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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 23 मार्च 2016

आशियाना परिवार होली २३-३-१६ ...आशियाना, लखनऊ -- डा श्याम गुप्त...


                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

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आशियाना परिवार होली २३-३-१६ ...आशियाना, लखनऊ --


१. राधा कृष्ण पर फूलों से होली वर्षा करती हुई सुषमा गुप्ता ...२.राधा -कृष्ण के साथ सुषमा व नीलम का नृत्य ....३.डा श्याम गुप्त .....४.राधा-कृष्ण के साथ सुषमा व अन्य का होली नृत्य ....५. राधा-कृष्ण का माल्यार्पण ---सुषमा गुप्ता

 Drshyam Gupta's photo.

मंगलवार, 22 मार्च 2016

कैसे रंगे बनवारी---डा श्याम गुप्त ...

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कैसे रंगे बनवारी


सोचि सोचि राधे हारी, कैसे रंगे बनवारी
कोऊ तौ न रंग चढ़े, नीले अंग वारे हैं |
बैजनी बैजन्तीमाल, पीत पट कटि डारि,
ओठ लाल लाल, श्याम, नैन रतनारे हैं |
हरे बांस वंशी हाथ, हाथन भरे गुलाल,
प्रेम रंग सनौ कान्ह, केस कजरारे हैं |
केसर अबीर रोली, रच्यो है विशाल भाल,
रंग रंगीलो तापै मोर-मुकुट धारे हैं ||

चाहे कोऊ रंग डारौ, चढिहै न लालजू पै,
क्यों न चढ़े रंग, लाल, राधा रंग हारौ है |
राधे कहो नील-तनु, चाहें श्यामघन सखि,
तन कौ है कारौ पर, मन कौ न कारौ है |
जन कौ दुलारौ कहौ, सखियन प्यारौ कहौ ,
तन कौ रंगीलौ कहौ, मन उजियारौ है |
एरी सखि! जियरा के प्रीति रंग ढारि देउ,
श्याम रंग न्यारो चढ़े, सांवरो नियारो है ||
 

बुधवार, 16 मार्च 2016

ये आज पूछता है बसंत ....डा श्याम गुप्त....

           
                                         

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...     

                                  

ये आज पूछता है बसंत

ये आज पूछता है बसंत
क्यों धरा नहीं हुलसाई है |
इस वर्ष नहीं क्या मेरी वह
बासंती पाती आई है |

क्यों रूठे रूठे वन-उपवन,
क्यों सहमी सहमी हैं कलियाँ |
भंवरे क्यों गाते करूण गीत,
क्यों फाग नहीं रचती धनिया |

ये रंग वसंती फीके से ,
है होली का भी हुलास नहीं |
क्यों गलियाँ सूनी-सूनी हैं,
क्यों जन-मन में उल्लास नहीं |

मैं बोला ऐ सुनलो बसंत !
हम खेल चुके बम से होली |
हम झेल चुके हैं सीने पर,
आतंकी संगीनें गोली |

कुछ मांगें खून से भरी हुईं,
कुछ दूध की बोतल खून रंगीं |
कुछ दीप-थाल, कुछ पुष्प-गुच्छ,
भी धूल से लथपथ खून सने |

कुछ लोग हैं खूनी प्यास लिए,
घर में आतंक फैलाते हैं|
गैरों के बहकावे में आ,
अपनों का रक्त बहाते हैं |

कुछ तन मन घायल रक्त सने,
आंसू निर्दोष बहाते हैं|
अब कैसे चढ़े बसन्ती रंग,
अब कौन भला खेले होली ?

यह सुन वसंत भी शरमाया,
वासंती चेहरा लाल हुआ |
नयनों से अश्रु-बिंदु छलके,
आँखों में खून उतर आया |

हुंकार भरी और गरज उठा,
यह रक्त बहाया है किसने!
मानवता के शुचि चेहरे को,
कालिख से पुतवाया किसने |

ऐ उठो सपूतो भारत के,
बासंती रंग पुकार रहा |
मानवता की रक्षा के हित,
तुम भी करलो अभिसार नया |

जो मानवता के दुश्मन हैं,
हो नाता, रिश्ता या साथी |
जो नफ़रत की खेती करते,
वे देश-धर्म के हैं घाती |

यद्यपि अपनों से ही लड़ना,
यह सबसे कठिन परीक्षा है |
सड़ जाए अंग अगर कोई,
उसका कटना ही अच्छा है |

ऐ देश के वीर जवान उठो,
तुम कलमवीर विद्वान् उठो |
ऐ नौनिहाल तुम जाग उठो,
नेता मज़दूर किसान उठो |

होली का एसा उड़े रंग,
मन में इक एसी हो उमंग |
मिलजुलकर देश की रक्षा हित,
देदेंगे तन मन,  अंग-अंग |


                                                                 

मंगलवार, 15 मार्च 2016

कैलाश पर शिव-शक्ति युगल के दर्शन------- डा श्याम गुप्त

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...  


                                          


  
----- क्या आपको कैलाश स्थित आदि-देव शिव के दर्शन होते हैं---ध्यान से देखिये, चित्र को बड़ा करें ..... और क्या क्या दृश्यमान होता है ---

-----शिव का भोले  रूप
-----शिव का रौद्र , कापालिक रूप
------ अर्धनारीश्वर रूप ---शिव-शक्ति का समन्वित रूप ......











                                                                                         

रविवार, 13 मार्च 2016

मुस्कराहट --गीत----डा श्याम गुप्त

                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

        मुस्कराहट
 ( शीघ्र प्रकाश्य गीत संग्रह--जीवन दृष्टि -से )

मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं,
मन का दर्पण है ये मुस्कुराते रहो |

तन भी सुन्दर है, मन भी है भावों भरा,
भव्य चहरे पर यदि मुस्कराहट नहीं |
ज्ञान है, इच्छा भी, कर्म अनुपम सभी ,
कैसे झलके, न यदि मुस्कुराए कोई |
मन के भावों को कैसे मुखरता मिले,
सौम्य आनन् पर जो मुस्कराहट नहीं |

मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं,
मन का दर्पण है ये मुस्कुराते रहो |

ये प्रसाधन ये श्रृंगार साधन सभी,
चाँद लम्हों की सुन्दरता दे पायंगे |
मुस्कराहट खजाना है कुदरत का वह,
चाँद तारों से चहरे दमक जायंगे |
मुस्कराहट तो है अंतर्मन की खुशी,
झिलमिलाती है चहरे को रोशन किये |

मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं,
मन का दर्पण है ये मुस्कुराते रहो |

मुस्कराहट तो जीवन की हरियाली है,
ज़िंदगी में चमत्कार कर जायगी |
मन मधुर कल्पनाओं के संसार में,
साद-विचारों से भर मुस्कुराया करे |
सौम्य सुन्दर सहज भाव आभामयी,
रूप सौन्दर्य चहरे पै ले आयगी |

मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं,
मन का दर्पण है ये मुस्कुराते रहो |

एक गरिमा है आत्मीयता से भरी,
शिष्ट आचार की है ये पहली झलक |
चाहे कांटे हों राहों में बिखरे हुए,
मुस्कुराओ सभी विघ्न कट जायंगे |
इन गुलावों की शोखी पर डालें नज़र,
रह के काँटों में भी मुस्कुराते हैं वो |

मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं,
मन का दर्पण है ये मुस्कुराते रहो |


















Drshyam Gupta's photo..

मंगलवार, 8 मार्च 2016

श्याम स्मृति -- पुरुषवादी मानसिकता .... डा श्याम गुप्त

                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



श्याम स्मृति -२२. पुरुषवादी मानसिकता ....
          आजकल एक शब्द-समूह अधिकाँश सुना, कहा लिखा जा रहा है वह है 'पुरुषवादी मानसिकता', प्राय: नारीवादी लेखिकाएं, सामाजिक कार्यकर्त्री, प्रगतिशील तेज तर्रार नारियां समन्वयक पुरुष सभी, स्त्री सम्बंधित घटनाओं, दुर्घटनाओं, अनाचार, अत्याचार, यौन उत्प्रीणन आदि सभी के सन्दर्भ में पुरुषवादी सोच मानसिकता का रोना रोया जाता है | यदि पुरुष में पुरुषवादी सोच मानसिकता नहीं होगी तो और क्या होगी, तभी तो वह पुरुष है | क्या स्त्री अपनी स्त्रियोचित सोच मानसिकता को बदल सकती है, त्याग सकती है, नहीं, यह तो प्रकृति-प्रदत्त है, .अपरिवर्तनशील | 
         यह असंगत है, समस्या के मूल से भटकना | किसी दुश्चरित्र पुरुष के कार्यकलापों का ठीकरा समस्त आधी दुनिया, सारे पुरुष वर्ग पर फोड़ना क्या उचित है !
            वस्तुतः यह सोचहीनता का परिणाम है, कृत्य-दुष्कृत्य करते समय व्यक्ति यह नहीं सोच पाता कि वह स्त्री किसी की बहन, पुत्री, माँ, पत्नी है..ठीक अपनी स्वयं की माँ, बहन, पुत्री, पत्नी की भांति | निकृष्ट आपराधिक आचरणहीनता की विकृत मानसिकता युक्त व्यक्ति ऐसी सोचहीनता से ग्रस्त होता है एवं स्त्रियों को सिर्फ कामनापूर्ति, वासनापूर्ति, वासना की पुतली, सिर्फ यौन तुष्टि का हेतु समझता है| नारी का मान, सम्मान, स्वत्व का उसके लिए कोई मूल्य नहीं होता | यह चरित्रगत कमी अक्षमता का विषय है जो विविध परिस्थितियों, आलंबन उद्दीपन-निकटता, आसंगता, स्पर्शमयता, आसान उपलब्धता से उद्दीप्तता की ओर गमनीय होजाते हैं|
           आज स्त्रियों में पुरुष-समान कार्यों में रत होने के कारण उनमें स्त्रेंण-भाव कम होरहा है पुरुष-भाव की अधिकता है अतः उनमें पुरुष के पुरुष-भाव की शमनकारी स्वयं के स्त्रेंण-भाव के उत्कर्ष का भाव नहीं रहा, फलतः पुरुष में प्रतिद्वंद्विता भाव युत आक्रामकता बढ़ती जा रही है जिसे पुरुष मानसिकता से संबोधित किया जा रहा है |