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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

मंगलवार, 7 मार्च 2017

मम्मी इमोशनल होगई हैं... डा श्याम गुप्त



....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



मम्मी इमोशनल होगई हैं...
पुत्रवधू का फोन आया -
बोली, पापा 'ढोक',
घर का फोन उठ नहीं रहा ,
कहाँ व कैसे हैं आप लोग ?    


खुश रहो बेटी, कैसी हो ...
ठीक हैं हम भी ,
ईश्वर की कृपा से मज़े में हैं , और-
इस समय तुम्हारे कमरे में हैं ।

क्या ...?
हाँ बेटा , जयपुर में हैं ,
तुम्हारे पापा के आतिथ्य में ।

हैं .... ! मम्मी कहाँ हैं , पापा ?
बैठी हैं तुम्हारे कमरे में,
 
तुम्हारे पलंग परसजल नयन ....             
मम्मी इमोशनल होगई हैं, और-
बैठी विचार मग्न हैं -
सिर्फ यही नहीं कि,
कैसे तुम यहाँ की डोर छोड़कर
गयी हो वहां,

अज़नबी, अनजान लोगों के बीच ,
अनजान डगर ,
हमारे पास 
अपितु - साथ ही साथ ,
अपने अतीत की यादों के डेरे में , कि-
कभी वह स्वयं भी अपना घर-कमरा-
छोड़कर आयी थी ;
और तुम्हारी ननद भी ,
अपना घर, कमरा, कुर्सी- मेज-
छोड़कर गयी है ,
इसी प्रकार ......और......।।   


 

कविता...सार्थकता अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर---डा श्याम गुप्त....

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर-------


कविता...सार्थकता ...

स्त्री-पुरुष की सार्थकता
अनावृत्त होने में नहीं
आवृत्त होने में है |
आदिकाल में देव-दनुज संस्कृति में
प्रायः महिलायें अनावृत्त थीं,
स्वतंत्र, स्वच्छंद, बन्धनहीन,
पुरुष भी |
यमी, गंगा, मेनका, रम्भा, उर्वशी
इंद्र, चन्द्रमा, बुध, एवं
देव, दानव, दैत्य, गन्धर्व और असुर |

मानव ही था ब्रह्मा की सृष्टि में –
कर्म पर सोचने-विचारने वाला श्रेष्ठ तत्व ,
जिसके हेतु स्वयंभाव मनु ने बनाया-
धर्मशास्त्र, रचे गए वेद |

यही कारण था-
विश्व में फ़ैली इस उच्च-उन्नत
विकसित संस्कृति-सभ्यता के
सम्पूर्ण विनाश का, अन्त का,
महा जल-प्लावन में,
जो बसी हुई है समस्त संसार की
सभी संस्कृतियों की स्मृति में ;
मनु की, नूह की, नोआ की गाथा बनकर |

बचे हुए वैवस्वत मनु ने किया विचार,
एकत्र किये बचे-खुचे वैदिकज्ञान व धर्मशास्त्र की
स्मृतियों से, रची-
मनु-स्मृति, नीति-नियम,
मानव की सच्चरित्रता, निष्ठा, सत्यप्रियता,
न्यायप्रियता, सामाजिकता :
पुरुषों की सज्जनता, नारी-मर्यादा, प्रतिष्ठा का भान,
स्त्रियों की आवृत्तता का-
वस्त्रों की, तन की, मन की, आत्मा की |

आज हम उठाते हैं स्मृति पर प्रश्न,
करें विचार –
प्रश्न उठाना अनुचित नहीं है,
है जीवंत समाज का लक्षण : परन्तु-
इतिहास से सबक लेकर
तथ्यगत करें, 
उचित-अनुचित,
करें नैतिकता, सच्चरित्रता को
रेखांकित |