँ चाहे बाद के काल में निर्मित की गई हों | मानव कंकाल के अधूरे अवशेष भी प्री-एतिहासिक काल की सभ्यता का भान कराते हैं|
जंगल में प्री-हिस्टोरिक सरीसृप -इगुआना


सतमहला भवन
गज लक्ष्मी
बौद्ध  स्तूप पर रीना आराध्य व सुषमा जी
बौद्ध  मंदिर में पुष्पों से पूजा
               पोलोनारूवा प्री -हिस्टोरिक नगर  साईट पर .. पराक्रम  बाहू का निर्मित सतमहला भवन , जिसमें  अब भी सात मंजिले मौजूद हैं ...प्लास्तर  उखड गया है परन्तु दूसरी मंजिल पर किसी पुरुष की मूर्ति व  छटी मंजिल पर स्त्री मूर्ति नज़र आती है| नज़दीक ही एक बहुत बडी शिला पर जो सतमहला व समीप के ही बौद्ध मंदिर की बगल में है,  किंग निसंकमला  के वंश एवं वीरता के किस्से लिखे गये  हैं , यह भी कि यह शिला १०० मील दूर मिहिंताले से  यहाँ लाई गयी  थी | इस शिला पर गज-लक्ष्मी की मूर्ति है  जो आम भारतीय मूर्तियों व चित्रों में देखी जाती है |समीप ही बौद्ध मंदिर है जिसे  मूल टूथ टेम्पल कहा जाता है , केंडी स्थित टूथ टेम्पल से पहले महात्मा  बुद्ध के दांत के अवशेष यहीं रखे गए थे |  ११ एडी का बौद्ध स्तूप  है जिसमें स्तूप  के चारों ओर प्रत्येक दिशा  में एक बुद्ध  मूर्ति है, स्तूप परकोटे से घिरा है |जिसकी सीढ़ियों पर गन्धर्व की भाँति  मानवाकृति व तथाकथित  मून स्टोन एवं गार्ड-स्टोन हैं जो हिन्दू व गन्धर्व कला के कुम्भ हस्त द्वारपाल लगते है शेष फण से नाग कालीन प्रतीत होते हैं| जंगल क्षेत्र में प्राचीन दुर्लभ सरीसृप , बड़ी छिपकली जैसे जंतु इगुआना  के दर्शन भी हुए |

सुनसान व उपेक्षित -प्री-हिस्टोरिक शिव मंदिर पर निर्विकार एवं रीना अन्दर प्रांगण  में शिव-लिंग

काले कान  व लाल मुख बन्दर

थूपारामा
               शिव-मंदिर .. जहां बौद्ध मंदिर में जूते उतारने का बोर्ड लगा है  व पूजा  भी होती है वही दूसरी ओर शिव-लिंग  सहित शिवमंदिर बिना किसी देख रेख के , जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है जूते पहन कर या चाहे जैसे जाएँ | मंदिर अति-प्राचीन ..शायद सबसे प्राचीन इमारत है|  समीप ही कुबेर की मूर्ति व  किसी प्रागैतिहासिक विश्वविद्यालय के भांति किसी संस्थान के अवशेष हैं |जिसे बौद्ध  विहार बताया जाता है | लंकातिलक मंदिर का
 यक्ष -कुबेर की मूर्ति
कैप्शन जोड़ें

नवीनीकरण किया जारहा है यह काफी ऊंचा व दोमहला इमारत लगती है | दरवाजे, छतें, खिड़कियों व खम्भों की कारीगरी, नक्काशी काफी सुन्दर है  व प्राचीन भारतीय घरों से मिलती-जुलती  है|  अन्य निवास-स्थानों , मंदिरों , सभामंडप आदि के अवशेष हैं जिनमें बीच  में शिव-लिंग एवं डिजायनदार खम्भे हैं | काले कान व लाल मुख व सुनहरे शरीर वाले पूंछ वाले व पूंछहींन बंदर हर ओर दिखाई पड़ते हैं परन्तु अपेक्षाकृत शान्ति-प्रकृति के,  वे उदंड नहीं हैं |
सिंहल सभाभवन पर निर्विकार
सतमंजिला राज भवन के खंडहर में  -निर्विकार व रीना , आराध्य
प्राचीन मंदिर --मध्य में शिव-लिंग ..डिजायन दार खम्भे

सभाभवन की दीवार -हाथी, सिंह व बौने मानव विभिन्न मुद्राओं में
            सिंहल सभा-भवन व स्नान- तालाब व  सत मंजिला  राज-महल -- आगे अन्दर कुछ घना वन प्रदेश  है  कच्चे -पक्के प्राचीन रास्ते के दोनों ओर क्रमबद्ध  दुकानों व बाज़ार के अवशेष है जिससे प्रतीत होता है कि यह नगर का प्रमुख व अच्छा बाज़ार था एवं नगर समृद्धिपूर्ण रहा होगा  ...सिंहल सभाभवन विशाल सभाभवन का अवशेष है जिसमें हाथियों, सिंहों व बौने मानवों  के विभिन्न भाव-भंगिमाओं सहित भित्ति-मूर्तियाँ है | द्वार पर सिन्हलों का प्रतीक चिन्ह सिंह हैं|लगभग चार -पांच फीट मोटाई की दीवारों से बने सत मंजिला राज-महल व कमरों के अवशेष जिनमें सिर्फ दो मंजिलें ही शेष हैं |
क्रमबद्ध दुकानें व बाजार में सुषमा जी व आराध्य
प्राचीन नगर के ध्वन्शावशेष --रीना व आराध्य
 
लेटे हुए बुद्ध की विशाल मूर्ति
               लेटे हुए बुद्ध पुलस्त्य मुनि की मूर्ति  व पुलस्त्यपुरा ---पराक्रम समुद्र   लेक के दूसरी ओर पहाडी के समीप छोटी सी झील के किनारे विशाल आकार की लेटे-बुद्ध की मूर्ति है समीप ही ध्यान में बैठे बुद्ध भी हैं | साथ में ही बहुत बड़ी शिला मूर्ति एक व्यक्ति की है जो दोनों हाथ में पुस्तक लिए हुए है| इसे पराक्रम बाहू की मूर्ति बताया  जाता है ..हाथ में ओला-लीफ  लिए हुए, उन्हें खेती का महान वैज्ञानिक कहा जाता है |
महर्षि पुलस्त्य
             परन्तु वास्तव में यह रावण के पितामह ( दादा या बाबा ), पिता  विश्रवा  मुनि के पिता महामुनि व  प्रारंभिक मानव एवं ब्रह्मा के पुत्र सप्तर्षियों  में से एक ऋषि पुलस्त्य की मूर्ति है , जो एक ब्राह्मण थे एवं स्वयं महान वैज्ञानिक , कृषि वैज्ञानिक , महान विचारक-दार्शनिक  थे एवं हाथ में  प्राचीन लिखने के पत्र ,अरक-पत्र की( ताड़ पत्र या भोजपत्र ) पुस्तक है |
                            वस्तुतः पोलोनरूवा का वास्तविक नाम पुलस्त्यपुरा....पुलस्त्यनगर  था जो बौद्ध काल में पोलोनरूवा कर दिया गया|








सोमवार, 21 जनवरी 2013

श्रीलंका यात्रावृत्त ..भाग चार ...सिगीरिया लायंस रोक फोर्ट ...







                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
टिस्सा वेवा रिजोर्ट अनुराधापुर

रास्ते में आम की दुकान

                           
                       






                                            २३-१२-१२ को अनुराधापुरा के टिस्सा वेवा रेज़ोर्ट  में रात्रि-विश्राम के उपरांत  २४-१२-१२ प्रातः हम लोग सिगीरिया लायंस रोक-फोर्ट के लिए चल दिए | मरान्द्कवल, केकीरावा, दम्बूला होते हुए दोपहर में सिगीरिया विलेज पहुंचे|  सिगीरिया... राजा कसापा ( कश्यप) ने ४७३एडी  अपने पिता व भाई से बगावत करके राज्य हथियाकर   अनुराधापुर की बजाय अपनी राजधानी बनाया था|  जहां से वह  अलक मंडवा ( अलकापुरी) के कुबेर की भांति राज्य किया करता था| तत्पश्चात उसके भई व सिंहासन के असली हकदार राजकुमार 'मिगलेन' जो भारत भाग गया था भारतीय सहायता से कसापा को हराकर पुनः अनुराधापुर को राजधानी बनाया| सिगीरिया फोर्ट लगभग ५००मीटर ऊंची चट्टान पर बसा हुआ पूरा नगर है | जिसमें जल -संग्रहण कुण्ड एवं हाइड्रोलिक सिस्टम से फब्बारे , एशिया के सबसे प्राचीन टेरेस-गार्डंस , अजन्ता की तरह शानदार क्लासिकल दीवार-पेंटिंग्स जो सभी  महिलाओं की  थीं एवं ५०० की संख्या में थी |ये एशिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित पेंटिंग हैं| २०० मीटर की ऊंचाई पर "मिरर वाल" है जो पोर्सिलेन की भांति पोलिश से चमकाई जाती थे  ताकि राजा अपना रूप देख सके|  यद्यपि मेरे विचार से इतने लम्बी दीवार  जो कोनकेव का कॉन्वेक्स  व अंग्रेज़ी के  S के आकार की  है शत्रु को दूर से ही देखने के कार्य आती होगी और इसके पीछे रहकर ऊंचाई से शत्रु की गतिविधि पर नज़र राखी जाती होगी |  सिंह रोक फोर्ट ऊपर जाने का रास्ता सीढ़ियों द्वारा है  जो सिंह के पैरों से  मूर्ति -मुख तक होकर  ऊपर जाता था | बाद में सिंह का मुख गिरा दिया गया( शायद युद्ध में )  सिर्फ पैर ही शेष हैं|  समीप ही पांच  सेंचुरी बीसी के पुराने प्री-हिस्टोरिक रौक गुफाएं   हैं जिनमें ब्राह्मी लिपि  से लिखावट मिलती है| राजा का सिंहासन, एवं अन्य  रोक-गुफायें  भी मिलते हैं|





सिगीरिया रोक फोर्ट व् मिरर वाल से नीचे का दृश्य

    





२०० मीटर ऊंचाई पर गुफा में भित्ति-चित्र

मिरर वाल

टेरेस गार्डंस

रोक फोर्ट के महल के अवशेष पर रीना-निर्विकार

फोर्ट पर नगर के अवशेष
फोर्ट के मध्य में रोक-गुफा

राजा कसापा का सिंहासन

लायंस पैर द्वार  के मध्य सीढियां पर निर्विकार






                     अन्य जनश्रुतियों  के अनुसार वस्तुतः सिगीरिया  का वास्तविक नाम 'वेस्सागिरिया है', यह ऋषि पुलस्त्य के पुत्र,   रावण-कुबेर  के पिता विश्रवा मुनि की राजधानी थी, जो एक महान शासक के साथ-साथ  महान वैज्ञानिक,  जेनेटिक- इंजीनियर , वेदों के ज्ञाता,ज्योतिषज्ञ,योद्धा व  विचारक थे |  इन्हें विश्वत मुनि,   वेस्सा मुनि, वासा मुनि, विश्रवस  आदि के नाम से भी जाना जाता था |     
सिगीरिया रिजोर्ट में क्रिसमस
 
सिगीरिया रिसोर्ट में सुषमा जी
      


सिगीरिया डीप-फारेस्ट रिजोर्ट ....
रीना एवं  आरू इन रूम
सुषमा जी वरांडे में आराम फरमाते हुए

आराध्य  मेकिंग  फ्रेंड




                 ------  क्रमश ---भाग पांच-- पोलोनरूवा .....                                   

नहीं रुकेंगे बलात्कार...डा श्याम गुप्त ..

                       

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
         क्योंकि हमारे समाचार-पत्र, पत्रकार, ट्रेवेल एजेंसी  तो हमें- हमारे नव-युवाओं-युवतियों, देश के भावी कर्णधारों को  मौज-मस्ती के लिए ..शराव - शबाव में मस्त रहने को ही पर्यटन बता रहे हैं ..सिखा-पढ़ा रहे हैं | देखें चित्रों में ...
     जबकि हमारे देश भर के तमाम विद्वान्, शंकराचार्य जैसे विश्व-मान्य संत-विद्वान्  एवं हाल ही में तमाम, संतो-साधुओं-आचार्यों-विद्वानों –अनुभवी जन-नेताओं, साहित्यकारों  आदि ने अप-संस्कृति एवं आचरण के विभिन्न बिन्दुओं पर विचार व्यक्त किये हैं, जिन पर आधुनिकता से संचारित तमाम युवाओं ने आपत्ति भी की है |

        हमें सोचना होगा कि ये तमाम विज्ञ व अनुभवी मान्य जनों  के  विचार आदि सही हैं या आपत्ति करने वाले कम-उम्र अनुभव व ज्ञान वाले युवा  जिन्हें अभी बहुत कुछ सीखना है और ये पत्र-पत्रिकाएं, पत्रकार, ट्रेवेल एजेंट आदि धंधेबाज संस्थाएं|





         ठीक है संत-समाज, नेताओं , अनुभवी लोगों में भी हाल में ही तमाम कदाचार देखे-सुने गए हैं ..जिससे युवा व बच्चों में अनास्था, श्रृद्धा व मति-भ्रम उत्पन्न होता है | निश्चय ही उन्हें अपना आचरण सुधारना होगा | परन्तु यह भी सत्य है कि यह तो अमेरिका जैसे देश में भी राष्ट्रपति स्तर तक के तमाम लोग अनाचरण व कदाचार में लिप्त पाए हैं | तो हम क्यों स्व-संस्कृति त्यागकर पाश्चात्य –संस्कृति अपनाएं व उस पर चलें |


       परन्तु इस से सांकृतिक मूल्य, आचरण-अनाचरण,स्वसंस्कृति-अनुसार 
 
आचार-व्यवहार की स्वीकार्यता, विदेशी एवं अप-संस्कृति की

अस्वीकार्यता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता |        

 

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

श्री लंका यात्रा-वृत्त ---भाग तीन --- अनुराधापुर ....



                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                           कोलम्बो का स्थानीय दर्शन  के उपरांत  २२-१२-१२ को कोलम्बो के होटल सैफायर  में रात्रि-विश्राम  के पश्चात २३-१२-१२ को सुबह सुबह ही हमारा कारवाँ अनुराधापुर की ओर चल दिया , जिसे रावण की राजधानी कहा जाता है | यह श्री लंका का सबसे प्राचीन स्थल है जो भारत से हिन्दू -सिन्हलीज  राजा विजय के आने पर सबारागामुवा से अनुराधापुर नाम से राजधानी बनायी गयी| तदुपरांत बौद्ध धर्म का मुख्य गढ़ बना |इसे  'इटरनल सेक्रेड सिटी' कहा जाता है  |  अनुराधापुर  श्रीलंका द्वीप के मध्यवर्ती घने वनांचल में बसा हुआ है | धन्कोत्ला, मार्वेवा गाँव एवं होनागाला रेलवे स्टेशन होते हुए ..रास्ते में विभिन्न घने जंगल, झीलें व वाटर-बोड़ीज़ पार करते हुए हम अनुराधापुर पहुंचे | सभी सड़कें अच्छी तरह  बनी हुई  व पक्की थीं | गाँव के क्षेत्र में  भी नगर संपन्न व आवासीय स्थल पक्के व सुन्दर बने हुए हैं | गहन जंगलों के मध्य बसे नगरों -कस्बों  में भी संचार  के संसाधन व ओटो आदि की सुविधाएं पर्याप्त हैं |
                अनुराधापुर गहन वन में बसा हुआ है | यहाँ बौद्ध धर्म के बहुत से चैत्य व स्तूप हैं | प्राचीन संस्कृति के भग्नावशेष भी वन-प्रांतर में फैले हुए हैं| पूरे क्षेत्र के दर्शनीय स्थलों की एक स्थान पर ही टिकट है जो २५ डालर की है , भारतीय व सार्क देशों के यात्रियों के लिए १२.५ डालर की कन्सेशन टिकट है|

टिस्सा लेक में हंस का विहार व अन्य  जलपक्षी
१.इसरूमुनिया राज महाविहार ----जोएक सुन्दर व विशाल  टिस्सा लेक के समीप स्थित है| झील में कमल व हंसों की उपस्थिति से प्राचीनता व पौराणिकता का अहसास हो रहा था |   मंदिर व यहाँ का तूपारामैया दगोबा ( बौद्ध स्तूप ) राजा देवानाम प्रिय टिस्सा द्वारा २५० ईपू में  अपने ५००० प्रजा सहित बौद्ध धर्म ग्रहण करने पर बनवाया गया कहा जाता है | जो श्रीलंका का सबसे पहला बौद्ध विहार है |
थूपारामैया बौद्ध विहार
                     वस्तुतः देखने पर मंदिर अधिक प्राचीन प्रतीत होता है | मंदिर में बनी हुई अश्व व पुरुष ( योरोपीय इतिहासकारों द्वारा दिया गया नाम हॉर्स एंड मेन) को राजा  टिस्सा की मूर्ति  कहाजाता है | परन्तु जनश्रुति के अनुसार वास्तव में यह मूर्ति एवं मंदिर रावण  के पिता प्रसिद्द ऋषि --विश्रवा मुनि ( वासामुनिया  ) की है जो इस क्षेत्र के महान शासक, वैज्ञानिक, इंजीनियर विद्वान् व लौह पुरुष व अश्व-संचालक  भी थे | बौद्ध स्तूप बाद में स्थापित किया हुआ लगता  है |
बौद्ध मूर्ति
ईशुर्मुनिया टेम्पल  एवं अश्व  सहित विश्रवा मुनि की मूर्ति  शेड के नीचे दायें ऊपर
अभायागिरिया स्तूप

बौद्ध मंदिर के अन्दर हिन्दू देवों की मूर्तियाँ

लेटे  हुए विशाल बुद्ध

मुरुगन कार्तिकेय या गरुड़ पर विष्णु



२.प्राचीन संग्रहालय ---- इसुरूमुनिया मंदिर के नज़दीक ही वन-क्षेत्र का प्रवेश द्वार है जो घने जंगल का क्षेत्र है और  विभिन्न स्थानों पर प्राचीन-सभ्यता के अवशेष व बौद्ध स्तूप एवं बौद्ध टेम्पल आदि इसी वन में बने हुए हैं| संग्रहालय इस प्रवेश द्वार के अन्दर ही है| संग्रहालय में प्राचीन हिन्दू व बौद्ध धर्म के अवशेष प्राप्त होते हैं| गणेश, कुबेर , यक्ष-यक्षी , शिव-लिंग , यज्ञ-स्थान , शेषशीर्ष सहित मूर्ति नागराज या  विष्णु की --आदि की मूर्तियाँ प्राचीन हिन्दू  सभ्यता की कथा कहती हैं |
 
संग्रहालय -अनुराधापुर



           अन्दर गहन जंगल में तमाम जल-भराव के बड़े-बड़े स्थल, तालाव, झीलें  थी, झीलों में कमल के पुष्प शोभायमान थे| कुछ दिनों से अधिक वर्षा होने से अधिकाँश मार्ग पानी से भरे हुए व घिरे हुए थे|  सभी  बौद्ध स्थलों तक प्रायः  पक्की सड़कें बनी हुई है |  कहीं कहीं अन्दर गहन वन में कच्ची रोड पर भी जाना पड़ता है  जो अधिक प्राचीन सभ्यता के ध्वंसावशेष हैं|  परन्तु सभी स्थानों पर मोटर वाहन से जाया जा सकता है|
गहन वन में कोलोनी के अवशेष
वनांचल में आधुनिक सिंहली परिवार के साथ श्री लंका की काली चाय व मसाला-आम
३.बौद्ध स्तूप -- अभय गिरिया(८९बीसी ) व जेतवन(३००एडी ) ,रूवंवेली,लंकारामैया( १ सेंचुरी बीसी) आदि  आठ बौद्ध स्तूप व अन्य  बौद्ध मन्दिर जो राजा टिस्सा, २४६बीसी, दुत्तगामनी १३७ बीसी, या राजा वलागाम्बा ८९बीसी व किंग महेसंन ३०० एडी द्वारा बनबाये गए हैं | जिनमें लेटे  हुए  बुद्ध व बैठे हुए बुद्ध की तमाम प्रतिमाओं के साथ -विष्णु, कार्तिकेय, शिवलिंग, गरुड़,आदि के चित्र व प्रतिमाएं भी मिलती हैं | जो प्राच्य हिन्दू धर्म व मध्यकालीन बौद्ध धर्म के अवशेष हैं| किंग देवानां प्रिय टिस्सा द्वारा स्थापित बोधि-बृक्ष भी है जो भारतीय सम्राट अशोक के पुत्र-पुत्री संघमित्रा व महेंद्र यहाँ लेकर आये थे ( लगभग ३०० बीसी )एवं बोद्ध धर्म स्थापित किया था |
४.कुट्टम -पोकुना --- बहुत बड़े बड़े १७ फीट गहरे दो जल संग्रह के पक्के तालाब हैं --जिन्हें प्राचीन लंका का ( ९ सेंचुरी एडी  -किंग कसापा द्वारा ) हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग का नायाब नमूना कहा जाता है | लगे हुए साइनबोर्ड के अनुसार यह अभयगिरिया के बौध भिक्षुओं के लिए  बनाया गया है ,परन्तु नाग-मूर्ति एवं कलश बने होने से यह हिन्दू, नाग राजा द्वारा बनबायी हुए लगती हैं |यह बौद्ध भिक्षुओं के स्नान आदि हेतु  प्रयोग होते थे|  परन्तु इतने गहरे तालाब मानव की बजाय हाथियों ( राजा के )के स्नान  एवं नगर की जल-व्यवस्था हेतु ही हो सकते हैं |
कुटटम-पोकुना
५. अनुराधापुर -अभय गिरिया  फारेस्ट-----  रतन प्रासाद -- सात मंजिला भवन के अवशेष हैं जो नागराजा किंग करेन टिस्सा १६४ एडी द्वारा निर्मित  राज महल हैं, गहन वन में समीप ही तमाम भवनों के सिर्फ खम्भे ही खड़े हुए मिलते हैं जो किसी प्राचीन  नगर का आभास कराते हैं जहां समीप ही पत्थर के एक विशाल  कटोरेनुमा वर्तन जिसे भिक्षुओं के खाने के  राईस-बाउल कहा जाता है जो ५०००  भिक्षु  एक साथ खा सकते थे समीप ही बनी हुई कथित  रसोई आदि का भाग है जो किसी बड़े शिक्षा-स्थल या नगर  का भाग है | कथित   रूप में ये बौद्ध -भिक्षुओं के निवास थे  परन्तु समीपवर्ती गार्ड-स्टोन नामक  मूर्ति  हाथ में कलश, शेषनाग शीर्ष , धनुष आदि की उपस्थिति से हिन्दू मंदिर के द्वारपालों की मूर्तियाँ   या शेषफण विष्णु  या अमृत-कुम्भ  लिए इंद्र  प्रतीत होती है जो हिन्दू-नाग या यक्ष राजाओं द्वारा निर्मित की गयीं तत्पश्चात बौद्ध पंथ द्वारा प्रयोगार्थ अधिग्रहीत | अर्ध-चंद्राकार  मून-स्टोन .. जो प्रायः पैरदान की भांति मंदिरों के प्रवेश द्वार पर प्राप्त होते हैं ..संसार को पार करके चौपाये = संसार, नाग-पुष्प-पत्ती  आदि = द्वंद्व , हंस-पक्षी = ध्यान भाव , अन्तिम  कमल = बुद्धत्व व मोक्ष --बुद्धत्व या ध्यान-दर्शन-मोक्ष  की और चलना को प्रदर्शित करते हैं|
गार्ड-स्टोन या विष्णु की मूर्ति
रतन प्रासादके अवशेष

महा राईस बाउल
मून-स्टोन