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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

सोमवार, 29 अगस्त 2016

---प्रेम तत्वामृत---- डा श्याम गुप्त.....

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 




                                   ---प्रेम तत्वामृत----
               भारत ही नहीं अपितु विश्वभर में प्रेम के अधीक्षक श्रीकृष्ण ----राधा  व कृष्ण माने जाते हैं , वे प्रेम के पर्याय हैं अतः राधा व कृष्ण के तत्व द्वारा यहाँ पर प्रेम के दोनों  मूल भावों की विवेचना की जायगी .....

                                               ******राधा तत्वामृत*****
-------राधा ---व्युत्पत्ति व उदभव----
------राधा एक कल्पना है या वास्तविक चरित्र, यह सदियों से तर्कशील व्यक्तियों विज्ञजनों के मन में प्रश्न बनकर उठता रहा है| अधिकाँशतः जन राधा के चरित्र को काल्पनिक एवं पौराणिक काल में रचा गया मानते हैं | कुछ विद्वानों के अनुसार कृष्ण की आराधिका का ही रुप राधा हैं। आराधिका शब्द में से अ हटा देने से राधिका बनता है। राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था। यहाँ राधा का मंदिर भी है। राधारानी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है।
------- यह आश्चर्य की बात हे कि राधा-कृष्ण की इतनी अभिन्नता होते हुए भी महाभारत या भागवत पुराण में राधा का नामोल्लेख नहीं मिलता, यद्यपि कृष्ण की एक प्रिय सखी का संकेत अवश्य है। राधा ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों का उल्लंघन किया। कृष्ण की अनुपस्थिति में उसके प्रेम-भाव में और भी वृद्धि हुई। दोनों का पुनर्मिलन कुरूक्षेत्र में बताया जाता है जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृन्दावन से नंद, राधा आदि गए थे।
-------यहाँ पर हम वस्तुतः राधा शब्द व चरित्र कहाँ से आया इस प्रश्न पर कुछ प्रकाश डालने का प्रयत्न करेंगे | प्रयत्न ही कर सकते हैं, यद्यपि यह भी एक धृष्टता ही है क्योंकि भक्ति प्रधान इस देश में श्रीकृष्ण (श्री राधाजी व श्री कृष्ण ) स्वयं ही ब्रह्म व आदि-शक्ति रूप माने जाते हैं अतः सत्य तो वे ही जानते हैं |
****** राधा का चरित्र-वर्णन, श्रीमदभागवत में स्पष्ट नहीं मिलता ....वेद-उपनिषद में भी राधा का उल्लेख नहीं है....राधा-कृष्ण का सांगोपांग वर्णन ‘गीत-गोविन्द’ से मिलता है|
-----वेदों में राधा शब्द -----
-------सर्व-प्रथम ऋग्वेद के भाग-१ /मंडल १,२ ...में ...राधस शब्द का प्रयोग हुआ है ....जिसे वैभव के अर्थ में प्रयोग किया गया है......
-------ऋग्वेद के २/म.३-४-५ में ..सुराधा ...शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है...सभी देवों से उनकी अपनी संरक्षक शक्ति का उपयोग करके धनों की प्राप्ति व प्राकृतिक साधनों के उचित प्रयोग की प्रार्थना की गयी है|
ऋग्वेद-५/५२/४०९४..में -- राधो व आराधना शब्द ..शोधकार्यों के लिए प्रयुक्त किये गए हैं...यथा..
“ यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्वं म्रजे |”....
------अर्थात यमुना के किनारे गाय ..घोड़ों आदि धनों का वर्धन, वृद्धि, संशोधन व उत्पादन आराधना सहित करें या किया जाता है | एवं.....
“गवामप ब्रजं वृधि कृणुश्व राधो अद्रिव:
नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः |”
------कृष्ण = क्र = कार्य = कर्म -----राधो = अराधना, राधन ( गूंथना ), शोध, शोधन, नियमितता, साधना ...अर्थात ब्रज में गौ – ज्ञान, सभ्यता उन्नति की वृद्धि ...कृष्ण-राधा द्वारा हुई = ...कर्म व साधना द्वारा की गयी शोधों से हुई |
इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते पिवा त्वस्य गिर्वण (ऋग्वेद ३. ५ १. १ ०) ---ओ राधापति ( इंद्र – बाद में विष्णु ) वेद मन्त्र भी तुम्हें जपते हैं। उनके द्वारा सोमरस पान करो।
-------विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधस : सवितारं नृचक्षसं (ऋग्वेद १ २ २. ७). -------ओ सब के हृदय में विराजमान सर्वज्ञाता दृष्टा जो हमारी आराधना सुनें हमारी रक्षा करो।
त्वं नृचक्सम वृषभानुपूर्वी : कृष्नास्वग्ने अरुषोविभाही ...(ऋग्वेद )
--------इस मन्त्र में श्री राधा के पिता वृषभानु का उल्लेख किया गया है जो अन्य किसी भी प्रकार के संदेह को मिटा देता है ,क्योंकि वही तो राधा के पिता हैं।
------यस्या रेणुं पादयोर्विश्वभर्ता धरते मूर्धिन प्रेमयुक्त : ---(अथर्ववेदीय राधिकोपनिषद )
----राधा वह शख्शियत है जिसके कमलवत चरणों की रज श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक अपने माथे पे लगाते हैं।
******तमिलनाडू की गाथा के अनुसार --दक्षिण भारत का अय्यर जाति समूह, उत्तर के यादव के समकक्ष हैं | एक कथा के अनुसार गोप व ग्वाले ही कंस के अत्याचारों से डर कर दक्षिण तमिलनाडू चले गए थे | उनके नायक की पुत्री नप्पिंनई से कृष्ण ने विवाह किया --- श्रीकृष्ण ने नप्पिंनई को ७ बैलों को हराकर जीता था | तमिल गाथाओं के अनुसार नप्पिनयी नीला देवी का अवतार है जो ऋग्वेद की तैत्रीय संहिता के अनुसार ---विष्णु पत्नी सूक्त या अदिति सूक्त या नीला देवी सूक्त में राधा ही हैं जिन्हें अदिति –दिशाओं की देवी भी कहते हैं | नीला देवी या राधा परमशक्ति की मूल आदि-शक्ति हैं –अदिति ...|
---------श्री कृष्ण की एक पत्नी कौशल देश की राजकुमारी---नीला भी थी, जो यही नाप्पिनायी ही है जो दक्षिण की राधा है | एक कथा के अनुसार राधाके कुटुंब के लोग ही दक्षिण चले गए अतः नप्पिंनई राधा ही थी |
-----पुराणों में श्री राधे :-----
--------वेदव्यास जी ने श्रीमदभागवतम के अलावा १७ और पुराण रचे हैं इनमें से छ :में श्री राधारानी का उल्लेख है।
यथा राधा प्रिया विष्णो : (पद्मपुराण )
राधा वामांश संभूता महालक्ष्मीर्प्रकीर्तिता (नारद पुराण )
तत्रापि राधिका शश्वत (आदि पुराण )
रुक्मणी द्वारवत्याम तु राधा वृन्दावन वने (मत्स्य पुराण १३. ३७ )
राध्नोति सकलान कामान तेन राधा प्रकीर्तित :(देवी भागवत पुराण )
-----यां गोपीमनयत कृष्णो (श्रीमद भागवतम १०.३०.३५ )
---श्री कृष्ण एक गोपी को साथ लेकर अगोचर हो गए। महारास से विलग हो गए। गोपी, राधा का एक नामहै|
----अन्याअ अराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वर : -(श्रीमद भागवतम )
----इस गोपी ने कृष्ण की अनन्य भक्ति( आराधना) की है। इसीलिए कृष्ण उन्हें अपने (संग रखे हैं ) संग ले
गए, इसीलिये वह आराधिका ...राधिका है |

--------- वस्तुतः ऋग्वेदिक व यजुर्वेद व अथर्व वेदिक साहित्य में ’ राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति = रयि (संसार, ऐश्वर्य, श्री, वैभव) +धा (धारक, धारण करने वालीशक्ति) से हुई है; अतः जब उपनिषद व संहिताओं के ज्ञान मार्गीकाल में सृष्टि के कर्ता का ब्रह्म व पुरुष, परमात्मा रूप में वर्णन हुआ तो समस्त संसार की धारक चितशक्ति, ह्लादिनी शक्ति, परमेश्वरी राधा का आविर्भाव हुआ|
----भविष्य पुराण में--जब वेद को स्वयं साक्षात नारायण कहा गया तो उनकी मूल कृतित्व - काल, कर्म, धर्म व काम के अधिष्ठाता हुए—कालरूप- कृष्ण व उनकी सहोदरी (साथ-साथ उदभूत) राधा-परमेश्वरी......कर्म रूप - ब्रह्मा व नियति (सहोदरी).... धर्म रूप-महादेव व श्रद्धा (सहोदरी) .....एवम कामरूप-अनिरुद्ध व उषा ( सहोदरी )---- इस प्रकार राधा परमात्व तत्व कृष्ण की चिर सहचरी, चिच्छित-शक्ति (ब्रह्मसंहिता) है।
------वही परवर्ती साहित्य में.... श्रीकृष्ण का लीला-रमण व लौकिक रूप के आविर्भाव के साथ उनकी साथी, प्रेमिका, पत्नी हुई व ब्रजबासिनी रूप में जन-नेत्री।
------भागवत-पुराण ...मैं जो आराधिता नाम की गोपी का उल्लेख है ......
किसी एक प्रिय गोपी को भगवान श्री कृष्ण महारास के मध्य में लोप होते समय साथ ले गये थे जिसे ’मान ’ होने पर छोडकर अन्तर्ध्यान हुए थे; संभवतः यह वही गोपी रही होगी जिसे गीत-गोविन्द के रचयिता विद्यापति व सूरदास आदि परवर्ती कवियों, भक्तों ने श्रंगारभूति श्रीकृष्ण (पुरुष) की रसेश्वरी (प्रक्रति) राधा....के रूप मेंकल्पित व प्रतिष्ठित किया।
-------महाभारत में राधा ------
-------- उल्लेख उस समय आ सकता था जब शिशुपाल श्रीकृष्ण की लम्पटता का बखान कर रहा था| परन्तु भागवतकार निश्चय ही राधा जैसे पावन चरित्र को इसमें घसीटना नहीं चाहता होगा, अतः शिशुपाल से केवल सांकेतिक भाषा में कहलवाया गया, अनर्गल बात नहीं कहलवाई गयी|
-------- कुछ विद्वानों के अनुसार महाभारत में तत्व रूप में राधा का नाम सर्वत्र है क्योंकि उसमें कृष्ण को सदैव श्रीकृष्ण कहा गया है | श्री का अर्थ राधा ही है जो आत्मतत्व की भांति सर्वत्र अंतर्गुन्थित है, श्रीकृष्ण = राधाकृष्ण |
******श्री कृष्ण की विख्यात प्राणसखी और उपासिका राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थी। राधा कृष्ण शाश्वत प्रेम का प्रतीक हैं। राधा की माता कीर्ति के लिए 'वृषभानु पत्नी' शब्द का प्रयोग किया जाता है। राधा को कृष्ण की प्रेमिका और कहीं-कहीं पत्नी के रुप में माना जाता हैं। राधा वृषभानु की पुत्री थी। पद्म पुराणने इसे वृषभानु राजा की कन्या बताया है। यह राजा जब यज्ञ की भूमि साफ कर रहा था, इसे भूमि कन्या के रूप में राधा मिली। राजा ने अपनी कन्या मानकर इसका पालन-पोषण किया। यह भी कथा मिलती है कि विष्णु ने कृष्ण अवतार लेते समय अपने परिवार के सभी देवताओं से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा। तभी राधा भी जो चतुर्भुज विष्णु की अर्धांगिनी और लक्ष्मी के रूप में वैकुंठलोक में निवास करती थीं, राधा बनकर पृथ्वी पर आई। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की सखी थी और उसका विवाह रापाण अथवा रायाण नामक व्यक्ति के साथ हुआ था। अन्यत्र राधा और कृष्ण के विवाह का भी उल्लेख मिलता है। कहते हैं, राधा अपने जन्म के समय ही वयस्क हो गई थी।
---------यह भी किम्बदन्ती है कि जन्म के समय राधा अन्धी थी और यमुना में नहाते समय जाते हुए राजा वृषभानु को सरोवर में कमल के पुष्प पर खेलती हुई मिली। शिशु अवस्था में ही श्री कृष्ण की माता यशोदा के साथ बरसाना में प्रथम मुलाक़ात हुई, पालने में सोते हुए राधा को कृष्ण द्वारा झांक कर देखते ही जन्मांध राधा की आँखें खुल गईं |
****** महान कवियों- लेखकों ने राधा के पक्ष में कान्हा को निर्मोही जैसी उपाधि दी। दे भी क्यूँ न ? राधा का प्रेम ही ऐसा अलौकिक था...उसकी साक्षी थी यमुना जी की लहरें, वृन्दावन की वे कुंजवे गलियाँ वो कदम्ब का पेड़, वो गोधुली बेला जब श्याम गायें चरा कर वापिस आते वो मुरली की स्वर लहरी जो सदैव वहाँ की हवाओं में विद्यमान रहती थी ।
------राधा जो वनों में भटकती, कृष्ण कृष्ण पुकारती, अपने प्रेम को अमर बनाती, उसकी पुकार सुन कर भी ,कृष्ण ने एक बार भी पलट कर पीछे नही देखा। ...तो क्यूँ न वो निर्मोही एवं कठोर हृदय कहलाए ।
*******किन्तु कृष्ण के हृदय का स्पंदन किसी ने नहीं सुना। स्वयं कृष्ण को कहाँ कभी समय मिला कि वो अपने हृदय की बात..मन की बात सुन सकें। जब अपने ही कुटुंब से व्यथित हो कर वे प्रभास -क्षेत्र में लेट कर चिंतन कर रहे थे तब 'जरा' के छोडे तीर की चुभन महसूस हुई। उन्होंने देहोत्सर्ग करते हुए 'राधा' शब्द का उच्चारण किया। जिसे 'जरा' ने सुना और 'उद्धव' को जो उसी समय वह पहुँचे..उन्हें सुनाया। उद्धव की आँखों से आँसू लगतार बहने लगे। सभी लोगों को कृष्ण का संदेश देने के बाद जब उद्धव राधा के पास पहुँचे तो वे केवल इतना कह सके ---" राधा, कान्हा तो सारे संसार के थे ..”
--------किन्तु राधा तो केवल कृष्ण के हृदय में थी…....कान्हा के ह्रदय में तो केवल राधा थीं ....
******समस्त भारतीय वाङग्मय के अघ्ययन से प्रकट होता है कि राधा प्रेम का प्रतीक थीं और कृष्ण और राधा के बीच दैहिक संबंधों की कोई भी अवधारणा शास्त्रों में नहीं है। इसलिए इस प्रेम को शाश्वत प्रेम की श्रेणी में रखते हैं। इसलिए कृष्ण के साथ सदा राधाजी को ही प्रतिष्ठा मिली।
-------बरसाना के श्रीजी के मंदिर में ठाकुर जी भी रहते हैं | भले ही चूनर ओढ़ा देते हैं सखी वेष में रहते हैं ताकि कोई जान न पाये | महात्माओं से सुनते हैं कि ऐसा संसार में कहीं नहीं है जहाँ कृष्ण सखी वेश में रहते हैं | जो पूर्ण पुरुषोत्तम पुरुष सखी बने ऐसा केवल बरसाने में है |
अति सरस्यौ बरसानो जू |
राजत रमणीक रवानों जू ||
जहाँ मनिमय मंदिर सोहै जू |



                                           ****श्रीकृष्ण तत्वामृत*****
-----वो कृष्णा है ----.

****वो गाय चराता है, गोमृत दुहता है...दधि खाता है...उसे माखन बहुत सुहाता है ...वह गोपाल है.....गोविन्द है.....वो कृष्ना है .......
-------गौ अर्थात गाय, ज्ञान, बुद्धि, इन्द्रियां, धरतीमाता ....अतः वह बुद्धि, ज्ञान , इन्द्रियों का, समस्त धरती का (कृषक ) पालक है –गोपाल, वह गौ को प्रसन्नता देता है (विन्दते) गोविन्द है
..... दधि...अर्थात स्थिर बुद्धि, प्रज्ञा ...को पहचानता है...उसके अनुरूप कार्य करता है वह दधि खाता है ...
------माखन उसको सबसे प्रिय है .....माखन अर्थात गौदुग्ध को बिलो कर आलोड़ित करके प्राप्त उसका तत्व ज्ञान पर आचरण करना व संसार को देना उसे सबसे प्रिय है ..

***** “सर्वोपनिषद गावो दोग्धा नन्द नन्दनं “ ...सभी उपनिषद् गायें हैं जिन्हें नन्द नंदन श्री कृष्ण ने दुहा ....गीतामृत रूपी माखन स्वयं खाया, प्रयोग किया ....संसार को प्रदान करने हेतु.....
**** वह बाल लीलाएं करता हुआ कंस जैसे महान अत्याचारी सम्राट का अंत करता है ...
****वो प्रेम गीत गाता है वह गोपिकाओं के साथ रमण करता है, नाचता है , प्रेम करता है , राधा का प्रेमी है, कुब्जा का प्रेमी है ...मोहन है ...परन्तु उसे किसी से भी प्रेम नहीं है...निर्मोही है ...वह किसी का नहीं .. वह सभी से सामान रूप से प्रेम करता है ..वह सबका है और सब उसके ...
****वो आठ पटरानियों का एवं १६०० पत्नियों का पति है, पुत्र-पुत्रियों में, संसार में लिप्त है ...परन्तु योगीराज है, योगेश्वर है |
****वो कर्म के गीत गाता है एवं युद्ध क्षेत्र में भी भक्ति व ज्ञान का मार्ग, धर्म की राह दिखाता है ,,,गीता रचता है ....
---- वो रणछोड़ है ...वो स्वयं युद्ध नहीं करता, अस्त्र नहीं उठाता, परन्तु विश्व के सबसे भीषण युद्ध का प्रणेता, संचालक व कारक है |
---अपने सम्मुख ही अपनी नारायणी सेना का विनाश कराता है, कुलनाश कराता है...
---काल के महान विद्वान् उसके आगे शीश झुकाते हैं ...
------------वो कृष्णा, कृष्ण है श्री कृष्ण है ...............
****वह कोइ विशेषज्ञ नहीं अपितु शेषज्ञ है उसके आगे काल व ज्ञान स्वयं शेष होजाते हैं |
---------- वह कृष्ण है ..........
@@@@@ कर्म शब्द कृ धातु से निकला है कृ धातु का अर्थ है करना। इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ कर्मफल भी होता है।
-----कृ से उत्पन्न कृष का अर्थ है विलेखण......आचार्यगण कहते हैं..... ‘संसिद्धि: फल संपत्ति:’ अर्थात फल के रूप में परिणत होना ही संसिद्धि है और ‘विलेखनं हलोत्कीरणं ”
अर्थात विलेखन शब्द का अर्थ है हल-जोतना |..जो तत्पश्चात अन्नोत्पत्ति के कारण ..मानव जीवन के सुख-आनंद का कारण ...अतः कृष्ण का अर्थ.. कृष्णन, कर्षण, आकर्षक, आकर्षण व आनंद स्वरूप हुआ... | ----वो कृष्ण है
------ 'संस्कृति' शब्द भी ….'कृष्टि' शब्द से बना है, जिसकी व्युत्पत्ति संस्कृत की 'कृष' धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ है- 'खेती करना', संवर्धन करना, बोना आदि होता है। सांकेतिक अथवा लाक्षणिक अर्थ होगा- जीवन की मिट्टी को जोतना और बोना। …..‘संस्कृति’ शब्द का अंग्रेजी पर्याय "कल्चर" शब्द ( ( कृष्टि -कल्ट कल्चर ) भी वही अर्थ देता है। कृषि के लिए जिस प्रकार भूमि शोधन और निर्माण की प्रक्रिया आवश्यक है, उसी प्रकार संस्कृति के लिए भी मन के संस्कार–परिष्कार की अपेक्षा होती है।
____अत: जो कर्म द्वारा मन के, समाज के परिष्करण का मार्ग प्रशस्त करता है वह कृष्ण है... | 'कृष' धातु में 'ण' प्रत्यय जोड़ कर 'कृष्ण' बना है जिसका अर्थ आकर्षक व आनंद स्वरूप कृष्ण है..
---वो कृष्ना है...कृष्ण है .....
****शिव–नारद संवाद में शिव का कथन ---‘कृष्ण शब्द में कृष शब्द का अर्थ समस्त और 'न' का अर्थ मैं...आत्मा है .इसीलिये वह सर्वआत्मा परमब्रह्म कृष्ण नाम से कहे जाते हैं| कृष का अर्थ आड़े’.. और न.. का अर्थ आत्मा होने से वे सबके आदि पुरुष हैं |"..
-----..अर्थात कृष का अर्थ आड़े-तिरछा और न (न:=मैं, हम...नाम ) का अर्थ आत्मा ( आत्म ) होने से वे सबके आदि पुरुष हैं...कृष्ण हैं| क्रिष्ट..क्लिष्ट ...टेड़े..त्रिभंगी...कृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा का यही तत्व-अर्थ है...
**** कृष्ण = क्र या कृ = करना, कार्य=कर्म …..राधो = आराधना, राधन, रांधना, गूंथना, शोध, नियमितता , साधना....राधा....
गवामप ब्रजं वृधि कृणुश्व राधो अद्रिव:
नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः |...ऋग्वेद
---ब्रज में गौ – ज्ञान, सभ्यता उन्नति की वृद्धि ...कृष्ण-राधा द्वारा हुई = कर्म व साधना द्वारा की गयी शोधों से हुई ....साधना के बिना कर्म सफल कब होता है ... वो राधा है
****राध धातु से राधा और कृष धातु से कृष्ण नाम व्युत्पन्न हुये| राध धातु का अर्थ है संसिद्धि ( वैदिक रयि= संसार..धन, समृद्धि एवं धा = धारक )...
----ऋग्वेद-५/५२/४०९४-- में राधो व आराधना शब्द ..शोधकार्यों के लिए प्रयुक्त किये गए हैं...यथा..
“ यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्वं म्रजे |”....अर्थात यमुना के किनारे गाय ..घोड़ों आदि धनों का वर्धन, वृद्धि, संशोधन व उत्पादन आराधना सहित करें या किया जाता है |
****नारद पंचरात्र में राधा का एक नाम हरा या हारा भी वर्णित है...वर्णित है | जो गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय में प्रचलित है| अतः महामंत्र की उत्पत्ति....
**** हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे// ----
-------सामवेद की छान्दोग्य उपनिषद् में कथन है...
”स्यामक केवलं प्रपध्यये, स्वालक च्यमं प्रपध्यये स्यामक”....
----श्यामक अर्थात काले की सहायता से श्वेत का ज्ञान होता है (सेवा प्राप्त होती है).. तथा श्वेत की सहायता से हमें स्याम का ज्ञान होता है ( सेवा का अवसर मिलता है)....यहाँ श्याम ..कृष्ण का एवं श्वेत राधा का प्रतीक है |
****नास्ति कृष्णार्चंनम राधार्चनं बिना ......
------जय कन्हैयालाल की ...जय राधा गोविन्द की -----.

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गुरुवार, 25 अगस्त 2016

तेरे कितने रूप---कृष्ण जन्माष्टमी पर----- डा श्याम गुप्त...

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


कृष्ण जन्माष्टमी पर-----
1.
ब्रज की भूमि भई है निहाल |
सुर गन्धर्व अप्सरा गावें नाचें दे दे ताल |
जसुमति द्वारे बजे बधायो, ढफ ढफली खडताल |
पुरजन परिजन हर्ष मनावें जनम लियो नंदलाल |
आशिष देंय विष्णु शिव् ब्रह्मा, मुसुकावैं गोपाल |
बाजहिं ढोल मृदंग मंजीरा नाचहिं ब्रज के बाल |
गोप गोपिका करें आरती, झूमि बजावैं थाल |
आनंद-कन्द प्रकट भये ब्रज में विरज भये ब्रज-ग्वाल |
सुर दुर्लभ छवि निरखे लखि-छकि श्याम’ हू भये निहाल ||

2.
बाजै रे पग घूंघर बाजै रे ।
ठुमुकि ठुमुकि पग नचहि कन्हैया, सब जग नाचै रे ।
जसुमति अंगना कान्हा नाचै, तोतरि बोलन गावै ।
तीन लोक में गूंजे यह धुनि, अनहद तान गुंजावै ।
कण कण सरसे, पत्ता पत्ता, हर प्राणी हरषाये |
कैसे न दौड़ी आयं गोपियाँ घुँघरू चित्त चुराए |
तारी दे दे लगीं नचावन, पायलिया छनकैं |
ढफ ढफली खड़ताल मधुर-स्वर,कर कंकण खनकें |
गोल बनाए गोपी नाचें, बीच नचें नंदलाल |
सुर दुर्लभ लीला आनंद मन जसुमति होय निहाल |
कान्हा नाचे ठुम्मक ठुम्मक तीनों लोक नचावै रे |
मन आनंद चित श्याम’, श्याम की लीला गावै रे ||
3.
तेरे कितने रूप गोपाल ।
सुमिरन करके कान्हा मैं तो होगया आज निहाल ।
नाग-नथैया, नाच-नचैया, नटवर, नंदगोपाल ।
मोहन, मधुसूदन, मुरलीधर, मोर-मुकुट, यदुपाल ।
चीर-हरैया, रास -रचैया, रसानंद, रस पाल ।
कृष्ण-कन्हैया, कृष्ण-मुरारी, केशव, नृत्यगोपाल |
वासुदेव, हृषीकेश, जनार्दन, हरि, गिरिधरगोपाल |
जगन्नाथ, श्रीनाथ, द्वारिकानाथ, जगत-प्रतिपाल |
देवकीसुत,रणछोड़ जी,गोविन्द,अच्युत,यशुमतिलाल |
वर्णन-क्षमता कहाँ 'श्याम की, राधानंद, नंदलाल |
माखनचोर, श्याम, योगेश्वर, अब काटो भव जाल ||












चित्र गूगल साभार...


 

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

श्याम स्मृति---काव्य -- मानवीय सृजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण – डा श्याम गुप्त..

                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

-----श्याम स्मृति-१२६. ---
*****काव्य -- मानवीय सृजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण – ***
-------- काव्य मानव-मन की संवेदनाओं का बौद्धिक सम्प्रेषण है--मानवीय सृजन में सर्वाधिक कठिन व रहस्यपूर्ण ; क्योंकि काव्य अंतःकरण के अभी अवयवों ---चित्त (स्मृति व धारणा ), मन ( संकल्प ), बुद्धि ( मूल्यांकन ), अहं ( आत्मबोध ) व स्वत्व (अनुभव व भाव ) आदि सभी के सामंजस्य से उत्पन्न होता है | तभी वह युगांतरकारी, युगसत्य, जन सम्प्रेषणीय, विराट-सत्याग्रही, बौद्धिक विकासकारी व सामाजिक चेतना का पुनुरुद्धारक हो पाता है |
---------काव्य--- इतिहास, दर्शन या विज्ञान के भांति कोरा कटु यथार्थ न होकर मूलरूप से वास्तविक व्यवहार जगत के अनुसार सत्यं, शिवं, सुन्दरं होता है, तभी उसका कथ्य युगानुरूप के साथ सार्वकालिक सत्य भी होता है|
---------साहित्यकार का दायित्व- नवीन युग-बोध को सही दिशा देना होता है तभी उसकी रचनाएँ कालजयी हो पाती हैं| आधुनिक व सामयिक साहित्य रचना के साथ-साथ ही सनातन व एतिहासिक विषयों पर पुनः-रचनाओं द्वारा समाज के दर्पण पर जमी धूलि को समय-समय साफ़ करते रहने से समयानुकूल प्रतिबिम्ब नए-नए भाव-रूपों में दृश्यमान होते हैं एवं प्रगति की भूमिका बनते हैं|



 

नवसृजन संस्था का वार्षिक सम्मान समारोह एवं कवि सम्मलेन--डा श्याम गुप्त...

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 
               **** नवसृजन संस्था का वार्षिक सम्मान समारोह एवं कवि सम्मलेन***

             लखनऊ के युवा रचनाकारों द्वारा संचालित एकमात्र साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्था ‘नवसृजन’ का वार्षिक सम्मान समारोह एवं कवि सम्मलेन स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व संध्या दिनांक १४ अगस्त २०१६ रविवार को राजाजीपुरम के सिटी कोंवेन्ट स्कूल के सभागार में हुआ |

       प्रथम सत्र - सम्मान समारोह व पुस्तक लोकार्पण के अध्यक्ष संस्कृत के विद्वान् प्रोफ ओमप्रकाश पांडे, मुख्य अतिथि लखनऊ वि.विद्यालय, हिन्दी विभाग की पूर्व अध्यक्ष विदुषी डा उषा सिन्हा एवं विशिष्ट अतिथि विधिवेत्ता श्री राजेश उपाध्याय एवं संस्था के संरक्षक साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य थे| संचालन संस्था के महामंत्री युवा कवि श्री देवेश द्विवेदी देवेश ने किया |

                        दीप प्रज्जवलन एवं माँ शारदे के माल्यार्पण उपरांत सरस्वती वन्दना श्री वाहिद अली वाहिद एवं कुमार तरल ने की | संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त ने संस्था के कार्यों व उद्देश्यों को संक्षिप्त में वर्णित किया |
                        समारोह में प्रसिद्द विधिवेत्ता श्री राजेश उपाध्याय को समाज साधना सम्मान -२०१६, कविवर श्री त्रिवेणी प्रसाद दुबे को सृजन साधना वरिष्ठ रचनाकार सम्मान -२०१६ एवं युवा व उदीयमान कवि श्री विशाल मिश्र को सृजन साथना युवा रचनाकार सम्मान प्रदान किया गया एवं युवा कवयित्री डा. यास्मीन खान के काव्य-संग्रह ‘जीवन के सुर’ का लोकार्पण भी किया गया | सम्मानित साहित्यकारों व लोकार्पित पुस्तक के रचनाकारों द्वारा अपनी रचनाओं के काव्यांश प्रस्तुत किये गए |
                        मुख्यवक्ता के रूप में डा श्यामगुप्त ने सम्मानित रचनाकारों को बधाई देते हुए नवसृजन संस्था को संदर्भित करते हुये कहा कि किसी भी राष्ट्र, देश, समाज या संस्कृति, साहित्य के उत्थान व प्रगति हेतु युवा शक्ति का कर्म संबल एवं वरिष्ठ विद्वानों का वैचारिक संबल सहयोग दोनों का समन्वित भाव आवश्यक होता है | युवा अध्यक्ष डा योगेश, उपाध्यक्ष श्री राजेश एवं महामंत्री श्री देवेश के रूप में युवा संबल तथा संरक्षक डा रंगनाथ मिश्र सत्य के रूप में वरिष्ठ विद्वान् का परामर्श रूपी वैचारिक संबल तो इस संस्था को प्राप्त है ही साथ ही साथ उपस्थित मंच एवं संस्था के मंचों की सदा शोभा बढाने वाले विद्वानों के अमूल्य विचारों की श्रृंखलाओं एवं नगर के उपस्थित युवा व वरिष्ठ कवि व साहित्यकार एवं वे सभी जो संस्था की गोष्ठियों-समारोहों में उपस्थित होते हैं उन सभी का सहयोग प्राप्त है | आशा है कि युवा व वरिष्ठ सहयोग युत लखनऊ की यह विशिष्ठ संस्था नित नवीन ऊंचाई प्राप्त करेगी |
                  विशिष्ट अतिथि श्री राजेश उपाध्याय ने सभी सम्मानित साहित्यकारों व लोकार्पित रचनाओं के रचनाकारों को बधाई प्रस्तुत की |
                   मुख्य अतिथि डा उषा सिन्हा ने स्पष्ट किया कि कवि व साहित्यकार पर सम्मान या पुरस्कार का दबाव नहीं होना चाहिए तभी उत्कृष्ट साहित्य का सृजन होता है |
                   अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफ ओमप्रकाश पांडे जी ने आज तक कलाकारों व साहित्यकारों का सर्वाधिक सम्मान व पुरस्कृत करने वाले राजा भोज को संदर्भित करते हुए उन्हें सौ सौ स्वर्ण मुद्राओं से सम्मानित करने वाले साहित्य व कलाप्रेमी बताया |

            द्वितीय सत्र कवि सम्मलेन डा श्याम गुप्त की अध्यक्षता में हुआ | कुशल संचालन डा रंगनाथ मिश्र सत्य द्वारा किया गया जिसमें लगभग ७० कवियों ने काव्यपाठ किया |




नर-नारी द्वंद्व व संतुलन, समस्यायें व कठिनाइयाँ... डा श्याम गुप्त...



 


                               नर-नारी द्वंद्व व संतुलन, समस्यायें व कठिनाइयाँ...

 

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                   समस्यायें व कठिनाइयाँ सर्वत्र एवं सदैव विद्यमान हैं, चाहे युद्ध हो, प्रेम हो, आतंरिक राजनीति या सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक या व्यवसायिक द्वंद्व हों या व्यक्तिगत कठिनाइयां |

                   वैदिक-पौराणिक युग में तात्कालीन सामजिक स्थितियों, ब्राह्मणों, ऋषि व मुनियों के तप बल एवं राजाओं के शक्ति बल एवं स्त्री-लोलुपता के मध्य स्त्रियों की दशा पर पौराणिक कथाओं (सुकन्या का च्यवन से मज़बूरी अथवा नारी सुकोमल भाव या मानवीय –सामाजिक कर्त्तव्य भाव में विवाह करना, नहुष का इन्द्रणी पर आसक्त होना, कच-देवयानी प्रकरण, ययाति-शर्मिष्ठा प्रकरण आदि ) में देवी सुकन्या( राजा शर्याति की पुत्री, महर्षि च्यवन की पत्नी ) विचार करती हैं कि नर-नारी के बीच सन्तुलन कैसे लाया जाए तो अनायास ही कह उठती हैं कि यह सृष्टि, वास्तव में पुरुष की रचना है। इसीलिए, रचयिता ने पुरुषों के साथ पक्षपात किया, उन्हें स्वत्व-हरण की प्रवृत्तियों से पूर्ण कर दिया। किन्तु पुरुषों की रचना यदि नारियाँ करने लगें, तो पुरुष की कठोरता जाती रहेगी और वह अधिक भावप्रणव एवं मृदुलता से युक्त हो जाएगा।

               इस पर आयु, उर्वशी-पुरुरवा पुत्र, यह दावा करता है कि मैं वह पुरुष हूँ जिसका निर्माण नारियों ने किया है। { पुरुरवा स्वयं इला, जो इल व इला नाम से पुरुष व स्त्री दोनों रूप था, का बुध से पुत्र था, एल कहलाता था| अतः आयु स्वयं को नारियों द्वारा निर्मित कहता था ..}

             आयु का कहना ठीक था, वह प्रसिद्ध वैदिक राजा हुआ, किन्तु युवक नागराजा सुश्रवा ने आयु को जीतकर उसे अपने अधीन कर लिया था।

              देवी सुकन्या सोचती हैं कि फिर वही बात ! पुरुष की रचना पुरुष करे तो वह त्रासक होता है और पुरुष की रचना नारी करे तो लड़ाई में वह हार जाता है।-

                    आज नारी के उत्थान के युग में हमें सोचना चाहिए कि अति सर्वत्र वर्ज्ययेत ....जोश व भावों के अतिरेक में बह कर हमें आज नारियों की अति-स्वाधीनता को अनर्गल निरंकुशता की और नहीं बढ़ने देना चाहिए | चित्रपट, कला, साहित्य व सांस्कृतिक क्षेत्र की बहुत सी पाश्चात्य-मुखापेक्षी नारियों बढ़-चढ़ कर, अति-स्वाभिमानी, अतिरेकता, अतिरंजिता पूर्ण रवैये पर एवं तत्प्रभावित कुछ पुरुषों के रवैये पर भी समुचित विचार करना होगा |

                अतिरंजिता पूर्ण स्वच्छंदता का दुष्परिणाम सामने है ...समाज में स्त्री-पुरुष स्वच्छंदता, वैचारिक शून्यता, अति-भौतिकता, द्वंद्व, अत्यधिक कमाने के लिए चूहा-दौड़, बढ़ती हुई अश्लीलता ...के परिणामी तत्व---अमर्यादाशील पुरुष, संतति, जो हम प्रतिदिन समाचारों में देखते रहते हैं...यौन अपराध, नहीं कम हुआ अपराधों का ग्राफ, आदि |

""क्यों नर एसा होगया यह भी तो तू सोच ,
क्यों है एसी होगयी उसकी गर्हित सोच |
उसकी गर्हित सोच, भटक क्यों गया दिशा से |
पुरुष सीखता राह, सखी, भगिनी, माता से |
नारी विविध लालसाओं में खुद भटकी यों |
मिलकर सोचें आज होगया एसा नर क्यों |""

              समुचित तथ्य वही है जो सनातन सामजिक व्यवस्था में वर्णित है, स्त्री-पुरुष एक रथ के दो पहियों के अनुसार संतति पालन करें व समाज को धारण करें ------ऋग्वेद के अन्तिम मन्त्र (१०-१९१-२/४) में क्या सुन्दर कथन है---
"" समानी व अकूतिःसमाना ह्रदयानि वः ।
समामस्तु वो मनो यथा वः सुसहामतिः ॥""
     --- अर्थात हम ह्रदय से समानता ग्रहण करें...हमारे मन समान हों, हम आपसी सहमति से कार्य संपन्न करें |

               पुरुष की सहयोगी शक्ति-भगिनी, मित्र, पुत्री, सखी, पत्नी, माता के रूप में सत्य ही स्नेह, संवेदनाओं एवं पवित्र भावनाओं को सींचने में युक्त नारी, पुरुष व संतति के निर्माण व विकास की एवं समाज के सृजन, अभिवर्धन व श्रेष्ठ व्यक्तित्व निर्माण की धुरी है।

              अतः आज की विषम स्थिति से उबरने क़ा एकमात्र उपाय यही है कि नारी अन्धानुकरण त्याग कर भोगवादी संस्कृति से अपने को मुक्त करे।

                   हम स्त्री विमर्श, पुरुष विमर्श, स्त्री या पुरुष प्रधान समाज़ नहीं, मानव प्रधान समाज़, मानव-मानव विमर्श की बात करें। बराबरी की नहीं, युक्त-युक्त उपयुक्तता के आदर की बात हो तो बात बने।


शनिवार, 13 अगस्त 2016

चाय पर साहित्यिक परिचर्चा’ एवं काव्य-गोष्ठी ---डा श्याम गुप्त ....

               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..     .


              -----‘चाय पर साहित्यिक परिचर्चा’ एवं काव्य-गोष्ठी----


--------दिनांक १२-८-१६ शुक्रवार को जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, छंदकार आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी से व्यक्तिगत साक्षात्कार का सौभाग्य प्राप्त हुआ | लखनऊ प्रवास के दौरान वे लखनऊ के सुकवि श्री अमरनाथ जी के साथ मेरे आवास पर पधारे | सलिल जी से इंटरनेट व फेसबुक के जरिये तो अच्छी मुलाक़ात थी परन्तु आमने सामने साक्षात्कार का सुअवसर कल प्राप्त हुआ श्री अमरनाथ जी के सौजन्य से |

------ सलिल जी ने मुझे अपनी गीत-नवगीत की पुस्तक ‘काल है संक्रांति का’ भेंट की | सलिल जी ने बताया कि मेरी एक पुस्तक महाकाव्य सृष्टि उनके पास है | मैंने उन्हें अपनी पुस्तकें ‘शूर्पणखा खंडकाव्य, ‘ब्रजबांसुरी’, ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ तथा ‘अगीत साहित्य दर्पण’ भेंट की |

--------मेरे प्रश्न पर कि नवगीत वास्तव में क्या है पर यह अनौपचारिक मुलाक़ात एक संक्षिप्त - ‘चाय पर साहित्यिक परिचर्चा’ एवं काव्य-गोष्ठी में परिवर्तित होगई, जिसमें श्री संजीव वर्मा सलिल, श्री अमरनाथ, श्रीमती सुषमा गुप्ता तथा डा श्यामगुप्त ने अपने अपने विचार प्रस्तुत किये एवं काव्य पाठ किया |

------ विचार-विमर्श के दौरान सलिल जी ने बताया कि वास्तव में जो नवगीत के लिए कहा जाता है उससे वे पूर्ण रूप से सहमत नहीं हैं कि केवल व्यंजनात्मक कथ्य नवगीत का अत्यावश्यक तत्व है क्योंकि व्यंजना या लक्षणा आदि तो काव्य में स्वतः प्रवेश करती हैं आवश्यकतानुसार, उन्हें साप्रयास लाने पर कविता में अप्राकृतिक सा भाव परिलक्षित होने लगेगा | सलिल जी ने यह भी कहा कि युग की असमानताएं, विसंगतियां, द्वंद्व वर्णन ही किसी भी विधा का मूल विषय नहीं होसकता |

----------डा श्यामगुप्त ने सहमत होते हुए कहा कि निश्चय ही किसी भी विधा का एक सुनिश्चित विषय निर्धारित नहीं होसकता | डा श्यामगुप्त के कथन कि नवगीत गीत का सलाद है और एक प्रकार से गीत ही है, पर सलिल जी का कहना था कि सचमुच ही किसी भी गीत को पृथक पृथक मात्रा-खण्डों की पंक्तियों में करके रखा जाय तो नवगीत बन जाता है | छंदों व सनातन छंदों आदि पर एक विशिष्ट रूढिगतता की अनावश्यकता पर भी चर्चा हुई | सलिल जी का कथन था कि हम जो कुछ भी बोलते हैं वाह छंद ही होता है |

------ सलिल जी ने हिन्दी गज़ल में उर्दू शब्दों की बहुलता की अनावश्यकता एवं उर्दू बहरों का संस्कृत-हिन्दी गणों पर ही आधारित होने पर भी चर्चा करते हुए उसे गज़ल की अपेक्षा मुक्तिका कहे जाने की बात रखी | डा श्यामगुप्त ने सभी प्रकार के काव्य की भांति शायरी व गज़ल का आदि श्रोत भी ऋग्वेद से होने की चर्चा की |

----- सलिल जी ने सूरज के विशिष्ट प्रतीक पर रचित कई कविताओं का पाठ किया –
आओ भी सूरज!
छंट गए हैं फूट के बादल
पतंगें एकता की मिलकर उडाओ
गाओ भी सूरज
---- तथा

सूरज बबुआ
चल स्कूल ...| 


-------- श्रीमती सुषमा गुप्ता जी ने वर्षा गीत सुनाया—
आई सावन की बहार
बदरिया घिरि घिरि आवै |


------- डा श्याम गुप्त ने ब्रजभाषा का एक नवगीत सुनाया –
ना उम्मीदी ने हर मन में
अविश्वास पनपायौ |

असली ते हू सुन्दर, नकली
पुष्प होय करिवैं हैं |
लाचारी है बाजारनि में
वही बिकै करिवे हैं |
---तथा घनाक्षरी छंद में घनाक्षरी की परिभाषा प्रस्तुत की ...

‘घनन घनन घन घन के समान करें
श्रोता को भावें करें घन जैसी गर्जना |’


चित्र में --१.परिचर्चा --- श्री अमरनाथ, संजीव वर्मा सलिल व डा श्याम गुप्त ..२. सलिल जी का काव्य पाठ, ...३.सुषमा गुप्ता जी का काव्य पाठ...४.डा श्याम गुप्त का नवगीत ...५.सेल्फी----डा श्याम गुप्त, संजीव वर्मा सलिल, श्रीमती सुषमा गुप्ता...श्री अमरनाथ जी ..

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रविवार, 7 अगस्त 2016

नागपंचमी पर विशेष -----क्या जन्मेजय का नाग-यज्ञ भारत राष्ट्र के दुर्बल होने का कारण था--डा श्याम गुप्त

                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                   -----नागपंचमी पर विशेष -----
                       -         --जीवों के प्रति दया भाव का पर्व है नागपंचमी ----

     ******क्या जन्मेजय का नाग-यज्ञ भारत राष्ट्र के दुर्बल होने का कारण था***** ....



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---------- प्रायः पाश्चात्य विद्वानों एवं कुछ देशी विद्वान् जो पाश्चात्य चश्मे से ही सब कुछ देखने के आदी हैं द्वारा यह कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के कारण भारत राष्ट्र कमजोर हुआ एवं विदेशी आक्रान्ताओं को देश पर आक्रमण करने का मौक़ा मिला | यह एक प्रकार से महाभारत के महानायक श्रीकृष्ण पर लांक्षन के रूप में भी दोहराया जाता है | जो लोहिया जैसे समाजवादियों के कथन से प्रकट होता है ....
“----लेकिन त्रिकालदर्शी क्यों न देख पाया कि इन विदेशी आक्रमणों के पहले ही देशी मगध–धुरी बदला चुकाएगी और सैंकड़ों वर्ष तक भारत पर अपना प्रभुत्व कायम करेगी और आक्रमण के समय तक कृष्ण की भूमि के नजदीक यानि कन्नौज और उज्जैन तक खिसक चुकी होगी, किन्तु अशक्त अवस्था में ।“

--------वस्तुतः यह सत्य नहीं है | श्रीकृष्ण के काल में देश अस्थिरता से जूझ रहा था| विदेशी शासक ..यवन, म्लेक्ष, शक, हूण आदि ..सुदूर पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों पर आधिपत्य जमाये हुए थे एवं भारत आतंरिक भागों में भी दखल रखते थे ....
------यथा कालयवन जिसे श्रीकृष्ण ने चतुराई से परास्त किया | समस्त भारत विभिन्न जनपदों में बंटा हुआ था जो अपनी अपनी शक्ति, मद व अहंकार में चूर थे व एक दूसरे से युद्धरत रहते थे| स्त्रियों, दासों, गरीबों व सामान्य जनों की दशा अत्यंत शोचनीय थी, जो युधिष्ठिर के द्यूत-क्रीडा एवं द्रौपदी प्रकरण से दृष्टिगत होती है, अधर्म का बोलबाला था |
------श्रीकृष्ण इस आसन्न खतरे को भांप गए थे | उन्होंने देख लिया कि उत्तर – पश्चिम में आगे चल कर यवनों, म्लेक्षों, यूनानियों, हूणों, पठानों, मुगलों आदि के आक्रमण होंगे इसलिए भारतीय एकता की धुरी का केन्द्र कहीं वहीं रचना चाहिए जो इन आक्रमणों का सशक्त मुकाबला कर कर सके । और उन्होंने किया भी भारत के केंद्र में पश्चिमी सीमान्त के समीप सशक्त कुरु धुरी का निर्माण करके |
---------उस समय देश में शक्ति की दो धुरियाँ थीं ...
------एक मगध धुरी जो मगध से मथुरा तक फ़ैली हुई थी| भारतीय जागरण का बाहुल्य उस समय उत्तर और पश्चिम में था एवं खतरा भी उत्तर-पश्चिम सीमान्त से था जो राजगिरि और पटना की सशक्त मगध धुरी से बहुत दूर पड़ जाता था, मगध– धुरी कुछ पुरानी पड़ चुकी थी, शक्तिशाली थी किन्तु उसका फैलाव संकुचित था । बीच में शिशुपाल आदि मगध के आश्रित – मित्र थे ।
---------दूसरी विरोधी इन्द्रप्रस्थ-हस्तिनापुर की कुरु धुरी थी ...कुरु – धुरी नयी व सशक्त थी साथ में शक्ति संपन्न यादवों की मित्र एवं उत्तर-पश्चिमी सीमान्त के समीप थी | अतः श्रीकृष्ण ने पूर्व में मणिपुर से ले कर पश्चिम में द्वारका तक को इस कुरु – धुरी में समावेश किया और उसकी आधार शिला थी कुरु – पांचाल संधि | उन्हें सारे देश को बाँधना जो था । महाभारत युद्ध में अधर्मी पीढी का विनाश हुआ परन्तु उन सभी की दूसरी पीढी के योद्धा शासक बने | युधिष्ठिर का धर्म का एकक्षत्र सुशासन लगभग २६ पीढ़ियों तक चला निरापद रूप से |
-------------वस्तुतः जन्मेजय का नागयज्ञ एक एतिहासिक, राजनैतिक व कूटनैतिक भूल थी जिसके कारण भारत राष्ट्र कमजोर हुआ | इसीलिये इस काल से कलयुग का आगमन कहा जाता है |
------कश्यप ऋषि की संतान नाग जाति हिमालय पार की एक भीषण योद्धा, दुर्धर्ष व लड़ाकू जाति थी जो महाजलप्लावन एवं हिमालय उत्पत्ति के साथ मूलतः हिमालय श्रेणी के पर्वतीय क्षेत्रों में बस गयी एवं धीरे धीरे जल उतरने के साथ समस्त भारत में |
------सूर्य व चन्द्र वंशियों की भाँति नागवंश भी भारत का मूल शासक वंश बना जिसने भारत व श्रीलंका एवं सुदूर देशों में भी में अपने साम्राज्य स्थापित किये| मानवों एवं नागों में आपसी सम्बन्ध अच्छे रहते थे जो शेषनाग-विष्णु, शिव-वासुकी , मेघनाद की पत्नी शेष-पुत्री सुलोचना, अर्जुन की पत्नी नागकन्या उलूपी, विष प्रकरण में भीम को बचाने व पालने वाले तथा शक्तिवान बनाने वाले यमुना किनारे के क्षेत्र वाले आर्यक नाग आदि तमाम दृष्टांतों से ज्ञात होता है |
------मथुरा में यमुना से कालिय नाग को ....इन्द्रप्रस्थ की स्थापना के समय खांडव वन से तक्षक नाग कुल को विस्थापित होना पडा, अर्जुन या पांडवों या श्रीकृष्ण ने कभी उनका तिरस्कार या विरोध नहीं किया |
------परन्तु तक्षक नाग द्वारा दुर्योधन की कुटिल नीतिमें आकर अर्जुन का वध करने की चाल को कृष्ण ने असफल कर दिया परन्तु उसे कोइ दंड नहीं दिया | अर्थात कृष्ण, पांडव व युधिष्ठिर काल में उन्होंने नागों के साथ वनांचल की अन्य जातियों व मनुष्यों में सहभाव बनाए रखा क्योंकि वे जानते थे कि देश की रक्षा हेतु उनकी शक्ति व सम्मिलित शक्ति की कितनी महत्ता है |
----------परन्तु राम के अनुज भरत जी के पुत्र तक्ष द्वारा स्थापित तक्षशिला में स्थित तक्षक नाग द्वारा पुराने द्वेष वश अभिमन्यु पुत्र कुरु सम्राट परीक्षत को डंसने पर (=युद्ध में छल से ह्त्या करने ) क्रोधवश उसके पुत्र जन्मेजय ने समस्त भारत से नागों का सफाया कर दिया और एक सशक्त, भीषण योद्धा एवं मानव की सहचर जाति का विनाश हुआ जिनके साथ ही वनांचल की अन्य योद्धा बर्बर जातियों का भी विनाश हुआ | देश में वनांचल निवासी, नागों व कुरु वंशियों एवं अन्य वंशों में सत्ता के लिए युद्ध प्रारम्भ होगये| | सता केंद्र तक्षशिला से मगध के बीच बार बार बदलता रहा | देश कमजोर होता चला गया |
----------इसी काल में ( लगभग २००० ईपू ) सरस्वती नदी के लुप्त होने एवं जल-प्लावन से क्षेत्र का अधिकाँश भाग विनाश को प्राप्त हुआ,( शायद द्वारिका आदि इसी काल में समुद्र में समा गयीं, कच्छ आदि मरूभूमि का निर्माण हुआ ) तमाम ऋषियों –मुनियों के हिमालय पर चले जाने के कारण वैदिक सभ्यता व संस्कृति के विनाश होने पर ब्राह्मण भी भ्रष्ट होने लगे, विद्या लुप्त होने लगी, चहुँ ओर अज्ञान का अन्धकार छाने लगा |
---------यही सिकंदर के आक्रमण का काल है ( १००० ईपू – जिसे योरोपीय विद्वान् ४०० ईपू मानते हैं) | उस समय सीमान्त के नाग शासक वेसीलियस या टेक्सीलियस ने सिकंदर का स्वागत किया था जिसका पुत्र आम्भी सिकंदर का मित्र बना जिसने पोरस पर चढ़ाई के लिए सिकंदर को उकसाया था |
-------यद्यपि भारतीय शक्ति एवं विभिन्न परिस्थितियों वश सिकंदर को पंजाब से ही लौट जाना पडा परन्तु इस आक्रमण के साथ ही भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमान्त के विदेशी शासकों, यवन, हूण, म्लेक्ष, आदि को भारत की आतंरिक दशा व अशक्त-स्थिति का ज्ञान होगया एवं आक्रमणों का सिलसिला प्रारम्भ होगया,जो मौर्य व गुप्त वंश के सशक्त शासकों के प्रतिरोध के कारण कुछ सदियों तक पुनः रुका रहा परन्तु गुप्त वंश के पतन के पश्चात विभिन्न विदेशी आक्रमणकारियों के आने व उनके शासन का सिलसिला चलने लगा |


चित्र---१. जन्मेजय का नाग यज्ञ...२.नाग पंचमी पर नाग दर्शन...३.नाग देवी--मनसा देवी ...४. -नाग देवता --श्री गोगाजी चौहान (जाहरवीर)जी जिन्होंने सोमनाथ मंदिर को लूटकर आ रहे गजनी के मुस्लिम लुटेरों से भयंकर युद्ध किया था । ...५. बादामी, कर्नाटक स्थित ग्राम देवता ( नाग देवता ) अभी भी पूजे जाते हैं
कर्नाटक -बादामी ..में ग्राम देवता नागराज की पूजा
'जन्मेजय  का नाग यज्ञ'
जन्मेजय का नाग यज्ञ


 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

गुरुवासरीय गोष्ठी दि.४-८-१६ वृहस्पतिवार को संपन्न ----- डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

                            ******गुरुवासरीय गोष्ठी दि.४-८-१६ वृहस्पतिवार*****

------प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली गुरुवासरीय गोष्ठी दि.४-८-१६ वृहस्पतिवार को डा श्याम गुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, डा श्याम गुप्त, श्री बसंत राम दीक्षित, कौशल किशोर, श्रीमती विजय लक्ष्मी महक, मंजू सिंह, अनिल किशोर शुक्ल निडर, अशोक विश्वकर्मा, गुंजन, श्रीमती सुषमा गुप्ता एवं श्री विनोद कुमार सिन्हा ने काव्यपाठ में भाग लिया |
---काव्य-गोष्ठी के प्रारम्भ से पहले अनौपचारिक वार्ता में श्री विनोद कुमार सिन्हा के उठाये विषय ‘कविता बनती है या बनाई जाती है‘ पर विवेचना की गयी, सभी उपस्थित साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किये |
------ गोष्ठी का प्रारम्भ करते हुए डा श्यामगुप्त ने सरस्वती वन्दना में कहा ..
" माँ लिखती तो सब कुछ तुम हो. नाम मुझे ही देदेती हो |
आप लिखातीं सारे जग से,लिखा श्याम ने कहा देती हो |..."
श्रीमती विजय लक्ष्मी महक एवं अनिल किशोर शुक्ल द्वारा भी माँ की वन्दना की गयी |
------श्री अशोक विश्वकर्मा ‘गुंजन’ के अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा-
"आयेंगे याद हम तुम्हें एक बार फिरसे,
जब तेरे अपने फैसले तुझे सताने लगेंगे |"
-------अनिल किशोर शुक्ल निडर ने भारत के सपूतों को ललकारा—
‘"भारत माँ के अमर सपूतो,
आगे बढाकर आना होगा |"
------- कवयित्री श्रीमती विजय लक्ष्मी ने ज़िंदगी से शिकवा करते हुए कहा...
"काश ए ज़िंदगी ! हम भी तेरी निगाहों में चढ़े होते |
नामचीनों की कतार में हम भी खड़े होते |"
-------श्रीमती मंजू सिंह ने भोले शंकर की अभ्यर्थना करते हुए इच्छा प्रकट की----
"मेरे भोले भाले शंकर को , किसी की नज़र न लगे |’
-------- श्रीमती सुषमा गुप्ता जी ने एक सुन्दर जीवन गीत प्रस्तुत किया ---
“तुम ही मेरे अंग संग हो,तुम ही तो रस रीति रंग हो |
उपमा रूपक उत्प्रेक्षाएं भी तुझको कब पा सकती हैं |
तुम श्लेष माधुर्य ओज हो, भाव व्यंजनायें तुम ही हो |"
एवं सावन के ऋतु के अनुरंजन में ब्रजभाषा में एक मल्हार भी गीत प्रस्तुत किया...
"आई सावन की बहार,
बदरिया घिर घिर आवै | "
------- श्री कौशल किशोर ने शिवकी अर्चना करते हुए कहा-
"दुनिया में देव हज़ारों हैं महादेव की महिमा क्या कहने |
सबको प्यारे, तनुधारी भूत पिशाच भी हैं इनके |"
-------श्री विनोद कुमार सिन्हा ने सावन में प्रिय से वार्तालाप करते हुए सुन्दर गीत प्रस्तुत किया –
‘सावन को प्रिय आजाने दो ,
मधुमय नभ रस बरसेंगे |"
------- कविवर बसंत राम दीक्षित ने श्रृगार गीत प्रस्तुत करते हुए कहा—
"रूपसी बोली नयन से, देखलो भरपूर मुझको ,
और अपनी प्यास को चहक कर बुझालो |"
------ डा श्याम गुप्त ने एक कवित्त द्वारा इसे घनाक्षरी क्यों कहते हैं इस छंद की परिभाषा प्रस्तुत की....
" घनन घनन घन घन के समान करें,
श्रोता को भावें करें घन जैसी गर्जना |" .... तथा
---कुछ देव घनाक्षरी छंद प्रस्तुत किये ---
“मन बाढ़े प्रीती ऐसी तन में अगन श्याम,
साजन बजावै द्वार-खिड़की खनन खनन |’
------विवेचित विषय ‘कविता बनती है या बनाई जाती है’ को संदर्भित करते हुए डा श्याम गुप्त ने गीत प्रस्तुत किया –
“बीज कविता का सदा मन में बसा होता है,
कोइ सींचे तो ये अंकुर हरा होता है |’
---------समापन व्याख्या व विवेचना करते हुए साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने आतंकवाद पर चोट करते हुए एक प्रस्तुत किया –
सीमा पार से आते हैं आतंकी सदा,
इसलिए मित्र की मिताई में न रहिये |
तथा यादों के घन से संदर्भित करते हुए सुन्दर गीत सुनाया –
मचल रहे गरज गरज यादों के घन.....
.यादों के घन |
---- इस अवसर पर श्रीमती सुषमा गुप्ता व विजय लक्ष्मी जी को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के सन्दर्भ में प्रभावी व उल्लेखनीय सेवा का प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया ...
------अंत में जलपान के पश्चात डा श्यामगुप्त व श्रीमती सुषमा गुप्ता ने सभी उपस्थित विद्वानों का आभार व्यक्त किया |
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 अनिल किशोर शुक्ल निडर का काव्यपाठ
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सुषमा गुप्ता द्वारा प्रस्तुत एक गीत 
चित्र में ---१.श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर का काव्यपाठ...२.सुषमा गुप्ता द्वारा प्रस्तुत एक गीत ...३.वयोवृद्ध कवि कौशल किशोर की भोले वन्दना...४.विनोद कुमार सिन्हा काव्यापाठ करते हुए ...५.बसंत राम दीक्षित का गीत....६.डा श्याम गुप्त का काव्य पाठ....७.श्रीमती विजय लक्ष्मी डा रंगनाथ मिश्र को अपनी पुस्तकें भेंट करती हुईं ....८.सुषमाजी व विजय लक्ष्मी जी का सम्मान ९. डा सत्य का काव्य पाठ ....

डा श्याम गुप्त का काव्य पाठ

श्रीमती विजय लक्ष्मी डा रंगनाथ मिश्र को अपनी पुस्तकें भेंट करती हुईंसाथ में कवि अशोक विश्वकर्मा गुंजन एवं सुषमा गुप्ता व् मंजू सिंह

.सुषमाजी व विजय लक्ष्मी जी का सम्मान

डा सत्य का काव्य पाठ ...
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कवि कौशल किशोर की भोले वन्दना
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विनोद कुमार सिन्हा काव्यापाठ करते हुए
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बसंत राम दीक्षित का गीत.