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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017
बात ग़ज़ल की--डा श्याम गुप्त ...
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
----बात ग़ज़ल की ----
------आदिदेव शिव के डमरू से निसृत ध्वनि से बोलियाँ, अक्षर, शब्द की उत्पत्ति के साथ ही श्रुति रूप में कविता का आविर्भाव हुआ|
-----देव-संस्कृति में शिव व आदिशक्ति की अभाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह की सर्वप्रथम कथा के उपरांत देव-मानव या मानव संस्कृति की, मानव इतिहास की सर्वप्रथम भाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह गाथा.... ‘उर्वशी–पुरुरवा’ ....की है |
------कहते हैं कि सुमेरु क्षेत्र, जम्बू-द्वीप, इलावर्त-खंड स्थित इन्द्रलोक या आज के उजबेकिस्तान की अप्सरा ( बसरे की हूर) उर्वशी, भरतखंड के राजा पुरुरवा पर मोहित होकर उसकी पत्नी बनी जो अपने देश से उत्तम नस्ल की भेड़ें तथा गले के लटकाने का स्थाली पात्र, वर्फीले देशों की अंगीठी –कांगड़ी- जो गले में लटकाई जाती है, लेकर आयी।
-------प्रणय-सुख भोगने के पश्चात उर्वशी …गंधर्वों अफरीदियों के साथ अपने देश चली गई और पुरूरवा उसके विरह में छाती पीटता रोता रहा, विश्व भर में उसे खोजता रहा। उसका विरह-रूदन गीत ऋग्वेद के मंत्रों में है, यहीं से संगीत, साहित्य और काव्य का प्रारम्भ हुआ।
------अर्वन देश (घोड़ों का देश) अरब तथा फारस के कवियों ने इसी की नकल में रूवाइयां लिखीं एवं तत्पश्चात ग़ज़ल आदि शायरी की विभिन्न विधाएं परवान चढी जिनमें प्रणय भावों के साथ-साथ मूलतः उत्कट विरह वेदना का निरूपण है । ------शायरी ईरान होती हुई भारत में उर्दू भाषा के माध्यम से आयी, प्रचलित हुई और सर्वग्राही भारतीय संस्कृति के स्वरूपानुसार हिन्दी ने इसे हिन्दुस्तानी-भारतीय बनाकर समाहित कर लिया| आज देवनागरी लिपि में उर्दू के साथ-साथ हिन्दुस्तानी, हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में भी शायरी की जा रही है |
-------शायरी अरबी, फारसी व उर्दू जुबान की काव्य-कला है | इसमें गज़ल, नज़्म, रुबाई, कते व शे’र आदि विविध छंद व काव्य-विधाएं प्रयोग होती हैं, जिनमें गज़ल सर्वाधिक लोकप्रिय हुई |
------गज़ल मूलतः शे’रों (अशार या अशआर) की मालिका होती है और प्रायः इसका प्रत्येक शे’र विषय–भाव में स्वतंत्र होता है | )
यहाँ हम ग़ज़ल के मूल रूप-भावों के बाते में बात करेंगे ....
-----बात ग़ज़ल की ----
------भाग एक ----
----- गज़ल दर्दे-दिल की बात बयाँ करने का सबसे माकूल व खुशनुमां अंदाज़ है | इसका शिल्प भी अनूठा है | नज़्म रुबाइयों, छंदों, गीतों से जुदा | इसीलिये विश्व भर में जन-सामान्य में प्रचलित हुई | हिन्दी काव्य-कला में इस प्रकार के शिल्प की विधा नहीं मिलती | परन्तु हाँ, घनाक्षरी-छंद ( कवित्त ) एवं सवैया छंद का शिल्प अवश्य ग़ज़ल की ही पद्धति का शिल्प है जिसमें रदीफ़ व काफिया के ही शब्द-भाव रहते हैं और गैर-रदीफ़ ग़ज़ल के भाव भी, परन्तु मतला नहीं होता।
-------मेरे विचार से शायद कवित्त-छंद, ग़ज़ल का मूल प्रारम्भिक रूप है। उदाहरण देखिये......निम्न घनाक्षरी में “रही” रदीफ़ है एवं शरमा व हरषा...आदि काफिया हैं.....
“ गाये कोयलिया तोता मैना बतकही करें,
कोंपलें लजाईं कली कली शरमा रही।
झूमें नव पल्लव चहक रहे खग वृन्द,
आम्र बृक्ष बौर आये, ऋतु हरषा रही। “ --- डा श्याम गुप्त
----इसी प्रकार गैर-रदीफ़ ग़ज़ल का प्रारूप घनाक्षरी देखें --- जिसमें पदांत स्वयं सुजानी ...पुरानी आदि काफिया है।
“थर थर थर थर कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु सखि वो सुजानी।
सिहरि सिहरि उठे जियरा पखेरू सखि,
उर मांहि उमंगाये प्रीति वो पुरानी।
बाल वृद्ध नर नारी बैठे धूप ताप रहे,
धूप भी है कुछ खोई-सोई अलसानी।
शीत की लहर तीर भांति तन वेधि रही,
मन उठे प्रीति की वो लहर अजानी।” ---डा श्याम गुप्त
------सवैया छंद के प्रारूप भी देखें----
-----बा रदीफ़ प्रारूप....
"पीने वाला यही चाहता गली गली मधुशाला हो |
हर नुक्कड़ हर मोड़ जो मिले मदिरा पीने वाला हो |
अपनी अपनी सोच सभी की मन गोरा या काला हो |
सभी चाहते उनकी दुनिया में हर ओर उजाला हो || ..." ---डा श्याम गुप्त
------गैर रदीफ़ प्रारूप देखें----
"बैन वही जो उचारे सदा वही गोविन्द नाम भजे जग सारो |
रसना वही रसधार बहाय भजे जेहि गोविन्द नाम पियारो |
भक्ति वही गज़राज करी परे दुःख: में गोविन्द काज संवारो |
श्याम वही नर गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द नाम उचारो || -----डा श्याम गुप्त ...."
------- मैं कोई शायरी व गज़ल का विशेषज्ञ ज्ञाता नहीं हूँ | परन्तु हम लोग हिन्दी फिल्मों के गीत सुनते हुए बड़े हुए हैं जिनमें वाद्य-इंस्ट्रूमेंटेशन की सुविधा हेतु गज़ल व नज़्म आदि को भी गीत की भांति प्रस्तुत किया जाता रहा है-यथा…. साहिर लुधियानवी की प्रसिद्द हिन्दी ग़ज़ल...
"संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे।
इस लोक को भी अपना न सके उस लोक में भी पछताओगे। "
"हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जन्म बिता कर जाएंगे तुम जन्म गँवाकर जाओगे।"
------छंदों व गीतों के साथ-साथ दोहा व अगीत-छंद लिखते हुए व गज़ल सुनते, पढते हुए मैंने यह अनुभव किया कि उर्दू शे’र भी संक्षिप्तता व सटीक भाव-सम्प्रेषण में दोहे व अगीत की भांति ही है और इसका शिल्प दोहे की भांति ...अतः लिखा जा सकता है, और नज्में तो तुकांत-अतुकांत गीत के भांति ही हैं, और गज़लों–नज्मों का सिलसिला चलने लगा |
----- गज़ल मूलतः अरबी भाषा का गीति-काव्य है जो काव्यात्मक अन्त्यानुप्रास युक्त छंद है और अरबी भाषा में “कसीदा” अर्थात प्रशस्ति-गान हेतु प्रयोग होता था जो राजा-महाराजाओं के लिए गाये जाते थे एवं असहनीय लंबे-लंबे वर्णन युक्त होते थे जिनमें ..औरतों व औरतों के बारे में गुफ्तगू ...एक मूल विषय-भाग भी होता था | कसीदा के उसी भाग “ताशिब “ को पृथक करके गज़ल का रूप व नाम दिया गया |
क्रमशः--- -----बात ग़ज़ल की ----भाग दो----

----बात ग़ज़ल की ----
(भाग -एक व भाग दो --)
( -----कविता व शायरी ---- कविता, काव्य या साहित्य किसी
विशेष, कालखंड, भाषा, देश या संस्कृति से बंधित नहीं होते | मानव जब मात्र
मानव था जहां जाति, देश, वर्ण, काल, भाषा, संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं था
तब भी प्रकृति के रोमांच, भय, आशा-निराशा, सुख-दुःख आदि का अकेले में अथवा
अन्य से सम्प्रेषण- शब्दहीन इंगितों, अर्थहीन उच्चारण स्वरों में करता
होगा |
------आदिदेव शिव के डमरू से निसृत ध्वनि से बोलियाँ, अक्षर, शब्द की उत्पत्ति के साथ ही श्रुति रूप में कविता का आविर्भाव हुआ| -----देव-संस्कृति में शिव व आदिशक्ति की अभाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह की सर्वप्रथम कथा के उपरांत देव-मानव या मानव संस्कृति की, मानव इतिहास की सर्वप्रथम भाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह गाथा.... ‘उर्वशी–पुरुरवा’ ....की है |
------कहते हैं कि सुमेरु क्षेत्र, जम्बू-द्वीप, इलावर्त-खंड स्थित इन्द्रलोक या आज के उजबेकिस्तान की अप्सरा ( बसरे की हूर) उर्वशी, भरतखंड के राजा पुरुरवा पर मोहित होकर उसकी पत्नी बनी जो अपने देश से उत्तम नस्ल की भेड़ें तथा गले के लटकाने का स्थाली पात्र, वर्फीले देशों की अंगीठी –कांगड़ी- जो गले में लटकाई जाती है, लेकर आयी।
-------प्रणय-सुख भोगने के पश्चात उर्वशी …गंधर्वों अफरीदियों के साथ अपने देश चली गई और पुरूरवा उसके विरह में छाती पीटता रोता रहा, विश्व भर में उसे खोजता रहा। उसका विरह-रूदन गीत ऋग्वेद के मंत्रों में है, यहीं से संगीत, साहित्य और काव्य का प्रारम्भ हुआ।
------अर्वन देश (घोड़ों का देश) अरब तथा फारस के कवियों ने इसी की नकल में रूवाइयां लिखीं एवं तत्पश्चात ग़ज़ल आदि शायरी की विभिन्न विधाएं परवान चढी जिनमें प्रणय भावों के साथ-साथ मूलतः उत्कट विरह वेदना का निरूपण है । ------शायरी ईरान होती हुई भारत में उर्दू भाषा के माध्यम से आयी, प्रचलित हुई और सर्वग्राही भारतीय संस्कृति के स्वरूपानुसार हिन्दी ने इसे हिन्दुस्तानी-भारतीय बनाकर समाहित कर लिया| आज देवनागरी लिपि में उर्दू के साथ-साथ हिन्दुस्तानी, हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में भी शायरी की जा रही है |
-------शायरी अरबी, फारसी व उर्दू जुबान की काव्य-कला है | इसमें गज़ल, नज़्म, रुबाई, कते व शे’र आदि विविध छंद व काव्य-विधाएं प्रयोग होती हैं, जिनमें गज़ल सर्वाधिक लोकप्रिय हुई |
------गज़ल मूलतः शे’रों (अशार या अशआर) की मालिका होती है और प्रायः इसका प्रत्येक शे’र विषय–भाव में स्वतंत्र होता है | )
यहाँ हम ग़ज़ल के मूल रूप-भावों के बाते में बात करेंगे ....
-----बात ग़ज़ल की ----
------भाग एक ----
----- गज़ल दर्दे-दिल की बात बयाँ करने का सबसे माकूल व खुशनुमां अंदाज़ है | इसका शिल्प भी अनूठा है | नज़्म रुबाइयों, छंदों, गीतों से जुदा | इसीलिये विश्व भर में जन-सामान्य में प्रचलित हुई | हिन्दी काव्य-कला में इस प्रकार के शिल्प की विधा नहीं मिलती | परन्तु हाँ, घनाक्षरी-छंद ( कवित्त ) एवं सवैया छंद का शिल्प अवश्य ग़ज़ल की ही पद्धति का शिल्प है जिसमें रदीफ़ व काफिया के ही शब्द-भाव रहते हैं और गैर-रदीफ़ ग़ज़ल के भाव भी, परन्तु मतला नहीं होता।
-------मेरे विचार से शायद कवित्त-छंद, ग़ज़ल का मूल प्रारम्भिक रूप है। उदाहरण देखिये......निम्न घनाक्षरी में “रही” रदीफ़ है एवं शरमा व हरषा...आदि काफिया हैं.....
“ गाये कोयलिया तोता मैना बतकही करें,
कोंपलें लजाईं कली कली शरमा रही।
झूमें नव पल्लव चहक रहे खग वृन्द,
आम्र बृक्ष बौर आये, ऋतु हरषा रही। “ --- डा श्याम गुप्त
----इसी प्रकार गैर-रदीफ़ ग़ज़ल का प्रारूप घनाक्षरी देखें --- जिसमें पदांत स्वयं सुजानी ...पुरानी आदि काफिया है।
“थर थर थर थर कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु सखि वो सुजानी।
सिहरि सिहरि उठे जियरा पखेरू सखि,
उर मांहि उमंगाये प्रीति वो पुरानी।
बाल वृद्ध नर नारी बैठे धूप ताप रहे,
धूप भी है कुछ खोई-सोई अलसानी।
शीत की लहर तीर भांति तन वेधि रही,
मन उठे प्रीति की वो लहर अजानी।” ---डा श्याम गुप्त
------सवैया छंद के प्रारूप भी देखें----
-----बा रदीफ़ प्रारूप....
"पीने वाला यही चाहता गली गली मधुशाला हो |
हर नुक्कड़ हर मोड़ जो मिले मदिरा पीने वाला हो |
अपनी अपनी सोच सभी की मन गोरा या काला हो |
सभी चाहते उनकी दुनिया में हर ओर उजाला हो || ..." ---डा श्याम गुप्त
------गैर रदीफ़ प्रारूप देखें----
"बैन वही जो उचारे सदा वही गोविन्द नाम भजे जग सारो |
रसना वही रसधार बहाय भजे जेहि गोविन्द नाम पियारो |
भक्ति वही गज़राज करी परे दुःख: में गोविन्द काज संवारो |
श्याम वही नर गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द नाम उचारो || -----डा श्याम गुप्त ...."
------- मैं कोई शायरी व गज़ल का विशेषज्ञ ज्ञाता नहीं हूँ | परन्तु हम लोग हिन्दी फिल्मों के गीत सुनते हुए बड़े हुए हैं जिनमें वाद्य-इंस्ट्रूमेंटेशन की सुविधा हेतु गज़ल व नज़्म आदि को भी गीत की भांति प्रस्तुत किया जाता रहा है-यथा…. साहिर लुधियानवी की प्रसिद्द हिन्दी ग़ज़ल...
"संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे।
इस लोक को भी अपना न सके उस लोक में भी पछताओगे। "
"हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जन्म बिता कर जाएंगे तुम जन्म गँवाकर जाओगे।"
------छंदों व गीतों के साथ-साथ दोहा व अगीत-छंद लिखते हुए व गज़ल सुनते, पढते हुए मैंने यह अनुभव किया कि उर्दू शे’र भी संक्षिप्तता व सटीक भाव-सम्प्रेषण में दोहे व अगीत की भांति ही है और इसका शिल्प दोहे की भांति ...अतः लिखा जा सकता है, और नज्में तो तुकांत-अतुकांत गीत के भांति ही हैं, और गज़लों–नज्मों का सिलसिला चलने लगा |
----- गज़ल मूलतः अरबी भाषा का गीति-काव्य है जो काव्यात्मक अन्त्यानुप्रास युक्त छंद है और अरबी भाषा में “कसीदा” अर्थात प्रशस्ति-गान हेतु प्रयोग होता था जो राजा-महाराजाओं के लिए गाये जाते थे एवं असहनीय लंबे-लंबे वर्णन युक्त होते थे जिनमें ..औरतों व औरतों के बारे में गुफ्तगू ...एक मूल विषय-भाग भी होता था | कसीदा के उसी भाग “ताशिब “ को पृथक करके गज़ल का रूप व नाम दिया गया |
क्रमशः--- -----बात ग़ज़ल की ----भाग दो----
बात ग़ज़ल की --- आगे -भाग दो ----
------गज़ल शब्द अरबी रेगिस्तान में पाए जाने वाले एक छोटे, चंचल पशु हिरण ( या हिरणी, मृग-मृगी ) से लिया गया है जिसे अरबी में ‘ग़ज़ल’ (ghazal या guzal ) कहा जाता है | इसकी चमकदार, भोली-भाली नशीली आँखें, पतली लंबी टांगें, इधर-उधर उछल-उछल कर एक जगह न टिकने वाली, नखरीली चाल के कारण उसकी तुलना अतिशय सौंदर्य के परकीया प्रतिमान वाली स्त्री से की जाती थी जैसे हिन्दी में मृगनयनी | अरबी लोग इसका शिकार बड़े शौक से करते थे | अतः अरब-कला व प्रेम-काव्य में स्त्री-सौंदर्य, प्रेम, छलना, विरह-वियोग, दर्द का प्रतिमान ‘गज़ल’ के नाम से प्रचलित हुआ | जैसे भारतीय काव्य-गीतों में वीणा–सारंग का पीड़ात्मक-भावुक प्रसंग |
-------- शायर फिराक गोरखपुरी के अनुसार जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करता हैं और हिरन भागते-भागते झाड़ी में फंस जाता है और निकल नहीं पाता, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज निकलती है, उसी करूण स्वर को गजल कहते हैं. इसलिये विवशता का दिव्यतम रूप में प्रकट होना, स्वर का करूणतम हो जाना ही गजल का आदर्श है |
--------यही गज़ल का अर्थ भी ..अर्थात ‘इश्के-मजाज़ी‘ - आशिक-माशूक वार्ता या प्रेम-गीत, जिनमें मूलतः विरह-वियोग की उच्चतर अभिव्यक्ति होती है |*
---------मानव इतिहास की सर्वप्रथम प्रणय-विरह गाथा उत्तरापथ-उज्बेकिस्तान की अप्सरा उर्वशी एवं भरतखंड के नृपति पुरुरवा की है| उर्वशी के चले जाने पर पुरुरवा के विरह वेदनात्मक गीत ऋग्वेद में वर्णित हैं| यहीं से साहित्य व काव्य का प्रादुर्भाव हुआ | अरबी-फारसी कवियों ने इसी पर रुबाइयां लिखीं जो शायरी कहलाई एवं उसकी एक विशिष्ट विधा ग़ज़ल के नाम से परवान चढी |* इसीलिये ग़ज़ल में शमा-परवाना, दीपक-शलभ, गुल-बुलबुल, कलिका-भ्रमर आदि प्रसंग प्रभावी हुए |
-------- अरबी गज़ल ईरान होती हुई सारे विश्व में फ़ैली और जर्मन व इंग्लिश में काफी लोक-प्रिय हुई | यथा.. अमेरिकी अंग्रेज़ी शायर ..आगा शाहिद अली कश्मीरी की एक अंग्रेज़ी गज़ल का नमूना पेश है...
Where are you now? Who lies beneath your spell tonight ?
Whom else rapture’s road you expel tonight ?
My rivals, for your love, you have invited them all.
This is mere insult, this is no farewell to night.
------- गज़ल का मूल छंद शे’र या शेअर है | शेर वास्तव में ‘दोहा’ का ही विकसित रूप है जो संक्षिप्तता में तीब्र व सटीक भाव-सम्प्रेषण हेतु सर्वश्रेष्ठ छंद है | आजकल उसके अतुकांत रूप-भाव छंद, मेरे द्वारा सृजित..अगीत, नव-अगीत व त्रिपदा-अगीत भी प्रचलित हैं| अरबी, तुर्की फारसी में भी इसे ‘दोहा’ ही कहा जाता है व अंग्रेज़ी में कसीदा मोनो राइम( Quesida mono rhyme)| अतः जो दोहा में सिद्धहस्त है अगीत लिख सकता है वह शे’र भी लिख सकता है..गज़ल भी | शे’रों की मालिका ही गज़ल है | ग़ज़लों के ऐसे संग्रह को जिसमें हर हर्फ से कम से कम एक ग़ज़ल अवश्य हो दीवान कहते हैं।
------- तुकांतता के अनुसार ग़ज़लें मुअद्दस या मुकफ्फा होती है| मुअद्दस गज़ल में रदीफ और काफिया दोनों का ध्यान रखा जाता है इसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल भी कहते हैं .. यथा ....
उनसे मिले तो मीना ओ सागर लिए हुए,
हमसे मिले तो जंग का तेवर लिए हुए
लड़की किसी ग़रीब की सड़कों पे आ गई
गाली लबों पे हाथ में पत्थर लिए हुए |... - (जमील हापुडी)
एवं मुकफ्फा ग़ज़ल में केवल काफिया का ध्यान रखा जाता है इसे ग़ैर मुरद्दफ़ या गैर रदीफ़ ग़ज़ल भी कहते हैं| जैसे...
जग कुछ भी कहे दास्ताँ तो सुनायेंगे |
साथ मोहब्बत का निभाते ही जायेंगे |
खाई है कसम न जाने की मयखाने
श्याम यादों की मय पीना न भुलायेंगे | ...डा श्याम गुप्त
-------- ग़ज़ल में ग़ज़ल का प्रत्येक शे'र अपने आप में पूर्ण होता है तथा शायर ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र में अलग अलग भाव को व्यक्त कर सकता है | एवं प्रत्येक शेर में एक ही मूल भाव को क्रमिक भी रख सकता है |
--------जब किसी ग़ज़ल के सभी शेर एक ही भाव को केन्द्र मान कर लिखे गए हों तो ऐसी ग़ज़ल को क्रमिक , जारी अर्थात मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं| यदि ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र अलग अलग भाव को व्यक्त करें तो ऐसी ग़ज़ल को ग़ैर -मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं|
----क्रमशः बात ग़ज़ल की ---भाग तीन------
------गज़ल शब्द अरबी रेगिस्तान में पाए जाने वाले एक छोटे, चंचल पशु हिरण ( या हिरणी, मृग-मृगी ) से लिया गया है जिसे अरबी में ‘ग़ज़ल’ (ghazal या guzal ) कहा जाता है | इसकी चमकदार, भोली-भाली नशीली आँखें, पतली लंबी टांगें, इधर-उधर उछल-उछल कर एक जगह न टिकने वाली, नखरीली चाल के कारण उसकी तुलना अतिशय सौंदर्य के परकीया प्रतिमान वाली स्त्री से की जाती थी जैसे हिन्दी में मृगनयनी | अरबी लोग इसका शिकार बड़े शौक से करते थे | अतः अरब-कला व प्रेम-काव्य में स्त्री-सौंदर्य, प्रेम, छलना, विरह-वियोग, दर्द का प्रतिमान ‘गज़ल’ के नाम से प्रचलित हुआ | जैसे भारतीय काव्य-गीतों में वीणा–सारंग का पीड़ात्मक-भावुक प्रसंग |
-------- शायर फिराक गोरखपुरी के अनुसार जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करता हैं और हिरन भागते-भागते झाड़ी में फंस जाता है और निकल नहीं पाता, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज निकलती है, उसी करूण स्वर को गजल कहते हैं. इसलिये विवशता का दिव्यतम रूप में प्रकट होना, स्वर का करूणतम हो जाना ही गजल का आदर्श है |
--------यही गज़ल का अर्थ भी ..अर्थात ‘इश्के-मजाज़ी‘ - आशिक-माशूक वार्ता या प्रेम-गीत, जिनमें मूलतः विरह-वियोग की उच्चतर अभिव्यक्ति होती है |*
---------मानव इतिहास की सर्वप्रथम प्रणय-विरह गाथा उत्तरापथ-उज्बेकिस्तान की अप्सरा उर्वशी एवं भरतखंड के नृपति पुरुरवा की है| उर्वशी के चले जाने पर पुरुरवा के विरह वेदनात्मक गीत ऋग्वेद में वर्णित हैं| यहीं से साहित्य व काव्य का प्रादुर्भाव हुआ | अरबी-फारसी कवियों ने इसी पर रुबाइयां लिखीं जो शायरी कहलाई एवं उसकी एक विशिष्ट विधा ग़ज़ल के नाम से परवान चढी |* इसीलिये ग़ज़ल में शमा-परवाना, दीपक-शलभ, गुल-बुलबुल, कलिका-भ्रमर आदि प्रसंग प्रभावी हुए |
-------- अरबी गज़ल ईरान होती हुई सारे विश्व में फ़ैली और जर्मन व इंग्लिश में काफी लोक-प्रिय हुई | यथा.. अमेरिकी अंग्रेज़ी शायर ..आगा शाहिद अली कश्मीरी की एक अंग्रेज़ी गज़ल का नमूना पेश है...
Where are you now? Who lies beneath your spell tonight ?
Whom else rapture’s road you expel tonight ?
My rivals, for your love, you have invited them all.
This is mere insult, this is no farewell to night.
------- गज़ल का मूल छंद शे’र या शेअर है | शेर वास्तव में ‘दोहा’ का ही विकसित रूप है जो संक्षिप्तता में तीब्र व सटीक भाव-सम्प्रेषण हेतु सर्वश्रेष्ठ छंद है | आजकल उसके अतुकांत रूप-भाव छंद, मेरे द्वारा सृजित..अगीत, नव-अगीत व त्रिपदा-अगीत भी प्रचलित हैं| अरबी, तुर्की फारसी में भी इसे ‘दोहा’ ही कहा जाता है व अंग्रेज़ी में कसीदा मोनो राइम( Quesida mono rhyme)| अतः जो दोहा में सिद्धहस्त है अगीत लिख सकता है वह शे’र भी लिख सकता है..गज़ल भी | शे’रों की मालिका ही गज़ल है | ग़ज़लों के ऐसे संग्रह को जिसमें हर हर्फ से कम से कम एक ग़ज़ल अवश्य हो दीवान कहते हैं।
------- तुकांतता के अनुसार ग़ज़लें मुअद्दस या मुकफ्फा होती है| मुअद्दस गज़ल में रदीफ और काफिया दोनों का ध्यान रखा जाता है इसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल भी कहते हैं .. यथा ....
उनसे मिले तो मीना ओ सागर लिए हुए,
हमसे मिले तो जंग का तेवर लिए हुए
लड़की किसी ग़रीब की सड़कों पे आ गई
गाली लबों पे हाथ में पत्थर लिए हुए |... - (जमील हापुडी)
एवं मुकफ्फा ग़ज़ल में केवल काफिया का ध्यान रखा जाता है इसे ग़ैर मुरद्दफ़ या गैर रदीफ़ ग़ज़ल भी कहते हैं| जैसे...
जग कुछ भी कहे दास्ताँ तो सुनायेंगे |
साथ मोहब्बत का निभाते ही जायेंगे |
खाई है कसम न जाने की मयखाने
श्याम यादों की मय पीना न भुलायेंगे | ...डा श्याम गुप्त
-------- ग़ज़ल में ग़ज़ल का प्रत्येक शे'र अपने आप में पूर्ण होता है तथा शायर ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र में अलग अलग भाव को व्यक्त कर सकता है | एवं प्रत्येक शेर में एक ही मूल भाव को क्रमिक भी रख सकता है |
--------जब किसी ग़ज़ल के सभी शेर एक ही भाव को केन्द्र मान कर लिखे गए हों तो ऐसी ग़ज़ल को क्रमिक , जारी अर्थात मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं| यदि ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र अलग अलग भाव को व्यक्त करें तो ऐसी ग़ज़ल को ग़ैर -मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं|
----क्रमशः बात ग़ज़ल की ---भाग तीन------

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017
श्याम स्मृति-१.यह भारत देश है मेरा -------..डा श्याम गुप्त ...
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
श्याम स्मृति-१.यह भारत देश है मेरा -------..
--- मेरी शीघ्र प्रकाश्य --कृति---श्याम स्मृति से ------
{ इस कृति की रचना के मूल में प्रथमबार ब्लॉग बनाते हुए मेरे पुत्र निर्विकार पंकज श्याम द्वारा सुझाए गए ब्लॉग शीर्षक...The world of my thoughts...---- My myriad thoughts, personal interpretations and their relevance....के शब्द व वाक्य ही हैं, जो आज हिन्दी ब्लोग्स जगत में..... श्याम स्मृति The world of my thoughts...श्याम गुप्त का चिट्ठा ----मेरे विचारों की दुनियां -मेरे अपने विचार एवं उन पर मेरा स्वयं का व्याख्या-तत्व तथा उनका समयानुसार महत्व....के नाम से जाना जाता है|
---------हाँ इसकी पृष्ठभूमि में भाई-बहन, सखा-सखी, पत्नी, स्कूल-कालिज के साथी-सहपाठी, चिकित्सा-महाविद्यालय के साथी-सहपाठी, चिकित्सकीय सेवा में वरिष्ठ-जन, कनिष्ठ सहयोगी, वरिष्ठ चिकित्सक गण, सहयोगी कवि-साहित्यकार एवं प्रशंसकगण आदि द्वारा समय-समय पर की गयीं टीका-टिप्पणियाँ ....”...जाने कहाँ कहाँ तक सोचते रहते हो... कब तक यूंही सोचते रहोगे दूसरों के लिए.... यूं तो मुझे भी भूल जाओगे इसी तरह......बड़े विचित्र ख्यालों वाला व्यक्ति है ....जाने क्या-क्या उल-जुलूल सोचते रहते हो यार?....ये बड़े-बड़े विचित्र से विचार कहाँ से आते हैं तुम्हारे खुराफाती दिमाग में......ही इज द मैन ऑफ़ प्रिंसिपल्स....ये तो हमारा काम करेगा ही नहीं.....जाने किन ख्यालों में खोये रहते हो हरदम, समय पर कुछ याद ही नहीं रहता, जरूरी काम भूल जाते हो .... ये तो खाना खाने के बाद यह भी नहीं बता पाता कि नमक था भी या नहीं....तुम सर्जरी मत लेना, तुम भूलते बहुत हो.... आपके लिए तो ‘आउट आफ साईट आउट आफ माइंड’ ही होता है सबकुछ....” जैसे आप कभी किसी का पक्ष नहीं लेते और लोग एसे नहीं होते.... आपके पास कहाँ से ख्याल आते हैं कविता-कहानी-उपन्यास लिखने के लिए...आपकी प्रेरणा कौन है....कौन किसकी प्रेरणा है? ...आदि आदि ...”... भी हैं |
------ और अंत में मनुस्मृति पर अध्ययन-मनन करते हुए एवं ‘आधुनिक-मनुस्मृति’ शीर्षक से कुछ अगीत काव्य-रचनाये ब्लॉग पर प्रकाशित करते हुए, ब्लॉग के उपरोक्त शीर्षक पर ध्यान गया और एक दिन अचानक ही यह विचित्र विचार मन में उद्भूत हुआ कि क्यों न अपने ये विभिन्न विचित्र विचारों के संकलन द्वारा मनुस्मृति की भांति...’आधुनिक-मनुस्मृति’ की रचना की जाय | जो परिवर्ती विचार द्वारा आज ‘श्यामस्मृति’ नाम से आपके सम्मुख प्रस्तुत है |
----- प्रस्तुत कृति ‘श्याम-स्मृति’ ..मेरी स्मृति में आये हुए विविध विषयक विचार, उपरोक्त टिप्पणियों, टीकाओं, समीक्षाओं, आपसी-वार्ताओं, मंचीय-वार्ताओं, कथनों, गोष्ठियों, सभाओं, वक्तव्यों, संभाषणों, साक्षात्कारों आदि में व्यक्त हुए मेरे स्वतंत्र विचारों के साथ ही विभिन्न आलेखों, कथाओं, रचनाओं, कविताओं, ब्लॉग-पोस्टों, स्वयं द्वारा की गयी टिप्पणियों, वाद-विवाद, बहस आदि में व्यक्त किये गए स्वतंत्र विचार, नवीन चिंतनयुक्त स्थापनाओं का संग्रह है | }
श्याम स्मृति-१.यह भारत देश है मेरा .
.
-----यह भारतीय धरती व वातावरण का ही प्रभाव है कि मुग़ल जो एक अनगढ़, अर्ध-सभ्य, बर्बर घुडसवार आक्रमणकारियों की भांति यहाँ आये थे वे सभ्य, शालीन, विलासप्रिय, खिलंदड़े, सुसंस्कृत लखनवी -नजाकत वाले लखनऊआ नवाब बन गए | अक्खड-असभ्य जहाजी, सदा खड़े-खड़े, भागने को तैयार, तम्बुओं में खाने-रहने वाले अँगरेज़, महलों, सोफों, कुर्सियों को पहचानने लगे |
------यह वह देश है जहां प्रेम, सौंदर्य, नजाकत, शालीनता, इसकी संस्कृति, में रचा-बसा है, इसके जल में घुला है, वायु में मिला है और खेतों में दानों के साथ बोया हुआ रहता है | प्रेम-प्रीति यहाँ की श्वांस है और यहाँ की हर श्वांस प्रेम है |
यह पुरुरवा-उर्वशी का, कृष्ण का, रांझे का, शाहजहां का और ताजमहल का देश है | जहां विश्व में मानव-सृष्टि के सर्वप्रथम काव्य ऋग्वेद में संदेशित है ---
"मा विदिष्वावहै"...किसी से भी विद्वेष न करें ........एवं
"समानी अकूती समानि हृदयानि वा
समामस्तु वो मनो यथा वै सुसहामती|"
.....हम सबके मन, ह्रदय व कृतित्व सहमति व समानता से परिपूर्ण हों|
--- मेरी शीघ्र प्रकाश्य --कृति---श्याम स्मृति से ------
{ इस कृति की रचना के मूल में प्रथमबार ब्लॉग बनाते हुए मेरे पुत्र निर्विकार पंकज श्याम द्वारा सुझाए गए ब्लॉग शीर्षक...The world of my thoughts...---- My myriad thoughts, personal interpretations and their relevance....के शब्द व वाक्य ही हैं, जो आज हिन्दी ब्लोग्स जगत में..... श्याम स्मृति The world of my thoughts...श्याम गुप्त का चिट्ठा ----मेरे विचारों की दुनियां -मेरे अपने विचार एवं उन पर मेरा स्वयं का व्याख्या-तत्व तथा उनका समयानुसार महत्व....के नाम से जाना जाता है|
---------हाँ इसकी पृष्ठभूमि में भाई-बहन, सखा-सखी, पत्नी, स्कूल-कालिज के साथी-सहपाठी, चिकित्सा-महाविद्यालय के साथी-सहपाठी, चिकित्सकीय सेवा में वरिष्ठ-जन, कनिष्ठ सहयोगी, वरिष्ठ चिकित्सक गण, सहयोगी कवि-साहित्यकार एवं प्रशंसकगण आदि द्वारा समय-समय पर की गयीं टीका-टिप्पणियाँ ....”...जाने कहाँ कहाँ तक सोचते रहते हो... कब तक यूंही सोचते रहोगे दूसरों के लिए.... यूं तो मुझे भी भूल जाओगे इसी तरह......बड़े विचित्र ख्यालों वाला व्यक्ति है ....जाने क्या-क्या उल-जुलूल सोचते रहते हो यार?....ये बड़े-बड़े विचित्र से विचार कहाँ से आते हैं तुम्हारे खुराफाती दिमाग में......ही इज द मैन ऑफ़ प्रिंसिपल्स....ये तो हमारा काम करेगा ही नहीं.....जाने किन ख्यालों में खोये रहते हो हरदम, समय पर कुछ याद ही नहीं रहता, जरूरी काम भूल जाते हो .... ये तो खाना खाने के बाद यह भी नहीं बता पाता कि नमक था भी या नहीं....तुम सर्जरी मत लेना, तुम भूलते बहुत हो.... आपके लिए तो ‘आउट आफ साईट आउट आफ माइंड’ ही होता है सबकुछ....” जैसे आप कभी किसी का पक्ष नहीं लेते और लोग एसे नहीं होते.... आपके पास कहाँ से ख्याल आते हैं कविता-कहानी-उपन्यास लिखने के लिए...आपकी प्रेरणा कौन है....कौन किसकी प्रेरणा है? ...आदि आदि ...”... भी हैं |
------ और अंत में मनुस्मृति पर अध्ययन-मनन करते हुए एवं ‘आधुनिक-मनुस्मृति’ शीर्षक से कुछ अगीत काव्य-रचनाये ब्लॉग पर प्रकाशित करते हुए, ब्लॉग के उपरोक्त शीर्षक पर ध्यान गया और एक दिन अचानक ही यह विचित्र विचार मन में उद्भूत हुआ कि क्यों न अपने ये विभिन्न विचित्र विचारों के संकलन द्वारा मनुस्मृति की भांति...’आधुनिक-मनुस्मृति’ की रचना की जाय | जो परिवर्ती विचार द्वारा आज ‘श्यामस्मृति’ नाम से आपके सम्मुख प्रस्तुत है |
----- प्रस्तुत कृति ‘श्याम-स्मृति’ ..मेरी स्मृति में आये हुए विविध विषयक विचार, उपरोक्त टिप्पणियों, टीकाओं, समीक्षाओं, आपसी-वार्ताओं, मंचीय-वार्ताओं, कथनों, गोष्ठियों, सभाओं, वक्तव्यों, संभाषणों, साक्षात्कारों आदि में व्यक्त हुए मेरे स्वतंत्र विचारों के साथ ही विभिन्न आलेखों, कथाओं, रचनाओं, कविताओं, ब्लॉग-पोस्टों, स्वयं द्वारा की गयी टिप्पणियों, वाद-विवाद, बहस आदि में व्यक्त किये गए स्वतंत्र विचार, नवीन चिंतनयुक्त स्थापनाओं का संग्रह है | }
श्याम स्मृति-१.यह भारत देश है मेरा .
.

-----यह भारतीय धरती व वातावरण का ही प्रभाव है कि मुग़ल जो एक अनगढ़, अर्ध-सभ्य, बर्बर घुडसवार आक्रमणकारियों की भांति यहाँ आये थे वे सभ्य, शालीन, विलासप्रिय, खिलंदड़े, सुसंस्कृत लखनवी -नजाकत वाले लखनऊआ नवाब बन गए | अक्खड-असभ्य जहाजी, सदा खड़े-खड़े, भागने को तैयार, तम्बुओं में खाने-रहने वाले अँगरेज़, महलों, सोफों, कुर्सियों को पहचानने लगे |
------यह वह देश है जहां प्रेम, सौंदर्य, नजाकत, शालीनता, इसकी संस्कृति, में रचा-बसा है, इसके जल में घुला है, वायु में मिला है और खेतों में दानों के साथ बोया हुआ रहता है | प्रेम-प्रीति यहाँ की श्वांस है और यहाँ की हर श्वांस प्रेम है |
यह पुरुरवा-उर्वशी का, कृष्ण का, रांझे का, शाहजहां का और ताजमहल का देश है | जहां विश्व में मानव-सृष्टि के सर्वप्रथम काव्य ऋग्वेद में संदेशित है ---
"मा विदिष्वावहै"...किसी से भी विद्वेष न करें ........एवं
"समानी अकूती समानि हृदयानि वा
समामस्तु वो मनो यथा वै सुसहामती|"
.....हम सबके मन, ह्रदय व कृतित्व सहमति व समानता से परिपूर्ण हों|
लेबल:
आधुनिक मनुस्मृति .,
भारत,
मनुस्मृति,
श्याम स्मृति
शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017
बसंत - डा श्याम गुप्त ..
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
सरस्वती वन्दना

बसंत ---- बागों में, वनों में, सुधियों में बगरा हुआ रहता है और समय आने
पर पुष्पित-पल्लवित होने लगता है .....प्रस्तुत है ..बसंत
पर एक रचना .....वाणी की देवी .सरस्वती वन्दना से....
सरस्वती वन्दना
जो
कुंद इंदु तुषार सम सित हार, वस्त्र से आवृता ।
वीणा
है शोभित कर तथा जो श्वेत अम्बुज आसना ।
जो
ब्रह्मा शंकर विष्णु देवों से सदा ही वन्दिता ।
माँ
शारदे ! हरें श्याम' के तन मन ह्रदय की मंदता ।।
प्रस्तुत है
एक गीत ......नव बसंत आये .....
सखी री !, नव बसंत आये |"
जन-जन में ,
जन जन, मन मन में ,
जौवनु जौवनु छाये |....................सखी री ....||
पुलकि पुलकि सब अंग सखी
री ,
हियरा उठे उमंग |
आये ऋतुपति पुहुप बान ले ,
आये रति-पति काम बान ले,
मनमथ छायो अंग |
होय कुसुमसर घायल जियरा
अँग अंग रस भरि लाये |............. सखी री ....||
तन मन में बिजुरी की थिरकन
बाजे ताल मृदंग ,
अंचरा खोले रे भेद जिया के ,
जौबन उठे तरंग |
गलियन गलियन झांझर बाजे ,
अंग अंग हरसाए |
काम -शास्त्र का पाठ पढ़ाने
ऋषि अनंग आये |
सखी री नव-बसंत आये ....||
सखी री !, नव बसंत आये |"
जन-जन में ,
जन जन, मन मन में ,
जौवनु जौवनु छाये |....................सखी री ....||
पुलकि पुलकि सब अंग सखी
री ,
हियरा उठे उमंग |
आये ऋतुपति पुहुप बान ले ,
आये रति-पति काम बान ले,
मनमथ छायो अंग |
होय कुसुमसर घायल जियरा
अँग अंग रस भरि लाये |............. सखी री ....||
तन मन में बिजुरी की थिरकन
बाजे ताल मृदंग ,
अंचरा खोले रे भेद जिया के ,
जौबन उठे तरंग |
गलियन गलियन झांझर बाजे ,
अंग अंग हरसाए |
काम -शास्त्र का पाठ पढ़ाने
ऋषि अनंग आये |
सखी री नव-बसंत आये ....||

रविवार, 4 दिसंबर 2016
गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी ०१दिसम्बर २०१६ गुरूवार...डा श्याम गुप्त...
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
----प्रत्येक
माह के प्रथम गुरूवार को आयोजित होने वाली गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी
०१दिसम्बर २०१६ गुरूवार को डा श्याम गुप्त के आवास सुश्यानिदी, के-३४८ ,
आशियाना , लखनऊ पर आयोजित की गयी |
---------गोष्ठी का प्रारंभ डा श्याम गुप्त द्वारा हरिगीतिका छंद में की गयी माँ शारदे की वन्दना से हुआ ..
"हम हैं शरण में आपकी माँ ज्ञान के स्वर दीजिये |
सुख शान्ति का वातावरण जग में रहे वर दीजिये |
कवि हों सुहृद समर्थ सात्विक सौम्य स्वर परिपूर्ण हों |
साहित्य हो सुन्दर शिवं सत तथ्य शुचि सम्पूर्ण हों ||"
---------गोष्ठी का प्रारंभ डा श्याम गुप्त द्वारा हरिगीतिका छंद में की गयी माँ शारदे की वन्दना से हुआ ..
"हम हैं शरण में आपकी माँ ज्ञान के स्वर दीजिये |
सुख शान्ति का वातावरण जग में रहे वर दीजिये |
कवि हों सुहृद समर्थ सात्विक सौम्य स्वर परिपूर्ण हों |
साहित्य हो सुन्दर शिवं सत तथ्य शुचि सम्पूर्ण हों ||"
----अशोक विश्वकर्मा गुंजन ने कई रचनाएँ प्रस्तुत कीं| नारी के जीने के अधिकार की बात प्रस्तुत करते हुए कहा--
"जीने का अधिकार चाहती हूँ ,
पर स्वाभिमान नहीं छोड़ना चाहती |"
----कविवर अनिल किशोर शुक्ल निडर ने पर्यावरण के प्रति आव्हान करते हुए कई रचनाये प्रस्तुत की एवं कहा---
"चलो सभी मिल वृक्ष लगाएं ,
घुटन तपन सब दूर भगाएं |"
-----कवयित्री सुषमागुप्ता ने ..मन पापी नहीं माने...जो कुछ भी है मैंने सुनाया आदि गीतों से वातावरण को योग ध्यान मय करते हुए सुनाया --
" हे मन ! क्या अभिमान करे |
क्या लाया, क्या लेजायेगा,
किसका मान धरे ..|"
---श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने राष्ट्रपर्व, विमुद्रीकरण आदि पर विभिन्न रचनाये प्रस्तुत करते हुए नोटबंदी व कालाधन पर व्यंग्य प्रस्तुत किया तथा काले धन को काले नाग से संबोधित करते हुए एक अगीत प्रस्तुत किया --
"बजी बीन संपेरे की
गूंजा स्वर ,
शहर गाँव गली गली
काले नाग निकल पड़े |"
---डा श्याम गुप्त ने कालजयी कविता एवं छंदों पर प्रस्तुत अतुकांत गीतों के साथ अपनी रचना 'श्याम मधुशाला' प्रस्तुत की जिसका काव्यांश प्रस्तुत है ---
" पीने वाला क्यों पीता है,
समझ न सकी स्वयं हाला |"
"मंदिर मस्जिद सच्चाई पर
चलने की हैं राह बताते |
और लड़खड़ाकर नाली की,
राह दिखाती मधुशाला ||"
-----श्री गिरीश कुमार मिश्र ने गज़लों के गुलदस्ते पेश करते हुए कहा--
"दरअसल अपना अमन खोते चले जाते हैं हम |
ख्वाहिशों के ढेर को ढोते चले जाते हैं हम | "
---साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने राधाकृष्ण का प्रेम की छंदीय रचना प्रस्तुत की --
"दुष्टों के दालान हेतु, जीवन शमन हेतु,
राधे राधे , श्याम श्याम, राधे श्याम कहिये |"
-----चाय सत्र में चर्चा पर हरिगीतिका छंद के विधान व छंद सौन्दर्य पर चर्चा की गयी |
-- श्याम मधुशाला की हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला से तुलनात्मक तथ्य प्रस्तुत किये गए कि बच्चन की मधुशाला में दार्शनिक तथ्य समुचित है जबकि श्याम मधुशाला में वैज्ञानिक व उसके सामाजिक नकारात्मक प्रभावों पर अधिक जोर दिया गया है |
---डा श्याम गुप्त के वक्तव्य कि गीतों की अधिक लम्बाई एक दुर्गुण है, श्रोता सुनते सुनते यह भूल जाता है कि कहाँ से प्रारम्भ हुआ व किस पर समाप्त हुआ , पर चर्चा हुई कि इसमें गीत का उद्देश्य भी भ्रमित होने का अंदेशा रहता है | नीरज युग के बाद उनकी गीतों की परम्परा आगे न चलने का एक प्रमुख कारण यह भी है |
----श्रीमती सुषमागुप्ता के धन्यवाद ज्ञापन के पश्चात गोष्ठी अगले आयोजन तक स्थगित की गयी |

"जीने का अधिकार चाहती हूँ ,
पर स्वाभिमान नहीं छोड़ना चाहती |"
----कविवर अनिल किशोर शुक्ल निडर ने पर्यावरण के प्रति आव्हान करते हुए कई रचनाये प्रस्तुत की एवं कहा---
"चलो सभी मिल वृक्ष लगाएं ,
घुटन तपन सब दूर भगाएं |"
-----कवयित्री सुषमागुप्ता ने ..मन पापी नहीं माने...जो कुछ भी है मैंने सुनाया आदि गीतों से वातावरण को योग ध्यान मय करते हुए सुनाया --
" हे मन ! क्या अभिमान करे |
क्या लाया, क्या लेजायेगा,
किसका मान धरे ..|"
---श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने राष्ट्रपर्व, विमुद्रीकरण आदि पर विभिन्न रचनाये प्रस्तुत करते हुए नोटबंदी व कालाधन पर व्यंग्य प्रस्तुत किया तथा काले धन को काले नाग से संबोधित करते हुए एक अगीत प्रस्तुत किया --
"बजी बीन संपेरे की
गूंजा स्वर ,
शहर गाँव गली गली
काले नाग निकल पड़े |"
---डा श्याम गुप्त ने कालजयी कविता एवं छंदों पर प्रस्तुत अतुकांत गीतों के साथ अपनी रचना 'श्याम मधुशाला' प्रस्तुत की जिसका काव्यांश प्रस्तुत है ---
" पीने वाला क्यों पीता है,
समझ न सकी स्वयं हाला |"
"मंदिर मस्जिद सच्चाई पर
चलने की हैं राह बताते |
और लड़खड़ाकर नाली की,
राह दिखाती मधुशाला ||"
-----श्री गिरीश कुमार मिश्र ने गज़लों के गुलदस्ते पेश करते हुए कहा--
"दरअसल अपना अमन खोते चले जाते हैं हम |
ख्वाहिशों के ढेर को ढोते चले जाते हैं हम | "
---साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने राधाकृष्ण का प्रेम की छंदीय रचना प्रस्तुत की --
"दुष्टों के दालान हेतु, जीवन शमन हेतु,
राधे राधे , श्याम श्याम, राधे श्याम कहिये |"
-----चाय सत्र में चर्चा पर हरिगीतिका छंद के विधान व छंद सौन्दर्य पर चर्चा की गयी |
-- श्याम मधुशाला की हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला से तुलनात्मक तथ्य प्रस्तुत किये गए कि बच्चन की मधुशाला में दार्शनिक तथ्य समुचित है जबकि श्याम मधुशाला में वैज्ञानिक व उसके सामाजिक नकारात्मक प्रभावों पर अधिक जोर दिया गया है |
---डा श्याम गुप्त के वक्तव्य कि गीतों की अधिक लम्बाई एक दुर्गुण है, श्रोता सुनते सुनते यह भूल जाता है कि कहाँ से प्रारम्भ हुआ व किस पर समाप्त हुआ , पर चर्चा हुई कि इसमें गीत का उद्देश्य भी भ्रमित होने का अंदेशा रहता है | नीरज युग के बाद उनकी गीतों की परम्परा आगे न चलने का एक प्रमुख कारण यह भी है |
----श्रीमती सुषमागुप्ता के धन्यवाद ज्ञापन के पश्चात गोष्ठी अगले आयोजन तक स्थगित की गयी |

सोमवार, 28 नवंबर 2016
पांच त्रिपदा अगीत छंद - डा श्याम गुप्त ....
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
पांच त्रिपदा अगीत छंद ---- मेरे द्वारा सृजित , अगीत कविता विधा का एक छंद ----तीन पंक्तियाँ, प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ , अतुकांत ....
१.
जग में खुशियाँ है उनसे ही,
हसीन चेहरे खिलते फूल; .
हंसते रहते गुलशन गुलशन |

पांच त्रिपदा अगीत छंद ---- मेरे द्वारा सृजित , अगीत कविता विधा का एक छंद ----तीन पंक्तियाँ, प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ , अतुकांत ....
१.
जग में खुशियाँ है उनसे ही,
हसीन चेहरे खिलते फूल; .
हंसते रहते गुलशन गुलशन |
2.
चमचों के मज़े देख हमने,
आस्था को किनारे रख दिया;
दिया क्यों जलाएं हमीं भला |
3.
खुश होकर फूँका उनका घर,
अपना घर भी बचा न पाए ;
चिंगारी उड़कर पहुँची थी |
४.
प्रकृति का सौंदर्य मधुरतम,
पर प्रियतम का वह सुन्दर मुख;
उपमा स्वयं लजा जाती है |
५.
ज़िंदगी की डोर लम्बी है,
थामना भी आना चाहिए;
हंसने का बहाना चाहिए |
चमचों के मज़े देख हमने,
आस्था को किनारे रख दिया;
दिया क्यों जलाएं हमीं भला |
3.
खुश होकर फूँका उनका घर,
अपना घर भी बचा न पाए ;
चिंगारी उड़कर पहुँची थी |
४.
प्रकृति का सौंदर्य मधुरतम,
पर प्रियतम का वह सुन्दर मुख;
उपमा स्वयं लजा जाती है |
५.
ज़िंदगी की डोर लम्बी है,
थामना भी आना चाहिए;
हंसने का बहाना चाहिए |

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