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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

पुस्तक मेला में नव सृजन की गोष्ठी व पुस्तक लोकार्पण -दि,१६-८-१७ ... डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ.


पुस्तक मेला में नव सृजन की गोष्ठी व पुस्तक लोकार्पण -दि,१६-८-१७ ...


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पुस्तक मेला लखनऊ ---ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ' का लोकार्पण--डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


पुस्तक मेला लखनऊ ---
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मोतीमहल लान में चलरहे पुस्तक मेले में आज दिनांक १४-८-१७ को अखिल भारतीय अगीत परिषद् ,लखनऊ द्वारा एक कवि सम्मलेन का आयोजन मेले के मुख्य पंडाल में संपन्न हुआ |
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---- मुख्य अतिथि डा सुलतान शाकिर हाशमी पूर्व सदस्य केन्द्रीय योजना आयोग, विशिष्ट अतिथि साहित्याचार्य डा श्याम गुप्त , विशेष अतिथि श्री त्रिवेणी प्रसाद दुबे एवं अध्यक्षता साहित्यभूषण साहित्याचार्य श्री डा रंगनाथ मिश्र सत्य द्वारा मंच को विभूषित किया गया |
संचलान डा योएश गुप्ता द्वारा किया गया एवं ...
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---वाणी वन्दना श्रीमती सुषमा गुप्ता ने की |
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डा श्याम गुप्त की पुस्तक ' ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ' का लोकार्पण किया गया |
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-----मेला आयोजक श्री देवराज अरोरा को समाज भूषण सम्मान से विभूषित किया गया |
----लगभग ६० कवियों -कवयित्रियों ने काव्यपाठ किया |
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डा श्याम गुप्त को साहित्याचार्य की उपाधि ---

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

 डा श्याम गुप्त को साहित्याचार्य की उपाधि ---

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'नवसृजन' साहित्यिक संस्था का नवाँ वार्षिकोत्सव---डा श्याम गुप्त को 'साहित्याचार्य '.की उपाधि

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                             दिनांक 13/08/2017 को राजधानी की प्रसिद्धि 'नवसृजन' साहित्यिक संस्था का नवाँ वार्षिकोत्सव मनाया गया जिसमें प्रतिवर्ष दिए जाने वाले वार्षिक सम्मान --वरिष्ठ कवि श्री कुमार तरल जी को -सृजन साधन वरिष्ठ रचनाकार सम्मान व मुकेश कुमार मिश्रा को सृजन साधना युवा रचनाकार सम्मान 2017 प्रदान किया गया।
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विशिष्ट सम्मान में--साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य को 'साहित्याचार्य श्री ' एवं डा श्याम गुप्त को 'साहित्याचार्य '.की उपाधि से सम्मानित किया गया |
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-----समारोह के अध्यक्ष आदरणीय रंगनाथ मिश्र सत्य ,मुख्य अतिथि सेवा निवृत्त पुलिस महानिदेशक व साहित्यकार श्री महेश चन्द्र द्विवेदी जी,विशिष्ट अतिथि पूर्व भाषा विज्ञान की विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर ऊषा सिन्हा जी व पूर्व सदस्य योजना आयोग भारत सरकार डाक्टर सुल्तान शाकिर हाशमी जी थे।
कार्यक्रम का संचालन युवा कवि श्री देवेश द्विवेदी 'देवेश' जी ने किया ।इस अवसर पर सीवान बिहार से आये वरिष्ठ कवि श्री परमहंस मिश्र प्रचंड जी सहित लखनऊ व आसपास के लगभग एक सौ कवि गण उपस्थिति रहे।

--------वाणी वन्दना श्रीमती सुषमा गुप्ता व वाहिद अली वाहिद ने की \
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इस अवसर पर डा योगेश गुप्त द्वारा संपादित साझा काव्य संकलन -श्रृंगिनी -का विमोचन भी हुआ जिसमें युवा कवियों-मुकेश कुमार मिश्रा , मनु बाजपेयी ,लव परवाना,विशाल मिश्र ,अनूप शुक्ल ,देवेश द्विवेदी व सम्पादक डाॅ. योगेश गुप्त जी की रचनाएँ शामिल हैं ।
---छोटी छोटी बच्चियों द्वारा मनमोहक नृत्य में गजानन वन्दना प्रस्तुत की गयी |

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पुस्तक शृंगिनी का लोकार्पण



 

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

श्रीकृष्ण--त्रिगुणात्मक प्रकृति से प्रकट होती चेतना सत्ता---डा श्याम गुप्त...

                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष------
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श्रीकृष्ण--त्रिगुणात्मक प्रकृति से प्रकट होती चेतना सत्ता---
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श्रीकृष्ण आत्मतत्व के मूर्तिमान रूप हैं। मनुष्य में इस चेतन तत्व का पूर्ण विकास आत्मतत्व का जागरण है। जीवन त्रिगुणात्मक प्रकृति सत रज व तम से उद्भूत और विकसित होता है प्रकृति का तमस तत्व चेतन-तत्व के विकास को रोकने का प्रयास करता है |
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-----तीन माताएं-----
त्रिगुणात्मक प्रकृति के रूप में श्रीकृष्ण की तीन माताएँ हैं।
१.रजोगुणी प्रकृति रूपा देवकी जो जन्मदात्री माँ हैं व सांसारिक माया गृह में कैद हैं।
२.सतोगुणी प्रकृति रूपा माँ यशोदा हैं, जिनके वात्सल्य -प्रेम रस को पीकर श्रीकृष्ण बड़े होते हैं।
३.इनके विपरीत एक घोर तमस रूपा प्रकृति भी शिशु-भक्षक सर्पिणी के समान पूतना माँ है, जिसे आत्मतत्व का प्रस्फुटित अंकुरण नहीं सुहाता और वह वात्सल्य का अमृत पिलाने के स्थान पर विषपान कराती है।
---------संदेश है कि प्रकृति का तमस तत्व चेतन-तत्व के विकास को रोकने में असमर्थ है।
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------गोकुल -----
शब्द का अर्थ इंद्रियाँ भी हैं, गोकुल का अर्थ है हमारी पंचेद्रियों का संसार और
------- वृन्दावन का अर्थ है वृन्द जन जन की वाटिका, जन जन का मन और
------- तुलसीवन अर्थात मन का उच्च गतिमय क्षेत्र तुर, तुरय, तुरंत तुरस, तुलसी |
-----इन्हीं में पूतना वध, शकट भंजन और तृणावर्त वध का तथा वृंदावन में बकासुर, अधासुर और धेनुकासुर आदि अनेक राक्षसों के हनन का वर्णन है जो मानव मन की अतीन्द्रिय क्षमता का उपाख्यान रूप है |

----- गोवर्धन धारण, गो अर्थात इंद्रियों का वर्धन - पालन पोषण आदि आर्थिक, नीति-परक और राजनीतिक व्याख्याएं हैं। आध्यात्मिक संकेत है कि इंद्रियों में क्रियाशील प्राण-शक्ति के स्रोत परमेश्वर पर हमारी दृष्टि होना चाहिए।
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----- रासलीला----
इसी प्रकार गोपियों के साथ रासलीला के वर्णन में मन की वृत्तियां ही गोपिकाओं के रूप में मूर्तिमान हुई हैं और प्रत्येक वृत्ति के रासलीला या रस-नृत्य के रूप में सराबोर होने का चित्रण है। इससे भी उच्च अवस्था का प्रेम व विरह का वर्णन महारास है | यह द्वैत का एक आंतरिक आनंद में समाहित हो जाने की चित्रण है |
-------कंस -----
श्रीकृष्ण को किशोर वय होने पर कंस उन्हें मरवा डालने का एक बार फिर षड्यंत्र रचकर मथुरा बुलवाता है, किंतु श्रीकृष्ण उसको उसके महाबली साथियों सहित मार डालते हैं। कंस देहासक्ति का मूर्तिमान रूप है, जो संभावित मृत्यु से बचने के लिए कितने ही कुत्सित कर्म करता है।
---------मथुरा देहासक्ति से विक्षुब्ध मन है ।
----द्वारिका-----
द्वारिका शब्द में द्वार का अर्थ है साधन, उपाय या प्रवेश मार्ग। समुद्र व्यक्तित्व के गहरे तल- आत्म क्षेत्र को इंगित करता है। अतः आत्म क्षेत्र का प्रवेश द्वार है द्वारिका
-------कंस वध करने के उपरांत द्वारिका में राज्य स्थापना करने का अर्थ है कि आत्मभाव में प्रवेश के पूर्व देहासक्ति की समाप्ति आवश्यक है। इस क्षेत्र में चेतना का प्रवेश होने पर जीवन जीने का जैसा स्वरूप होगा, उसका निरूपण द्वारिका पर श्रीकृष्ण राज्य के रूप में किया गया है। इस क्षेत्र का परिचय महाभारत में श्रीकृष्ण के लोकहितार्थ और धर्मस्थापनार्थ किए गए कार्यों द्वारा तथा गीता के अंतर्गत उनकी वाणी द्वारा किया गया है।
------- व्यक्ति भी संकल्प करे तो उसकी चेतना भी कृष्ण की भांति विकसित हो सकती है।
\
-------- श्री  अर्थात राधा, आदिशक्ति, प्रकृति से सदा सर्वदा सायुज्य श्रीकृष्ण जिनका नाम है, गोकुल जिनका धाम है ऐसे पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण को बारम्बार प्रणाम |




 

Hindi Epaper: ePaper in Hindi, Hindustan News Paper - हिन्दुस्तान Page1 2017-08-14

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....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



 















श्याम सवैया छंद----राष्ट्र के गीत बसें मन में--डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...





                      भारत
जैसे विश्व के प्राचीनतम देश जो विश्व में अग्रणी देश था , उसकी गौरव गाथा
आज हम व हमारी वर्त्तमान पीढ़ी भूल चुकी है , अतः वर्त्तमान पीढ़ी में
देशभक्ति के गौरव को , स्वाभिमान को जगाना इस कविता का उद्देश्य है... इसके
कण कण में शौर्य की गाथाएं भरी हुई हैं , कण कण में इतिहास में ज्ञान का
भण्डार है , फिर भी यह देश शान्ति का पुजारी है ...इस युग में भी भारत
विश्व गुरु बनाने को तैयार है....
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प्रस्तुत है --श्याम सवैया छंद ---
\
भारत माता ----
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भाल रचे कंकुम केसर, निज हाथ में प्यारा तिरंगा उठाए।

 राष्ट्र के गीत बसें मन में,उर राष्ट्र के गान की प्रीति सजाये।
अम्बुधि धोता है पांव सदा,नैनों में विशाल गगन लहराये।
गंगा जमुना शुचि नदियों ने,मणि मुक्ताहार जिसे पहनाये।
है सुन्दर ह्रदय प्रदेश सदा, हरियाली जिसके मन भाये।
भारत मां शुभ्र ज्योत्सिनामय,सब जग के मन को हरषाये॥

-२-
हिम से मंडित इसका किरीट,गर्वोन्नत गगनांगन भाया ।
उगता जब रवि इस आंगन में,लगता है सोना बरसाया ।
मरुभूमि व सुन्दरवन से सजी, दो सुन्दर बांहों युत काया ।
वो पुरुष-पुरातन विन्ध्याचल,कटि-मेखला बना हरषाया ।
कण-कण में शूरवीर बसते,नस-नस में शौर्य भाव छाया ।
हर तृण ने इसकी हवाओं के,शूरों का परचम लहराया ।

-३-
इस ओर उठाये आंख कोई,वह शीश न फ़िर उठपाता है ।
वह द्रष्टि न फ़िर से देख सके,इस पर जो द्रष्टि गढाता है ।
यह भारत प्रेम -पुजारी है, जग -हित ही इसे सुहाता है ।
हम विश्व-शान्ति हित के नायक,यह शान्ति दूत कहलाता है।
यह विश्व सदा से भारत को, गुरु जगत का कहता आता है।
इस युग में भी यह ज्ञान-ध्वजा,नित-नित फ़हराता जाता है।।

-४-
इतिहास बसे अनुभव-संबल,मेधा-बल,वेद-रिचाओं में।
अब रोक सकेगा कौन इसे,चलदिया आज नव-राहों में।
नित नव तकनीक सजाये कर,विज्ञान का बल ले बाहों में।
नव ज्ञान तरंगित इसके गुण,फ़ैले अब दशों दिशाओं में।
नित नूतन विविध भाव गूंजें,इसकी नव कला-कथाओं में।
ललचाते देव मिले जीवन, भारत की सुखद हवाओं में ॥
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सोमवार, 14 अगस्त 2017

श्याम सवैया छंद----राष्ट्र के गीत बसें मन में--डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                      भारत जैसे विश्व के प्राचीनतम देश जो विश्व में अग्रणी देश था , उसकी गौरव गाथा आज हम व हमारी वर्त्तमान पीढ़ी भूल चुकी है , अतः वर्त्तमान पीढ़ी में देशभक्ति के गौरव को , स्वाभिमान को जगाना इस कविता का उद्देश्य है... इसके कण कण में शौर्य की गाथाएं भरी हुई हैं , कण कण में इतिहास में ज्ञान का भण्डार है , फिर भी यह देश शान्ति का पुजारी है ...इस युग में भी भारत विश्व गुरु बनाने को तैयार है....
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प्रस्तुत है --श्याम सवैया छंद ---
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भारत माता ----
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भाल रचे कंकुम केसर, निज हाथ में प्यारा तिरंगा उठाए।
 राष्ट्र के गीत बसें मन में,उर राष्ट्र के गान की प्रीति सजाये।
अम्बुधि धोता है पांव सदा,नैनों में विशाल गगन लहराये।
गंगा जमुना शुचि नदियों ने,मणि मुक्ताहार जिसे पहनाये।
है सुन्दर ह्रदय प्रदेश सदा, हरियाली जिसके मन भाये।
भारत मां शुभ्र ज्योत्सिनामय,सब जग के मन को हरषाये॥
-२-
हिम से मंडित इसका किरीट,गर्वोन्नत गगनांगन भाया ।
उगता जब रवि इस आंगन में,लगता है सोना बरसाया ।
मरुभूमि व सुन्दरवन से सजी, दो सुन्दर बांहों युत काया ।
वो पुरुष-पुरातन विन्ध्याचल,कटि-मेखला बना हरषाया ।
कण-कण में शूरवीर बसते,नस-नस में शौर्य भाव छाया ।
हर तृण ने इसकी हवाओं के,शूरों का परचम लहराया ।
-३-
इस ओर उठाये आंख कोई,वह शीश न फ़िर उठपाता है ।
वह द्रष्टि न फ़िर से देख सके,इस पर जो द्रष्टि गढाता है ।
यह भारत प्रेम -पुजारी है, जग -हित ही इसे सुहाता है ।
हम विश्व-शान्ति हित के नायक,यह शान्ति दूत कहलाता है।
यह विश्व सदा से भारत को, गुरु जगत का कहता आता है।
इस युग में भी यह ज्ञान-ध्वजा,नित-नित फ़हराता जाता है।।
-४-
इतिहास बसे अनुभव-संबल,मेधा-बल,वेद-रिचाओं में।
अब रोक सकेगा कौन इसे,चलदिया आज नव-राहों में।
नित नव तकनीक सजाये कर,विज्ञान का बल ले बाहों में।
नव ज्ञान तरंगित इसके गुण,फ़ैले अब दशों दिशाओं में।
नित नूतन विविध भाव गूंजें,इसकी नव कला-कथाओं में।
ललचाते देव मिले जीवन, भारत की सुखद हवाओं में ॥
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रविवार, 13 अगस्त 2017

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर दो पद----- डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर दो पद-----
\\
१.
ब्रज की भूमि भई है निहाल |
सुर गन्धर्व अप्सरा गावें नाचें दे दे ताल |
जसुमति द्वारे बजे बधायो, ढफ ढफली खडताल |
पुरजन परिजन हर्ष मनावें जनम लियो नंदलाल |
आशिष देंय विष्णु शिव् ब्रह्मा, मुसुकावैं गोपाल |
बाजहिं ढोल मृदंग मंजीरा नाचहिं ब्रज के बाल |
गोप गोपिका करें आरती, झूमि बजावैं थाल |
आनंद-कन्द प्रकट भये ब्रज में विरज भये ब्रज-ग्वाल |
सुर दुर्लभ छवि निरखे लखि-छकि श्याम’ हू भये निहाल ||


 
२.
तेरे कितने रूप गोपाल ।
सुमिरन करके कान्हा मैं तो होगया आज निहाल ।
नाग-नथैया, नाच-नचैया, नटवर, नंदगोपाल ।
मोहन, मधुसूदन, मुरलीधर, मोर-मुकुट, यदुपाल ।
चीर-हरैया, रास -रचैया, रसानंद, रस पाल ।
कृष्ण-कन्हैया, कृष्ण-मुरारी, केशव, नृत्यगोपाल |
वासुदेव, हृषीकेश, जनार्दन, हरि, गिरिधरगोपाल |
जगन्नाथ, श्रीनाथ, द्वारिकानाथ, जगत-प्रतिपाल |
देवकीसुत,रणछोड़ जी,गोविन्द,अच्युत,यशुमतिलाल |
वर्णन-क्षमता कहाँ 'श्याम की, राधानंद, नंदलाल |
माखनचोर, श्याम, योगेश्वर, अब काटो भव जाल ||
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चित्र गूगल साभार




शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

३० वर्ण की दो घनाक्षरी-----सूर घनाक्षरी...व श्याम-घनाक्षरी....डा श्याम गुप्त ...

                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


३० वर्ण की दो घनाक्षरी-----सूर घनाक्षरी...व श्याम-घनाक्षरी.......

 
\\
१. श्याम-घनाक्षरी, ...वर्ण- १६-१४ ..८ ८, ७ ७ पर यति, अंत में तीन गुरु (sss मगण)--
\
बहु भांति पुष्प खिलें, कुञ्ज क्यारी उपवन,
रंग-विरंगी ओढे, धरन रजाई है |
केसर अबीर रोली, कुंकुंम, मेहंदी रंग,

घोल के कटोरों में, भूमि हरषाई है |
फैलि रहीं चहुँ ओर, लता मनमानी किये,
द्रुम चढीं शर्मायं, मन मुसुकाई हैं |
तिल मूंग बादाम के, लड्डू घर घर बनें ,
गज़क मंगोड़ों की, बहार सी छाई है ||
\

२.सूर घनाक्षरी --३० वर्ण, चरणान्त लघु या गुरु, ८ ८, ८ ६ पर यति – ISS यगण)
\
थर थर थर थर, कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु, सखि वो सुजानी |
सिहरि सिहरि उड़े, जियरा पखेरू सखि,
उर मांहि उमंगाये, पीर वो पुरानी |
बाल वृद्ध नारी नर, धूप बैठे तापि रहे,
धूप भी है कुछ खोई, सोई अलसानी |
शीत की लहर तीर, भांति तन बेधि रही,
मन उठै प्रीति की वो, लहर अजानी ||


 

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

श्याम स्मृति- --- काव्य -- मानवीय सृजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण – डा श्याम गुप्त

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



-----श्याम स्मृति-१२६. ---
*****काव्य -- मानवीय सृजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण – ***
-------- काव्य मानव-मन की संवेदनाओं का बौद्धिक सम्प्रेषण है--मानवीय सृजन में सर्वाधिक कठिन व रहस्यपूर्ण ; क्योंकि काव्य अंतःकरण के अभी अवयवों ---चित्त (स्मृति व धारणा ), मन ( संकल्प ), बुद्धि ( मूल्यांकन ), अहं ( आत्मबोध ) व स्वत्व (अनुभव व भाव ) आदि सभी के सामंजस्य से उत्पन्न होता है | तभी वह युगांतरकारी, युगसत्य, जन सम्प्रेषणीय, विराट-सत्याग्रही, बौद्धिक विकासकारी व सामाजिक चेतना का पुनुरुद्धारक हो पाता है |
---------काव्य--- इतिहास, दर्शन या विज्ञान के भांति कोरा कटु यथार्थ न होकर मूलरूप से वास्तविक व्यवहार जगत के अनुसार सत्यं, शिवं, सुन्दरं होता है, तभी उसका कथ्य युगानुरूप के साथ सार्वकालिक सत्य भी होता है|
---------साहित्यकार का दायित्व- नवीन युग-बोध को सही दिशा देना होता है तभी उसकी रचनाएँ कालजयी हो पाती हैं| आधुनिक व सामयिक साहित्य रचना के साथ-साथ ही सनातन व एतिहासिक विषयों पर पुनः-रचनाओं द्वारा समाज के दर्पण पर जमी धूलि को समय-समय साफ़ करते रहने से समयानुकूल प्रतिबिम्ब नए-नए भाव-रूपों में दृश्यमान होते हैं एवं प्रगति की भूमिका बनते हैं|


 

भारत ७० साल का होगया है - डा श्याम गुप्त

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

१.भारत ७० साल का होगया है -----एक समाचार , हिन्दुस्तान----
----हम भूल जाते हैं कि यह देश -जो भारत है - का जन्म १९४७ में नहीं हुआ ,अपितु लाखों वर्ष प्राचीन यह देश सृष्टि का आदि देश है , १९४७ में तो यह विदेशियों की गुलामी से स्वतंत्र हुआ था ---अतः पुनः स्वतंत्रता का ७०वा साल है |
--------हम, हमारा मीडिया कब अपना दायित्व समझेंगे ---अपनी भावी पीढी के समुचित मार्गदर्शन का -----



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बुधवार, 9 अगस्त 2017

पुस्तक ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद --मन्त्र आठ---- डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...




ईशोपनिषद के अष्ठम मन्त्र .--- स पर्यगाच्छुक्रमकायमब्रणम अस्नाविरम शुद्धम्पापविद्धम |
             कविर्मनीषी परिभू: स्वयंभू: याथातथ्यतोsर्थान व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्यः ||  
                                     का काव्य भावानुवाद...
कुंजिका - स= वह ईश्वर ...परि अगात=सर्वत्र व्यापक....शुक्रं =जगत का उत्पादक....अकायम=शरीर रहित....अब्रणम=शारीरिक विकार रहित....अस्नाविरम=स्नायुओं, नाडियों व नसों आदि ( शारीरिक) के बंधन से मुक्त...शुद्धं =पवित्र ...अपापविद्धं=पाप बंधन से रहित....कवि =सूक्ष्मदर्शी ...मनीषी =ज्ञानी...परिभू =सबको आच्छादित किये हुए, सर्वोपरि,सर्वत्र वर्त्तमान ...स्वयंभू =स्वयंसिद्ध, प्रामाणिक ....शास्वतीभ्य =अनादि, शाश्वत...समाभ्य =प्रजा अर्थात जीव के लिए...याथाताथ्यत:= यथानुसार, ठीक ठीक ...अर्थान= कर्मों के फल का ..व्यदधात= विधान/ व्यवस्था करता है |

मूलार्थ-  वह एकमात्र अकेला ब्रह्म सर्वत्र व्यापक, कण-कण में स्थित, उसी में समस्त जगत स्थित है, सारे जगत का उत्पादन कर्ता, शारीरिक विकारों से रहित, स्नायुविक अर्थात तन,मन व आत्मिक बंधनों से मुक्त, पापरहित, पवित्र, सूक्ष्मदर्शी, आदि-अंत रहित अनादि, मनीषी, सब कुछ जानने वाला, सर्वज्ञ, स्वयंभू है| उस ब्रह्म ने सदैव अनादि काल से ही कर्मों के अनुसार सभी के लिए यथातथ्य उचित व्यवस्था व फल का विधान किया है |      



पर्यगात शुक्रम अकायं अब्रणम
अस्नाविरम शुद्धं पाप अविद्धम |
सूक्ष्मदर्शी मनीषी परिभू स्वयंभू ,
यथातथ्य फलेषु वह शाश्वत समाभ्य: |

देहरहित अविकारी व्यापक,
तेजस्वी वह जग उत्पादक |
अप्रभावित दैहिक बंधन से,
पापबोध से मुक्त व पावन |

स्वयंसिद्ध है सर्वोपरि वह,
सदा उपस्थित वह अनादि है |
भूतकाल, दिक् परे का दृष्टा ,
सब कुछ यथातथ्य निर्धारक |

स्वयं पूर्ण वह ब्रह्म सदा ही,
जग का सब विधान करता है |
जिसका जैसा कर्म-कृत्य है ,
वैसा फल विधान करता है |


ब्रह्म प्राप्त वह ब्रह्म हुआ नर,
ये सारे गुण आत्मसात कर |
मनसा वाचा और कर्मणा,
श्रेष्ठ मार्ग अपनाता वह नर |

बह आत्मज्ञ सर्वज्ञानी बन ,
दैहिक बंधन से हुआ परे |
मन की सत्ता पर किये नियंत्रण,
पाप बोध से मुक्त रहे |

विश्वप्रेम परमार्थ साधकर,
एक्यभाव अनुसर कर पाता |
उचित कर्म को करने वाला,
उचित धर्म जग को दिखलाता |

ईश्वर के इन सभी गुणों को,
धारण करलें और अपनाएं |
अपना जीवन सफल करें हम,
जग सुन्दर शिव सत्य बनाएं ||