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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

मंगलवार, 20 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त
----पूर्वा पर ----
          आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
          भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
          विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
             -------पोस्ट छह---- कथन २२ से २६ तक---
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   कथन २२---     यहाँ यह देखना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि ब्राह्मण परम्परा जो कि आर्यों की परम्परा है वह अपने आरंभिक संघर्ष में सर्वप्रथम कोयवंशी गोंडों के खिलाफ और बाद में फिर असुरों के खिलाफ कुछ ख़ास तरह के कुटिलतापूर्ण षड्यंत्र और समाज मनोवैज्ञानिक हथकंडे इस्तेमाल कर रही है। ठीक यही हथकंडे और षड्यंत्र ब्राह्मणवादी धर्म को उंचा दिखाने के लिए और उसे प्रतिष्ठित करने के लिए बाद में बुद्ध, बौद्ध धर्म और कबीर व रविदास के खिलाफ भी इस्तेमाल कर रही है। और चूँकि इतिहास और मिथक को ब्राह्मण परम्परा ने सहेजा और आकार दिया है इसलिए उन्होंने शत्रुओं को उनके उद्विकास (क्रमविकास या एवोल्यूशन) की अवस्था के अनुसार कई श्रेणियों में बाँट दिया है जिन्हें असुर और बौद्ध या अछूत कहा जा सकता है। लेकिन स्वयं को अलग अलग श्रेणियों में न रखकर आर्य ब्राह्मण ही घोषित किया है।लेकिन असल में डॉ. आम्बेडकर के विश्लेषण में ये असुर अछूत और बौद्ध अंत में क्षत्रिय ही साबित होते हैं। और देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय और स्वामी अछूतानन्द सहित भदंत बोधानन्द महास्थविर के अध्ययन में ये सब मूलनिवासी साबित होते हैं|
 समाधान २२ --गोंडों,  असुरों और बौद्धों को एक ही दर्शन कैसे हो सकता जबकि सभी में युगों का कालान्तर है | पहले ही कहा जाचुका है ब्राहमण परम्परा आर्यों की नहीं है आर्य सभी वर्गों के लोग थे क्षत्री, ब्राह्मण, शूद्र व वैश्य, वस्तुतः ब्राह्मण कोइ परम्परा ही नहीं है अपितु वे सब आर्य ही हैं, सनातन धर्मी | 
----गलत व अज्ञानी है ये सभी तथाकथित स्वयंभू दार्शनिक एवं विदेशी षडयंत्र के प्रभाव में भ्रमित हैं | बौद्ध, जैन, आदि लोग स्वयं ब्राह्मण व वैदिक परम्परा के विरोध में उठे व मुखर हुए थे न कि वैदिक परम्पराओं ने उनका विरोध किया | कबीर, रविदास तो स्वयं वैदिक परम्पराओं का अनुसरण करते थे वे केवल समाज में आयी हुई कुरीतियों का निराकरण करने हेतु तत्पर थे न की ब्राह्मण-शूद्र, असुर ,बौद्ध आदि के साथ थे | प्रखर आर्य व वैदिक रचयिता वेद व्यास ब्राह्मण नहीं शूद्र थे, श्रीकृष्ण जीवन भर निम्न जाति ग्वाला ही कहे जाते रहे | मूर्ख है ये लेखक एवं तथाकथित शोध करने वाले जिन्हें यह भी ज्ञान नहीं कि ..रावण असुर, राक्षस था परन्तु ब्राह्मण था, राम क्षत्रिय थे, उनके मन्त्रकार गुरु ब्राह्मण  ...बौद्ध धर्म के प्रवर्तक छत्रिय थे न असुर या अछूत एवं उसमें सभी वर्णों के लोग हैं |  
कथन-२३--हालाँकि डॉ. अंबेडकर आर्य आक्रमण थ्योरी में भरोसा नहीं रखते लेकिन फिर भी स्थानीय स्तर पर भारत में उंच नीच के निर्माण का जो षड्यंत्र चलाया गया है उसके सम्बन्ध में उनका विश्लेषण हमारे लिए बहुत उपयोगी है। डॉ. अम्बेडकर के बतलाये अनुसार अगर आर्य अन्य देश से न भी आये हों तो भी उनका अपना विश्लेषण ब्राह्मण श्रमण या ब्राह्मण क्षत्रिय संघर्ष को अपनी पूरी नग्नता में उजागर करता है। इसी को अगर प्राचीन भारतीय भौतिकवाद के विश्लेषण के साथ रखा जाए तो ये संघर्ष देव-असुर संग्राम को भी ब्राह्मण-क्षत्रिय संग्राम की तरह निरुपित कर सकता है। यह तर्क और यह तरीका बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसका ठीक इस्तेमाल करते हुए हम देख पाते हैं कि एक आततायी संस्कृति के प्रतिनिधियों ने मूलनिवासी संस्कृति को एक जैसे तरीकों और षड्यंत्रों से कमजोर कर परास्त किया है। यह तरीका क्या था? वह समाज मनोवैज्ञानिक, धार्मिक-दार्शनिक उपाय क्या था? इसका उत्तर असुरों, बौद्धों कबीर और रविदास के खिलाफ रची गयी मिथकीय कथाओं में मिलता है।
 समाधान २३--- अर्थात आंबेडकर के अनुसार आर्य बाहरी नहीं थे कोइ आताताये अन्कृति थी ही नहीं तो फिर यह सारा का सारा विरोध कहीं ठहरता ही नहीं | केवल विदेशी षडयंत्रों के प्रभाव में  अपनी राजनीति चमकाने हेतु यह सारा ताम झाम उठाया जा रहा है | हमें सावधान रहना चाहए | हमारी एकता को तोड़ने का षडयंत्र है | और भितरघात में हम भारतीय सदा से ही माहिर हैं |


कथन २४----गोंडी पुनेम दर्शन और ब्राह्मणी धर्म----- असुर जो कि लोकायतिक हैं, और जो चार महाभूत वाले इस लोकवादी दर्शन को मानते थे उन्हें उनके दर्शन सहित निन्दित ठहराया गया हैये दर्शन और ये समाज आत्मा या परमात्मा को नहीं बल्कि प्रकृति को मानता था।
    आज भी आदिवासी/मूलनिवासी समाज में आत्मा और परमात्मा की परलोकवादी धारणा की बजाय प्रकृति की शक्तियों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। असुरों की भाँति एक अन्य बहुत ही महत्वपूर्ण जनजातीय समुदाय है जिन्हें गोंड कहा जाता है। गोंड एक समय में बहुत शक्तिशाली राज्य व्यवस्था के संस्थापक रहे हैं और दलपतशाह जैसे महान गोंडी राजाओं ने बहुत विस्तृत भूभाग पर शासन किया है। आज भी उनके नाम पर मध्यप्रदेश के बालाघाट सहित अन्य अनेक जिलों में उनके व अन्य गोंड राजाओं के किलों, मंदिरों और अन्य भवनों के खंडहर मौजूद हैं। पुरातात्विक खोजें अब यह सिद्ध कर रही हैं कि भारत के प्रत्येक राज्य में प्राचीन मंदिरों और किलों के खंडहरों में गोंडी राज चिन्ह (हाथी पर बैठा शेर) पाया जाता रहा है। इससे आभास होता है कि गोंडी संस्कृति संभवतः पूरे भारत में फली-फूली होगी और बाद में आर्य या ब्राह्मणी षड्यंत्रों से उसी तरह नष्ट की गयी जिस तरह कि बाद में महिषासुर, रावण, बुद्ध, कबीर और उनके संप्रदायों को नष्ट किया गया।
समाधान -२४..क्या दलपत शाह, गोंडों के मौजूद किले व मंदिर व राज चिन्ह, या सुप्रसिद्ध गोंड रानी दुर्गावती आदि महिषासुर, रावण, बुद्ध कबीर सभी से प्राचीन हैं |  वस्तुतः ये लोग इतिहास व पुराणों से बिलकुल अनभिज्ञ है |
     सभी जानते हैं कि इन सभी गोंड राजाओं रानियों को भारत के वीरों में गिना जाता है, वे भारतीय थे न की केवल गोंड | गोंड जाति, जन जाति भारत की एक प्रसिद्द प्राचीन वंश है | शायद प्राचीनतम जिसके नाम पर आदि-कालिक पृथ्वी के दक्षिणी भूभाग का नाम गोंडवाना लेंड रखा गया जहां मानव का उद्भव हुआ |
      यह प्राचीन गोंड संस्कृति आदि मानव से लेकर ...वनांचल की संस्कृति थी जिसने पूर्व हरप्पा सभ्यता का निर्माण किया एवं सुमेरु लोक ( ब्रह्म लोक ), सरस्वती क्षेत्र , कैलाश-मानसरोवर क्षेत्र की सरस्वती सभ्यता के मानवों से( जो आदि-मानव काल में ही भारतीय भूखंड व सुमेरु पर्वतीय भूखंड के मध्य फैले टेथिस सागर(दिति सागर ) को पार करके सरस्वती –मानसरोवर क्षेत्र में पहुंचकर उन्नत मानव होचुके थे )  तादाम्य करके एक उच्च संस्कृति वैदिक संस्कृति को जन्म दिया | यह शंभू शिव एवं ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र द्वारा मानव समन्वय का प्रथम प्रयास था जिसके मूल विचारक व कर्ता शंभू सेक या शिव थे | इसीलिये वे महादेव कहलाये एवं विश्व की प्रत्येक संस्कृति में पूज्य हुए | क्योंकि यही मानव एवं संस्कृति समस्त विश्व में फ़ैली | आज भी यही मानव सारे विश्व में रहते हैं |

कथन २५--डॉ. कंगाली के अध्ययन से इस मान्यता को न केवल बल मिलता है बल्कि एक अर्थ में उनकी महान खोज इस बात को स्थापित ही कर देती है कि गोंडी पुनेम दर्शन या संस्कृति पहली अखिल भारतीय संस्कृति रही है। उनका अध्ययन स्पष्ट करता है कि किस तरह ब्राह्मणी धर्म ने गोंडी धर्म और संस्कृति को बुद्ध के उदय के बहुत पहले ही आत्मसात करके मूल गोंडी समुदायों को षड्यंत्रपूर्वक समाज व राज्य व्यवस्था में निचले पायदानों पर धकेलकर जंगलों में ही सीमित कर दिया था। यह देखना उपयोगी है कि लोकयातिकों और मूल सांख्य सहित तंत्र के समान ही गोंडी दर्शन भी इश्वर को नही मानता, बल्कि प्रकृति की शक्तियों को मानता है सृष्टि सृजन या सृष्टिकर्ता में वे विश्वास नहीं करते उनके लिए यह प्रकृति ही सब कुछ है जो न कभी पैदा हुई न कभी समाप्त होगी।
समाधान २५---निश्चय ही गोंडी संस्कृति सर्वप्रथम अखिल भारतीय संस्कृति रही होगी जो बनांचल संस्कृति थी | जैसा बिंदु २४ में स्पष्ट किया जा चुका है | सांख्य आदि दर्शन वैज्ञानिक, अध्यात्म, व मानवमनोविज्ञान, समाज विज्ञान के क्रमिक विकास की एक निम्न सौपान है जो भारतीय षड्दर्शन ( जिसमें आस्तिक व नास्तिक दर्शनों का क्रमिक विकास है ) का अंग है बौद्ध, जैन, लोकायत आदि भारतीय नास्तिक दर्शन के अंग हैं जो मानव व वैश्विक समाज-धर्म के क्रमिक बौद्धिक विकास के द्योतक हैं...  |
 कथन २६--मध्यप्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों के शिक्षित गोंड आज भी गर्व से कहते हैं कि भगवान् शब्द उनका दिया हुआ है जिसमे भ भूमि, गगन, वायु अ अग्नि और न नीर है।
     यह अर्थ असल में इस लोक के समर्थन में है,  इसमें कोई  अतिभौतिक या पारलौकिक तत्व शामिल नहीं है और यह अर्थ सृष्टिकर्ता या परमात्मा की सत्ता की बजाय प्रकृति की शक्तियों को महत्व देता है। सृष्टिकर्ता या सर्जक इश्वर को नकारने वाला यही सूत्र श्रमणों अर्थात बौद्धों और जैनों में भी है। असल में गहराई से देखें तो किसी पारलौकिक या अतिभौतिक तत्व के आधार पर ही ब्राह्मणों या आर्यों ने परलोक आत्मा और परमात्मा को आकार दिया है, इसीलिये हम देखते हैं कि बहुत बाद में आगे चलकर प्रथम गोंडी दार्शनिक कुपार लिंगों की ही तरह बुद्ध ने पारलौकिक तत्व की संभावना को ही मिटा डाला।

समाधान २६  ---यही तो भारतीय वैदिक दर्शन के पंचतत्व हैं---क्षिति जल पावक गगन समीरा हैं | यही तो सांस्कृतिक समन्वय है | भगवान् शब्द, मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है, बहुत बाद का है, यह प्रकृति या परमतत्व का समानार्थी नहीं है | गोंड शब्द को भी वे अपनी विशिष्ट शैली में भगवान् शब्द का ही अन्य रूप मानते हैं। अंग्रेज़ी का गॉड शब्द गौंड से ही आया है ?
   पर पारलौकिक संभावना मिती कहाँ, स्वयं बौद्ध दुनिया से मिट गए, आज बौद्ध धर्म दो एक देशों में सिमट कर रह गया है | जैन भी लघु रूप में है | वस्तुतः भौतिक,  अधिभौतिक तत्व अर्ध विक्सित सभ्यता का है,  बुद्धि-ज्ञान के आगे विकास में पारलौकिक व अधि-आत्मिक तत्व का विकास हुआ, केवल दिखने वाले प्रत्यक्ष भौतिक सुन्दरम के आगे शिव एवं सत्य का प्रादुर्भाव हुआ | और इन तीनों के समन्वित तत्व का नाम ईश्वर हुआ,  ब्रह्म,  परमात्मा  | भगवान्,  मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है बहुत बाद का है, ईश्वर का समानार्थी नहीं |


-----------क्रमश --पोस्ट सात--आगे
चित्र गूगल===
१,२अ ब--ब्रह्म-ईश्वर ...३, त्रिदेव,,,,४,५,६,७,८,...भगवान गणेश, परशुराम, कृष्ण,वरुणदेव , हनुमान ....

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शुक्रवार, 16 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट-पांच--डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 


भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---डा श्याम गुप्त



           आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड  आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है | भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा  इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
       विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |


-------पोस्ट पांच----कथन-समाधान १८ से २१ त१क-----



कथन-१८--- पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाके में जलपाईगुड़ी ज़िले में स्थित अलीपुरदुआर के पास माझेरडाबरी चाय बागान में रहने वाली एक जनजाति के लोग दुर्गापूजा के दौरान मातम मनाते हैं। इस दौरान वे न तो नए कपड़े पहनते हैं और न ही घरों से बाहर निकलते हैं, ये लोग असुर हैं और महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं (BBC HINDI, 2015)उनकी अपनी मान्यताओं में महिषासुर एक नायक हैं और दुर्गा खलनायिका हैं। इसी वजह से पूरा राज्य जब खुशियां मनाने में डूबा होता है तब ये लोग मातम मनाते रहते हैं। इस जनजाति के बच्चे मिट्टी से बने शेर के खिलौनों से खेलते तो हैं, लेकिन उनमें से किसी के कंधे पर सिर नहीं होता। बच्चे शेरों की गर्दन मरोड़ देते हैं। यह दुर्गा की सवारी जो है। कुछ विद्वान तो आर्य आक्रमण सिद्धांत को आधार बनाकर यह भी सिद्ध करते हैं कि आर्यों का दुर्गा का मिथक भी असल में सुमेरियन/मेसोपोटामियन मिथकों से लिया गया है। सुमेरियन लोगों में इनन्नानामक युद्ध और उर्वरता की देवी की मान्यता थी और यह देवी भी सिंह पर सवारी करती थी।--- इसी देवी के मिथक ने इरान, सिन्धु सभ्यता और बाद में अन्य भारतीय महाद्वीप के मिथकों को आकार दिया (Wolpert, 2006)|
समाधान-१८.---परन्तु गोंड साम्राज्य का राज्य चिन्ह हाथी पर सवार शेर का क्या करेंगे, उसकी गर्दन कौन मरोडेगा | वास्तव में उलटा सोच जा रहा है .....ये कथाएं एवं मिथक यहीं से सारे विश्व में गयीं हैं | जब भारतीयों ने महासमन्वय ( शिव, इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा के नतृत्व में हुआ मानव इतिहास का सर्वप्रथम व सबसे बड़ा समन्वय जिसके बारे में आगे यथास्थान बताया जायगा)  के पश्चात समस्त विश्व पर राज्य किया | हो सकता है कि महिषासुर के कुछ वंशज बचे हों, इससे महिषासुर अच्छा व्यक्ति थोड़े ही होजाता है, वंशज तो आज रावण के भी हैं |


कथन -१९- डॉ. अंबेडकर ने अपनी रिसर्च में ये सवाल खड़े किये हैं कि भारत में देवियों और मातृदेवियों का उभार एक गहन पहेली है जिसके आधार पर इस देश के धर्म-दर्शन के उद्विकास के बहुत सारे पहलू उजागर किये जा सकते हैं।
----इस अर्थ में चट्टोपाध्याय और डॉ. अंबेडकर दोनों ही मातृसत्तात्मक परिवार और समाज व्यवस्था सहित ब्राह्मणी धर्म में देवियों की भूमिका के साथ प्राचीन भारतीय भौतिकवादी परम्पराओं को रखकर देखने का आग्रह कर रहे हैं। चट्टोपाध्याय अपनी अकादमिक रिसर्च से वहां पहुँच रहे हैं और डॉ. अंबेडकर अपनी धर्म-दर्शन और धर्म के समाजशास्त्र को आधार बनाकर उस निष्कर्ष तक आ रहे हैं। बालाघाट के लांजी नामक स्थान में नेताम गोंडी वंश के दुर्ग की खुदाई में भगवान् महावीर,  गणेश और बुद्ध की मूर्तियाँ मिली हैं जिनका सीधा संबंध श्रमण या लोकायत परम्परा से है |
समाधान १९- अर्थात लोकायत परम्परा व प्राचीन आर्य वैदिक परम्परा का मिश्रण-समन्वय  हुआ है क्योंकि श्रमण संस्था भी वैदिक कालीन संस्था है जो वैदिक ऋषि अपनाते थे | गणेश जैन व बौद्ध धर्म के समय की लोकायत या श्रमण संस्था के नहीं हैं, जो इन संस्थाओं ने वैदिक धर्म से अपनाई, अपितु उनसे बहुत अधिक प्राचीन हैं वे वैदिक देव हैं |.. और यह मूर्तियाँ मिलना कोइ पुराकाल का तथ्य नहीं है अपितु नवीन जैन या बौद्ध काल का तथ्य है | अति पुराकाल में मूर्तिकला कहाँ थी |
      कथन २०- गोंडों सहित बैगा, मारिया, भील, ओराव, हलवा आदि जनजातियों में भूमि, वन, जल, पर्वत सहित धरती और स्त्री की उर्वरा शक्ति को सम्मान देने की परम्पराएं एक जैसी हैं। ये लोग अपनी विशेष जीवन शैली लिए जंगलों में सिमटते रहे हैं या सिमटने को मजबूर हुए हैं और इनके परितः शहरी या नागर समाज में भिन्न किस्म की या पित्रसत्तात्मक संस्कृति ने सत्ता स्थापित की है। इस तरह देखें तो दो ही संभावनाएं हैं पहली यह कि या तो मूलनिवासी जनजातियों ने कभी भी नगर नहीं बसाए और खेती नहीं की है और सदैव ही वनवासी जीवन व्यतीत किया है और दूसरी यह कि उन्होंने नागर सभ्यता भी पैदा की लेकिन किसी कारण से कालान्तर में उनकी सभ्यता जंगलों में सिकुड़ते जाने को विवश हो गयी।
     भौतिकवादी, श्रमण, नास्तिक, वेदविरोधी, मूलनिवासी, स्त्रीवादी और अंबेडकरवादी विचारक सब के सब अपने-अपने और अलग-अलग प्रस्थान बिन्दुओं से यात्रा करते हुए भी एक साझे निष्कर्ष तक चले आ रहे हैं। वे सब के सब अनिवार्य रूप से ब्राह्मणवाद को मूल भारतीय भौतिकवादी और मातृसत्तात्मक संस्कृति के खिलाफ खड़ी की गयी प्रतिसंस्कृतिनिरूपित करते हैं।
      इसका सीधा अर्थ ये है कि वर्तमान में जो दलित, मूलनिवासी या स्त्रीवादी आन्दोलन हैं वे जिस संस्कृति का नक्शा बना रहे हैं या खोज कर रहे हैं वही असल में इस देश की प्राचीन और प्रगतिशील संस्कृति थी जिसके खिलाफ षड्यंत्रपूर्वक ब्राह्मणवादी और भाववादी दर्शन पर आधारित प्रतिसंस्कृति खड़ी की गयी थी।
समाधान २०---ये सभी जातियां निश्चय ही हमारी पुरा आदि निवासी जातियां हैं जो सदैव से ही भारत के वनांचल सभ्यता रही हैं | यही सभ्यताएं समय समय पर नागरी सभ्यता में परिवर्तित होती रही हैं | यह ऐसा ही है जैसे आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्र व नागरी क्षेत्र भिन्न भिन्न है उनके रहन-सहन भिन्न भिन्न हैं और समय समय पर ग्रामीण परिवार नगर में आकर बसते रहते हैं तथा दोनों के क्रियाकलाप व्यवहार आदि का मिश्रण-समन्वय होता रहता है |
     निश्चय ही प्रतिसंस्कृति किसी उन्नत संस्कृति के प्रति ही खडी की जाती है, जिसे विनष्ट नहीं किया जा सकता | यह इस देश का, किसी भी देश का इतिहास रहा है, बुरी संस्कृति को तो विनष्ट किया जाता है चाहे वह कितनी भी वलशाली हो, जैसा दैत्यों, असुरों, रावण, कंस, दुर्योधनों आदि शक्तिशाली अप-संस्कृतियों का किया गया |
     इस देश में सदा से ही प्रगतिशील, भाववादी संस्कृति रही है | कथन में वर्णित आन्दोलन जिस संस्कृति की खोज का नक्शा बनारहे हैं यह वही संस्कृति है जो देश की सनातन आदि संस्कृति है जो सदा से वनांचल संस्कृति, ग्रामीण संस्कृति व नागरी संस्कृति का समन्वित रूप है और आज भी वही संस्कृति बहुरंगी रूप में भारत के कोने कोने गाँव गाँव नगर नगर में मौजूद है | जो हमारे त्यौहार, ऋतुएँ, पर्व, रहन-सहन, खान-पान, धार्मिक व्यवहार की सर्वत्र समानताओं से परिलक्षित होता है जिसे अनेकता में एकता कहा जाता है ,जिसे तोड़ने के असफल प्रयत्न किये जारहे हैं|

कथन २१- देवअसुर संग्राम,  ब्राह्मणक्षत्रिय या ब्राह्मणबौद्ध संघर्ष  ----
     प्राचीन कोयवंशीय गोंडों,  असुरों और बौद्धों को एक ही दर्शन के हिस्से के रूप में देखना न केवल तर्कपूर्ण है बल्कि अब आवश्यक भी हुआ जा रहा है। प्राचीन संहिताएँ और मिथक जिन संघर्षों का उल्लेख करते हैं वे बहुत महत्वपूर्ण हैं।....इनसे जुड़े रूपक व् प्रतीक दंतकथाओं और लोक कथाओं के रूप में भारत के बहुत सारे हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमे गजब की समानता है और इनके धर्मदर्शन और समाज मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोग (इम्प्लीकेशंस) एक जैसे हैं।
         यह समानता यह सिद्ध करती है कि एक आततायी संस्कृति ने किसी प्राचीन संस्कृति के वाहकों  को एक जैसे समाज मनोवैज्ञानिक उपाय से छलपूर्वक नष्ट किया था।
     इस बात का स्पष्ट उल्लेख न सिर्फ महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. अंबेडकर के चिन्तन में मिलता है, बल्कि जनजातीय समाज से आने वाले विद्वानों और धार्मिक नेताओं से भी यही सूत्र प्राप्त होता है। इनमें एक नया और महत्वपूर्ण नाम है डॉ. मोतिरावण कंगाली (1949-2015) का जो गोंड समाज की धार्मिक परम्पराओं और भाषाओं के विद्वान थे।
    भारत के अनेकों राज्यों में एक समान समाज मनोवैज्ञानिक आशय लिए हुए सैकड़ों दन्त कथाएं हैं जिनमें  देवों  और असुरों के संघर्ष का जिक्र आता है। ये संघर्ष असल में ब्राह्मणों और क्षत्रियों का संघर्ष रहा है (Ambedkar,1970)
    स्वयं ऋग्वेद की अनेकों रिचाओं में स्पष्ट संकेत हैं कि आर्य युद्धखोर और मदिरासेवी लोग थे (Ross, 2008) । इन आर्यों के लिए भारत की जलवायु बहुत सुखद और सहायक सिद्ध हुई और वे यहीं रूककर अपना विस्तार करने लगे। स्वाभाविक रूप से अपने साथ अपने पशु हथियार और परम्पराओं के साथ अपनी मान्यताएं और मिथक भी लाये थे (Keith,1925)। इन परम्पराओं और मिथकों ने स्थानीय परम्पराओं और मिथकों के साथ मिलकर बहुत ही चकरा देने वाला कथानक रचा है, जिसे समझ पाना अब संभव हो पा रहा है।
     धर्म दर्शन, साहित्य, इतिहास, मिथक और पुरातत्व सहित भाषा विज्ञान से अब जो सूत्र मिल रहे हैं। वे किसी एक साझे संश्लेषण की तरफ इशारा करते हैं। वह संश्लेषण इस अर्थ में है कि अगर भारतीय राज्यों में अलग-अलग फ़ैली दंतकथाओं लोककथाओं और वाचिक परम्पराओं में फैले सूत्रों को ठीक से देखा जाए तो उनमे एक जैसी प्रवृत्तियाँ हैं। समाज मनोवैज्ञानिक अर्थ में रची गयी वर्जनाओं और पुरस्कारों सहित उनके प्रस्थान बिंदु और उनके लक्ष्य एक जैसे हैं. ---       ये समानता कोयवंशी गोंडों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण नायक संभूशेकसहित बाद में असुरों और बौद्धों के खिलाफ रचे गए मिथकों में एकदम साफ़ नजर आती है।

समाधान २१—जो रूपक व् प्रतीक दंतकथाओं और लोक कथाओं के रूप में भारत के बहुत सारे हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमे गजब की समानता है और इनके धर्मदर्शन और समाज मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोग (इम्प्लीकेशंस) एक जैसे हैं। ----इससे इस संस्कृति के लोग आततायी कैसे हुए अपितु निश्चय ही यह एक समन्वित उच्च संस्कृति की ओर इशारा करते हैं जो भारत भर में फ़ैली हुई थी सभी धर्म दर्शन, पंथ , सम्प्रदाय उसी संस्कृति के अंग थे जिसका वर्णन समाधान २० में किया गया है | पहले ही स्पष्ट होचुका है कि गोंडों के तथाकथित नायक शम्भूसेक स्वयं ही महादेव शिव हैं जो स्वयं वेदों के निर्माता हैं | 

चित्र---१. गोंडों के जुन्नार देव का त्रिशूल----अर्थात शिव के पूर्व रूप के त्रिशूल...
चित्र-२.--कथित गोंड राज्य चिन्ह ---कोणार्क--हाथी पर सवार शेर---अर्थात दुर्गा की सवारी ..

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----------क्रमश पोस्ट ६ आगे----