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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
---एक चिकित्सक, शल्यक --जो हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन- सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है।.क्योंकि मेरा मानना है कि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश व राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... ---I am a medicine man, a surgeon and now a literature-pro and an avid Hindi/english writer.I write on every vidha of literature ie. geet, chandeey vidha, ageet and atukant poetry, novel, stories, samiksha, articles on various subjects etc. I have published five books on hindi literature. काव्य-दूत,, काव्य-मुक्ताम्रत,;काव्य-निर्झरिणी,श्रिष्टि (ageet Mahakavya on scientific,philosophic and vadik perceptions on creation of earth, life and univarse and god),प्रेम-महाकाव्य (Geeti vidha),on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास... my blogs-- 1.the world of my thoughts-shyam smriti...श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpress.com, 3.saahityshyam ; 4.विजानाति-विजानाति-विग्यान..५. हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान....

Tuesday, February 7, 2012

सभ्यताओं का संघर्ष, संस्कृतियों का टकराव और भारत .... डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                                 
            सभ्यताओं के संघर्ष के  मूल कारण—(१)-आर्थिक –जिसमें बाज़ार, जमीन-क्षेत्र-राज्य के अधिग्रहण..फ़ैलाव का भाव होता है। प्राचीन कबीले-युद्ध व आजकल के आर्थिक द्वन्द्व इनका उदाहरण हैं। (२)-आचरण अशुचिता- मूलतः स्त्रियां—जैसे स्पार्टा-युद्ध, (३)- वैचारिक भिन्नता—जिनका कारण -मज़हब, पन्थ, धर्मान्धता, धर्मपरिवर्तन जो मूलत संसकृतियों के टकराव का कारण होते है (४) अहं —…..अध्यात्म व परमार्थ भाव से परे अतिभौतिकता – व्यक्तिगत सुख-भाव से समष्टिगत या व्यष्टिगत—टकराव …आतन्कवाद आदि इसी के जनक हैं। जो आज के आधुनिक वैज्ञानिक युग में चरम पर हैं।
        यद्यपि यह कहा जाता है कि ..यह सब तो सदैव व हर युग में होता ही है। सदा ही हमें आज का युग अन्धेरा व पुरायुग उजियारा लगता है। पर वास्तव में एसा नहीं है…तभी तो भारत में काल-निर्धारण अर्थात क्रमिक  “चतुर्युगी” की अवधारणा है। आचरण-अनाचरण, कम-आधिक्य के अनुसार-सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग । क्योंकि निश्चय ही आचरण कालान्तर में क्षीण होते जाते हैं। यह पाश्चात्य संस्कृति में नहीं है, जो मूलतः खाओ-पियो –मौज उडाओ... कौन देखता है ... पर आधारित है । इसीलिये यहां पुनर्जन्म की भी अवधारणा प्रचलित है।
       सभ्यताओं का संघर्ष विश्व में सदा चलता रहा है, जिसमें विश्व की न जाने कितनी सभ्यतायें मृत-प्रायः हुईं, नष्ट हुई, लुप्त होगयीं, विजयी संस्कृति द्वारा नष्ट कर दी गईं । भारत में भी यह संघर्ष सदा से होता आया है, विदेशी आक्रमण भी हुए | परन्तु यह भारतीय-संस्कृति  क्यों आज तक अक्षुण्ण रही? अपितु समय के साथ गतिमान,-विकामान होती गयी। क्योंकि यह विनाश में नहीं अपितु विरोधी व विरोधी विचारों से समन्वय में, युद्ध में नहीं अपितु मिलन व शान्ति में विश्वास का भाव रखने वाली संस्कृति है। तलवार के साथ-साथ कलम की शक्ति में विश्वास वाली संस्कृति  है। तभी तो यहां वेद, इतिहास, पुराण, उपनिषदों की रचना हुई,  सभी में मूलतः यही भाव रहा । घर घर रखी जाने वाली रामायण, महाभारत जैसे युद्ध-काव्यों में भी मूलतःयही भाव प्रमुख है।  गीता जैसी कृति में भी युद्ध की विभीषिका का गहन चित्रण है। अत: भारत से कबीले युद्ध न जाने कब के समाप्त प्राय: होगये जबकि विश्व के अन्य भागों में अभी भी सुने जाते हैं।
        भारत में भी युगों से ये संघर्ष चलते रहे हैं। कबीले-युद्ध, इन्द्र के युद्ध, देवासुर-सन्ग्राम, आर्य-अनार्य युद्ध, आर्य-द्रविड युद्ध, शैव-वैष्णव युद्ध  से लेकर शक, हूण, तुर्क-मुगल आक्रमण से लेकर योरोपीय् देश व अन्ग्रेज़ों के आक्रमण तक। परन्तु भारत अपने आध्यात्मिक इतिहास, मानवीय मूल्यों और समन्वयवादी सांस्कृतिक संमृद्धि  व सबको आत्मसात करने की प्रवृत्ति के कारण हर बार अधिक और अधिक समृद्ध, उन्नत, विकासशील व प्रभावी होकर आगे आया है। सभी अन्य संस्कृतियों को इसमें विलीन होजाना पडा ।  जो यहां का था मिलगया, जो बाहर के आया था उसे भी यहीं का होकर रह्जाना पडा । इस सर्वग्रासी संस्कृति ने सभी को आत्मसात करलिया, और स्वयं हर बार एक और अधिक उन्नत प्रगतिशील अग्रगामी  बन कर निखरी जो विश्व के लिये एक मानक है।
         यद्यपि योरोपीय व अन्ग्रेज़ों की स्थिति कुछ भिन्न थी। वे सिर्फ़ व्यापारी थे अतः लूट का धन अपने देश भेजना ही उनका उद्देश्य था। अतः वे यहां समन्वित नहीं होपाये। वे चालाक भी थे। उन्होंने मुगल काल में बर्बर लोगों द्वारा अशोभनीय तरीके से तलवार के बल पर भारतीय लेखनी व मनीषा के विनाश व संक्रांति काल का लाभ उठाकर, स्वयं भारतीय तत्व भाव – तलवार के साथ-साथ कलम की उपयोगिता का उपयोग उसी के विरुद्ध करके तलवार व कलम दोनों का प्रयोग किया और योजनाबद्ध तरीके से भारतीय मनीषा को झुठलाकर पाश्चात्य-संस्कृति को बढाचढाकर कलम-बद्ध किया। अतः भारतीयों ने तो योरोपीय तत्व ग्रहण किये परन्तु उन्होंने नहीं, अतः उन्हें भारत छोडकर जाना पडा, वे यहां आत्मसात नहीं होपाये। भारत का सूर्य फ़िर से उसी भाव में चमकने को आतुर है।
         आज जो आतन्कवाद की समस्या है वह विचारों का सन्घर्ष ही है। विश्वव्यापी है । यह पश्चिम की भोगवादी व्यव्स्था, व्यक्तिवादी सोच व युद्ध्वादी व्यवहार का परिणाम है; जो शस्त्रों, अणुशस्त्रों, बन्दूक-बमों की झन्कार-टन्कार से नहीं अपितु भारतीय संस्कृति में अपनाये गये, युग-प्रभावी, प्रमाणिक भाव- परमार्थ-अध्यात्म-समन्वयवाद आधारित वैचारिक-अध्यात्म क्रान्ति द्वारा ही नियमित की जा सकती है। निश्चय ही आगे आने वाले समय में भारत अपनी अध्यात्मिक- वैचारिक क्रान्ति द्वारा विश्व में शान्ति-ध्वज़ फ़हरायेगा और  लोग धमाकों की भाषा के स्थान पर शान्ति वार्ताओं की बात करेंगे।

                         ---डा श्याम गुप्त, के-३४८, आशियाना, लखनऊ .. ९४१५१५६४६४...
   

Friday, February 3, 2012

प्रेम का जीवन में वास्तविक महत्व व प्रेम का स्वरूप...डा श्याम गुप्त....

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


          प्रेम की लौकिक अभिव्यक्ति का प्रभावोत्पादन कैसा सौन्दर्यमय, अभिव्यन्जनीय, अनिवर्चनीय व मादक होता है  कि प्रेम रस में सराबोर जीव, प्रेमी कह उठता है---"नी मैं तो यार बनानाणी चाहे लोग बोलियाँ बोलें...."और  आदर्श सामाजिक-दार्शनिक भाव  में  बुल्लेशाह गाते हैं ---
              " बेशक मंदिर-मस्जिद तोड़ो बुल्लेशाह कहदा ,
                पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो, 
        इस दिल में दिलवर रहता ".....
और तार्किक भाव में कवि गाता है --" जो तुम इतना ज्योतित मादक,
                              गहरा प्यार करो प्रिय मुझसे
                                                            तो फ़िर मेरे प्यार को ही ,
                              तुम प्यार करो प्रिय ||"  -----( डा श्याम गुप्त)
तथा द्वैत-भाव  में   रैदास नृत्य-रत गाते हैं ---"प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी ..." वहीं   अद्वैत रूप-भाव ग्रहण करते हुए--" रांझा रांझा कहदे कहदे आपुहि रांझा होई "|
               व्यक्त रूप में नैनों, सैनों, वाणी, कामोन्माद, शारीरिक व्यापार-विषयानुभूति से अभिव्यक्त यह कामरूपी प्रेमअव्यक्त भाव-रूप में हृदयाकाशमानव के अंतस में आनंदानुभूति बनकर स्पंदित होता है ---" प्रेम उदधि में डूबिये, डूबै सो उतराय..." |  यह सच्चे प्रेम का स्वरुप हैउदात्त रूप है इस प्रेम के बारे में लिखना ईश्वर को ईश्वर के बारे में बताना ही है |
           यह प्रेम कहाँ से प्रस्फुटित होता है ! वैदिक ज्ञान  के अनुसार आदि-सृष्टि की ब्रह्म-इच्छा --"एकोहं बहुस्याम .." ही प्रेम का प्रथम प्रस्फुटन है जो सृष्टि का, जीवन-जगत का आधार है परमाणु स्थित उपकणों में जो सहज आवेश है वह प्रेम है,  अणु  के परमाणुओं के मध्य जो बंधन है वह प्रेम है, प्रत्येक कण-कण  मध्य जो आकर्ष है, विभव है जिससे वे एक दूसरे को खींचते हैं वह प्रेम है, जीव मात्र के  हृदयाकाश  में जो  सार्वभौम अपनेपन का  सर्वश्रेष्ठ भाव गुम्फित  है वह प्रेम है  |  शिव-शक्ति, ब्रह्म-मायासृष्टि-लयकाम-रतिसंसार-लीलाव्यवहार व व्यापारकार्य-कारण में  जो सहज सम्बन्ध है वही प्रेम  है समस्त जीव-जगत का व्यापार प्रेम का ही प्रतिफलन है यही प्रेम की सार्थकता व महत्ता है अतः  प्रेम जीवन का वास्तविक ही नहीं अपितु सार्वकालीन, सार्वजनीन व सार्वभौम सत्य है |
            प्रेम की महिमा अनंत  है, प्रेम-सरिता का प्रवाह तात्विकता से उत्पन्न होकर, लोक से होकर दिव्य की अनुभूति तक जाता है | तभी  जायसी कह उठते हैं---"  
                  मानुष प्रेम भयो बैकुंठी, नाहत काह छार इक मूठी .." |
           
         प्रेम शाश्वत है, शाश्वतता प्रेम से ही है सृष्टि के प्रादुर्भाव, स्थिति, लय व पुनर्सृजन की निरंतरता का आधार प्रेम ही है सृष्टि प्रेम से है, प्रेम ही सृष्टि है सृष्टि के कण-कण में जो स्पंदन, क्रंदन, नर्तन, जीवन व निलयन  हैसभी कुछ प्रेमप्रेम की अभिव्यक्ति व प्रेम की परिणति ही हैसंयोग प्रेम है, वियोग प्रेम है, स्थिति प्रेम है | जीवन की अभिव्यक्ति, कृति व सांसारिकता का भव-चक्र प्रेम से ही है |
            विश्व में जो कुछ भी घटता है वह प्रेम की ही अभिव्यक्ति है, और जो कुछ नहीं होता वह भी प्रेम की ही अभिव्यक्ति ( या अनभिव्यक्ति ) ही है | लौकिक संसार के आचार, व्यवहार, संचार व संगठन की जो मूल शक्ति 'एक्य' है, आपसी प्रेम की अभिव्यक्ति ही है | एकता विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है और उस शक्ति का बीज-मूल प्रेम ही है |
           प्रेम यद्यपि एक ऐच्छिक वृत्ति  भी है, परन्तु प्रायः यह एक स्वतः उपलब्ध तत्व की भाँति सहज-योग की अवधारणा ही है | मानव-मानव का सामीप्य भाव प्रेम हैप्रेम ही मानव को समाज के सौहार्द, एकता व संगठन के रूप में सामुदायिक भावना व जन-जन को समान धरती पर लाने में सक्षम है विनम्रता, आदर, त्याग, परोपकार, सहिष्णुता, भाईचारा, क्षमा, श्रृद्धा, विश्वास आदि उदात्त भाव , जो समाज, राष्ट्र व देश और संस्कृति के स्थायित्व, गति व उत्थान के बीज रूप हैं, प्रेम के ही रूप हैं | तभी तो विश्व के प्राचीनतम व श्रेष्ठतम  साहित्य--'ऋग्वेद' में ऋषि ने एक ही सूत्र से सारे प्रेम की व्याख्या कर दी है--"मा विदिष्वावहै  -जीव मात्र से द्वेष न करें ; ताकि- "सर्वेन सुखिना सन्तु "--सब सुखी हों कबीर कहते भी हैं---ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय " |
             भाव-अभावव्यक्त-अव्यक्तमूर्त-अमूर्तसत्य-असत्यसद-नासद में जो अंतर्द्वंद्व निहित है, जो पृथकता व संयुक्त द्वंद्व भाव है, वह प्रेम की ही अभिव्यक्ति हैऔर इससे जो ऊर्जा -भाव, रस आदि के रूप में निःसृत या आवृत्त होती है, वही प्रेम है |
          सृष्टि, जीवनजगत, सत्यअहिंसा, दर्शन, धर्मअध्यात्मआत्मतत्वअमृतत्व , ईश्वरब्रह्म -सब प्रेम के ही रूप हैं आदि-इच्छा (supreme-will ) परमात्मा का आदि-प्रेम भाव ही है जो
चराचर की उत्पत्ति का कारण-मूल है | उस प्रेम को नमन ही प्रेम की पराकाष्ठा है, पराकाष्ठा स्वयं प्रेम है | वस्तुत: मानव मन में जब तक प्रेम प्रस्फुटित नहीं होता वह स्थूल पिंड मात्र ही है जड़ शरीर में भरी चेतना में तब तक भाव तरंगें नहीं फूटतीं जब तक आत्मचेतना में प्रेम-स्फुरणा न उठे | यह प्रेम जहां भी स्थिर होजाता है उसी का स्वभाव व सत्ता का रूप तक ग्रहण कर लेता है, और यही सत्ता मानवीय जड़ता को गतित्व व देवत्व में परिवर्तित करती है |
          
         प्रेम में अनासक्ति भाव से लेना-देना, लौकिक प्रेम के लक्षण हैं, परन्तु प्रेमास्पद से कुछ चाहना 'आसक्ति' है | अनासक्त प्रेम की चरम अवस्था 'भक्ति' है कण-कण को प्रेममय मानकर निष्काम व्यवहार अलौकिक 'परमात्म-भाव' है | यह भाव सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को बांधता है | इस अलौकिक तत्व ज्ञान को प्रेमी अंतःकरण ही समझ पाता है, तभी तो मीरा गाती  हैं ---
                                " माई री मैं तो प्रेम दिवाणी, मेरा दरद न जाणे कोय "
प्रेम तत्व को समझने वाला ही सच्चा भक्त है, " प्रेम के बस भगवान"गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं --
                              " सर्व भूतस्थमात्मानं सर्व भूतानिचात्मनि  | 
                               ईक्षते योग-युक्तात्मा, सर्वत्र समदर्शन:  || "
अर्थात सम्पूर्ण प्राणियों में मुझ ( परमात्मा ) को देखने वाला व्यक्ति (भक्त) सबको एक समान प्रेम  की अवस्था को, समाधि सुख की भाँति अनुभव करता है |
                              " प्रेम कौ पंथ कराल महा, तरवारि की धार पै धावनो है | " ---यह दुधारी तलवार की तरह प्रेम-पथ अत्यंत दुष्कर मार्ग हैपरन्तु  आत्मिक व आध्यात्मिक विकास का मार्ग यही है | भौतिक विकास का सूत्र भी यही प्रेम  है अवगुण-त्रय  --घृणा, क्रोध व लोभ पर नियंत्रण ही प्रेम-राह का प्रथम सोपान है, श्रृद्धा-विश्वास के साथ साथ उन्मुक्त युक्ति-युक्त चिंतन प्रेम का अगला सोपान है | तभी तुलसीदास जी कहते हैं --" "भवानी-शंकरौ वन्दे , श्रृद्धा-विश्वास रूपिणों " |
               निश्छलता, निस्वार्थता व अनासक्ति-भाव -प्रेम मार्ग के अंतिम सोपान हैं जो व्यष्टि, समष्टि व सृष्टि के सर्वांगीण विकास की चरम अवस्था है | यही स्वर्ग है, ईश्वर प्राप्ति है, कैवल्य है, मोक्ष है |
             इस प्रेमसर्व व्यापी 'प्रेम' को कुछ शब्दों, वाक्यों में बांधना धृष्टता ही है, इस धृष्टता के लिए मैं ईश्वर, माँ वाणीस्वयं प्रेम व  प्रेमी जनों से क्षमा का आकांक्षी हूँ ---
                " इस संसार असार में, श्याम ' प्रेम ही  सार।
                   प्रेम करे दोनों मिलेंज्ञान और संसार॥