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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

बात गीतों की----- भाग चार --अंतिम क़िस्त---डा श्याम गुप्त

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


--------- बात गीतों की----- भाग चार --अंतिम क़िस्त ------




-------------- आज यदि हम किसी पत्रिका या पत्र या अंतरजाल पत्रिकाओं या अंतरजाल पर चिट्ठों ( ब्लोग्स-आदि ) को उठाकर देखें तो विविध रूप में कविताओं आदि के साथ-साथ गीत अपने विविध रूप रंगों यथा - प्राचीन गीत, आधुनिक गीत, वैयक्तिक गीत, राष्ट्रीय गीत, श्रृंगार गीत, प्रगतिवादी गीत, नवगीत, अगीत, प्रचार गीत, लोक शैली के गीत एवं ग़ज़ल गीत, गीतिका आदि में अपनी छटा विखेरता हुआ मिलता है |
-------------------अंतरिक्ष यात्रियों, वैज्ञानिकों द्वारा बादलों की रंगीनी, नक्षत्रों के सौन्दर्य का रागात्मक वर्णन इसी काव्यानंद, गीत-भाव को प्रदर्शित करता है जिसके बिना मानव जीवन अपंग है |
------अर्थात वैज्ञानिक बुद्धिवाद, गद्य का अपरम्पार प्रयोग भी उल्लास के भावनात्मक क्षणों को नहीं रोक पाता जब मानव मन में नभ में छिटके हुए तारों को, खिले हुए पुष्पों देखकर गीतात्मकता का भाव उत्पन्न होता है |
----- उल्लास का वही क्षण उसे पुष्प के तात्विक विवेचन की शक्ति देता है अन्यथा विश्लेष्य, विश्लेषण व विश्लेषक सभी इतने यांत्रिक होजायं कि मानव मन उसे समन्वित ही न कर पाय |
------गीत में भाव, शब्द, तन्मयता आदि विशेषताएं भिन्न भिन्न होते हुए भी एक लय से जुडी रहती हैं | गीत के प्रति आकर्षण के मूल में संभवतया यही सहज सम्प्रेषणीयता है |
------------------------यही कारण है कि अनेक अवरोधों के बाद भी गीत आज तक अपनी चमक दिखा रहा है| गीत का श्रृंगार है-शालीनता और संक्षिप्तता | लय आधारित होना अथवा संगीतमय लोकगीतों का ध्रुवपद पर आधारित होना गीत की विशेषता है जो इसे गीत बनाती है| गीत जो मृत्युंजय है, कालजयी है |

---------------------जहां तक पारंपरिक गीतों में एवं श्रृंगार व प्रेम की बात है| गीतों के मूल में पराविद्या की अपार्थिवता, वेदान्त के अद्वैत, लौकिक प्रेम की तीब्रता, कबीर का सांकेतिक द्वैत दाम्पत्य सूत्रभाव एवं निराला का स्नेह का सम्बन्ध समायोजित रहता है |
-------------- आदि-सृष्टि की रचना भी तो उस परमतत्व के आदि-प्रेम भाव, आदि-इच्छा, ईषत इच्छा का सौन्दर्यमय श्रृंगारसिक्त प्राकट्य से उद्भूत प्रकृति-गीत ही है| प्रेम से ही तो पृथ्वी पर जीवन-स्पंदन है, जीवन-क्रंदन है | प्रेम ही वह तत्व है जिससे मानव दिव्य होजाता है| इस दिव्यता का सरित-प्रवाह लोक से होकर ही जाता है जो सहज, सरल एवं ऋजु जीवन मार्ग है, छल कपट अहं का त्याग एवं सरल ह्रदय युत | घनानंद के शब्दों में ---
अति सूधो सनेह कौ मारग है, जहां नैकु सयानप बांक नहीं |
जहां सांचे चलें तजि आपुनपौ, झिझकें कपटी जो निसाँक नहीं ||

-------------------प्रेम व श्रृंगार जीवन का उत्स है सम्पूर्णता है जीवन का संगीत है, जीवन का जीवन है जिसकी आराधना हर गीतकार करता है|
----- प्रीति-स्मृतियाँ कोमलतम व सुन्दरतम अनुभूतियां होती हैं, चाहे बालमन की हों या कैशोर्य की या युवा मन की, सखा-सखी या प्रेमी-प्रेमिका या साथी-संगिनी की|
-----कवि मन तो कभी वृद्ध होता ही नहीं | स्मृतियाँ चाहे पल भर के संयोग की मिलन की हों या विरह की या सतत सान्निध्य की, कवि उनमे विविध विम्ब, कल्पनाएँ उकेर कर रंग भरता है, उन्हें घटनाक्रम देता है|
-------------------गीतों में प्रेम या श्रृंगार, मांसल-सौन्दर्य की व्याख्या नहीं अपितु आत्मिक सौदर्य के निर्मल सरोवर में खिलते हुए शतदल की शोभा को निरखते-परखते-सराहते काव्यानंद रूपी आत्मानंद से परमात्मानंद तक की यात्रा होती है, सत्य-शिव-सुन्दर रूप में काव्य-सृजन का पथ होता है |
------अतःगीतों में मर्यादित श्रृंगार ही श्रृंगार है अन्यथा वह अश्लीलता बन जाता है | प्रेम व श्रृंगारिक रचना सरल, सरस व अर्थ गाम्भीर्य के साथ गहन तत्वार्थ लिए हुए, क्लिष्ट शब्दों-भावों से दूर अभिधात्मक होनी चाहिए|
----- श्रृंगार गीत रचना नारी रूप-सौन्दर्य की भाँति है अर्थात शब्दावली, तथ्य, कथ्य इस प्रकार होने चाहिए कि श्रृंगार का आनंद भी मिले एवं खुलापन भी न रहे| ....यथा महाकवि बिहारी दास के शब्दों में ---
“कवि आखर अरु तिय सेकून, अध उघरे सुख देत,
अधिक ढके तो सुख नहीं, उघरे महा अहेत | “

---------------- उषा का युवती रूप सौन्दर्य, अगस्त्य–लोपामुद्रा, यम-यमी, उर्वशी-पुरुरवा के वैदिक गीतों से वाल्मीकि एवं कालिदास से होते हुए विद्यापति, केशव, विहारी दास, रहीम, तुलसी, सूर, मीरा, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद आदि से गुजरते हुये आधुनिक हिन्दी गीत में प्रेम के संयोग व वियोग के सभी भावों–पक्षों के गीतों एवं श्रृंगार रचनाओं-गीतों की लम्बी परम्परा है | ऋग्वेद में ऋषि वामदेव का कथ्य श्रृंगार का अनुपम उदाहरण है –
“कन्येव तन्वा शाश्दानां ऐषि देवि देवप्रिय क्षमांणम |
संस्मयमाना युवतिः पुरस्तादार्विवक्षांसि कृणुते विभाति |

---- वह (उषा देवि) कमनीय कन्या के समान सज्जित वेश में देवों के प्रिय देव, अभिमत फलदाता सूर्य के निकट जाती है और यह मंद मंद मुस्कुराती हुई युवती उसके समक्ष अपने वक्ष प्रदेश को अनावृत्त कर देती है |

---------------- प्रेम के दो अक्षर अथवा कबीर की भाषा में ढाई आखर अपने अन्दर से असीम प्रभा उद्भासित करते हैं और श्रृंगार उस प्रभा की लौकिक अभिव्यक्ति है जो सर्वाधिक प्रभावी ढंग से गीतों में उद्भूत होती है | प्रेमगीत- जिसे हर अणु, जड़, जंगम या जीव, हर मानव ह्रदय गुनुगुनाता है | बस कवि उन्हें कागज़ पर उतारने का प्रयत्न करता है |
                                            -------इति-------- बात गीतों की -----



 

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

मेरी सद्यप्रकाशित प्रेम व श्रृंगार गीत संग्रह---डा श्याम गुप्त ---

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 



                           मेरी सद्यप्रकाशित प्रेम व श्रृंगार गीत संग्रह ----प्रस्तुत कृति में जीवन के विविध भाव-क्षणों में प्रेम एवं श्रृंगार के विभिन्न पक्षों का विविध रूपों में काव्य-भावों के रूप में चित्रण प्रस्तुत किया गया है -----






 

मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद---डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद---डा श्याम गुप्त -----

----------------मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद ----इस कृति में ईशोपनिषद जो यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय है जिसमें उपनिषदकार ने १८ मन्त्रों में , मानव आचरण व व्यवहार हेतु भारतीय, वैदिक ज्ञान एवं जीवन व्यवहार के सिद्धांतों का मूल प्रस्तुत कर दिया है, उसका सरल हिन्दी में काव्य भावानुवाद प्रस्तुत किया गया है -----


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 प्रस्तुत है----
ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र ..ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |”
                                                    तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध कस्यविद्धनम "
 के प्रथम भाग..ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद......
कुंजिका- इदं सर्वं =यह सब कुछ...यदकिंचित=जो कुछ भी ...जगत्याम= पृथ्वी पर, विश्व में ...जगत= चराचर वस्तु है ...ईशां =ईश्वर से ..वास्यम=आच्छादित है |
मूलार्थ- इस समस्त विश्व में जो कुछ भी चल अचल, जड़,चेतन वस्तु, जीव, प्राणी आदि है सभी ईश्वर के अनुशासन में हैं, उसी की इच्छा /माया से आच्छादित/ बंधे हुए हैं/ चलते हैं|
ईश्वर माया से आच्छादित,
इस जग में जो कुछ अग-जग है |
सब जग में छाया है वह ही,
उस इच्छा से ही यह सब है |
ईश्वर में सब जग की छाया,
यह जग ही है ईश्वर-माया |
प्रभु जग में और जग ही प्रभुता,
जो समझा सोई प्रभु पाया |
अंतर्मन में प्रभु को बसाए,
सबकुछ प्रभु का जान जो पाए |
मेरा कुछ भी नहीं यहाँ पर,
बस परमार्थ भाव मन भाये |
तेरी इच्छा के वश है नर,
दुनिया का यह जगत पसारा |
तेरी सद-इच्छा ईश्वर बन ,
रच जाती शुभ-शुचि जग सारा |
भक्तियोग का मार्ग यही है ,
श्रृद्धा भाक्ति आस्था भाये |
कुछ नहिं मेरा, सब सब जग का,
समष्टिहित निज कर्म सजाये |
अहंभाव सिर नहीं उठाये,
मन निर्मल दर्पण होजाता|
प्रभु इच्छा ही मेरी इच्छा,
सहज-भक्ति नर कर्म सजाता ||
 




 

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

बात गीतों की--आगे ---भाग तीन --डा श्याम गुप्त ---

                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

----------बात गीतों की--आगे ---भाग तीन --------

------------------लय साधने हेतु गीतों व छंदों में तुकांत का प्रयोग सनातन परम्परा से प्रारम्भ हुआ जो हिन्दी में तुकांत वर्णिक व मात्रिक छंदों युत गीतों का प्रयोग महाकाव्यों की लम्बी कवितायें एवं शास्त्रीय काव्य में ही रहा | लोकगीतों में तुकांत की अनिवार्यता कभी पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हुई अपितु केवल लय ही गीतों का मूलतत्व बना रहा | जो महादेवी, प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त आदि तक गीतों के रूप में चलती रही |

----------------- वास्तव में छायावाद के पश्चात के युग में अर्थात सत्तर के दशक में समाज की भांति साहित्य भी ठिठका हुआ था | स्वतंत्रता के पश्चात साहित्य में अंग्रेज़ी साहित्य एवं अन्य विदेशी साहित्य के प्रभाववश एवं समाज में स्वतंत्र चेतना की उत्पत्ति हुई परन्तु विशिष्ट साहित्यिक दिशा के बिना साहित्य भी समाज की भांति दिशाहीन था ? 

------अतः महादेवी-प्रसाद-पन्त के संक्षिप्त भावसौन्दर्य प्रधान छायावादी गीतों के बाद, निराला के अतुकांत छंदों व गीतों की क्रान्ति के समय तक गीतों की महत्ता व उपादेयता स्पष्ट दिखाई देती रही | 

------छायावादोत्तर युग में बच्चन, नीरज आदि के विलंवित लम्बे लम्बे गीतों के काल में, खुले मंच पर कविता व कवि सम्मेलनों के प्रादुर्भाव के कारण जिनमें लम्बे गीतों को सुनने का किसी के पास समय नहीं था अपितु मंच हेतु हलके-फुल्के काव्य, हास्य-कविता आदि के प्रादुर्भाव के साथ ही विभिन्न सामयिक वस्तु-विषयों का कविता में प्रवेश के कारण गीतों का प्रभाव कम हुआ|

------गीतों का लंबा होना एक दुर्गुण है इसमें भाव एक नहीं रह पाते और श्रोता भावों की भूलभुलैया में खोजाता है और भूल जाता है की वह क्या सुन रहा था | यही कारण है कि रूढ़ गीत इस बिंदु पर जड़ीभूत हुआ

-----परन्तु यह गीत की गतिशीलता एवं मृत्युंजय रूप ही है कि वह पारंपरिक रूप बनाए रहते हुए --अतुकांत गीतविधा ‘अगीत’ एवं तुकांत गीतविधा नवगीत के नए रूप में प्रतिष्ठित होकर भी आज अपने मूल रूप में जीवित है |
-------------------------------- इन सभी कारणों से कविता जगत में विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों का प्रवेश हुआ जो अकविता, नयी कविता, गद्यगीत, अतुकांत गीत एवं उसका संक्षिप्त रूप अगीत तथा तुकांत-गीत के संक्षिप्त रूप नवगीत का अवतरण हुआ |

-----ग़ज़ल विधा के लोकप्रिय होने से भी गीतों की चमक पर प्रभाव पड़ा और यहाँ तक कहा जाने लगा कि ‘गीत मर गया’ परन्तु इस सब के बाबजूद भी हिन्दी में लोक व पारंपरिक गीत परम्परा की अजस्र धारा निरंतर प्रवहमान रही और आज भी प्रवहमान है |

------परम्परा से हटकर तुकांत व अतुकांत गीतों की एवं कविता की नवीन धाराओं के रूप में अतुकांत गीत की धारा अगीत एवं तुकांत गीत की धारा नवगीत ही आज जीवित हैं | अन्य सभी धाराएं काल के गाल में समा चुकी हैं|
--------------अगीत - अतुकांत गीत का संक्षिप्त रूप है जो गीत की मुख्य शर्त लय पर ही आधारित सामायिक आवश्यकता – संक्षिप्तता एवं तीब्र भाव-सम्प्रेषण के आधार दोहे व शेर की तर्ज़ पर रचा गया है |
-----अगीत का एक सुनिश्चित छंद विधान “ अगीत साहित्य दर्पण “ ( लेखक- डा श्यामगुप्त, प्रकाशक-सुषमा प्रकाशन एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद्, लखनऊ..प्रकाशन –जनवरी २०१२ ई.) प्रकाशित होचुका है
-----एवं तुकांत गीति विधा के भांति ही इसके विभिन्न प्रकार के विविध छंद भी सृजित किये जाचुके हैं | आज यह गीत की एक सुस्थापित विधा है |
--------------नवगीत - वास्तव में मूल रूप से गीत ही है गीत के पारंपरिक रूप का पुनर्नवीनीकरण | गीत और नवगीत में काव्यरूपात्मक अंतर नहीं है। यह कोई नवीन विधानात्मक तथ्य भी नहीं है अपितु पारंपरिक गीत को ही मोड़-तोड़ कर लिख दिया जाता है |
----इसमें मूलतः तो तुकांतता का ही निर्वाह होता है और मात्राएँ भी लगभग सम ही होती हैं, कभी-कभी मात्राएँ असमान व अतुकांत पद भी आजाता है |
----मेरे विचार से इसे गीत का सलाद या खिचडी भी कहा जा सकता है | इसका स्पष्ट तथ्य-विधान भी नहीं मिलता तथा प्रायः कवि अपने निजी (ज़्यादातर काल्पनिक) अवसाद-आल्हाद को ऐकान्तिक भाव में गाता दिखाई देता है |
-----वस्तुतः यह है पारंपरिक गीत ही जिसे टुकड़ों में बाँट कर लिख दिया जाता है | ----उदाहरणार्थ---- एक नवगीत का अंश है—
टुकड़े टुकड़े
टूट जाएँगे     १६
मन के मनके
दर्द हरा है      १६ = ३२
धीरे-धीरे
ढल जाएगा
वक्त आज तक
कब ठहरा है?     ३२ ---- पूर्णिमा वर्मन का नवगीत ..

----सीधा -सीधा ३२ मात्राओं का पारंपरिक गीत है ...

----इसे ऐसे लिखिए --
धीरे धीरे ढल जाएगा वक्त आज तक, कब ठहरा है , ३२
टुकड़े-टुकड़े टूट जायंगे मन के मनके , दर्द हरा है | ३२

--------------------कहने का अर्थ है कि गीत आज भी जीवित है, अपने पारंपरिक रूप में भी एवं विविध नवीन रूपों में भी | वर्तमान में अनेकों गीतकार अपने गीतों से सरस्वती का भण्डार भर रहे हैं|
------भविष्य में या साहित्य के इतिहास में जब कभी सुरुचिपूर्ण गेय साहित्य या कविता की बात होगी तो गीतों-लोकगीतों-प्रेमगीतों का नाम सर्वोपरि रहेगा एवं गीत के दोनों नवीन रूपों अगीत एवं नवगीत का भी महत्वपूर्ण उल्लेख अवश्य किया जाएगा |
-----सजग रचनाकार सदैव परिष्कार और नवता के प्रति आग्रहशील रहे हैं, अतः पारम्परिक गीतों से गीत के इन नये स्वरूपों की समन्वित पहचान बनी |
-----यही कारण है, कि गीत के मर जाने की घोषणा का गीत के नये प्रारूपों, अगीत व नवगीत, दोनों विधाओं ने न केवल प्रतिकार किया अपितु स्वयं को सक्षम व प्रभावशाली रूप में साहित्य व समाज के सम्मुख विस्तृत रूप में प्रस्तुत भी किया |

-----क्रमशः---भाग चार ( अंतिम किश्त )-----


 

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

बात गीतों की ----भाग दो-------डा श्याम गुप्त-----

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

बात गीतों की ----भाग दो-------डा श्याम गुप्त-----

                        वैदिक गीत स्वर-प्रधान थे| लौकिक संस्कृत में लयसाम्य और नाद-सौन्दर्य आधारित गीत परंपरा प्राप्त होती है | लौकिक काव्य परम्परा का श्रीगणेश आदिकवि बाल्मीकि से माना जाता है| यहीं से काव्य में वर्णानात्मकता के स्थान पर गीति-काव्यात्मकता का प्रवेश हुआ |विश्व की सर्वप्रथम मानवीय कथा उर्वशी-पुरुरवा की विरह कथा एवं क्रोंच-वध की घटना के कारण आदिकवि में पीड़ा-संवेदना द्वारा उत्पन्न काव्य के कारण ही परवर्ती काल में काव्य में कवियों में ‘वियोगी होगा पहला कवि ..’ जैसी एकल धारणा बनी, जो पूर्ण सत्य नहीं है |
                      वस्तुतः पूर्ण सत्य यही है कि प्रथम गीत/कविता प्रकृति के सुखद आश्चर्य मिश्रित रोमांच के कारण ही रची गयी| वैसे भी संयोग के बिना वियोग कहाँ, प्रेम के बिना विरह कहाँ, सुख के बिना दुःख कहाँ | अतः गीत में भावों व रसोद्द्वेगों की उत्सर्जना, विभिन्न संवेदनाओं, सुख-दुःख, प्रेम, श्रृंगार, सौन्दर्य, आश्चर्य, शौर्य सभी के द्वारा उद्भूत होती है | प्रेमी मन पहले प्रेमगीत गाता है तदुपरांत विरह दुःख होने पर विरह गीत |
                      प्रारंभिक लौकिक काव्य में गीत की अनिवार्य शर्त छंद एवं लयात्मकता रही है आदि कवि वाल्मीकि से लेकर अब तक गीत इसी रूप में पहचाना जाता रहा है। इसके पूर्व वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएं, जो गीत ही मानी जाती हैं लयबद्ध रचनाएँ ही हैं जो तुकांत आधारित नहीं हैं परवर्ती लौकिक काव्य में गीत की शर्तें छंद संतुलन और अंत्यानुप्रास (तुकान्त) मानी गयीं । परन्तु लोकगायकों के लोकगीतों व जनकाव्य में स्वर की महत्ता आरोह-अवरोह-स्वरित बनी रही तथा मात्रा व वर्णसंख्या व तुकांत की कठोर अनिवार्यता नहीं थी |
                       स्पष्ट है कि वैदिक साहित्य से लेकर अद्यतन अगीत / नवगीत तक लय ही एकमात्र ज़रूरी शर्त रही है गीत की | लम्बे गीतों में भाव-सौन्दर्य स्थिर नहीं रह पाता अतः गीत संक्षिप्त ही होने चाहिए | भावों एवं विचारों के सुन्दर समन्वय के साथ-साथ गीतात्मकता का सही सन्तुलन सफल गीत रचना की अनिवार्यता है। छंदशास्त्रों के नियमों को ध्यान में रखकर भी गीत लिखे जाते हैं और उन्मुक्त गायन के भाषा से भी गीतों की रचना होती है।
               जीवनगत भावों से गहरे संबंधित होने के कारण गीतों की रचना-प्रक्रिया जटिल होती है एवं भावुक क्षणों में छंदों के शास्त्रीय बंधन आवश्यक नहीं रह जाते तथापि लयात्मकता एवं संगीतात्मकता का तत्व सतत् बना रहता है।   खासकर लोकगीतों में तो यह धारा अविछिन्न बनी रहती है और छंद शास्त्र के अज्ञानी बने रहकर भी कवि मस्ती में, अपनी धुन में गाए जाता है, अमृत रस का संचार करते हुए |
              अन्तर्निहित भाव जब द्रव्यीभूत होकर तरलीकृत होते हैं तो गीत रूप में निसृत होते हैं | गीत जब व्यक्तिपरक उद्गार बन जाता है तब भी वह समाज के सामूहिक संवेग का ही प्रतिनिधित्व करता है|
                गीत की सबसे बड़ी अनिवार्यता उसकी लय है, उसमें विद्यमान गेयता है। निराला ने कविता को छन्दों के बन्धन से मुक्तहोने का जो कार्य किया है वह भी एक आवश्यकता थी। लेकिन निराला ने कविता में अन्त:संगीत की अनिवार्यता को भी नहीं नकारा।
              निराला-रचित मुक्तछंद की कविताओं में अन्त:गीत-संगीत सर्वथा विद्यमान है। इसी भाव पर डा रंगनाथ मिश्र सत्य द्वारा सातवें दशक में स्थापित अगीत कविता भी अपनी स्वर-लयबद्धता सहित अन्तः संगीत-गीत से आप्लावित है |

               गीत, प्रत्येक युग में मनुष्य के साथी रहे हैं। लोकजीवन अगर कहीं अपने नैसर्गिक रूप में आज भी सुरक्षित है तो वह है गीतों में। जब तक लोक रहेगा एवं लोक जीवन रहेगा तब तक गीतों में लोकजीवन का स्पन्दन विद्यमान रहेगा एवं भविष्य में जब कभी भी सरस कविताओं की बात होगी तो उसमें गीतों का स्थान सर्वोपरि रहेगा।
               आधुनिक युग में गीतों के भविष्य के बारे में प्रश्न चिन्ह लगाए जाते रहे हैं | परन्तु प्रश्न उठाने वाले भूल जाते हैं कि गीतों का संसार एक बहुरंगी संस्कृति है| प्रेम, श्रृंगार, पीड़ा आदि भाव मानव की मूलवृत्ति हैं, जब तक प्रकृति में सौंदर्य है, जगत में संवेदना का प्रवाह है, तब तक गीतों का अस्तित्व विद्यमान रहेगा। हाँ गीत युगानुसार अपना स्वरुप बदलते रहे हैं |
              सजग रचनाकार सदैव परिष्कार और नवता के प्रति आग्रहशील रहते हैं यह साहित्य व काव्य का धर्म भी है | सृजनशील व्यक्ति प्रयोगशील होता है, उसकी प्रतिभा एक पूर्व निश्चित ढाँचे में संतुष्टि नहीं पाती, वह नूतन आयामों को खोजकर अभिव्यक्ति के नवीन शिल्प, भाव, विधान व कथावस्तु में तृप्ति पाता है|
               सच्चे साहित्यकार परम्परा एवं नव-प्रयोग के सामंजस्य से आगे बढ़ते हैं | आदिकाल से अधुनातन युग तक काव्य में प्रवृत्यात्मक परिवर्तन निरन्तर होता रहा है, लोकप्रियता के आधार पर कभी किसी एक काव्यरूप को प्रमुखता मिली तो कभी दूसरे को|
              गीत और गीतेतर कविता का विवाद केवल अभी कुछ दशकों के उपज है | यह टकराव भी तथाकथित छांदसिक और अछांदसिक काव्य रूपों के बीच अधिक है जो केवल तुकांत छंदों को ही छंद समझने के भ्रम व सीमित ज्ञान के कारण है|
                        आचार्य भरत ने अत्यंत व्यापक रूप में वाक् तत्व को शब्द और काल तत्व को छन्द कहा है....
----. “छन्दहीनो न शब्दोSजस्त नच्छन्द शब्दवजजातम्। “-----अर्थात कोई शब्द या ध्वनि छन्द रहित नहीं और न ही कोई छन्द शब्द रहित है क्योंकि ध्वनि काल के बिना व्यक्त नहीं होती काल का ज्ञान ध्वनि के बिना संभव नहीं |  
                     आज मुक्तछंद कविता को कोई 'नई कविता` नहीं कहता।

--------क्रमशः बात गीतों की ..भाग तीन -----

 

वह यहीं है---डा श्याम गुप्त ----

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



वह यहीं है ...ग़ज़ल...


वो कहते हैं कि ईश्वर कहीं नहीं है |
मैं कहता हूँ खोजने में कमी कहीं है |

उनका कहना है, वह बस कल्पना ही है,
है हर कहीं, जग उसकी अल्पना ही है |

उसने कहा किसी ने पाया भला कभी,
मैंने कहा, है, तू ढूंढ पाया नहीं है |

जग की गज़ब कारीगरी क्यों देखता नहीं,
जिसकी है बाजीगरी, बस वह वही है |

सदियों से ज्ञानी, विज्ञजन, तत्वज्ञ, साधु-संत,
क्यों खोज में लगे हैं, उसकी, जो नहीं है |

तत्वों के अंतर में, तारों के पार भी,
जो खोजते साइंसदां, क्या वही नहीं है |

मन में यदि बसाए, परमार्थ प्रीति -भाषा,
स्वारथ को भूलकर, तू देख, तू वही है |

तू ढूँढता फिरे है, जाने कहाँ कहाँ,
बस ढूंढ श्याम' दिल में,वह यहीं है यहीं है ||


पद---

मैं तो खोजि खोजि कें हारो |
ब्रह्म हू जान्यो, पुरानन खोजो, गीता बचन उचारो |
ज्ञान वार्ता, धरम-करम औ भक्ति-प्रीति मन धारो |
कथा रमायन, वेद-उपनिषद् ढूँढो अग-जग सारो |
पोथी पढ़ि पढ़ि भजन -कीरतन रत अति भयो सुखारो |
किधों रहै कित उठै औ बैठे कौन सो ठांव तिहारो |
कबहुं न काहू कतहु न पायो प्रभु का रूप संवारो |
थकि हारो अति आरत , राधे राधे नाम पुकारो |
कुञ्ज-कुटीर में लुकौ राधिका पाँव पलोटतु प्यारो |
सो लीला छवि निरखि श्याम' तन मन अति भयो सुखारो ||



 

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

बात गीतों की******-भाग एक..... (डा श्याम गुप्त ).......

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


  ******बात गीतों की****** (डा श्याम गुप्त ).......


-----भाग एक ------

-----------आज गीतों के ऊपर तमाम प्रश्न उठाये जा रहे हैं | गीत मर गए , अब तक प्रचलित सनातन गीत आज के समय के अनुकूल नहीं है, आदि आदि | उत्तर में नवगीत आदि विविध प्रकार की कविता विधाओं को खडा किया जा रहा है | काव्य एक गतिशील विधा है , समयानुसार उसमें प्रगति आना आवश्यक है, चाहे जितनी विधाओं की उत्पत्ति हो परन्तु उससे गीतों की मूल सनातन प्रकृति नहीं बदलती, वे प्रत्येक अवस्था में 'गीत' ही रहते हैं |
------------- ब्रह्म व प्रकृति के द्वैत-प्राकट्य पर अनाहतनाद से उद्भूत ओंकार की आदि ध्वनि से सृजित पुंजीभूत सृष्टि के साथ उत्पन्न स्वर-सप्तक के साथ ही प्रकृति में लयात्मकता युत प्रवाह से गीत का प्रादुर्भाव हुआ होगा |
-----आदि मानव ने जब उन्मुक्त प्रकृति के प्रांगण में प्रकृति की लयात्मकता, संगीतमयता युत विविध भावों, बादलों के गर्जन में एक भय-मिश्रित रोमांच, नदियों-झरनों के नाद घोष में, खगवृंदों के कल-कंठों के गायन में जीवन की पुकार को सुना होगा, चांद-तारों की रोशनी में, फूलों की हंसी में एक आकर्षण, एक सौंदर्य भावबोध का अनुभव किया होगा, गीत की वाणी तभी से थिरकने लगी होगी।
-----वैदिक ऋषियों का वचन है कि 'तेने ब्रह्म हृदा य आदि कवये'- अर्थात कल्प के प्रारंभ में आदि कवि ब्रह्मा के हृदय में वेद का प्राकट्य हुआ था।
---------------- स्वर के आविर्भाव के साथ सृष्टि के सर्वाधिक भावुक प्राणी मानव ने मूक इंगितों के स्थान पर शब्दहीन ध्वन्यात्मक इंगितों, अर्थहीन ध्वनियों द्वारा प्रकृति के दृश्यों-रूपों से उत्पन्न भय मिश्रित रोमांच, सुखद आश्चर्यप्रद अनुभूति की मुग्धावस्था एवं उससे उत्पन्न श्रद्धा के स्व-भावों का स्वयं में ही अथवा आपस में सम्प्रेषण करना प्रारम्भ किया होगा |
------शिव के डमरू से उत्पन्न स्वर-ताल व अक्षर एवं माँ सरस्वती की वीणा ध्वनि से उद्भूत वाणी के बैखरी रूप की उत्पत्ति पर उन्मुक्त प्रकृति के विभिन्न स्वर—संगीत, वायु के मर्मर स्वर, नदी की कल कल कल, झरने की झर झर झर, मेघ की घनन घनन घन, तडित की गर्ज़न, पशु पक्षियों के विवध कलरव के अनुकरण द्वारा विभिन्न स्वरों में ताल–लय बद्धता के साथ प्रसन्नता, रोमांच, आश्चर्य, श्रद्धा का प्रदर्शन करने लगा होगा | निश्चय ही यही संगीतमय उत्कंठित स्वर गीत के प्रथम स्वर थे|
------ मानव ने जब सर्वप्रथम बोलना प्रारम्भ किया होगा तो वह गद्य-कथन ही था, तदुपरांत गद्य में गाथा व गद्यगीत | अपने कथन को विशिष्ट, स्व व पर आनन्ददायी, अपनी व्यक्तिगत प्रभावी वक्तृता व शैली बनाने एवं दीर्घकालीन स्मृत्यांकन हेतु उसे सुर, लय, प्रवाह व गति देने के प्रयास में पद्य का, गीत का जन्म हुआ |
---------------माँ सरस्वती के कठोर तप स्वरुप ब्रह्मा द्वारा वरदान में प्राप्त पुत्र ‘काव्यपुरुष’ के अवतरण पर मानव मन में लयबद्ध एवं विषयानुरूप गीत का आविर्भाव हुआ जो पृथ्वी पर मानव जीवन के अस्तित्व के विविध भावों, कृतित्वों, कलापों, स्पंदनों के साथ लोकगीतों के रूप में हुआ |
-------इस प्रकार भौरों की गुंजार, कोयल की तान, मयूर के नृत्य, शिशुओं की मुस्कान, किसानों के श्रम, बादलों की गर्जन, दामिनी की चमक, पक्षियों की कलरव आदि प्रकृति के आदिम संगीत-गीत से जीवन में ऊर्जा एवं ताजगी का संचरण प्राप्त करते हुए, प्रकृति के हर क्रिया-व्यापार में स्थित लय से साम्य करते हुए विभिन्न भाव-स्वर लयबद्ध रूप में आविर्भूत हुए है और यह लय ही गीत है |
-------------- गीत, काव्य की सबसे पुरानी विधा है। सृष्टि की सबसे सुन्दर है कृति है मानव, और मानव की कृतियों में सबसे सुन्दर है- कविता | गीत--काव्य की सुन्दरतम प्रस्तुति है ।
-----गीत होते ही हैं मानव मन के सुख-दुख व अन्तर्द्वन्द्वों के अनुबन्धों की गाथा। जहां भावुक मन गीत सृष्टा हो तो वे मानव ह्रदय, जीवन, जगत, की सुखानुभूति, वेदना, संवेदना के द्वन्द्वों व अन्तर्संबंधों की संगीतमय यात्रा हो जाते हैं गीत के मूल में भावना व कल्पना दोनों का ही समत्व होता है |
-----यद्यपि कल्पना अनुरंजनशील वृत्ति की भांति है जिसमें संभाव्य एवं संभावित वस्तु का मानवीय अंकन किया जाता है| कल्पना पूर्ण अनुभूति का स्थान नहीं ले पाती | मनोवेगों के आरोह-अवरोह में उनके आधारों का संयोजन भावना करती है जो कल्पना से अधिक वास्तविक, स्थिर व कोमल वृत्ति है |
----- मन की एकाग्रता के लिए आतंरिक व वाह्य आधार का अवलंबन भावना द्वारा ही प्रस्तुत किये जाते हैं- कल्पना द्वारा नहीं | प्रेमी व भक्त अपने इष्ट की भावना करता है, कल्पना नहीं |
------------- भारतीय गीतिकाव्य की परम्परा विश्व साहित्य में सबसे पुरातन है | ऋग्वेद के पूर्व भी गीत पूर्ण-परिपक्व व सौन्दर्यमय रहा होगा | वैदिक मन्त्रों में स्वर संबंधी निर्देश मिलने से एवं स्थान स्थान पर पुरा-उक्थों के कथन से यह प्रतीत होता है कि मौखिक गीत-रचना परम्परा वेदों से पूर्व भी अवश्य रही होगी |
----- मानव इतिहास के प्राचीनतम साहित्य ऋग्वेद में मानव इतिहास के सर्वप्रथम गीत पाए जाते हैं | वे गीत प्रकृति व ईश्वर के प्रति सुखद आश्चर्य, रोमांच एवं श्रद्धा भाव के गीत ही हैं | ऋषियों ने प्रकृति की सुकुमारिता व सौन्दर्य का सजीव चित्रण किया है जो भावमयता व अर्थग्रहण के साथ मनोहारी कल्पनाएँ हैं | ऋग्वेद ७/७२ में वैदिककालीन एक प्रातः का वर्णन कितना सुन्दर व सजीव है ---

“विचेदुच्छंत्यश्विना उपासः प्र वां ब्रह्माणि कारवो भरन्ते |
उर्ध्व भानुं सविता देवो अश्रेद वृहदग्नयः समिधा जरन्ते ||”

----हे अश्वनी द्वय ! उषा द्वारा अन्धकार हटाने पर स्तोता आपकी प्रार्थना (स्वाध्याय, व्यायाम, योग आदि स्वास्थ्य वर्धक कृत्य की दैनिक चर्या ) करते हैं | सूर्य देवता ऊर्धगामी होते हुए तेजस्विता धारण कर रहे हैं | यज्ञ में समिधाओं द्वारा अग्नि प्रज्वलित हो रही है |
-----तथा …..
“एषा शुभ्रा न तन्वो विदार्नोहर्वेयस्नातो दृश्ये नो अस्थातु
अथ द्वेषो बाधमाना तमो स्युषा दिवो दुहिता ज्योतिषागात |
एषा प्रतीचि दुहिता दिवोन्हन पोषेव प्रदानिणते अणतः
व्युणतन्तो दाशुषे वार्याणि पुनः ज्योतिर्युवति पूर्वः पाक: ||”

----प्राची दिशा में उषा इस प्रकार आकर खड़ी होगई है जैसे सद्यस्नाता हो | वह अपने आंगिक सौन्दर्य से अनभिज्ञ है तथा उस सौन्दर्य के दर्शन हमें कराना चाहती है | संसार के समस्त द्वेष-अहंकार को दूर करती हुई दिवस-पुत्री यह उषा प्रकाश साथ लाई है, नतमस्तक होकर कल्याणी रमणी के सदृश्य पूर्व दिशि-पुत्री उषा मनुष्यों के सम्मुख खडी है | धार्मिक प्रवृत्ति के पुरुषों को ऐश्वर्य देती है | दिन का प्रकाश इसने पुनः सम्पूर्ण विश्व में फैला दिया है |
----------------- ऋग्वेद में प्रकृति के अतिरिक्त उर्वशी-पुरुरवा, यम-यमी, इंद्र-सरमा, अगस्त्य-लोपामुद्रा, इंद्र-इन्द्राणी के रूप में विभिन्न भावों की सूक्ष्म व्यंजनायें, नारी ह्रदय की कोमलता, दुर्बलता, काम-पिपासा, आशा, निराशा, विरह वेदना सभी के संगीत-गीत की अभिव्यक्ति हुई है |
---- यही सृष्टि के प्राचीनतम गीत हैं जिनकी पृष्ठभूमि पर परवर्ती काल में समस्त विश्व में काव्य का विकास हुआ, लोकगीतों-गीतों के विविध भाव-रूपों में | यजु, अथर्व एवं साम वेद में इनका पुनः विक्सित रूप प्राप्त होता है | साम तो स्वयं गीत का ही वेद है यथा- ऋषि कहता है......
”ओ3म् अग्न आ याहि वीतये ग्रृणानो हव्य दातये |
नि होता सत्सि बर्हिषि ||”
साम 1 ....
---- हे तेजस्वी अग्नि (ईश्वर) आप ही हमारे होता हो, समस्त कामना पूर्तिकारक स्त्रोता हो, हमारे ह्रदय रूपी अग्निकुंड ( यज्ञ ) हेतु आप ही गीत हो आप ही श्रोता हो |
-----------क्रमशः-----भाग दो-----