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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 19 मई 2017

पुस्तक----ईशोपनिषद केप्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा.का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


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ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद......
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कुंजिका – तेन = उसी के /उसे...त्यक्तेन= उपयोगार्थ दिए हुए /त्याग के भाव से...भुंजीथा = भोगकर /भोगना चाहिए ...
\
मूलार्थ- उसके द्वारा उपयोगार्थ दिए हुए पदार्थों को ही भोगना चाहिए, उसे ईश्वर का दिया हुआ ही समझकर ( प्राकृतिक सहज रूप से प्राप्य)...अथवा उसे त्याग के रूप में, अनासक्त भाव से भोगना चाहिए |
\
सब कुछ ईश्वर की ही माया,
तेरा मेरा कुछ भी नहीं है |
जग को अपना समझ न रे नर !
तू तेरा सब कुछ वह ही है |


पर है कर्म-भाव आवश्यक,
कर्म बिना कब रह पाया नर |
यह जग बना भोग हित तेरे,
जीव अंश तू, तू ही ईश्वर |

उसे त्याग के भाव से भोगें,
कर्मों में आसक्ति न रख कर|
बिना स्वार्थ, बिन फल की इच्छा,
जो जैसा मिल जाए पाकर |

कर्मयोग है यही, बनाता -
जीवनमार्ग सहज, शुचि, रुचिकर |
जग में रहकर भी नहिं जग में,
होता लिप्त कर्मयोगी नर |

पंक मध्य ज्यों रहे जलज दल,
पंक प्रभाव न होता उस पर |
सब कुछ भोग-कर्म भी करता,
पर योगी कहलाये वह नर ||
--------क्रमश-आगे प्रथम मन्त्र के तृतीय भाग का काव्यभावानुवाद ----



 

सोमवार, 15 मई 2017

ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र . के प्रथम भाग..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद...... \---डा श्याम गुप्त

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----
\\
ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र ..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |”
                                           ”तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध कस्यविद्धनम "
के प्रथम भाग..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद......
\
कुंजिका- इदं सर्वं =यह सब कुछ...यदकिंचित=जो कुछ भी ...जगत्याम= पृथ्वी पर, विश्व में ...जगत= चराचर वस्तु है ...ईशां =ईश्वर से ..वास्यम=आच्छादित है |
\
मूलार्थ- इस समस्त विश्व में जो कुछ भी चल अचल, जड़,चेतन वस्तु, जीव, प्राणी आदि है सभी ईश्वर के अनुशासन में हैं, उसी की इच्छा /माया से आच्छादित/ बंधे हुए हैं/ चलते हैं|
\
1.
ईश्वर माया से आच्छादित,
इस जग में जो कुछ अग-जग है |
सब जग में छाया है वह ही,
उस इच्छा से ही यह सब है |
2.
ईश्वर में सब जग की छाया,
यह जग ही है ईश्वर-माया |
प्रभु जग में और जग ही प्रभुता,
जो समझा सोई प्रभु पाया |
3.
अंतर्मन में प्रभु को बसाए,
सबकुछ प्रभु का जान जो पाए |
मेरा कुछ भी नहीं यहाँ पर,
बस परमार्थ भाव मन भाये |
4.
तेरी इच्छा के वश है नर,
दुनिया का यह जगत पसारा |
तेरी सद-इच्छा ईश्वर बन ,
रच जाती शुभ-शुचि जग सारा |
5.
भक्तियोग का मार्ग यही है ,
श्रृद्धा भाक्ति आस्था भाये |
कुछ नहिं मेरा, सब सब जग का,
समष्टिहित निज कर्म सजाये |
6.
अहंभाव सिर नहीं उठाये,
मन निर्मल दर्पण होजाता|
प्रभु इच्छा ही मेरी इच्छा,
सहज-भक्ति नर कर्म सजाता ||

क्रमश.........ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र .
के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद......



 

शुक्रवार, 12 मई 2017

सूखे गुलाब ---ग़ज़ल---डा श्याम गुप्त

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


ग़ज़ल----
इन शुष्क पुष्पों में आज भी जाने कितने रंग हैं |
तेरी खुशबू, ख्यालो-ख्वाब किताबों में बंद हैं |

न गुलाब पुस्तकों में अब, न अश्रु-सिंचित  पत्र,
यादों को संजोयें वो दरीचे ही बंद हैं |

क्या ख्वाबो-ख्याल का फायदा, इस हाथ ले और दे,
किताबों में गुलाब, इश्क का ये भी कोइ ढंग है |

फसली है इश्क, रंग, खुशबू, पुष्प भी नकली,
ये आज की दुनिया भी कितनी हुनरमंद है |

कल की न सोच, न कल को सोच, बस आज पर ही चल,
है प्यार वही आज, अब जो तेरे संग है |

जो है सामने उसे याद रख, जो नहीं उसे तू भूल जा,
इस युग में इश्क की राह श्याम’ कैसी तंग है ||

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ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद -- आत्म कथ्य -भाग चार -डा श्याम गुप्त ....

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

                     ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद -- आत्म कथ्य --डा श्याम गुप्त


                                                                 भाग चार
           भाग तीन में उपनिषदकार .....ने विद्या-अविद्या, ज्ञान व कर्म, भौतिक संसार एवं आत्मिक जगत के समन्वय से उत्तम, उचित सत्कर्म करने  व अकर्मों से दूर रहने पर प्रकाश डाला था कि वह क्यों व कैसे इस ब्रह्म
६.
विद्या को  प्राप्त करे ताकि उचित व सही दिशा में किये गए अपने कर्मों से समाज व मानवता को प्रगति की ओर दिशा प्रदान करे |
            प्रस्तुत अंतिम भाग में मन्त्र १५ से १८ तक , बताया गया है कि उचित कर्मों व कर्तव्य पालन व कार्यों में सत्यता व  वास्तविकता होनी चाहिए अन्यथा उस कर्म की उपयोगिता नहीं रहेगी | और इस जगत में सत्य को छिपाने के लाखों साधन व बहाने हैं  | मनुष्य को उनसे सावधान रहना चाहिए |
हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखं |
तत्वं पूषन्न पावृणु सत्यधर्माय दृष्टये  ||...१५ ..
             सत्य का मुख सुवर्णमय पात्र से ढंका हुआ है,  हे पूषन! उस सत्य धर्म के दिखाई देने के हेतु तू उस आवरण को हटा दे |  अर्थात चमक-धमक वाली वस्तुएं, धन, सुख-सुविधाएं आदि प्रलोभन मनुष्य को सत्य से अवगत होने नहीं देते एवं उसे  सत्य के कर्तव्य पथ से विमुख कर देते हैं और विविधि अकर्मों व दुष्कर्मों में धकेल देते हैं | अतः हे ईश्वर ! इस प्रलोभन का आवरण सत्यता के ऊपर से हट जाय ताकि हम सत्य पर चल सकें|
               सत्य क्या है व सत्य को इतनी महत्ता क्यों दी जारही है | क्योंकि सत्य का ही दूसरा  नाम धर्म है  मूल कर्त्तव्य है ...... स: ति य: ..... अर्थात जिसमें  स: अर्थात अनश्वर जीव्  एवं ति अर्थात तिरोहितकारी विनाशशील संसार ...य:...दोनों का समन्वय है ..वह सत्य |.......ब्रह्म का नाम 'सत्यम' कहा  गया है |...स+ति+यम ...अर्थात  स: = जीव ...ति = तिरोहित ..विनाशयोग्य संसार ...यम = अनुशासन ....अर्थात जो  जीव व ब्रह्माण्ड दोनों को अनुशासन में रखने वाला है....धर्म है., कर्त्तव्य है ..ईश्वर है...ब्रह्म है वही  सत्य है |  ऐसी महत्वपूर्ण वस्तु आवरण रहित ही रहनी चाहिए अतः मानव सत्य के ऊपर से प्रलोभनों का आवरण हटाकर कर्तव्यपथ पर चले | तभी सारे कार्य उद्देश्यपूर्ण व सफल होते हैं |

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन समूह
तेजो यत्ते  रूपंकल्याणतम तत्ते पश्यामि,
योs सावसौ  पुरुष:  सो sहमस्मि ||....१६ ...
                     हे सब के पालक, अद्वितीय, अनुशासक-न्यायकारी,  प्रकाश स्वरुप ( ज्ञान दायक ) प्रजापति ( ईश्वर ) ...दुखप्रद ताप  किरणों  ( रश्मीन) को दूर करें एवं सुखप्रद तेज समूह( तेज ) को प्राप्त करा | आपका जो कल्याणकारी, मंगलमय रूप है मैं उसे  देख रहा हूँ अतः जो वह पुरुष (ईश्वर ) है वही मैं हूँ |
                वास्तव में जब मनुष्य ईश्वर के उन गुणों------ पूषन ......सबका पोषक बिना भेद-भाव के कर्तव्य कारक, ---एकर्षि.....अपने विशेष गुणों के कारण अद्वितीय  सब में समानरूप से प्रसिद्ध व सब को उपलब्ध, --- यम.... अटल न्यायकारी,---सूर्य .. अन्तःकरण से अज्ञान का अन्धकार हटाकर  हृदय में  ज्ञान का प्रकाश  देनेवाला,---- प्रजापति ....अपने प्रजा, परिवार, देश, समाज ,राष्ट्र व मानवता का रक्षक आदि .....को आत्मसात कर लेता है तो उसका सरल-सहज, भक्त-प्रेमी हृदय अपने प्रभु का दर्शन कर लेता है एवं स्वयं ईश्वर रूपमय होजाता है|  इसप्रकार  सत्य से आवरण हटने पर जब सत्य सम्मुख होता है तो ज्ञात होता है कि जो ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है वही मैं हूँ |
                            "मैं वही हूँ,
                              तू वही है | "..... ग़ज़ल- डा श्याम गुप्त

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम् |
ओम क्रतो स्मर क्लिवे स्मर कृतं स्मर  ||...१७.....
                 वायु: अर्थात शरीर में आने जाने वाला जीव ( अनिलं.=.जीव. शक्ति, प्राण, तेज, आत्मा  )  अमर है  परन्तु यह शरीर स्वयं केवल भस्म पर्यंत है अर्थात मर्त्य है, नाशवान है अतः अंत समय में हे जीव ओम का अर्थात उस ईश्वर
७.
का स्मरण कर, मन की निर्बलता, मृत्यु का भय आदि दूर करने के लिए ईश्वर का स्मरण कर एवं अपने किये हुए कर्मो का स्मरण कर |

                 उपनिषदकार का कथन है कि मनुष्य को अपना जीवन इस प्रकार व्यतीत करना चाहिए कि जब अमर आत्मा व नश्वर शरीर के वियोग अर्थात अपने अंतिम  समय में, वह ओम का उच्चारण अर्थात ईश्वर का ध्यान कर सके | अंतिम समय में मन में कोई  तृष्णा-- व एषणा ---लोकेषणा, पुत्रेषणा, वित्तेषणा  आदि न रहे अन्यथा उसे ईश्वर के ध्यान की बजाय पुत्रादि, धन, अधूरे कर्म आदि का ध्यान रहेगा एवं अंतिम समय कष्ट प्रदायक होगा |

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् |
  युयोध्य स्मज्जुहुराणमेन भूयिष्ठान्तेनाम उक्तिं विधेम ||..१८...
                    हे अग्ने ..प्रकाशमय सर्वशक्तिमान, तेजस्वी ईश्वर आप हमारे सम्पूर्ण कर्मों को जानने वाले हैं अतः हमें एश्वर्य अर्थात उचित ज्ञान व कर्म की प्राप्ति के अच्छे मार्ग ...सुकर्मों, सत्कर्मों पर चलाइये | हमें उलटे, टेड़े-मेडे, विकृत मार्ग पर चलने  रूपी  पाप से बचाइये | हम आपको बारम्बार प्रणाम करते हैं
                   वेदों के मन्त्रों -ऋचाओं का भाव  मूलतः दो रूपों  में प्राप्त होता है ...१. उपदेश रूप में --जहाँ मानव को अनेक शिक्षाएं दी गयी हैं ताकि वह अपने आचरण व कर्म से जीवन को उच्चकोटि का बनाए परन्तु वह अपने कर्म में स्वतंत्र है वह उपदेश उस रूप में ग्रहण करे न करे...२. नियम रूप में -- जो प्राकृतिक नियम रूप हैं एवं अनुल्लंघनीय हैं |   अंत में ईश्वर की दया का सहारा ही उचित है| पुण्य के पथ पर चलने में ईश्वर का सहारा ही आवश्यक है | मन्त्र १७ में .....'ओम क्रतोस्मर'....  उपदेश रूप में हैं  परन्तु ...'कृतं स्मर '....नियम रूप में है जीवन के अंतिम समय उसे अपने कृत्यों का स्मरण आयेगा ही एवं उन्हीं के अनुसार उसे अंत समय में दुःख या सुख का अनुभव होगा |.... उपनिषदकार ने इस अंतिम नमस्कार मन्त्र में पाप का मूल रूप उलटे मार्ग पर चलना ही कहा है | यही  संब अकर्मों, विकर्मों व दुष्कर्मों की जड़ है |
                             आज हम सभी उलटे मार्ग पर अग्रसर हैं |  स्वयं के भौतिक लाभ,  अति-सुखाभिलाषा, अनावश्यक  मनोरंजन, धनागम के अनावश्यक व अन्याय से प्राप्त श्रोत, अनावश्यक  धन-संचय, धन-आधारित व्यवथाएं ..स्कूल, कालेज, अस्पताल, संस्थाएं, खेल, मनोरंजन ....गली गली में गुरुओं,  साधू-संतों के मठ रूपी आलीशान  महल, चेलों की फौज, वोट की राजनीति आदि  सभी उलटे मार्ग अंतत दुष्कर्मों को प्रश्रय देते हैं जिनके कारण आज समाज में भ्रष्टाचार,  लूट-खसोट,  अनाचार, अत्याचार, बलात्कार आदि फैले हुए हैं |
                                    "अब तो हर ओर घना छाया धुंआ लगता है
                                      आदमी आजकल खुद  से भी खफा लगता है ||"डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल
                    निश्चय ही वेदों के अतिरिक्त विश्व के किसी भी धर्म,  संस्कृति,  समाज,  इतिहास,  दर्शन,  साहित्य, ज्ञान में इतनी अधुना-वैज्ञानिक  तार्किकता के साथ मानवीय कर्म व स्वयं में निष्ठा, श्रृद्धा,  भक्ति,  दर्शन,  आस्था, ईश्वर पर धार्मिक विश्वास के समन्वय के साथ मानव आचरण व कर्तव्यों के प्रति शिक्षाएं व ज्ञान का भण्डार देखने को नहीं मिलता |
               अत: वैदिक शिक्षा ....ईशोपनिषद के मन्त्र आज भी व्यक्ति समाज, राष्ट्र व मानवता को कर्म की वास्तविक राह दिखने में सक्षम  हैं,  सजग हैं,  तत्पर हैं समीचीन व सन्दर्भित हैं ...आवश्यकता है इन पर चलने की |
८.
                                "जब से उड़ने लगे हम श्याम प्रगति के पथ पर ,
                                   अपनी संस्कृति से ही मानव नट  गया यारो | "
                                   'खोलकर देखिये फलसफे की किताबों को,
                                    अब भी हर वर्क पे उलफत ही लिखा लगता है |'

                                 'चल दिये जब से  हम गैर की  राहों पर श्याम,
                                   दर्द भी अपनों का भी हमको खता लगता है |
                                                                                                                 ---डा श्याम गुप्त



 

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद -- वन्दना ----डा श्याम गुप्त . .....




पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त .
\\
वन्दना
१.
रे मन अब कैसी ये भटकन |
क्यों न रमे तू श्याम भजन नित, कैसी मन अटकन |
श्याम कृपा बिन जगत-जुगति नहिं, मिले न भगति सुहानी |
श्याम भगति बिनु क्या जग-जीवन कैसी अकथ कहानी |
श्याम की माया, श्याम ही जाने, और न जाने कोय |
माया मृग-मरीचिका भटकत जन्म वृथा ही होय |
श्याम भगति रस रंग रूप से सींचे जो मन उपवन |
श्याम,श्याम की कृपा मिले ते सफल होय नर जीवन ||
२.
हे मन ! ले चल सत की राह |

लोभ, मोह ,लालच न जहां हो,
लिपट सके ना माया ....|
मन की शान्ति मिले जिस पथ पर ,
प्रेम की शीतल छाया ....|
चित चकोर को मिले स्वाति-जल ,
मन न रहे कोई चाह | -----हे मन ले चल.....||
यह जग है इक माया नगरी ,
पनघट मन भरमाया ...|
भांति- भांति की सुंदर गगरी,
भरी हुई मद-माया...|
अमृत गागर ढकी असत पट,
मन क्यूं तू भरमाया...
मन काहे भरमाया ....|
सत से खोल ,असत -पट घूंघट ,
पिया मिलन जो भाया......|
अन्तर के पट खुलें मिले तब,
श्याम पिया की राह ....|
रे मन ! ले चल सत की राह ,
ले चल प्रभु की राह .....हे मन!....||
-----क्रमश

बुधवार, 10 मई 2017

ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद --- प्रस्तावना-डा रंगनाथ मिश्र सत्य--------डा श्याम गुप्त .

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त .
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___ प्रस्तावना --डा रंगनाथ मिश्र सत्य ____
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डा श्यामगुप्त बहुमुखी प्रतिभा के धनी लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार हैं | आप आगरा चिकित्सा महाविद्यालय से शल्य-चिकित्सा शास्त्र में विशेषज्ञता ( मास्टर ऑफ़ सर्जरी ) प्राप्त हैं एवं भारतीय रेलवे में कार्य करते हुए वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक के पद से सेवा निवृत्त हुए | आपके परिवार का वातावरण धार्मिक व आद्यात्मिक चेतना से जुड़ा हुआ था | लेखन की अभिरुचि आपको बचपन से ही थी अतः अध्ययन काल व सेवाकाल के साथ साथ ही आप हिन्दी व अंगरेजी लेखन से जुड़े रहे| आपकी अब तक ग्यारह हिन्दी साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित हैं | अब आपकी प्रस्तुत बारहवीं कृति ‘ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद’ के नाम से प्रकाशित होकर विज्ञ पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत होने जा रही है|
-------इस कृति में ईश्वर विद्या पर प्रकाश डालने वाली संस्कृत साहित्य की महत्वपूर्ण उपनिषद् ‘ईशोपनिषद’ में दिए गए अठारह मन्त्रों का खड़ीबोली सरल हिन्दी में अनुवाद किया गया है | सर्वप्रथम कवि ने एक पद व एक गीत में दो वन्दनाएँ की हैं—
‘रे मन! कैसी अब भटकन|
क्यों न रमे तू श्याम भजन नित कैसी मन अटकन |’.....तथा...
‘रे मन ! ले चल सत की राह |
लोभ मोह लालच न जहां हो / लिपट सके न माया |...
मन की शान्ति मिले जिस पथ पर / प्रेम की शीतल छाया |’
ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र के द्वितीय भाग का अनुवाद, जो भारतीय दर्शन / व्यवहार का मूल मन्त्र है, कवि द्वारा बहुत ही स्वाभाविक ढंग से समझाया गया है –
सब कुछ ईश्वर की ही माया / तेरा मेरा कुछ भी नहीं है |
जग को अपना समझ न रे नर / तू तेरा सब कुछ वह ही है ||
पर है कर्म भाव आवश्यक / कर्म बिना कब रह पाया नर |
यह जग बना भोग हित तेरे / जीव अंश तू, तू ही ईश्वर ||’
\
इसी प्रकार सभी अठारह मन्त्रों का सहज व सरल भाषा में काव्य-भावानुवाद प्रस्तुत करके डा श्याम गुप्त ने एक महनीय कार्य किया है, क्योंकि मूल वेदों व उपनिषदों का पारायण आम व्यक्ति नहीं कर सकता | अतः इस सरल हिन्दी अनुवाद से हिन्दी के करोड़ों पाठक लाभान्वित होंगे, एसा मेरा मानना है | सभी मन्त्रों का कई कई बन्दों में रोचकता के साथ भावानुवाद प्रस्तुत किया गया है इसकी सहज अनुभूति पाठकों को स्वयं पढ़ने के बाद मिल सकती है | अंतिम मन्त्र अठारह से एक उदाहरण दृष्टव्य है ---
\
‘हे तेजस्वी अग्नि रूप प्रभु / सर्व प्रकाशक और द्युतिमान |
सब कर्मों को जानने वाले / सकल विश्व व्यापी विद्वान् ||’
उसी ईश का वरण करें हम / उसी ईश की करें प्रार्थना |
उसके ही प्रति नतमस्तक हो / प्रतिपल प्रतिदिन करें वन्दना ||’
\.
--------डा श्यामगुप्त ने प्रत्येक मन्त्र की कुंजिका एवं मूलार्थ खड़ीबोली गद्य में देदिया है अतः पाठक को प्रत्येक मन्त्र का भावानुवाद पढ़ने व समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी | इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं |
\
डा श्यामगुप्त जी को अब तक अनेकों सम्मान भारत की विभिन्न साहित्यिक/ सांस्कृतिक /राजकीय / स्वैच्छिक / शैक्षिक संस्थाओं द्वारा दिए जा चुके हैं | उनका लेखन सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है एवं वे साहित्य में सदैव नए नए प्रयोग करते रहते है | वे सभी के प्रति समदर्शी दृष्टि रखते हैं, किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष नहीं, जैसा आदिकाल से अब तक के कवियों, लेखकों में दृष्टिगत होता है | वे जो भीतर हैं उनका वही व्यक्तित्व बाहर से भी परिलक्षित होता है |
---जिस प्रकार कविवर शारदा प्रसाद मिश्र ( गोरखपुर) ने भागवत गीता व चाणक्य-नीति का काव्य-भावानुवाद किया है उसी प्रकार महाकवि डा श्यामगुप्त ने ईशोपनिषद का काव्य-भावानुवाद खड़ीबोली हिन्दी में करके राष्ट्रभाषा हिन्दी के उन्नयन में अमूल्य योगदान दिया है |
-------काव्य-भावानुवाद में अलंकारों का भी प्रयोग हुआ है | अनुप्रास अलंकार की छाटा सर्वत्र देखने को मिलती है | रचनाएँ प्रसाद गुण से ओत-प्रोत हैं | हिंदी व संस्कृत अकादमियों व संस्थानों, विश्वविद्यालयों व पुस्तकालयों द्वारा इसे अपनाकर भारतीय संस्कृति एवं रचनाकार को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए |
\
डा श्यामगुप्त पर लखनऊ विश्वविद्यालय से शोध-प्रवंध भी लिखा जा चुका है | वे ऐसे रचनाकार हैं जो सबका साथ और सबका विकास में विश्वास रखते हैं, सभी के लिए सहयोगी हैं एवं स्वयं में स्वाभिमानी भी |
\
मुझे यह कहने में गर्व होता है कि महाकवि डा श्यामगुप्त जी अखिल भारतीय अगीत परिषद् के कर्मठ सदस्य हैं | अपनी प्रयोगधर्मिता के कारण वे अगीत कविता विधा की प्रगति हेतु भी जो कार्य कर रहे हैं वह सदैव मननीय व माननीय होगा |
--------उन्होंने इस विधा में भी महाकाव्य व खंडकाव्य लिखकर एक मील-स्तम्भ का कार्य किया है | उनके अनुकरण में अन्य बहुत से साहित्यकार इस विधा में आगे आरहे हैं| उनकी प्रेरणा लेकर कविवर कुमार तरल ने अगीत-विधा में बुद्ध-कथा महाकाव्य की रचना की है |
----- ‘वादे वादे जायते तत्व बोध ..’ के परिप्रेक्ष्य में मैं ईशोपनिषद के काव्यभावानुवाद का स्वागत करता हूँ और माँ भारती से प्रार्थना करता हूँ कि डा श्याम गुप्त जी इसी प्रकार आगे भी अपनी रचनाओं से हिन्दी का भंडार भरते रहें | मंगल कमंनाओं के साथ |
दि.१५-८-२०१६
संपर्क— साहित्य-भूषण डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ डी.लिट्
अगीतायन, ई-३८८५,राजाजीपुरम,लखनऊ संस्थापक /अध्यक्ष
मो.९३३५९९०४३५, दूभा-०५२२-२४१४८१७ . अ.भा. अगीत परिषद्, लखनऊ
-----क्रमश - आगे वन्दना व पश्च पृष्ठ का कथन ----


 

मंगलवार, 2 मई 2017

डा श्याम गुप्त की दो नई गज़लें ---- डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


 डा श्याम गुप्त की दो नई गज़लें ----
 
 ग़ज़ल-१...

साडी व दुपट्टे में यही फ़ायदा है दोस्तो,
भीड़ में भी आँचल डाल, माँ दूध पिला लेती है |

हर जगह अलग से एक केबिन चाहिए उन्हें,
माताएं जो पेंट जींस टॉप सिला लेती हैं |

पत्तियों और छाल की स्कर्ट टॉप पहनते थे सभी,
प्रगति क्या हमें उसी मुकाम पे ला देती है |

पढ़ लिख के हुए काबिल और बदन को ढकना सीखा,
नारी यूं सौन्दर्य, शील औ लज्जा बचा लेती हैं |

कहते हैं ज़माना है नया, माडर्न है नारी औ नर,
दौरे उन्नति क्या श्याम’ कपडे उतरवा लेती है |


ग़ज़ल ---२.
न प्यार मोहब्बत का ग़ज़ल गीत चाहिए |
न हुश्न नाजो-अदा की ही रीति चाहिए |

अब देश पे जीने की मरने की कसम की,
झंकार भरा गीत कोइ मीत चाहिए |

हैं हर तरफ दुश्मनी की अंधेरी वादियाँ ,
अब शौर्य के उजाले भरे गीत चाहिए |

साकी शराब मयकदे की शायरी न कह,
तलवार तीर गोलियों से प्रीति चाहिए |

वीरों के गीत फिर सुना तू ऐ कलम ‘श्याम,
भरे रक्त में उबाल ऐसे गीत चाहिए ||