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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

यक्ष-प्रश्न ...कहानी ...डा श्याम गुप्त...

                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


.                         यक्ष-प्रश्न ...कहानी
        पुष्पाजी अपनी महिला मंडली के नित्य सायंकालीन समागम से लौटकर आयें तो कहने लगीं,’ आखिर राम ने एक धोबी के कहने पर सीताजी को वनबास क्यों देदिया? क्या ये उचित था |

       क्या हुआ? मैंने पूछा, तो कहने लगीं,’ आज पर्याप्त गरमा-गरम तर्क-वितर्क हुए| शान्ति जी कुछ अधिक ही महिलावादी हैं, इतना कि वे अन्य महिलाओं के तर्क भे नहीं सुनतीं | उनका कहना है कि पुरुष सदा ही नारी पर अत्याचार करता आया है | मेरे कुछ उत्तर देने पर बोलीं कि अच्छा तुम डाक्टर साहब से पूछ कर आना इनके उत्तर | वे तो साहित्यकार हैं और नारी-विमर्श आदि पर रचना करते रहते हैं | वे आपसे भी बात करना चाहती हैं |

      क्यों नहीं ,मैंने कहा , अवश्य, कभी भी |

      दूसरे दिन ही तेज तर्रार शान्ति जी प्रश्नों को लेकर पधारीं, साथ में अन्य महिलायें भी थीं | बोलीं ‘क्या उत्तर हैं आपके इन परिप्रेक्ष्य में ?  मैंने कहने का प्रयत्न किया कि एसा नहीं है, राम शासक थे और.....वे तुरंत ही बात काटते हुए कहने लगीं ,’ राम राजा थे..प्रजा के हित में व्यक्तिगत हित का परित्याग, लोक-सम्मान आदि..... ये सब मत कहिये, घिसी-पिटी बातें हैं, बेसिर-पैर की...पुरुषों की सोच की ...| कुछ महिलाओं ने कहा भी कि पहले उनकी बात तो सुनिए, परन्तु वे कहती ही गयीं, आखिर नारी ही क्यों सारे परीक्षण भोगे, पुरुष क्यों नहीं?

      मैंने प्रति-प्रश्न किया, अच्छा बताइये, क्या एक स्त्री के कहने पर राम-वनबास... क्या स्त्री का पुरुष पर अत्याचार नहीं था| पुरुष तो कभी ये प्रश्न नहीं उठाते, क्यों | प्रश्न उठते भी हैं तो... हाय, विरुद्ध विधाता....आज्ञाकारी पुत्र ..में दब कर रह जाते हैं| विवाह सुख भोगते राम को ठेल दिया वनबास में और दशरथ को मृत्युलोक में | क्या स्त्री पर पुरुषों को प्रश्न उठाने का अधिकार नहीं है ?

      शान्ति जी कुछ ठिठकीं परन्तु हतप्रभ नहीं हुईं, बोलीं, तो आप मानते हैं कि जैसे राम पर अत्याचार हुआ वैसे ही सीता पर भी अग्नि-परिक्षा व सीता त्याग रूपी अत्याचार –अन्याय हुआ, तो राम पुरुषोत्तम क्यों हुए ?

      क्या आप समझती हैं कि राम को कष्ट नहीं हुआ होगा यह निर्णय लेते हुए, मैंने कहा, पत्नी-सुख वियोग एवं आत्म-ग्लानि की दो-दो पीडाएं झेलना कम दुःख होगा | वे चाहते तो दूसरा विवाह कर सकते थे, परन्तु नहीं सामाजिक परिवर्तन की उस युग-संधिबेला पर राम एक उदाहरण, एक मर्यादा स्थापित करना चाहते थे –प्रत्येक स्थित-परिस्थिति में एक पत्नीव्रत की |

       तो उन्होंने स्वयं वनबास क्यों नहीं लेलिया, साथ में बैठी प्रीति जी ने पूछ लिया |

       तो फिर एक पत्नीव्रत मर्यादा कैसे स्थापित होती, और वे कायर कहलाते| समस्या समाधान से पलायन करने वाला भगोड़ा, कापुरुष राजा | सीता को यह कब मान्य था अतः उन्होंने स्वयं ही निर्वासन को चुना| पति का अपमान प्राय: पत्नी को स्वयं का ही अपमान प्रतीत होता है, क्या यह सही नहीं है, मैंने कहा| सब चुप रहीं |

      सीता ने स्वयं ही निर्वासन को चुना...ये नया ही बहाना गढ़ लिया है आपने, वाह!... शान्ति जी ने कहा |

       मैंने पुनः प्रयास किया, ‘वास्तव में जैसे राम का वनगमन एक राजनीति-सामाजिक कूटनीति का भाग था वैसे ही सीता-वनबास भी विभिन्न नीतिगत राजनीति के कार्यान्वन का भाग थे |

       कैसे ! वे बोल पडीं |

       देखिये मैंने कहा, कुछ विद्वानों का मत है कि सीता-वनबास हुआ ही नहीं, क्योंकि तुलसी की रामचरित मानस एवं महाभारत के रामायण प्रसंग में इस घटना का रंचमात्र भी उल्लेख नहीं है, अतः बाल्मीक रामायण में यह प्रसंग प्रक्षिप्त है, बाद में डाला गया, राम को बदनाम करने हेतु| परन्तु मेरे विचार से जन-श्रुतियां, लोक-साहित्य व स्थानीय प्रचलित कथाये आदि में कुछ अनकही बातें अवश्य होती हैं जो लोक-स्मृति में रह जाती हैं| जिन्हें पात्र की महत्ता व संगति से विपरीत मानकर सामाजिक-साहित्यकार-रचनाकार छोड़ भी सकते हैं|

       वस्तुतः राम एक अत्यंत ही नीति-कुशल राजनैतिज्ञ थे| समस्त भारत की शक्तियों का ध्रुवीकरण करके अयोध्या व भारतवर्ष को अविजित शक्ति का केंद्र बनाना उनका ध्येय था | पूरे भारत में उन्होंने अपनी मित्रता, कूटनीति, धर्माचरण व शक्ति-पराक्रम के बल पर शक्तियां एकत्रित कीं| वनांचल के तमाम स्थानीय कबीले, वनबासी शासक, आश्रम व ऋषि, मुनि अस्त्र-शस्त्रों व शक्ति के केंद्र थे | विश्वामित्र, वशिष्ठ, अगस्त्य, भारद्वाज सभी ने राम को अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये, परेंतु महर्षि बाल्मीकि जो बहुत बड़े शक्ति के केंद्र थे, उन्होंने सिर्फ आशीर्वाद दिया ..अस्त्र-शस्त्र नहीं | जैसा मानस में पाठ है....

              मुनि कहँ राम दण्डवत कीन्हा। आसिरवादु विप्रवर दीन्हा।।

     वाल्मीकि जी ने आशीर्वाद तो दिया किन्तु दिव्यास्त्रों के भण्डार का नाम तक नहीं लिया। अतः लंका विजय अर्थात समस्त भारतीय भूभाग का ध्रुवीकरण के पश्चात सिर्फ अयोध्या के निकटवर्ती वाल्मीकि आश्रम ही शक्ति का केंद्र बच गया था| राम ने सोचा, यह भण्डार अब व्यर्थ  है इसका सदुपयोग होना चाहिए। उसी वन के समीप सीता को प्रेषित किया, जहाँ महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। राम का यह कृत्य महर्षि को अच्छा नहीं लगा। महर्षि ने साध्वी सीता को संरक्षण दिया। महर्षि ने उनके माध्यम से राम को सबक सिखाने का निश्चय कर, लव व कुश को दिव्यास्त्रों का संचालन सिखाया। समस्त शस्त्र-शास्त्र उन्हें सौंप कर अयोध्या से लड़ने योग्य बनाया| माँ के लाड़-प्यार व संरक्षण में और महर्षि के कुशल निर्देशन में पल्लवित बच्चे अश्वमेध के घोडे को पकड़ने के प्रकरण में विश्व-विजयी अयोध्या की समस्त सेना को हराने में सफल हुए| इस युद्ध में लंका-विजयी शूरवीरों के दर्प व उनकी शक्तियों का भी दलन हुआ जो राम की कूटनीति का भाग था| इस प्रकार राम व सीता ने परस्पर सहयोग, सामंजस्य व कूटनीति से अपने पुत्रों को भी महलों के राजसी विलास, लंका-विजयी विश्व-विख्यात महान सम्राट राजा रामचंद्र के प्रभामंडल के दर्प से दूर वनांचल में ज्ञानी ऋषियों-मुनियों छत्र-छाया में पालन-पोषण का प्रवंध कर दिया ताकि वे सर्व-शक्तिमान बन कर उभरें|

        ये त्याग की पराकाष्ठाएं हैं | इसीलिये  राम,राम हैं....सीता, सीता| त्याग, तप, धैर्य व कष्टों में तपकर ही तो व्यक्ति महान होता है| यदि राम-वनबास नहीं होता तो कौन जनता राम को, लक्ष्मण को, वे सिर्फ एक राजा होकर रह जाते, न इतिहास पुरुष होते, न पुरुषोत्तम न प्रभु राम|

       कृष्ण-राधा के त्याग तप ने ही उन्हें श्रीकृष्ण व श्रीराधिका जी बनाया अन्यथा कौन पूछता सीता को कौन राधा को...वे भी श्रीकृष्ण की एक और रानी या किसी अन्य पात्र की पत्नी बन कर इतिहास में गुम हो जातीं |  

      तो आपका मत है कि सीता के साथ कोइ अन्याय नहीं हुआ, शान्ति जी जल्दी-जल्दी बोलीं, ये सारे प्रश्न निरर्थक हैं?

      आप लोग यह बताइये, मैंने भी प्रश्न पूछ लिया, कि क्या सीता के काल-खंड में विदुषी स्त्रियाँ नहीं थीं, उन्होंने ये प्रश्न क्यों नहीं उठाये? विज्ञ, पढी-लिखी, विदुषी, बीर-प्रसू, शस्त्र-शास्त्र कुशल तीनों माताएं; कैकयी जैसी युद्धकुशल, नीतिज्ञ, देवासुर संग्राम में दशरथ की रथ-संचालिका एवं सहायिका ने ये प्रश्न क्यों नहीं उठाये? सीता की अन्य तीनों बहनों ने क्यों नहीं उठाये?

      यदि उठाये भी होंगें तो हमें कैसे ज्ञात होगा, वे कहने लगीं, पुरुष दंभ व राजाज्ञा में दबा दिए गए होंगे |

      उसी प्रकार जैसे सीता पर अत्याचार के तथ्य आपको ज्ञात हैं, मैंने स्पष्ट किया, अन्यथा हमें क्या पता कोई राम-सीता थे भी या नहीं, सीता वनबास हुआ भी था या नहीं | फिर तो सारे प्रश्न ही निरर्थक होजाते हैं|

       और अग्नि-परिक्षा का क्या औचित्य है आपके अनुसार | प्रीति जी ने पूछा |  

       आपने रामचरित मानस तो कई बार पढी होगी| ध्यान दें ,जब राम कहते हैं...

           “तुम पावक महं करहु निवासा, जब लगि करों निशाचर नासा |

           जबहिं राम सब कहा बखानी, प्रभु पद हिय धरि अनल समानी| 

           निज प्रतिबिम्ब राखि तहं सीता, तैसेहि रूप सील सुविनीता | “   ...अरण्यकाण्ड 

३.

       अर्थातु सीताजी तो महर्षि अग्निदेव के आश्रय में चली गयीं जो उनके श्वसुर थे| वह तो नकली सीता थी जिसका हरण हुआ|

       अब लंकाकाण्ड की चौपाई पर गौर करें ....

            “सीता प्रथम अनल महं राखी, प्रकट कीन्ह चहं अंतरसाखी”

                 ‘तेहि कारन करूणानिधि, कछुक कहेउ दुर्वाद,

                 सुनत जातुधानी सबै लागीं करन बिसाद |’



        आखिर बिना असली सीता को प्रकट किये वे नकली सीता को वहां से कैसे साथ लेजाते |

        तो फिर सीताजी लौटी क्यों नहीं राम के साथ? किसी महिला ने एक और प्रश्न उठाया |

        जिससे कूटनीति का पटाक्षेप भी सत्य लगे, कुछ तो स्वाभिमान प्रकट होना ही चाहिए नारी का,   ताकि प्रत्येक एरा-गेरा पुरुष इस उदाहरण रूप में स्त्री पर अत्याचार न करने लगे|
 यह तीसरी अग्नि-परिक्षा थी, वास्तव में शक्ति के पूर्ण ध्रुवीकरण के पश्चात, शक्ति-रूप की आवश्यकता समाप्त

होगई | आदि-शक्ति को ब्रह्म से पूर्व पहुँचना होता है गोलोक की व्यवस्था हेतु, मैंने हंसते हुए कहा | वे भी मुस्कुराने लगीं |

       पूरा समाधान नहीं होपाया, आपके उत्तर, तर्क व व्याख्याएं सटीक होते हुए भी पूर्ण नहीं हैं | शान्ति जी उठकर चलते हुए बोलीं |  

       पूर्ण यहाँ कौन है शान्ति जी? इस प्रकार के ये प्रश्न युग-प्रश्न हैं..यक्ष-प्रश्न...प्रत्येक युग में अपने-अपने प्रकार से प्रश्नांकित व उत्तरित किये जाते रहेंगे | मैंने समापन करते हुए दोनों हाथ जोड़कर कहा, हम तो बस आप सबको, सभी महिलाओं को  ‘जोरि जुग पाणी’ प्रणाम ही कर सकते हैं इस आशा में कि शायद रामजी की एवं पुरुष-वर्ग की इस तथाकथित भूल का रंचमात्र भी निराकरण होजाए|   

       


 

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

पुस्तक समीक्षा-- काल है संक्रांति का...डा श्याम गुप्त

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                              पुस्तक समीक्षा 

समीक्ष्य कृति- काल है संक्रांति का...रचनाकार-आचार्य संजीव वर्मा सलिल...संस्करण-२०१६..मूल्य -२००/- ..आवरण –मयंक वर्मा..रेखांकन..अनुप्रिया..प्रकाशक-समन्वय प्रकाशन अभियान, जबलपुर.. समीक्षक—डा श्यामगुप्त |
  
         साहित्य जगत में समन्वय के साहित्यकार, कवि हैं आचार्य संजीव वर्मा सलिल | प्रस्तुत कृति ‘काल है संक्रांति का’ की सार्थकता का प्राकट्य मुखपृष्ठ एवं शीर्षक से ही होजाता है | वास्तव में ही यह संक्रांति-काल है, जब सभी जन व वर्ग भ्रमित अवस्था में हैं | एक और अंग्रेज़ी का वर्चस्व जहां चमक-धमक वाली विदेशी संस्कृति दूर से सुहानी लगती है; दूसरी और हिन्दी –हिन्दुस्तान का, भारतीय स्व संस्कृति का प्रसार जो विदेश बसे को भी अपनी मिट्टी की और खींचता है | या तो अँगरेज़ होजाओ या भारतीय –परन्तु समन्वय ही उचित पंथ होता है हर युग में जो विद्वानों, साहित्यकारों को ही करना होता है |  सलिल जी की साहित्यिक समन्वयक दृष्टि का एक उदहारण प्रस्तुत है ---गीत अगीत प्रगीत न जानें / अशुभ भुला शुभ को पहचानें |
        माँ शारदा से पहले, ब्रह्म रूप में चित्रगुप्त की वन्दना भी नवीनता है | कवि की हिन्दी भक्ति वन्दना में भी छलकती है –‘हिन्दी हो भावी जग वाणी / जय जय वीणापाणी’ |
     यह कृति लगभग १४ वर्षों के लम्बे अंतराल में प्रस्तुत हुई है | इस काल में कितनी विधाएं आईं–गईं, कितनी साहित्यिक गुटबाजी रही, सलिल मौन दृष्टा की भांति गहन दृष्टि से देखने के साथ साथ उसकी जड़ों को, विभिन्न विभागों को अपने काव्य व साहित्य-शास्त्रीय कृतित्वों से पोषण दे रहे थे, जिसका प्रतिफल है यह कृति|  
      कितना दुष्कर है बहते सलिल को पन्ने पर रोकना उकेरना | समीक्षा लिखते समय मेरा यही भाव बनता था जिसे मैंने संक्षिप्त में काव्य-रूपी समीक्षा में इस प्रकार व्यक्त किया है-
“शब्द सा है मर्म जिसमें, अर्थ सा शुचि कर्म जिसमें |
साहित्य की शुचि साधना जो, भाव का नव धर्म जिसमें |
उस सलिल को चाहता है, चार शब्दों में पिरोना ||” 
       सूर्य है प्रतीक संक्रांति का, आशा के प्रकाश का, काल की गति का, प्रगति का | अतः सूर्य के प्रतीक पर कई रचनाएँ हैं | ‘जगो सूर्य लेकर आता है अच्छे दिन’ ( -जगो सूर्य आता है ) में आशावाद है, नवोन्मेष है जो उन्नाकी समस्त साहित्य में व इस कृति में सर्वत्र परिलक्षित है | ‘मानव की आशा तुम, कोशिश की भाषा तुम’ (-उगना नित) छंट गए हैं फूट के बादल, पतंगें एकता की उडाओ”(-आओ भी सूरज ) |
       पुरुषार्थ युत मानव, शौर्य के प्रतीक सूर्य की भांति प्रत्येक स्थित में सम रहता है | ‘उग रहे या ढल रहे तुम, कान्त प्रतिपल रहे सूरज’ तथा ‘आस का दीपक जला हम, पूजते हैं उठ सवेरे, पालते या पल रहे तुम ‘(-उग रहे या ढल रहे ) से प्रकृति के पोषण-चक्र, देव-मनुज नाते का कवि हमें ज्ञान कराता है | शिक्षा की महत्ता – ‘सूरज बबुआ’ में, सम्पाती व हनुमान की पौराणिक कथाओं के संज्ञान से इतिहास की भूलों को सुधारकर लगातार उद्योग व हार न मानने की प्रेरणा दी गयी है ‘छुएँ सूरज’ रचना में | शीर्षक रचना ‘काल है संक्रांति का’ प्रयाण गीत है, काल है संक्रांति का, तुम मत थको सूरज’ ..सूर्य व्यंजनात्मक भाव में मानवता के पौरुष का,ज्ञान का व प्रगति का प्रतीक है जिसमें चरैवेति-चरैवेति का सन्देश निहित है | यह सूर्य स्वयं कवि भी होसकता है | “
     युवा पीढ़ी को स्व-संस्कृति का ज्ञान नहीं है कवि व्यथित हो स्पष्टोक्ति में कह उठता है –
‘जड़ गँवा जड़ युवापीढी, काटती है झाड, प्रथा की चूनर न भाती, फैकती है फाड़ /
स्वभाषा भूल इंग्लिश से लड़ाती लाड |’
      यदि हम शुभ चाहते हैं तो सभी जीवों पर दया करें एवं सामाजिक एकता व परमार्थ भाव अपनाएं | कवि व्यंजनात्मक भाव में कहता है ---‘शहद चाहैं, पाल माखी |’ (-उठो पाखी )| देश में भिन्न भिन्न नीतियों की राजनीति पर भी कवि स्पष्ट रूप से तंज करता है..’धारा ३७० बनी रहेगी क्या’/ काशी मथुरा अवध विवाद मिटेंगे क्या’ | ‘ओबामा आते’ में आज के राजनीतिक-व्यवहार पर प्रहार है |  
     अंतरिक्ष पर तो मानव जारहा है परन्तु क्या वह पृथ्वी की समस्याओं का समाधान कर पाया है यह प्रश्न उठाते हुए सलिल जी कहते हैं..’मंगल छू / भू के मंगल का क्या होगा |’ ’सिंधी गीत ‘सुन्दरिये मुंदरिये ’...बुन्देली लोकगीत ‘मिलती कायं नें’ कवि के समन्वयता भाव की ही अभिव्यक्ति है |
    प्रकृति, पर्यावरण, नदी-प्रदूषण, मानव आचरण से चिंतित कवि कह उठता है –
‘कर पूजा पाखण्ड हम / कचरा देते डाल |..मैली होकर माँ नदी / कैसे हो खुशहाल |’
   ‘जब लौं आग’ में कवि उत्तिष्ठ जागृत का सन्देश देता है कि हमारी अज्ञानता ही हमारे दुखों का कारण है-
‘मोड़ तोड़ हम फसल उगा रये/ लूट रहे व्यौपार |जागो बनो मशाल नहीं तो / घेरे तुमें अन्धेरा |   
    धन व शक्ति के दुरुपयोग एवं वे दुरुपयोग क्यों कर पा रहे हैं, ज्ञानी पुरुषों की अकर्मण्यता के कारण | सलिल जी कहते हैं हैं---‘रुपया जिसके पास है / उद्धव का संन्यास है /सूर्य ग्रहण खग्रास है |’ (-खासों में ख़ास है )
    पेशावर के नरपिशाच..तुम बन्दूक चलाओ तो..मैं लडूंगा ..आदि रचनाओं में शौर्य के स्वर हैं| छद्म समाजवाद की भी खबर ली गयी है –‘लड़वाकर / मामला सुलझाए समाजवादी’ | 
    पुरखों पूर्वजों के स्मरण बिना कौन उन्नत हो पाया है, अतः सभी पूर्व, वर्त्तमान, प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष पुरखों , पितृजनों के एवं उनकी सीख का स्मरण में नवता का एक और पृष्ठ है ‘स्मरण’ रचना में –
‘काया माया छाया धारी / जिन्हें जपें विधि हरि त्रिपुरारी’
‘कलम थमाकर कर में बोले / धन यश नहीं सृजन तब पथ हो |’ क्योंकि यश व पुरस्कार की आकांक्षा श्रेष्ठ सृजन से वंचित रखती है | नारी-शक्ति का समर्पण का वर्णन करते हुए सलिल जी का कथन है –
‘बनी अग्रजा या अनुजा तुम / तुमने जीवन सरस बनाया ‘ (-समर्पण ) | मिली दिहाड़ी रचना में दैनिक वेतन-भोगी की व्यथा उत्कीर्णित है |
    ‘लेटा हूँ ‘ रचना में श्रृंगार की झलक के साथ पुरुष मन की विभिन्न भावनाओं, विकृत इच्छाओं का वर्णन है | इस बहाने झाडूवाली से लेकर धार्मिक स्थल, राजनीति, कलाक्षेत्र, दफ्तर प्रत्येक स्थल पर नारी-शोषण की संभावना का चित्र उकेरा गया है | ‘राम बचाए‘ में जन मानस के व्यवहार की भेड़चाल का वर्णन है –‘मॉल जारहे माल लुटाने / क्यों न भीड़ से भिन्न हुए हम’| अनियंत्रित विकास की आपदाएं ‘हाथ में मोबाइल’ में स्पष्ट की गयी हैं|
     ‘मंजिल आकर’ एवं ‘खुशियों की मछली’ नवगीत के मूल दोष भाव-सम्प्रेषण की अस्पष्टता के उदाहरण हैं | वहीं आजकल समय बिताने हेतु, कुछ होरहा है यह दिखाने हेतु, साहित्य एवं हर संस्था में होने वाले विभिन्न विषयों पर सम्मेलनों, वक्तव्यों, गोष्ठियों, चर्चाओं की निरर्थकता पर कटाक्ष है—‘दिशा न दर्शन’ रचना में ...
‘क्यों आये हैं / क्या करना है |..ज्ञात न पर / चर्चा करना है |’
        राजनैतिक गुलामी से मुक्त होने पर भी अभी हम सांस्कृतिक रूप से स्वतंत्र नहीं हुए हैं | वह वास्तविक आजादी कब मिलेगी, कृतिकार के अनुसार, इसके लिए मानव बनना अत्यावश्यक है ....
 ‘सुर न असुर हम आदम यदि बन जायेंगे इंसान, स्वर्ग तभी होपायेगा धरती पर आबाद |’
      सार्वजनिक जीवन व मानव आचरण में सौम्यता, समन्वयता, मध्यम मार्ग की आशा की गयी है ताकि अतिरेकता, अति-विकास, अति-भौतिक उन्नति के कारण प्रकृति, व्यक्ति व समाज का व्यबहार घातक न होजाय-
पर्वत गरजे, सागर डोले / टूट न जाएँ दीवारें / दरक न पायें दीवारे |’ 
     इस प्रकार कृति का भावपक्ष सबल है | कलापक्ष की दृष्टि से देखें तो जैसा कवि ने स्वयं कहा है ‘गीत-नवगीत‘ अर्थात सभी गीत ही हैं | कई रचनाएँ तो अगीत-विधा की हैं –‘अगीत-गीत’ हैं| वस्तुतः इस कृति को ‘गीत-अगीत-नवगीत संग्रह’ कहना चाहिए | सलिल जी काव्य में इन सब छंदों-विभेदों के द्वन्द नहीं मानते अपितु एक समन्वयक दृष्टि रखते हैं, जैसा उन्होंने स्वयम कहा है- ‘कथन’ रचना में --
‘गीत अगीत प्रगीत न जानें / अशुभ भुला शुभ को पहचाने |’
‘छंद से अनुबंध दिखता या न दिखता / किन्तु बन आरोह या अवरोह पलता |’
‘विरामों से पंक्तियाँ नव बना / मत कह, छंद हीना / नयी कविता है सिरजनी |’
     सलिल जी लक्षण शास्त्री हैं | साहित्य, छंद आदि के प्रत्येक भाव, भाग-विभाग का व्यापक ज्ञान व वर्णन कृति में प्रतुत किया गया है| विभिन्न छंदों, मूलतः सनातन छंदों –दोहा, सोरठा, हरिगीतिका, आल्ह छंद, लोकधुनों  के आधार पर नवगीत रचना दुष्कर कार्य है | वस्तुतः ये विशिष्ट नवगीत हैं, प्रायः रचे जाने वाले अस्पष्ट सन्देश वाले तोड़ मरोड़कर लिखे जाने वाले नवगीत नहीं हैं | सोरठा पर आधारित एक गीत देखें-
‘आप न कहता हाल, भले रहे दिल सिसकता |
करता नहीं ख़याल, नयन कौन सा फड़कता ||’
       कृति की भाषा सरल, सुग्राह्य, शुद्ध खड़ीबोली हिन्दी है | विषय, स्थान  व आवश्यकतानुसार भाव-सम्प्रेषण हेतु देशज व बुन्देली का भी प्रयोग किया गया है- यथा ‘मिलती कायं नें ऊंची वारी/ कुरसी हमकों गुइयाँ |’       उर्दू के गज़लात्मक गीत का एक उदाहरण देखें—
   ‘ख़त्म करना अदावत है / बदल देना रवायत है /ज़िंदगी गर नफासत है / दीन-दुनिया सलामत है |’
       अधिकाँश रचनाओं में प्रायः उपदेशात्मक शैली का प्रयोग किया गया है | वर्णानात्मक व व्यंगात्मक शैली का भी यथास्थान प्रयोग है | कथ्य-शैली मूलतः अभिधात्मक शब्द भाव होते हुए भी अर्थ-व्यंजना युक्त है | एक व्यंजना देखिये –‘अर्पित शब्द हार उनको / जिनमें मुस्काता रक्षाबंधन |’ एक लक्षणा का भाव देखें –
 राधा हो या आराधा सत शिव / उषा सदृश्य कल्पना सुन्दर |’
      विविध अलंकारों की छटा सर्वत्र विकिरित है –‘अनहद अक्षय अजर अमर है /अमित अभय अविजित अविनाशी |’ में अनुप्रास का सौन्दर्य है |  ‘प्रथा की चूनर न भाती ..’ व उनके पद सरोज में अर्पित / कुमुद कमल सम आखर मनका |’ में उपमा दर्शनीय है | ‘नेता अफसर दुर्योधन, जज वकील धृतराष्ट्र..’ में रूपक की छटा है तो ‘कुमुद कमल सम आखर मनका’ में श्लेष अलंकार है |  उपदेशात्मक शैली में रसों की संभावना कम ही रहती है तथापि ओबामा आते, मिलती कायं नें, लेटा हूँ में हास्य व श्रृंगार का प्रयोग है | ‘कलश नहीं आधार बनें हम..’ में प्रतीक व ‘आखें रहते भी सूर’ व ‘पौवारह’ कहावतों के उदाहरण हैं | ‘गोदी चढ़ा उंगलियाँ थामी/ दौड़ा गिरा उठाया तत्क्षण ‘.. में चित्रमय विम्ब-विधान  का सौन्दर्य दृष्टिगत है | 
     पुस्तक आवरण के मोड़-पृष्ठ पर सलिल जी के प्रति विद्वानों की राय एवं आवरण व सज्जाकारों के चित्र, आचार्य राजशेखर की काव्य-मीमांसा का उद्धरण एवं स्वरचित दोहे भी अभिनव प्रयोग हैं | अतः वस्तुपरक व शिल्प सौन्दर्य के समन्वित दृष्टि भाव से ‘काल है संक्रांति का’ एक सफल कृति है | इसके लिए श्री संजीव वर्मा सलिल जी बधाई के पात्र हैं |

   लखनऊ                                          .        ---डा श्यामगुप्त                                                                                              
  विजय दशमी                                               सुश्यानिदी के-३४८, आशियाना    दि.११.१०.२०१६ ई                                        लखनऊ-२२६०१२.. मो.९४१५१५६४६४

                                                        .
              



 

शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न ---डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


** गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न **
------प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली विशिष्ट गुरुवासरीय गोष्ठी दि.६-१०-१६ गुरूवार को डा.श्यामगुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, श्री बिनोदकुमार सिन्हा, श्री रामप्रकाश प्रकाश, अनिल किशोर शुक्ल निडर, श्री अशोक विश्वकर्मा गुंजन, श्री कौशल किशोर, डा श्यामगुप्त व श्रीमती सुषमा गुप्ता ने काव्य पाठ किया |
-------- गोष्ठी का प्रारम्भ माँ की वन्दना से हुआ | डा श्यामगुप्त द्वारा माँ शारदे से प्रार्थना की गयी--
वीणा झंकृत हो माँ वाणी,
भाषा स्वर शुचि संवर्धित हो |
अन्धकार में घिरे मनुज का,
ह्रदय दीप ज्योतिर्मय करदो |
------ गोष्ठी के प्रथम सत्र में **महाकाव्य क्या है व उसकी विशेषताओं*** पर चर्चा की गयी | डा श्यामगुप्त ने कहा कि महाकाव्य मूलत: अपने देश की जातीय और युगीन सभ्यता-संस्कृति के वाहक होते हैं। महाकाव्य सदा ही विश्व के प्रत्येक प्राचीन देश की सभ्यता-संस्कृति की अभिव्यक्ति का प्रबल माध्यम रहे हैं। भारत के ‘रामायण’ और 'महाभारत’ तथा यूनानी कवि होमर के ‘इलियड’ और ‘ओडिसी’ इसके प्रमाण हैं।
--------डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने महाकाव्य के मुख्य तत्वों की व्याख्या करते हुए बताया कि आठ या इससे अधिक सर्ग या अध्याय वाली काव्यकृति जिसमें किसी धीरोद्दात नायक अर्थात किसी प्रभावशाली महापुरुष जो अत्यंत गंभीर, क्षमावान् स्थिरचरित्र, और दृढ़व्रत हो, के जीवन व चरित्र का सांगोपांग वर्णन हो, एवं श्रृंगार, शांत व वीर रस में से एक की प्रधानता व अन्य के वर्णन के साथ साथ प्रकृति वर्णन भी रहे; उसे महाकाव्य माना जाता है | प्रत्येक सर्ग की रचना एक ही छंद में की जाती है, सर्ग के अंत में आगामी कथा की सूचना होनी चाहिए। महाकाव्य की कथावस्तु एक महान उद्देश्य युत होती है और महत्तर मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा करती है।
-------- डा श्यामगुप्त के प्रश्न उठाया कि फिर ‘रामचरितमानस’ कैसे महाकाव्य हुआ उसमें तो केवल सात काण्ड ही हैं|
------इसका उत्तर देते हुए डा सत्य ने बताया कि महाकवि तुलसी के ‘रामचरितमानस’ में मूलतः अन्य सभी गुण तो महाकाव्य के हैं ही | कुछ संस्करणों में लवकुश काण्ड की उपस्थिति है अतः आठ काण्ड की शर्त भी पूरी होजाती है | महाकाव्य के कुछ लक्षण कम होते हुए भी विद्वानों ने ‘कामायनी’ को और यहाँ तक कि मुंशी प्रेमचंद के गद्य उपन्यास गोदान को भी महाकाव्य माना है | अगीत-विधा में लिखे गए काव्यों डा श्यामगुप्त के सृष्टि, ईशत इच्छा या बिगबेंग-एक अनुत्तरित उत्तर’ एवं पं. जगतनारायण पांडे के ‘सौमित्र गुणाकर’, कुमार तरल के बुद्धकथा को भी महाकाव्य माना गया है |
----- सुषमा गुप्ता जी का कथन था कि सच ही है,| बचपन में हम लवकुश काण्ड सहित आठ काण्ड वाली राम चरित मानस ही पढ़ा करते थे एवं जानते थे | पता नहीं बाद में क्या हुआ, कैसे हुआ कि मानस केवल सात काण्ड की ही रह गयी |
डा श्यामगुप्त ने समर्थन करते हुये बताया कि अपितु बालकाण्ड से पहले भी एक पाठ/अध्याय था, शायद प्रस्तावना हो जिसमें राम-कलेवा एवं अजामिल की कथा का प्रसंग भी वर्णित था | वह सब आज हटा दिया गया है पता नहीं क्या हुआ, कैसे |
-------काव्य-पाठ का प्रारम्भ करते हुए कवि अशोक विश्वकर्मा गुंजन ने कई गीत प्रस्तुत किये, एक गीतांश है-
हमको दिल का दीवाना पसंद है, और,
किसी को दिल का नज़राना पसंद है |
------- वन विभाग में कार्यरत रहे कविवर रामप्रकाश शुक्ल’प्रकाश’ ने विविध विषयक कवितायें प्रस्तुत करते हुए, दोहे द्वारा प्रदूषण रोकने में वृक्ष की महत्ता स्पष्ट की –
बहुत प्रदूषण बढ़ रहा, रोक रहे हैं वृक्ष |
लेकर दूषित वायु को, करते रहते स्वच्छ ||
-------अनिल किशोर शुक्ल निडर ने गांधीजी पर एक रचना प्रस्तुत की –
गांधी स्वराज्य के लिए लड़े
गांधी गोरों से रहे भिड़े |
------श्री बिनोदकुमार सिन्हा ने माँ की वन्दना व अन्य कई गीत प्रस्तुत किये, बेटियों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए आजकल के बेटों पर भी कटाक्ष किया ----
न बेटा कुलभूषण, न बेटी पराया धन,
विवश नहीं, होती है सक्षम बेटी |
बेटे होते सच में महान !
बनते नहीं वृद्धाश्रम तमाम ||
--------वयोवृद्ध कवि श्री कौशल किशोर ने ‘बिगड़ी मेरी बनादे .’.माँ से विनय करते हुए, सम सामयिक विषय पाकिस्तान पर सर्जीकल स्ट्राइक की बात की---
सर्जीकल स्ट्राइक से दिया भारत ने पाक को हमले का जबाव,
मिटे धूल में पाक के, देखे कश्मीरी ख़्वाब |
-------डा श्यामगुप्त ने प्रेमगीत, अगीत, प्रयाण गीत एवं छंद रचनाएँ प्रस्तुत कीं---हरिगीतिका छंद के विधान की चर्चा करते हुए एक हरिगीतिका छंद प्रस्तुत किया --
नर की कसौटी पर रहे नारी स्वयं शुचि औ सफल |
वह कसौटी है उसी की, परिवार हो सात्विक सुफल |
होजाय जग सुन्दर सकल, यदि वह रहे कोमल सजल |
नर भी उसे दे मान, जीवन बने इक सुन्दर गज़ल ||
------श्रीमती सुषमा गुप्ता ने दो सुन्दर गीत प्रस्तुत करते हुए कहा ----
तुम कहते हो याद नहीं करना,
कोइ फ़रियाद नहीं करना |
अपनी इन प्यार की बातों का,
कोइ अनुवाद नहीं करना ||
---------डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने अपने कई प्रसिद्ध गीतों एवं अगीतों का पाठ किया | एक गीत में शासन को सीमापार के आतंकवाद पर कठोर रुख अपनाने का परामर्श व्यंजनात्मकता भाव में दिया ---
मेरे मनमोहन बजाओ नहीं बांसुरी को,
एक बार आगे बढ़ चक्र को भी गहिये |
-----डा श्यामगुप्त की सद्य प्रकाशित व पुस्तक मेले में लोकार्पित कृति*** ‘अगीत-त्रयी’*** पर भी चर्चा हुई | अगीत-त्रयी के तीनों कवियों पर डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने प्रकाश डाला|
*****अवांछित कविता****** पर भी चर्चा हुई | डा श्याम गुप्त ने किसी पत्रिका से एक काव्यांश पढ़कर सुनाया----जिसका शीर्षक था ..'क्या गारंटी है '---
'करने को तो शादी करलो,
बीबी क्वांरी ही होगी, क्या गारंटी है '.....और भी गारंटियां गिनाई गयीं थी प्राय: सभी अवांछित ही थीं |
--- सभी ने एक मत से कविता की निंदा की, सभी सहमत थे कि एसी रचनाएँ एवं इस प्रकार के वर्णन साहित्य में अवांछित व निंदनीय हैं,बचना चाहिए...... पत्रिका को भी इस प्रकार के प्रकाशन से बचना चाहिए |
----------चायपान के दौरान चर्चा में श्री विनोदकुमार सिन्हा का कथन था कि गीत तो बस गाते जाओ कुछ आसान लगता है पर मेरे विचार में अगीत लिखना कठिन है |
--------डा श्यामगुप्त ने इसमें मनोवैज्ञानिक तत्व को स्पष्ट करते हुए स्पष्ट किया कि गीति तत्व हम बचपन से भजन, कीर्तन, रामचरित मानस के सर्वजन सुलभ दोहों, चौपाइयां के घर घर में प्रयोग, एवं कबीर, रहीम के जन जन प्रचलित दोहे आदि में सुनते रहे हैं अतः तुकांत सरल व ग्राह्य प्रतीत होता है
------क्योंकि गीत ह्रदय के भावों से उत्पन्न स्वभूत होता है |
------अतुकांत कविता मस्तिष्क से रची जाती है, यह कविता का वैज्ञानिक रूप है, वैश्विक रूप है अतः कठिन लगता है,
-------अगीत दोनों के मध्य की कविता है अतः आज गद्य के युग में उसकी आवश्यकता है | विश्व भर में ‘ब्लेंक वर्स’ अर्थात अतुकांत काव्य का अधिक प्रयोग होता है | विश्व का सर्वश्रेष्ठ् व प्राचीनतम साहित्य ऋग्वेद भी अतुकांत काव्य में ही है |
-----कविवर श्री रामप्रकाश शुक्ल का कहना था कि अगीत का अर्थ आने वाले युग का गीत |
------डा श्याम गुप्त द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी का समापन हुआ |


शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

शरावबंदी---- सामाजिक सरोकार एवं तकनीकी तथ्य .. डा श्याम गुप्त...

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 


शराव बंदी-----सामाजिक सरोकार एवं तकनीकी तथ्य .....

                 अभी हाल में ही शरावबंदी के प्रकरण में पटना हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के दो निर्णय देखने को मिले | मुझे लगता है कि निर्णय केवल तकनीकी आधार पर दिए गए हैं, सामाजिक सरोकार पर विवेचित नहीं |

१. पटना हाईकोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए निम्न निर्णय दिया--- चित्र १.



Drshyam Gupta's photo. 

----कोइ भी कम्पनी अपना व्यापार मुनाफे के लिए लगाती है परोपकार के लिए नहीं ....

------आश्चर्य में तो हम हैं, क्या हम आज भी पुरा युग में जी रहे हैं ? प्राचीनकाल में व्यापारियों को पणि अर्थात पैसे लेकर व्यापार –विनिमय करने वाले कहा जाता था | इन्हें असम्माननीय दस्यु वर्ग में जाना जाता था | जिसका कालान्तर में वणिक या बनिया शब्द बना |

------कोइ भी कम्पनी अपना व्यापार मुनाफे के लिए लगाती है परोपकार के लिए नहीं ....यह तथ्य या कथ्य सामान्यजन के लिए या व्यापार जगत के स्वयं कथ्य के लिए सही (?..) होसकता है परन्तु किसी भी दायित्व के पद से टिप्पणी के लिए नहीं | प्रत्येक व्यापार व व्यापारी का मूल कर्तव्य स्वयं की जीविका हेतु उचित मुनाफे के अतिरिक्त सामाजिक परोपकार भी एक कर्तव्य होता है जिससे वह अतिरिक्त व अधिक मुनाफे की प्रवृत्ति से नियमित रहता है | शासन द्वारा अधिक मुनाफ़ा लेने को नियमित करना भी महंगाई नियमित करने का एक इंस्ट्रूमेंट है मूलतः सामाजिक दुष्प्रवृत्तियों की रोक थाम हेतु|


२. सुप्रीम कोर्ट के निम्न कथ्यों में -----

चित्र २..Drshyam Gupta's photo. 


------द्वितीय कथ्य तो उचित है ही---निश्चय ही किसी भी कोर्ट को नीतिगत मामलों में दखल नहीं देना चाहिए | परन्तु प्रथम टिप्पणी – मेरे विचार से शराव पीने के सम्बन्ध में यह तथ्य देश में प्रचलित व मान्य सभी चिकित्सा प्रणालियों से प्रमाणित नहीं है अतः यह चिकित्सा-नीतिगत तथ्य भी टिप्पणी में नहीं होना चाहिए | यह न्यायाधीशों का व्यक्तिगत मान्यता व विचार होसकता है परन्तु कोर्ट द्वारा टिप्पणी हेतु नहीं |
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शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

पुस्तक मेला में अखिल भारतीय अगीत परिषद् की राष्ट्रीय गोष्ठी एवं डा श्यामगुप्त की सद्य प्रकाशित पुस्तक अगीत-त्रयी का लोकार्पण संपन्न ..डा श्याम गुप्त

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..



                                 


****अखिल भारतीय अगीत परिषद् की राष्ट्रीय गोष्ठी एवं डा श्यामगुप्त की सद्य प्रकाशित पुस्तक अगीत-त्रयी का लोकार्पण संपन्न ***

                          २९-९-१६ को १४वे पुस्तक मेला, लखनऊ, मोतीमहल लान में अखिल भारतीय अगीत परिषद् के तत्वावधान में वृहद् राष्ट्रीय एवं नारी शक्ति को समर्पित काव्य गोष्ठी संपन्न हुई | समारोह में डा श्यामगुप्त की सद्य प्रकाशित पुस्तक अगीत-त्रयी का लोकार्पण एवं विवेचना की गयी | समारोह के अध्यक्ष साहित्यभूषण डा रंगनाथ सत्य मुख्य-अतिथि प्रोफ ओमप्रकाश पांडे, पूर्व अध्यक्ष संस्कृत विभाग लविवि एवं विशिष्ट अतिथि श्री सुलतान शाकिर हाशमी पूर्व सदस्य केन्द्रीय लोक सेवा आयोग, सुप्रसिद्ध उर्दू, हिन्दी व ब्रज भाषा के साहित्यकार एवं श्री रामचंद्र शुक्ल पूर्व न्यायाधीश थे |
                              दीप प्रज्वलन के पश्चात श्री कुमार तरल, साहित्यभूषण श्री देवकी नंदन शांत एवं श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा वाणी वन्दना प्रस्तुत की गयी |
                              गोष्ठी का संचालन एवं मंच संचालन डा योगेश गुप्त ने किया | गोष्ठी में लगभग ६० कवियों ने अपनी विविध विषयक रचनाओं का पाठ किया | समारोह में विभिन्न कवियों को सम्मान-पत्र व प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया भी गया |
                            लोकार्पित पुस्तक अगीत-त्रयी पर अपने वक्तव्य में डा श्यामगुप्त ने कृति के लिखे जाने की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अपनी इससे पूर्व प्रकाशित पुस्तक अगीत का छंद विधान ‘अगीत साहित्य दर्पण’ जिसमें अगीत के विश्व भर में फैले कवियों, अगीत पर कृतियों, शोधों, आलेखों एवं अगीत के एतिहासिक वस्तुस्थिति एवं वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य का विस्तृत वर्णन किया गया था, साहित्य जगत को प्रस्तुत करने के पश्चात् डा रंगनाथ मिश्र सत्य एवं साहित्य जगत में यह अनुभव किया जारहा था कि इस अपूर्व कविता विधा अगीत के जो प्रमुख स्तम्भ हैं उनके बारे में भी तार-सप्तक की भांति एक कृति प्रस्तुत की जाय | उसी का प्रतिफल है प्रस्तुत कृति ‘अगीत-त्रयी’ जिसमें अगीत के संस्थापक डा रंगनाथ मिश्र सत्य, उसके प्रगतिकारक पं जगतनारायण पांडे एवं उसके सर्वांगीण उन्नायक डा श्याम गुप्त के विचार, वक्तव्य , व्यक्तित्व व कृतित्व एवं अगीत ३०-३० रचनाओं को संकलित किया गया है |
                   श्रीमती सुषमा गुप्ता ने अगीत-त्रयी पर अपने वक्तव्य में कहा कि ये तीनों कवि जिनका इस कृति में उल्लेख है कविता व साहित्य की प्रत्येक विधा गीत, छंद आदि में संपन्न व समर्पित होते हुए भी इन साहित्यकारों ने हिन्दी जगत को एक नवीन विधा प्रदान की जो आज राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय क्षितिज पर अगीत विधा के नाम से जानी जाती है | इसके लिए साहित्य जगत इनका सदैव आभारी रहेगा |
                        समारोह के मुख्य अतिथि के वक्तव्य में प्रोफ ओम प्रकाश पांडे ने स्पष्ट किया कि नारी सशक्तीकरण की बात सही है परन्तु इस देश में नारी कभी भी निशक्त नहीं रही | नारी के महत्ता व सदा-सशक्तता को रेखांकित करते हुए उन्होंने गार्गी–याज्ञवल्क एवं विद्यमा आदि विदुषी नारियों के व्यक्तित्व व कृतित्व का उल्लेख किया |
                         अध्यक्षीय वक्तव्य में डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने अगीत-त्रयी पर विवेचनात्मक तथ्य प्रस्तुत करते हुए इसे साहित्य की महत्वपूर्ण कृति एवं विश्वविद्यालयों में अध्ययन के योग्य बताया |

                      अंत में डा योगेश ने सभी को धन्यवाद ज्ञापन किया |

 
 माँ का माल्यार्पण