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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

सत्य शुचि आचरण जरूरी है .....जीवन दृष्टि ..से ..डा श्याम गुप्त ..

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..


                              आजकल धर्म व सेवा कार्यों की बाढ़ सी आगई है, कोइ एक लाख पेड़ लगवाता है, कोइ पशुओं की संवेदना-सुरक्षा, कोइ जल-वायु, पर्यावरण की चिंता, कोइ भ्रष्टाचार पर भाषण, कोइ धार्मिक श्रृद्धा जागरण, कोइ देश-जाति सम्मान पर विचार-सेवाएं देने को आतुर-तत्पर है |
                            परन्तु मेरे विचार में ये सब कृतित्व पत्तियों, फल-फूल , शाखाओं आदि पर जल छिड़कने के समान हैं | मानव समाज व जीवन का मूल -मानव आचरण में है, जब तक मानव मात्र का आचरण संवर्धन नहीं होगा कोई भी कार्य सम्पूर्ण नहीं होसकता, संसार के द्वंद्व कम  नहीं होंगे  |
                         ठीक है पत्तियों शाखाओं आदि पर संवर्धन-छिडकाव आदि भी आवश्यक है | परन्तु मानव आचरण सुधार की बात मूल अत्यावश्यक तत्व है | इसके सुधरते ही सब कुछ ठीक होने लगता है .....प्रस्तुत है एक रचना ----

    सत्य शुचि आचरण जरूरी है .....

न कोई नीति नियम, न कोई रीति धरम,
न कोई योग करम शास्त्र ही जरूरी है |
न कीर्तन न भजन, न ज्ञान का प्रवचन,
न कोई तीर्थ न दान-पुण्य जरूरी है |

बात हो अनय-अनीति के समापन की |
या कि सद्नीति- नय के स्थापन की |
एक ही नीति-नियम सर्वदा सनातन है |
सत्य शुचि आचरण मनुज का जरूरी है |

बात चाहे हो दहेज़ के संचारण की |
बात पत्नी के हो दाह की, प्रतारण की |
बात हो चाल-चलन की, अशुभ विचारण की |
सत्य शुचि आचरण मनुज का जरूरी है |

भ्रष्ट आचरण आचार व तन मन से हुए |
भूलकर देश धरम, लिप्त निज स्वार्थ हुए |
कैसे भर पायं स्वयं खोदे हुए अंधे कुए |
सत्य शुचि आचरण मनुज का जरूरी है |

संस्थाएं, नीति-नियम,शास्त्र व समाज सभी ,
जड़, निर्जीव व अविचारी हुआ करते हैं |
जीव, मानव ही तो सोच समझ पाता है ,
सत्य शुचि आचरण मनुज का जरूरी है ||

 

सोमवार, 18 जुलाई 2016

इतना तो खतावार हूँ मैं.... जीवन दृष्टि काव्य संग्रह से.....डा श्याम गुप्त....

           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


इतना तो खतावार हूँ मैं....  जीवन दृष्टि काव्य संग्रह से.....


न कहो कवि या शब्दों का कलाकार हूँ मैं,
दिल में उठते हुए भावों का तलबगार हूँ मैं ||

काम दुनिया के हर रोज़ चला करते हैं,
साज जीवन के हर रोज़ सजा करते हैं|
शब्द रस रंग सभी उर में सजे होते हैं,
ज्ञान के रूप भी हर मन में बसे होते हैं |
भाव दुनिया के हवाओं में घुले रहते हैं,
गीत तो दिल की सदाओं में खिले रहते हैं |

उन्हीं बातों को लिखा करता, कलमकार हूँ मैं,
न कहो कवि या शब्दों का कलाकार हूँ मैं ||

प्रीति की बात ज़माने में सदा होती है,
रीति की बात पै दुनिया तो सदा रोती है |
बदले इंसान व तख्तो-ताज ज़माना सारा,
प्यार की बात भी कब बात नई होती है |
धर्म ईमान पै कुछ लोग सदा कहते हैं,
देश पै मरने वाले भी सदा रहते हैं |

उन्हीं बातों को कहा करता कथाकार हूँ मैं ,
न कहो कवि या शब्दों का कलाकार हूँ मैं ||

बात सच सच मैं जमाने को सुनाया करता,
बात शोषण की ज़माने को बताया करता |
धर्म साहित्य कला देश या नेता कोई ,
सब की बातें मैं जन जन को सुनाया करता |

लोग बिक जाते हैं, उनमें ही रंग जाते हैं,
भूलकर इंसां को सिक्कों के गीत गाते हैं|
बिक नहीं पाता, इतना तो खतावार हूँ मैं,
दिल की सुनता हूँ, इसका तो गुनहगार हूँ मैं|

न कहो कवि या शब्दों का कलाकार हूँ मैं,
दिल में उठते हुए भावों का तलबगार हूँ मैं ||


 

एक नियम है इस जीवन का ....( शीघ्र प्रकाश्य -जीवन दृष्टि -गीत संग्रह से ...)..डा श्याम गुप्त....

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..




एक नियम है इस जीवन का ....( शीघ्र प्रकाश्य -जीवन दृष्टि -गीत संग्रह से ...)

एक नियम है इस जीवन का,
जीवन का कुछ नियम नहीं है ।
एक नियम जो सदा-सर्वदा,
स्थिर है, परिवर्तन ही है |


पल पल, प्रतिपल परिवर्तन का,
नर्तन होता है जीवन में |
जीवन की हर डोर बंधी है,
प्रतिपल नियमित परिवर्तन में |

जो कुछ कारण-कार्य भाव है,
सृष्टि, सृजन ,लय, स्थिति जग में |
नियम व अनुशासन,शासन सब,
प्रकृति-नटी का नर्तन ही है |

विविधि भाँति की रचनाएँ सब,
पात-पात औ प्राणी-प्राणी |
जल थल वायु उभयचर रचना ,
प्रकृति-नटी का ही कर्तन है |

परिवर्धन, अभिवर्धन हो या ,
संवर्धन हो या फिर वर्धन |
सब में गति है, चेतनता है,
मूल भाव परिवर्तन ही है |

चेतन ब्रह्म, अचेतन अग-जग ,
काल हो अथवा ज्ञान महान |
जड़-जंगम या जीव सनातन,
जल द्यौ वायु सूर्य गतिमान |

जीवन मृत्यु भाव अंतर्मन,
हास्य, लास्य के विविधि विधान |
विधिना के विविधान विविधि-विधि,
सब परिवर्तन की मुस्कान |

जो कुछ होता, होना होता ,
होना था या हुआ नहीं है |
सबका नियमन,नियति,नियामक .
एक नियम परिवर्तन ही है ||

.

अनुबंधित सम्बन्ध ----काव्य संग्रह 'जीवन दृष्टि से....डा श्याम गुप्त....

       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



अनुबंधित सम्बन्ध ----काव्य संग्रह 'जीवन दृष्टि से....

अनुबंधों के जग में अब,
क्या संबंधों की बात करें |
स्वार्थ न तुझसे कोई है तो-
अपने ही प्रतिघात करें |


अनुबंधों के जग में अब,
क्या संबंधों की बात करें ||

आज नहीं परमार्थ भाव से ,
साथ किसी का कोई देता |
दो हाथों से लेलेता है,
एक हाथ से यदि कुछ देता |

रिश्ते नाते स्वार्थ भरे हैं ,
सब क्यों तुझको पूछ रहे |
तेरी दौलत ,धन, ऊंचाई ,
माप तौल कर बूझ रहे |

तेरे हैं अनुबंध बहुत संग,
फिर क्यों ना संवाद करें ||

हमने तो देखा है यह जग,
बहुत दूर से, बहुत पास से |
हमने पूछ के, सुनके देखा,
सभी आम से, सभी ख़ास से |

जिसको तुझसे लाभ मिल रहा,
तुझको अपना मानेंगे |
तू निष्प्रह, निष्पक्ष भाव तो,
क्यों तुझको सम्मानेंगे ।

उनके स्वार्थ में साथ न दे तू,
फिर क्यों तुझे सलाम करें ||

पिता पुत्र माँ पत्नी पुत्री,
सखा सखी साथी कर्मी |
सारे प्रिय सम्बन्ध, प्रीतिरस,
अपने ही हित के धर्मी |

तू हित साधन जब तक होगा,
प्रीति रीति तब तक होगी |
अनुचित कर्मों के तेरे फल-
का न कोई होगा भोगी |

क्यों न भला फिर, मन के-
सच्चे संबंधों की बात करें |

मानव, ईश्वर, भक्ति, न्याय-
सत अनुबंधों की बात करें |
अनुबंधों के जग में अब -
क्या संबंधों की बात करें ||

 

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

गुरुवासरीय गोष्ठी दी.७-७-१६...डा श्याम गुप्त ...


....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                                          गुरुवासरीय गोष्ठी 

                         जुलाई माह की प्रथम गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ७जुलाई २०१६ गुरूवार को डा श्याम गुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर आयोजित हुई ,जिसमें साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, कवियत्री श्रीमती नलिनी खन्ना एवं कविवर शिव मंगल सिंह मंगल, अशोक विश्वकर्मा गुंजन, डा श्रीकृष्ण सिंह अखिलेश, मुरली मनोहर कपूर निर्दोष, बसंत राम दीक्षित, श्रीमती सुषमा गुप्ता एवं डा श्याम गुप्त ने अपनी रचनाओं से भाव विभोर किया |
                           गोष्ठी में श्रीमती नलिनी खन्ना, डा श्याम गुप्त व श्रीमती सुषमा गुप्ता को श्रीमती शीलावंती एवं श्री संतराम कपूर स्वतन्त्रता सेनानी स्मृति मंच द्वारा सम्मानित किया गया एवं अ.भा अगीत परिषद् द्वारा उसके आयोजन ‘ मधुर गीतों की एक शाम, मधु-चंद्रहास के नाम’..के उपलक्ष में प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया | 

                      गोष्ठी का प्रारम्भ डा श्याम गुप्त ने माँ की वन्दना से किया |

            अशोक विश्वकर्मा ने दर्द के सहने का आभास देते हुए कहा—
दुनिया में अकेला चलना सीख लिया |
दूसरों के दिए दर्द को सहना सीख लिया |

            मुरली मनोहर कपूर ने दिल को जलाने की बात की ---
हम चराग प्यार का हमेशा जला के रखते हैं|
गर न हों चराग तो दिल को जलाके रखते हैं|

                      डा नलिनी खन्ना ने कलम की महत्ता वर्णित करते हुए कहा—
कलम शक्ति युत मानिए, कलम सब सार लिख देती है |
कलम तकदीर लिख देती है, कलम तस्वीर लिख देती है |

                         कारे कारे बदरा ...का सुन्दर सस्वर प्रस्तुत करते हुए हुए डा शिव मंगल सिंह मंगल ने गाया –
बदरा घिर रहे कारे कारे, कैसे जे मतवारे |
संग हवा के बहे जाय रहे, जैसे पर्वत कारे |

             चौके की खटपट के साथ गीत रचना की वास्तविकता की बात श्रीमती सुषमा गुप्ता ने बड़े सुन्दर ढंग से सस्वर प्रस्तुत की –
मन में प्रिय रागिनी बसी हो,
गीत लवों पर आजाता है |

              डा श्याम गुप्त ने वर्षा गीत की निम्न पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं---
झरर झरर झर, जल वरसावे मेघ ,
टप टप बूँद गिरें, भीजे रे अंगनवा हो ..
आई रे बरखा बहार, आये न सजना हमार |

        संयम की उंगली पकडे, पर अंतर्मन वनवास’
         रात भर जागे हम |          ---से डा श्रीकृष्ण अखिलेश जी ने अपना गीत गुनगुनाया |

                  डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने मचलकर अपना यादों भरा गीत सुनाया—
‘मचल मचल बरस रहे यादों के घन...’

                           गोष्ठी के अंत में स्वल्पाहार के उपरांत श्रीमती सुषमा गुप्ता ने सभी विज्ञजनों का आभार प्रकट किया |


चित्र में ----१. श्रीमती सुषमा गुप्ता का सम्मान.-..२.डा श्याम गुप्त का सम्मान.-मुरली मनोहर कपूर ,अशोक विश्वकर्मा, डा सत्य व डा नलिनी खन्ना ..३.व ४. डा नलिनी खन्ना का सम्मान...५.गोष्ठी क्रम -डा श्याम गुप्त का काव्य पाठ .-बसंत राम दीक्षित, शिवमंगल सिंह, डा अखिलेश, डा नलिनी खन्ना, डा सत्य, मुरली मनोहर कपूर व अशोक विश्वकर्मा व ..६.सुषमाजी का काव्य पाठ...७.आमंत्रित अतिथि डा नलिनी खन्ना का काव्य पाठ एवं विशिष्ट आमंत्रित अतिथि डा रंगनाथ मिश्र सत्य .....८शिव मंगल सिंह का काव्य पाठ...९. बसंत राम दीक्षित का काव्य पाठ...
Drshyam Gupta's photo.
श्रीमती सुषमा गुप्ता का सम्मान.
Drshyam Gupta's photo.

श्रीमती सुषमा गुप्ता का काव्यपाठ



बसंत राम दीक्षित का काव्य पाठ

शिवमंगल सिंह का काव्य पाठ
Drshyam Gupta's photo.
डा नलिनी खन्ना का सम्मान
Drshyam Gupta's photo.
 डा श्याम गुप्त का सम्मान.-मुरली मनोहर कपूर ,अशोक विश्वकर्मा, डा सत्य व डा नलिनी खन्ना


डा नलिनी खन्ना का काव्य पाठ

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

आर्य नामकरण -- डा श्याम गुप्त ...

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 



                                                   आर्य नामकरण 
                   भारत में आर्य जन एवं भारत का नाम आर्यावर्त क्यों हुआ इस पर प्रायः प्रश्न उठाते रहे हैं | अधिकांशतः आर्य शब्द को संस्कारित व्यक्तियों का समूह अर्थात गुणवाचक शब्द माना जाता है | कोइ ईरान -आर्यान की बात कहता है | वस्तुतः आर्य शब्द का उद्गम प्राचीन वैदिक देवता अर्यमा से हुआ है |

          अर्यमन या अर्यमा या अर्यमान प्राचीन हिन्दू धर्म के एक देवता हैं जिनका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। वे अदिति के तीसरे पुत्र हैं और आदित्य नामक सौर-देवताओं में से एक हैं। आकाश में आकाश गंगा उन्हीं के मार्ग का सूचक माना जाता है। 

      अर्यमा-- अदिति-कश्यप के पुत्र हैं एवं १२ आदित्यों में से एक आदित्य हैं | जो इस प्रकार थे -विवस्वान्,  अर्यमा,  पूषा,  त्वष्टा,  सविता,  भग,  धाता,  विधाता,  वरूण, मित्र,  इन्द्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन-विष्णु)

    सूर्य से सम्बन्धित इस देवता का अधिकार प्रात-रात्रि के चक्र पर माना जाता है। द्वादश आदित्यों में से एक जो बैशाख माह में उदय होते हैं जिनकी किरणों की संख्या ३०० मानी जाती है | हिन्दू विवाहों में वर-वधु उन्हें भी साक्षी मानकर विवाह-प्रण लेते हैं।

अर्यमा सूर्य का ध्यान मन्त्र ----
अर्यमा पुलहोऽथोर्ज: प्रहेति: पुंजिकस्थली।
नारद: कच्छनीरश्च नयन्त्येते स्म माधवम्।।1।।

मेरुश्रृंगान्तरचर: कमलाकरबान्धव:।
अर्यमा तु सदा भूत्यै भूयस्यै प्रणतस्य मे।।2।। --ऋग्वेद १०/१२६

       वैशाख मास में सूर्य अर्यमा नाम से विख्यात हैं तथा पुलह ऋषि, उर्ज यक्ष, पुंजिकस्थली अप्सरा, प्रहेति राक्षस, कच्छनीर सर्प और नारद नामक गन्धर्व के साथ अपने रथ पर निवास करते हैं। मेरु पर्वत के शिखर पर भ्रमण करनेवाले तथा कमलों के वन को विकसित करनेवाले भगवान् अर्यमा मुझ प्रणाम करनेवाले का सदा कल्याण करें। अर्यमा सूर्य दस सहस्त्र किरणों के साथ तपते हैं तथा उनका पीत वर्ण है।
             "अर्यमा" के लिये अन्य नाम ---आकाश गंगा,  पितृपति,  पितृनाथ,  विष्णुः,  समकक्ष, अर्यमा,  आदित्य,  पितृ प्रधान,  घनिष्ठ मित्र,  सूर्य ...

           
भारतीय  महीनों के हिसाब से सूर्य के नाम हैं - चैत्र मास में धाता, वैशाख में अर्यमा, ज्येष्ठ में- मित्र, आषाढ़ में वरुण, श्रावण में- इंद्र, भाद्रपद में- विवस्वान, आश्विन में पूषा, कार्तिक-पर्जन्य, मार्गशीर्ष में-अंशु, पौष में- भग, माघ में- त्वष्टा एवं फाल्गुन में विष्णु। इन नामों का स्मरण करते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है।
        विश्व के संचालन में यम,  अर्यमा एवं इंद्र का हाथ है। इनमें से इहलोक पर यम का अधिराज्य होता है। पितृलोक पर अर्यमा का और देवलोक पर इंद्र का अधिपत्य रहता है। प्रारंभ में इहलोक पर पूर्ण रूप से यम का आधिपत्य था अतः मनुष्यों के लिए अनुशासन को यम-नियम कहा गया | तत्पश्चात ब्रह्मा जी ने यम को यमलोक व मृतकों का एवं मनु को पृथ्वीलोक व मनुष्यों का अधीक्षक बनाया और वे मानव कहलाये|
         अर्यमा का सामान्य अर्थ साथी, सहयोगी होता है, ये आदर-सत्कार-सेवाभाव  (होस्पीटेलिटी—जो मानव के स्वाभाविक गुण हैं ) के वैदिक देवता हैं जिनका नाम मुख्यतया वरुण व मित्र (सूर्य) के साथ लिया जाता है | 
यूयं विश्वं परि पाथ वरुणो मित्रो अर्यमा |
युष्माकंशर्मणि परिये सयाम सुप्रणीतयो अति दविष: ||.. ऋग्वेद १०/१२६
       इन्द्र- ऐश्वर्य, शक्ति, प्रगति और विजय सूचक देता है। वरुण- पाप विमोचक शक्ति का आदर्श प्रस्तुत करते हैं| मित्र- मैत्री व आपसी स्नेह तथा अर्यमा- उंच-नीच विभेद व्यवहार और न्यायाकारिता, उवर्रता के देवता हैं | अच्छे मानव में ये गुण होना अनिवार्य है तभी वह आर्य कहलाने योग्य है |
          ऐश्वर्य प्राप्ति के देवता अर्यमा----. मित्रस्यार्यम्णः मकथा राधाम सखाय स्तो | महि प्सरो वरुणस्य ॥७॥---हे मित्रो! मित्र, अर्यमा और वरुण देवो के महान ऐश्वर्य साधनो का किस प्रकार वर्णन करें ? अर्थात इनकी महिमा अपार है॥७॥
    ।ॐ अर्यमा न त्रिप्य्ताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः।...ॐ मृत्योर्मा अमृतं गमय।।

       पितरों में अर्यमा श्रेष्ठ है। अर्यमा पितरों के देव हैं। अर्यमा को प्रणाम। हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारम्बार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें |
गीता अध्याय-10 श्लोक-29 में कृष्ण कहते हैं --
 अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
 पितृणामर्यमा चास्मि यम: संयमतामहम् ।।29।।-- पितरों में अर्यमा अर्यमा नामक पित्रेश्वर हूँ |

     इनकी गणना नित्य पितरों में की जाती हैं। जड़-चेतनमयी सृष्टि में, शरीर का निर्माण नित्य पितृ ही करते हैं। इनके प्रसन्न होने पर पितरों की तृप्ति होती है। श्राद्ध के समय इनके नाम से जल दान दिया जाता है। यज्ञ में मित्र (सूर्य) तथा वरुण (जल) देवता के साथ स्वाहा का 'हव्य' और श्राद्ध में स्वधा का 'कव्य' दोनों स्वीकार करते हैं।

          पितृलोक के अधिष्ठातृ देवता अर्यमा श्राद्ध कर्म में उपस्थित रहते हैं। श्राद्ध के निमित्त प्राप्त हविर्भाग वसु रूद्र  आदित्य स्वरूप सभी पितरों को पहुंचाने की जिम्मेदारी अर्यमा की होती है। कई बार वसु रूप में निहित आत्मा पुनर्जम लेकर फिर से मर्त्य लोक में अवतरित होता है। ऎसे में मृत व्याक्ति को उद्देश्य कर किया गया श्राद्ध कर्म पितरों के देवता अर्यमा को प्राप्त होता है। अर्यमा उस श्राद्ध कर्म का फल अब पुनर्जन्म पाई आत्मा के हवाले कर देता है। यदि किसी के पिता के पुनर्जन्म लेने की बात सिद्ध हुई तो भी उस पिता को उद्देश्य कर श्राद्ध करना आवश्यक माना जाता है। श्राद्ध में जो पिता पितृ रूप में प्रत्यक्ष उपस्थित नहीं हुआ तो भी उसके प्रतिनिधि के रूप में अर्यमा की उपस्थिति वहां रहती है।
 
        पितरों का आगमन-- अमावस्या तिथि का महत्व -सूर्य की सहस्त्रों किरणों में जो सबसे प्रमुख है उसका नाम 'अमा' है। उस अमा नामक प्रधान किरण के तेज से सूर्य त्रैलोक्य को प्रकाशमान करते हैं। उसी अमा में तिथि विशेष को चन्द्र (वस्य) का भ्रमण होता है तब उक्त किरण के माध्यम से चंद्रमा के उर्ध्वभाग से पितर धरती पर उतर आते हैं इसीलिए श्राद्धपक्ष की अमावस्या तिथि का महत्व भी है। अमावस्या के साथ मन्वादि तिथि, संक्रांतिकाल व्यतीपात, गजच्दाया, चंद्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण इन समस्त तिथि-वारों में भी पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध किया जा सकता है।   

तत सु नः सविता भगो वरुणो मित्रो अर्यमा |   इन्द्रो नो राधसा गमत ||
वय अर्यमा वरुणश चेति पन्थाम इषस पतिः सुवितं गातुम अग्निः

इन्द्राविष्णू नर्वद उ षु सतवाना शर्म नो यन्तम अमवद वरूथम || --ऋग्वेद ४/५५
आ नो बर्ही रिशादसो वरुणो मित्रो अर्यमा | सीदन्तु मनुषो यथा| -ऋक १/२६

प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम्।
यस्मिन्निन्द्रो वरूणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे।। ..ऋग्वेद १/४०/५ 

      'सचमुच परमात्मा और ब्रह्मज्ञानी महापुरुष ही स्पष्ट एवं प्रशंसनीय मार्गदर्शन देते हैं। उनके मार्गदर्शन में इन्द्र, वरूण, मित्र और अर्यमा देवों का निवास होता है।'---(ऋग्वेदः1.40.5) 
       वेद भगवान के अनुसार ब्रह्मज्ञानी गुरु के मार्गदर्शन में इन्द्र, वरुण, मित्र और अर्यमा देवों का मार्गदर्शन भी निहित होता है।
-----ब्रह्मज्ञानी महापुरुष के मार्गदर्शन में उपर्युक्त सभी प्रकार की सीख स्वतः समाविष्ट होती है।

         सम्पूर्ण विश्व के संचालक -प्रमुख 33 देवता ये हैं:- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और इन्द्र व प्रजापति को मिलाकर कुल 33 देवी और देवता होते हैं। कुछ लोग इन्द्र और प्रजापति की जगह 2 अश्विनी कुमारों को रखते हैं। प्रजापति ही ब्रह्मा हैं। 12 आदित्यों में से एक विष्णु हैं और 11 रुद्रों में से एक शिव हैं। उक्त सभी देवताओं को परमेश्वर ने अलग-अलग कार्य सौंप रखे हैं।
         अर्यमा का सामान्य अर्थ साथी, सहयोगी होता है, ये आदर-सत्कार-सेवाभाव  (होस्पीटेलिटी—जो मानव के स्वाभाविक गुण हैं ) अर्यमा- उंच-नीच विभेद व्यवहार और न्यायाकारिता, उवर्रता के देवता हैं | अच्छे मानव में ये गुण होना अनिवार्य है तभी वह आर्य कहलाने योग्य है | हिन्दू विवाहों में वर-वधु उन्हें भी साक्षी मानकर विवाह-प्रण लेते हैं।
       इसप्रकार आर्य जाति व देश का नाम – पृथ्वी के देव पितृव्य के लोक के अधीक्षक अर्यमा के नाम पर हुआ --
          
                     तदुपरांत  महाराजा पृथु के पुत्र द्राविड़ जो भारत के दक्षिण क्षेत्र के राजा हुए उनके नाम पर इस देश का नाम द्रविड़ देश  भी हुआ | महा-जलप्रलय के समय वाले वैवस्वत मनु को द्रविड़ देश का राजा सत्यव्रत कहा गया है | अर्थात  आर्य भारत देश में स्थित श्रेष्ठ कर्म रत मानवों का समूह था | द्रविड़ देश भारत का ही नाम था | बाद में स्वयं की स्वतंत्र पहचान हेतु दक्षिण भारत स्थित  राजा द्राविड़ के वंशज स्वयं को द्रविड़ कहने लगे होंगे |