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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2018

सनातन धर्म की वैज्ञानिकता, सार्वग्राहिता व निरंतरता--- डा श्याम गुप्त

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 


सनातन धर्म की वैज्ञानिकता, सार्वग्राहिता व निरंतरता---
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मानव जब वृक्षों व कंदराओं से बाहर आया और रहन-सहन के सामूहिक रूप की स्थापना हुई तो सामाजिकता के नियमन व समन्वय हेतु कुछ नियमों का प्रचलन हुआ| वही नियम सार्वभौम होकर धर्म, समाज, संस्कृति व सभ्यता बने|
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इस प्रकार एक सनातन व्यवस्था मानव की प्रथम उत्पत्ति की भूमि, ब्रह्मा के प्रदेश सुमेरु पर्वतीय क्षेत्र में स्थापित हुई
------जो ब्रह्मा की मानस पुत्री सरस्वती के उद्गम क्षेत्र मानसरोवर एवं प्रवाह क्षेत्र स्वर्ग आदि में प्रतिष्ठित हुई,
------तत्पश्चात सरस्वती के पृथ्वी क्षेत्र में अवतरण, वेदों के आविर्भाव एवं मानव के विकास प्रक्रिया में पृथ्वी पर चहुँओर प्रसार द्वारा उसके भूतलीय प्रवाह क्षेत्र में सारस्वत-सभ्यता के नाम से प्रतिष्ठित हुई,
------जो पृथ्वी की प्रथम सनातन व्यवस्था, धर्म व संस्कृति हुई, सनातन वैदिक सभ्यता |
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यह बहुदेववादी व्यवस्था थी, ----
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--------केवल सामाजिक विज्ञान से ओत-प्रोत ही नहीं अपितु पूर्णरूपेण वैज्ञानिक तंत्र व नियम आधारित व्यवस्था, जिसमें प्रत्येक मानव क्या विस्तृत रूप में धरती, सूर्य, तारे, मिट्टी, पानी, वृक्ष, प्राणी, जीव-निर्जीव सभी को देव या भगवान माना जाता है | देवताओं को सृष्टि के पालनकर्ता और नैतिक वृत्ति के पोषक के रूप में दर्शाया जाता है। कण कण में भगवान की अवधारणा बनी|
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यह विज्ञान के साथ साथ ईश्वर पर आस्था व विश्वास की संस्कृति व धर्म था| अत: यह कभी न मिटने वाली सतत-प्रवहमान, कालजयी धर्म व संस्कृति हुई एवं ‘धर्म की जड़ सदा हरी’ जैसे वाक्य अस्तित्व में आये| वेद, उपनिषद्, पुराण साहित्य से ज्ञान का प्रकाश उद्भासित हुआ|
------- ईश्वर, आत्मा व जीव के सम्बन्ध की श्रेष्ठतम मान्यताएं व दर्शन प्रतिष्ठित हुए | जम्बू द्वीपे, भरत-खंडे से उद्भूत यह व्यवस्था व धर्म मानव के विश्व में प्रसार के साथ समस्त विश्व में फैला |
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प्रारम्भ से ही उचित-अनुचित, धर्म-अधर्म, कृतित्व-अकृतित्व के समुचित व्याख्या-भाव के कारण इस श्रेष्ठ व्यवस्था को बुराई से, समाज के नियमों की अवमानना करने वालों से चुनौती मिलती रही है|
------मानव अहं, कि ईश्वर सर्वोपरि है या मानव स्वयं के प्रश्न पर, भौतिकता, सुख-समृद्धि के अति-प्रचलन तथा मानव आचरण की स्वयं की हीनता से भी विभिन्न पथ व पंथ इसके विरोध में अस्तित्व में आते रहे हैं | -------जिसके कारण कभी कोई सागर में सभ्यता स्थापित करता है, कभी कोई नभ में नगर स्थापना करता है, कभी कोई समस्त धरती का सम्राट बनाने की लालसा |
-------देव-दैत्य, सुर-असुर, आर्य-अनार्य संस्कृतियों-सभ्यताओं की उत्पत्ति, टकराहट व युद्ध एवं अवतारवाद और अंततः इस प्रक्रिया में प्रत्येक बार सनातन शक्तियों व नियमों की विजय इन्हीं की विश्व-गाथाएँ हैं जो वेदों व पुराणों में वर्णित हैं|
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परशुराम की विजय गाथाएँ, राम द्वारा रावणत्व का विनाश, कृष्ण द्वारा भारत-युद्ध इसी सनातन संस्कृति, धर्म की पुनर्स्थापना की घटनाएं हैं जो हर बार, हर युग में अनैतिकता, अनाचरण, अनाचार, अतिवादिता के विरुद्ध सनातन आचरण, आचार व मानवतावाद की विजय है|
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पश्च द्वापर युग में भी मानव आचरण की कमी, धर्म व सत्कर्मों में आये क्षरण के कारण सनातन व्यवस्था के विरोध में एकेश्वरवाद व अनीश्वरवाद का प्रसार हुआ|
------ ये प्रायः महाभारत युद्ध के पश्चात एवं सम्राट हर्षवर्धन की पराजय के पश्चात समाज में आयी धार्मिक शिथिलता, अकर्मण्यता, ब्राह्मणवाद व निरंकुशता का विरोध था|
मूलतः अनीश्वरवादी सम्प्रदाय ये थे---
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१. गोसाल द्वारा स्‍थापित ==आजीविक सम्‍प्रदाय== .. कर्म सम्‍बन्‍धी कार्य कारण सम्‍बंध के व्‍यवस्‍थाक्रम को स्‍वीकार नहीं करता था। उनकी मान्‍यता थी कि सृष्टि के घटक तत्‍व – पृथ्‍वी, जल, अग्नि, वायु, सुख, दुख ओर जीवात्‍मा (जीव) – अरचित, अखंडनीय पदार्थ के अणुओं के रूप में विद्यमान हैं जो परस्‍पर क्रिया नहीं करते हैं।
२. अजित द्वारा प्रतिपादित -===लोकायत या चार्वाक दर्शन=== भी कर्म के सिद्धांत को अस्‍वीकार करता था। इतना ही नहीं, यह दर्शन पुनर्जन्‍म और जीवात्‍मा जैसी संकल्‍पना को भी अस्‍वीकार करता था।
३. संजयिन द्वारा प्रशस्‍त ===अनीश्‍वरवादियों के अज्ञान दर्शन ==में यह कहा गया कि तत्‍वज्ञान सम्‍बन्‍धी चिन्‍तन या तर्क पर आधारित वाद-विवाद से किसी भी प्रकार का निर्णायक ज्ञान प्राप्‍त करना असम्‍भव है। इस दर्शन में ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले ऐसे मठों में रहने की शिक्षा दी गई जो केवल साहचर्य के भाव पर बल देते हैं।
४.महावीर द्वारा प्रतिपादित ==जैन या निर्ग्रन्‍थ दर्शन ==का प्रादुर्भाव लोकायत दर्शन के विरूद्ध कड़ी प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। इस दर्शन में कर्म गति के कारण जीवात्‍मा के पुनर्जन्‍म की प्रक्रिया से गुजरने की बात पर बल दिया गया।
---- जैन धर्म की अहिंसा वैदिक उपनिषदीय तत्वों से पृथक नहीं है उनकी अपनी राम कथा है एवं अन्य हिन्दू धर्म ग्रंथों की उनकी अपनी व्याख्याएं हैं|
-----स्वामी नेमिनाथ तो स्वयं श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे | अतः उसे सनातन हिन्दू धर्म ने अपने सर्व-आत्मलयी, सर्वग्राही बहुरूप के कारण स्वयं के एक दर्शन के रूप में स्वीकार करलिया, अनीश्वरवादी दर्शन के रूप में |
------अंतत जैन धर्म केवल एक प्रमुख भारतीय धार्मिक व्‍यवस्‍था के रूप में हिन्दू धर्म का एक पंथ की भांति रह गया|
५. गौतम बुद्ध का == बौद्ध मत== का प्रादुर्भाव एक ऐसे श्रमण दर्शन के रूप में हुआ जो कर्म गति को पुनर्जन्‍म के कारण के रूप में स्‍वीकार करता था, लेकिन अन्‍य दर्शनों की मान्‍यता वाले आत्‍मा के स्‍वरूप को अस्‍वीकार करता था।
----- बुद्ध ने तर्क और शास्‍त्रार्थ तथा नैतिक आचरण को मुक्ति के मार्ग में सहायक उपायों के रूप में स्‍वीकार किया,
------लेकिन उन्‍होंने इसे जैन दर्शन जैसी तपश्‍चर्या के रूप में स्‍वीकार नहीं किया। इस प्रकार बौद्ध मत ने पूर्व में उल्लिखित चारों श्रमण दर्शनों की अतिशयताओं का परिवर्जन किया।
------ महात्मा बुद्ध व बौद्ध धर्म के प्रादुर्भाव ने अतिवादितापूर्ण अन्य सभी मतों को स्वयं ही निर्मूल कर दिया और वे इतिहास बन कर रह गए |
----- स्वयं बौद्ध-धर्म जो अपने दया, त्याग, करुणा, संयम आदि के कारण यज्ञों में हिंसा व ब्राहमणत्व के विरोध स्वरुप एक धार्मिक सुधार के रूप में भारत भर में एवं भारत के पडौसी देशों में तेजी से फैला परन्तु ------आज स्वयं भारत से ही निष्कासित अवस्था में है |
------क्योंकि बुद्ध के चार आर्य-धर्म, पंचशील, अष्टांगिक मार्ग वैदिक धर्म के ही अंग थे, उन्होंने कोई नवीन तथ्य उपस्थित नहीं किया |
------उनके दया, करुणा आदि हिन्दू वैष्णव धर्म के ही अंग थे |
------अंतत उसे भी वैष्णव धर्म ने बुद्ध को कृष्ण के वाद अपना नवां अवतार घोषित करके( जो उनके अनुसार जो विष्णु के नकारात्मक अवतार थे, दुष्टों व अपराधियों को पथभ्रष्ट करने हेतु .. एवं इस प्रकार वैदिक धर्म में आयी कुरीतियों को समाप्त करने को हुआ था..) उसे हिन्दू धर्म का ही एक अनीश्वरवादी दर्शन स्वीकार कर लिया |
----- इस प्रकार बुद्ध के बाद अत्यधिक तांत्रिकता, मठों आदि में अव्यवस्था, मत-मतान्तर, जन साधारण से पृथक रहने के कारण बौद्ध धर्म ध्वस्त प्राय होगया|
-----शंकराचार्य की वैदिक विजय एवं ईसाई व इस्लाम धर्म के एकेश्वरवाद का आगमन इसकी विलुप्ति का अन्य कारण बना |
-----आखिर देश की साहित्य व संस्कृति पर बौद्ध दर्शन का प्रभाव तो लाभदायी ही रहा | जब वैदिक संस्कृत का लोप हुआ तो पाली भाषा में बौद्ध धर्म की कथा कहानियां, ग्रंथों में भारतीय संस्कृति के मूल किस्सों को जीवित रखा गया |
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अब बात दो विदेशी धर्मों की है |----
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अनीश्वरवादियों की अनास्था एवं बुद्ध व जैन धर्मों की अकर्मण्यता से उत्पन्न भारतीय समाज असमंजसता की स्थिति में था |
------अनिश्चयता व राजनैतिक अस्थिरता के इस काल में देश पर ==इस्लाम ==का आक्रमण हुआ |
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------इस्लाम एकेश्वरवादी धर्म है जो तलवार के जोर पर दुनिया में फैला | इस्लाम शब्द का अर्थ है – 'अल्लाह को समर्पण'। इस्लाम धर्म का आधारभूत सिद्धांत अल्लाह को सर्वशक्तिमान, एकमात्र ईश्वर और जगत का पालक तथा हज़रत मुहम्मद को उनका संदेशवाहक या पैगम्बर मानना है।
------ भारत में पृथ्वीराज चौहान की निर्णायक हार के पश्चात् यह शासन के धर्म एवं तलबार के बल पर भारत में फैला |
-------परन्तु सनातन धर्म के सच्चे अनुयाइयों ने कभी भी इसे नहीं स्वीकारा एवं सदा हीविरोध में युद्ध रत रहे |
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=== ईसाई धर्म ==
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मूलतः योरोपीय धर्म है | बौद्ध धर्म की दया, करुणा व सेवा ईसाई धर्म का भी मूल है |
----- ईसाई एकेश्वरवादी हैं, लेकिन वे ईश्वर को त्रिक के रूप में समझते हैं- परमपिता परमेश्वर, उनके पुत्र ईसा मसीह (यीशु मसीह) और पवित्र आत्मा।
------ ईसामसीह ने ईसाई धर्म का फ़िलीस्तीन में सर्वप्रथम प्रचार किया, जहाँ से वह रोम और फिर सारे यूरोप में फैला।
------ ईसाई धर्म अधिकाँश राजनैतिक संरक्षण युद्धों व तलवार के बल पर एवं गरीब व दलित जनता को लालच लोभ व चमत्कारों के बल पर फैला | --------इस्लाम व ईसाइयों के धर्म-युद्ध सारे योरोप में अधिकार के लिए होते रहे हैं जिनका रक्तरंजित इतिहास है |
------- ईसामसीह द्वारा सभी के पाप माफ़ कर देने की व्यवस्था के कारण अनुपालन में सबसे सरल यह धर्म विश्व का सबसे अधिक अनुयायियों वाला धर्म है |
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ईसा मसीह के प्रमुख शिष्यों में से एक संत टामस ने प्रथम शताब्दी ईस्वी में ही भारत में मद्रास के पास आकर ईसाई धर्म का प्रचार किया था। उसी समय से इस क्षेत्र में ईसाई धर्म का स्वतंत्र रूप में प्रसार होता रहा है। -------उत्तर भारत में अकबर के दरबार में सर्व धर्म सभा में विचार-विमर्श हेतु जेसुइट फ़ादर उपस्थित थे।
------उन्होंने आगरा में एक चर्च भी स्थापित किया था। इसी काल में ईसाई सम्प्रदाय रोथ ने लैटिन भाषा में संस्कृत व्याकरण लिखा।
------16वीं सदी में पुर्तग़ालियों के साथ आये रोमन कैथोलिक धर्म प्रचारकों के माध्यम से उनका सम्पर्क पोप के कैथोलिक चर्च से हुआ। --------अंग्रेजों के भारत पर अधिकार के साथ शासन के धर्म के सारे लाभ ईसाई धर्म को मिले |
------भारत में सुदूर पूर्वोत्तर व दक्षिण के कुछ भागों में में ईसाई धर्म का प्रभाव है | मदर टेरेसा द्वारा 1950 में कलकत्ता में शासन की सहायता से स्थापित मिशनरीज और चेरिटी मानवता की सेवा में कार्यरत हैं।भारत में -------ईसाइयों मूलतः दो प्रकार की धाराएं हैं –
अ...गोवा, मंगलोर, महाराष्ट्रियन समूह, जो पश्चिमी विचारों से प्रभावित था परन्तु पूरी तरह भारतीय आचार विचारों से कटा नहीं है |
ब...तमिल समूह जो ईसाई धर्म में होते हुए भी अपनी प्राचीन भाषा-संस्कृति से जुड़ा रहा है |
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वस्तुतः यह ===सनातन धर्म या दर्शन,=== सभ्यता, संस्कृति या जीवन व्यवहार, मानव सभ्यता के अत्यंत उच्चतम शिखर पर स्थित होने पर वैचारिक प्रक्रिया के द्वारा उत्पन्न व प्रतिष्ठित हुआ कि इसे अंतिम सत्य की भांति स्वीकारा गया |
------इसका ताना-बाना इतना विशाल, बहुरूपवादी, सर्वग्राही, उदार है कि मानवता के सत्य का प्रत्येक विचार, दर्शन, धर्म व तत्व इसके अन्दर समाहित होसकता है व होता आया है, हाँ उसके मानव हितकारी अंश को स्वयं में लय एवं अनिष्टकारी अंश को अस्वीकार करके |
------यह सतत विकासमान प्रक्रिया का धर्म है | हर युग में, प्रत्येक बार सारे झंझावातों, अनिष्टों, आक्रमणों से जूझकर विजयी भाव में प्रतिष्ठित होता है, क्योंकि इसकी विजय मानवता व मानव मात्र के विजय है |
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देश की स्वतन्त्रता के पश्चात विश्व स्थित व वैश्विक-राजनीति के अनुसार ==भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र ==है आज यहाँ विश्व के प्रत्येक धर्म व देश के निवासी अपने अपने धार्मिक विश्वासों के अनुसार रह रहे हैं जो सनातन धार्मिक विश्वास के अनुसार इसी मूल सनातन धर्म की विकृतियाँ, शाखाएं, प्रशाखाएं हैं जो अपने मूल से दिग्भ्रमित या नवोन्मेषी भाव में उत्पन्न होती हैं |
------यह धार्मिक निरपेक्षता वस्तुतः उसी सनातन भारतीय धर्म का ही मूल-भाव है | विश्व में आज भारतीय संस्कृति, सभ्यता व धर्म का पुनः डंका बजने लगा है |
----- हिन्दू व सनातन-धर्मियों के जाग्रत व क्रियाशील होते जाने एवं गरीबी, अशिक्षा के निराकरण के साथ भारत में सनातन धर्म का पुनर्जागरण होरहा है जो एक बार पुनः विश्व को दिशा प्रदान करेगा सदा की भांति |



 

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

पौधे भी फहरा रहे हैं अब तिरंगा शान से-----डा श्याम गुप्त

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                          

अच्छे दिनों की आस भी अब जगने लगी है,
पौधे भी फहरा रहे हैं अब  तिरंगा शान से |





 

आर्यावर्त का प्रथम संघर्ष और यवन, मलेच्छ अनार्यों व दस्यु जातियों का उद्भव ---डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                          

आर्यावर्त का प्रथम संघर्ष और यवन, मलेच्छ अनार्यों व दस्यु जातियों का उद्भव ---
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देवासुर संग्रामों की समाप्ति पर, बलि-बामन संधि द्वारा असुरों के पाताल गमन पर भरतखंड में उत्तर व दक्षिण के उन्नत मानवों के महासमन्वय ( शिव--इंद्र -विष्णु ) के उपरांत स्थापित वैदिक संस्कृति-सभ्यता का उदय हुआ, जो अपने मानवीयता जन आचरण, शौर्य, ज्ञान-विज्ञान, सामाजिकता, व्यवहारिकता, धर्म, अध्यात्म, दर्शन के उच्चतम स्वरुप के कारण मानव सभ्यता की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति हुई |
------- यही लोग स्वयं को आर्य अर्थात श्रेष्ठजन कहने लगे एवं ‘कृण्वन्तो विश्वं आर्यम..’ के घोष के साथ विश्व भर में फैलते गए | जम्बू द्वीप, भरतखंड, भारतवर्ष, ब्रह्मावर्त, आर्यावर्त इन्ही लोगों ने बसाए |
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बुराई सदैव ही रूप-भाव बदल बदल कर समाज को विश्रन्खलित करने का प्रयत्न करती रहती है | राम से समय से ही वैदिक –संस्कृति के विरोध की धाराएं प्रतिबिम्वित होने लगी थीं, यथा जाबालि का नास्तिकवाद | इसी क्रम में अनैतिक कृतित्वों का समर्थन एवं वैदिक संस्कृति का विरोध करने वाले लोग अनार्य या दस्यु कहलाये जाने लगे |
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इस प्रकार वैदिक काल में भारतीय सभ्यता का विस्तार दुनिया के सभी देशों में था जिसे जम्बूद्वीप कहा जाता है | लोग विभिन्न जातियों, जनजातियों व कबीलों में बंटे थे। उनके प्रमुख राजा कहलाते थे, बीतते समय के साथ-साथ उनमें अपनी सभ्यता व राज्य विस्तार की भावना बढ़ी और उन्होंने युद्ध और मित्रता के माध्यम से खुद का चतुर्दिक विस्तार का प्रयास किया।
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और इस क्रम में कई जातियां, जनजातियां और कबीलों का लोप सा हो गया। एक नई सभ्यताओं और संस्कृतिओं का उदय हुआ। भरतखंड, भारतवर्ष, ब्रह्मावर्त, आर्यावर्त आदि बसते गए | सूर्यवंश , चन्द्रवंश, महाराजा पृथु, भारत, इक्ष्वाकु, ययाति आदि के वंशज जम्बू द्वीप, भरतखंड भारतवर्ष , आर्यावर्त आदि नाम से विभिन्न क्षेत्रों में राज्य करते रहे |
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राम-वशिष्ठ काल वर्णन के अनुसार उस काल में भारतवर्ष में रामवंशी लव, कुश, बृहद्वल, निमिवंशी शुनक और ययाति वंशी यदु, अनु, पुरु, दुह्यु, तुर्वसु का भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों में राज्य था|
------यही काल मूलतः आर्य काल कहलाता है, इसी काल में भारतवर्ष को आर्यावर्त नाम दिया गया |
-------आर्यों के काल में जिन वंश का सबसे ज्यादा विकास हुआ, वे हैं- यदु, तुर्वसु, द्रुहु, पुरु और अनु।
-------उक्त पांचों से विभिन्न राजवंशों --यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव का निर्माण हुआ। जो पुनः पृथ्वी के विभिन्न भागों में फ़ैले | इनके काल को ही आर्यों का काल कहा जाता है। l
प्रथम आर्य संघर्ष --
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ऋग्वेद से पता चलता है कि हरियूपिया नामक स्थान पर याब्यावती नदी ( हरहवती, हव्यवती, सरस्वती ) के तट पर तुर्वश और बीचवृन्त तथा श्रृजंयो के बीच संघर्ष हुआ। हरियूपिया की पहचान हड़प्पा से की जाती है। इस युद्ध में श्रृंजयों की विजय हुई यही संघर्ष आगे बढ़कर दसराज्ञ युद्ध में बदल गया।
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इस क्रम में भारतीय उपमहाद्वीप का पहला दूरगामी असर डालने वाला युद्ध बना दसराज्ञयुद्ध इस युद्ध ने न सिर्फ आर्यावर्त को बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया बल्कि राजतंत्र के पोषक महर्षि वशिष्ट की लोकतंत्र के पोषक महर्षि विश्वामित्र पर श्रेष्ठता भी साबित कर दी।
------- उस काल में राजनीतिक व्यवस्था गणतांत्रिक समुदाय से परिवर्तित होकर राजाओं पर केंद्रित होती जारही थी। दाशराज्ञ युद्ध में भरत कबीला राजा प्रथा आधारित था जबकि उनके विरोध में खड़े कबीले लगभग सभी लोकतांत्रिक थे|
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दसराज्ञ युद्ध -
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अधिकाँश हम राम–रावण एवं महाभारत के युद्धों की विभीषिका से ही परिचित हैं, परन्तु इस बात से अनभिज्ञ हैं कि राम-रावण युद्ध से भी पूर्व संभवतः 7200 ईसा पूर्व त्रेतायुग के अंत में एक महायुद्ध हुआ था जिसे दशराज युद्ध (दाशराज्ञ युद्ध ) के नाम से जाना जाता है।
---- ( यद्यपि राम के काल में यवनों, म्लेक्षों, यादवों, भोज आदि का वर्णन नहीं है, महाभारत काल में है अतः निश्चय ही यह युद्ध राम-रावण युद्ध के पश्चात हुआ होगा )
-------यह आर्यावर्त का सर्वप्रथम भीषण युद्ध था जो आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच ही हुआ था। प्रकारांतर से इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान हैं। इस युद्ध के परिणाम स्वरुप ही मानव के विभिन्न कबीले भारत एवं भारतेतर दूरस्थ क्षेत्रों में फैले व फैलते गए |
----- एक मत के अनुसार माना जाता है कि यह युद्ध त्रेता के अंत में राम-रावण युद्ध के 150 वर्ष बाद हुआ था। क्योंकि हिन्दू काल वर्णन में चौथा काल : राम-वशिष्ठ काल वर्णन के अनुसार रामवंशी लव, कुश, बृहद्वल, निमिवंशी शुनक और ययाति वंशी यदु, अनु, पुरु, दुह्यु, तुर्वसु का राज्य महाभारतकाल तक चला और फिर हुई महाभारत।
------दासराज युद्ध को एक दुर्भाग्यशाली घटना कहा गया है। इस युद्ध में इंद्र और वशिष्ट की संयुक्त सेना के हाथों विश्‍वामित्र की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा। दसराज युद्ध में इंद्र और उसके समर्थक विश्‍वामित्र का अंत करना चाहते थे। विश्‍वामित्र को भूमिगत होना पड़ा। दोनों ऋषियों का देवों और ऋषियों में सम्मान था, दोनों में धर्म और वर्चस्व की लड़ाई थी।
------ इस लड़ाई में वशिष्ठ के 100 पुत्रों का वध हुआ। फिर डर से विश्वामित्र के 50 पुत्र तालजंघों (हैहयों) की शरण में जाकर उनमें मिलकर म्लेच्छ हो गए। तब हार मानकर विश्वामित्र वशिष्ठ के शरणागत हुए और वशिष्ठ ने उन्हें क्षमादान दिया। वशिष्ठ ने श्राद्धदेव मनु (वैवस्वत) 6379 वि.पू. को परामर्श देकर उनका राज्य उनके पुत्रों को बंटवाकर दिलाया।
---- दासराज्ञ युद्ध ---- परुष्णी (रावी) नदी के किनारे हुआ जिसका उल्लेख ऋग्वेद के सातवें मण्डल में है | भरत वंश (त्रित्सु वंश) के राजा सुदास के पुरोहित विश्वामित्र थे सुदास ने विश्वामित्र की जगह वशिष्ठ को अपना पुरोहित बना लिया, फलस्वरूप विश्वामित्र ने दस जनों को इकठ्ठा कर सुदास के विरूद्ध युद्ध कर दिया परन्तु विजय सुदास को ही मिली इस दस-जनों में पंच जन का नाम विशेष रूप से उल्लेख है-पुरु, यदु, अनु द्रुहा तुर्वश तथा अन्य में अलिन, पक्थ भलानस, विषाणी, शिव। दस राज्ञ युद्ध में दोनों तरफ से आर्य एवं अनार्यों ने भाग लिया था।
------ इस युद्ध में सुदास के भरतों की विजय हुई और उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप के आर्यावर्त पर उनका अधिकार स्थापित हो गया।
------इस देश का नाम भरतखंड एवं इस क्षेत्र को आर्यावर्त कहा जाता था |
परन्तु
*********इस युद्ध के कारण आगे चलकर पूरे देश का नाम ही आर्यावर्त की जगह 'भारत' पड़ गया तथा === यवन, ==मलेच्छ ===अनार्यों व दस्यु जातियों का उद्भव ===हुआ जो विभिन्न कारणों से अधिकाँशतः भारत के बाहर जाकर बसते गए |******

महाभारत युद्ध --
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रामचंद्र के युग के बाद – राक्षस एवं असुरों की संगठित राजनैतिक शक्ति का पूर्ण पराभव होगया | केवल छुट-पुट स्थानों आदि पर ही उनका वर्चस्व रह गया | यवन व म्लेक्ष अधिकाँश भारत से बाहर जाकर बस गए |
-----अतः यादवों और पौरवों ने पुन: एक बार फिर अपने पुराने गौरव के अनुरूप आगे बढ़ना शुरू कर दिया। मथुरा से द्वारिका तक यदुकुल फैल गए और अंधक, वृष्णि, कुकुर और भोज उनमें मुख्य हुए। कृष्ण उनके सर्वप्रमुख प्रतिनिधि थे।
------ संवरण के कुल के कुरु ने पांचाल पर अधिकार कर लिया | कुरु के नाम से कुरु वंश प्रसिद्ध हुआ, राजा कुरु के नाम पर ही सरस्वती नदी के निकट का राज्य कुरुक्षेत्र कहा गया। उस के वंशज कौरव कहलाए और आगे चलकर दिल्ली के पास इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर उनके दो प्रसिद्ध नगर हुए। ------भाई भाइयों, कौरवों और पांडवों का विख्यात महाभारत युद्ध पुनः एक बार भारतीय इतिहास की विनाशकारी घटना सिद्ध हुआ।


 

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

युगल छवि राधे गोविन्द बन्दे ....चित्र काव्य--चित्र गाथा --- डा श्याम गुप्त ---

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



      चित्र काव्य---
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कान्हा तेरी वंसी मन तरसाए |
कण कण ज्ञान का अमृत बरसे, तन मन सरसाये |
ज्योति दीप मन होय प्रकाशित, तन जगमग कर जाए |
तीन लोक में गूंजे यह ध्वनि,  देव दनुज मुसकाये |
पत्ता-पत्ता, कलि-कलि झूमे, पुष्प-पुष्प खिल जाए |
नर-नारी की बात कहूँ क्या, सागर उफना जाए |
बैरन छेड़े तान अजानी , मोहनि  मन्त्र चलाये |
राखहु श्याम’ मोरी मर्यादा, मुरली मन भरमाये ||
काहे मन धीर धरे घनश्याम |
तुम जो कहत हम एक विलगि कब हैं राधे श्याम
फ़िर क्यों तडपत ह्रदय जलज यह समुझाओ हे श्याम !
सान्झ होय और ढले अर्क, नित बरसाने घर-ग्राम
जावें खग मृग करत कोलाहल अपने-अपने धाम।
घेरे रहत क्यों एक ही शंका मोहे सुबहो-शाम।
दूर चले जाओगे हे प्रभु!  छोड़ के गोकुल धाम
कैसे विरहन रात कटेगी, बीतें आठों याम
राधा की हर सांस सांवरिया , रोम रोम में श्याम।
श्याम', श्याम-श्यामा लीला लखि पायो सुख अभिराम

राधे काहे धीर धरो
मैं पर-ब्रह्म ,जगत हित कारण, माया भरम परो
तुम तो स्वयं प्रकृति -माया ,मम अन्तर वास करो।
एक तत्व गुन , भासें जग दुई , जगमग रूप धरो।
राधा -श्याम एक ही रूपक ,विलगि भाव भरो।
रोम-रोम हर सांस सांस में , राधे ! तुम विचरो
श्याम, श्याम-श्यामा लीला लखि,जग जीवन सुधरो।
  चित्र गाथा ---
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                     युगल छवि राधे गोविन्द बन्दे ....
                “ रस स्वरुप घनश्याम हैं राधा भाव विभाव... | ”
             
        इश्के मजाजी और इश्के हकीकी का जो संगम बांसुरी की तान में है अन्यंत्र कहाँ ! यही वह रूप, भाव, रस, छंद की अनूठी तान है जिसने युगों युगों से विश्व को, विश्व की हर संस्कृति-सभ्यता को, जन जन को, स्त्री-पुरुष को, मानवता को, समस्त जड़-जंगम, चेतन-अचेतन प्रकृति को अपने वश में कर रखा है |
       प्रेम और भक्ति का सम्पूर्ण भाव यदि कहीं ढूंढना हो राधाकृष्ण शब्द में ढूंढिए, मुरली की तान में खोजिये | गोपाल की वंशी धुन में पाइए | गोपी भाव में, राधा की भक्ति, श्रीकृष्ण की प्रेम धुन में जानिये, अपने अंतर के आनंदमय मधुरतम भाव में अनुभव कीजिये और प्रेम-सरिता के प्रवाह को तात्विकता से उत्पन्न होकर, लोक में प्रणय से होकर दिव्य की अनुभूति तक प्राप्त करिए |
      श्रृद्धा-विश्वास रूपिणों  का सम्पूर्ण रूप प्रस्तुत चित्र में ढूंढिए जिसे मन की गहराई से अनुभव करेंगे तो प्रेम की लौकिक अभिव्यक्ति प्रणय के प्रभावोत्पादन का सौन्दर्यमय, अभिव्यन्जनीय, अनिवर्चनीय व मादक रूप भाव दृष्टव्य होगा | ब्रह्म-माया-जीव-संसार का भाव आनंद रूप मिलेगा, साक्षात् माया-ब्रह्म का नर्तन, प्रकृति-पुरुष का भाव मंथन, द्वैत–अद्वैत के तत्व-चितन का दर्शन होगा, जहां प्रेम उच्चतम अवस्था में, भावातिरेक अवस्था में भक्ति में परिवर्तित होजाता है और अगले सोपान निर्विकल्प भक्ति पर द्वैत का अद्वैत में लय होकर प्रिय के साथ रंग, रूप, रस, भाव, लय, विचार आदि सर्वस्व तदनुरूपता में | ...
            जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं |”
   तब मीरा आलाप लेती हैं---मैं तो सांवरे के रंग रांची .......
तथा मुग्धा नायिका भाव विह्वल हुई गा उठती है – पिया अंग लग लग भयी सांवरी मैं ...|
   जिसका वर्णन आदि-पुराण में इस प्रकार किया गया है ----
              श्री कृष्णस्य तेजसार्धेना सा च मूर्तिमती सती
              एका मूर्तिहि द्विविधा भुव भेदो वेदा निरूपिता |
    -----श्रीकृष्ण के दैवीय तेजस स्वरुप का अर्धभाग राधारूप है | वे वेदों द्वारा निरूपित एक ही शरीर के दो अविभाज्य रूप है |
        यथा सामवेद के अनुसार-  रेपोहि कोटि जन्मागम कर्म भोगम शुभशुभं |  जिसका दर्शन मात्र करोड़ों करोड़ों वर्ष के जन्मों के पाप का विनाश व समस्त कर्मभोगों का क्षय करता है तथा जन्म-मरण के संसार चक्र से मुक्ति प्रदान करता है ---- अस्तु-
           लीला राधा-श्याम की श्याम’ सके क्या जान ,
           जो लीला को जान ले श्याम’ रहे न श्याम’ |
     
                   -----हरे कृष्ण -----