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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

रविवार, 10 जून 2018

मेरी चारधाम यात्रा भाग एक--- डा श्याम गुप्त

                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...














                       मेरी चारधाम यात्रा 
भाग एक---
      उत्तर भारत में हिमालय स्थित चारधाम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ व बद्रीनाथ भारतवर्ष के एवं हिन्दुओं के प्राचीनतम तथा पवित्रतम तीर्थस्थल हैं | हर किसी हिन्दू व भारतीय की जीवन में एक बार बदरीनाथधाम जाने की इच्छा मोक्ष की इच्छा के समान है | वास्तव में तो यह यात्रा माँ गंगा के चहुँ और की परिक्रमित यात्रा ही है |  गौमुख ग्लेशियर से भागीरथी और गंगोत्री एक ओर से नीलकंठ भागीरथ ग्लेशियर से अलकनंदा और उसकी पृष्ठभूमि में नर-नारायण पर्वत के मध्य बद्रीनाथ, उसी के दूसरे पृष्ठ से शतपथ ग्लेशियर से मंदाकिनी और केदारनाथ, और सामने  कालिंदी पर्वत की  बंदरपूंछ चोटी के पश्चिमी अंत में फैले  चंपासर ग्लेसियर से –यमुनोत्री- यमुना |
        अतः प्रोग्राम बनते ही मैं व सुषमाजी तुरंत ही बेंगलोर से लखनऊ आगये| लखनऊ से सत्यप्रकाश गुप्ता जी व पदमा जी, श्री कृष्ण कुमार सिन्हा एवं उनकी पत्नी तथा आगरा से डा राकेश गुप्ता, सुधा गुप्ता व उनका पुत्र राजुल ट्रेन द्वारा १७-५-२०१८ को हरिद्वार पहुंचे जहां से हम नौ लोगों को चार्मिंग यात्रा वालों के १० दिन के टूर पैकेज द्वारा चारधाम यात्रा को प्रस्थान करना था|
प्रथम दिन---दिनांक १७-५-१८ को होटल में विश्राम के बाद हम सभी हर की पौड़ी हरद्वार पर गंगा आरती में सम्मिलित हुए |
       हर की पौड़ी या हरि की पौड़ी का ब्रह्म कुंड हरिद्वार का मुख्य घाट है जहां गंगा पर्वतों को छोड़कर मैदान में उतरती है | समुद्रमंथन से प्राप्त अमृतकुम्भ से कुछ बूंदे यहाँ भी गिरी थीं, अतः यह स्थान भी मोक्ष का द्वार मानाजाता है | यही कनखल में दक्ष के यज्ञ स्थल है जिसमें शिवपत्नी सती ने आत्मदाह किया था | शाम को प्रतिदिन गंगा आरती का सुप्रसिद्ध व मनोहारी कार्यक्रम होता है | हरिद्वार को माया नगरी और कुंभ नगरी भी कहा जाता हैं |
      
   चित्र १-हर की पौड़ी --- चित्र २ ---गंगा आरती
 


दूसरे दिन हरिद्वार से बारकोट ----
         १८-५-१८ की प्रातः हम १२ सीटर टेम्पो ट्रेवेलर से हरिद्वार से मसूरी एवं केम्पटीफाल होते हुए बारकोट के लिए रवाना हुए जो हरिद्वार से २१० किमी है १३५२ मी ऊंचाई पर है जहां से यमुनोत्री जाते हैं| बारकोट ( या बड़ाकोट )  उत्तरकाशी ( या प्राचीन नाम बड़ाहाट ) का प्रवेश द्वार है एवं चारों ओर हिमालय की दुर्गम बंदरपूंछ पर्वत श्रेणी एवं अन्य ऊंची श्रेणियों के मध्य यमुना के किनारे पर बसा हुआ मनोरम स्थान है | रात्रि विश्राम किया गया |
      बड़कोट की पौराणिकता से संबंधित दो भिन्न विचार धाराएं स्थानीय रूप से प्रचलित हैं। एक का मत है कि महाभारत युग में बड़कोट राजा सहस्रबाहु के राज्य की राजधानी थी। हजार बाहुओं के समान शक्ति रखने वाला सहस्रबाहु अपना दरबार एक सपाट भूमि पर लगाता था बड़ा दरबार अर्थात बड़कोट। माना जाता है कि पांडवों ने वन पर्व के दौरान गंधमर्दन पर्वत पर जाते समय सहस्रबाहु का आतिथ्य स्वीकार किया गया था। यहां के कई कुंडों एवं मंदिरों का निर्माण पांडवों द्वारा हुआ, ऐसा
माना जाता है।

 
चित्र ४ व ५ ----बारकोट रात्रि में---होटल की बालकनी में सुषमाजी व मि.मिथिलेश सिन्हा तथा प्राचीन पर्वतीय छतें स्लेट पत्थर की खपरेल ---

 

चित्र -६ .बंदरपूंछ व अन्य चोटियों से घिरा बारकोट
      एक अन्य मत का दृढ़ विश्वास है कि बड़कोट मूल रूप से जमदग्नि मुनि और उनके पुत्र परशुराम की भूमि रही थी। कहा जाता है वास्तव में सहस्रबाहु दक्षिण में शासन करता था और चारधामों की यात्रा के लिये ही वह उत्तर आया था। उसका विवाह जमदग्नि मुनि की पत्नी रेणुका की बहन बेनुका से हुआ था।
--------यह तथ्य मौजूद है कि रवाँई एवं बड़कोट के लोग अपनी वंश परंपरा पांडवों , जिन्होंने एक ही स्त्री द्रोपदी से विवाह रचाया था, से जोड़ते हैं उस क्षेत्र के गांवों में मूल रूप से निर्वाहित प्राचीन परंपराओं में से एक है बहुपतित्व की प्रथा जिसमें कई पतियों को रखने का रिवाज है।



 

शुक्रवार, 1 जून 2018

अच्छे उद्देश्य के कार्य हेतु बुरा तरीका ----डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



             अच्छे उद्देश्य के कार्य हेतु बुरा तरीका ----- डा श्याम गुप्त

            -क्या इस अच्छे उद्देश्य के लिए कोइ अन्य अच्छा व शालीन तरीका नहीं अपनाया जा सकता था------परन्तु आसुरी प्रवृत्ति वाले क्षेत्रों में सोच का तरीका ही वही है ----




 

सोमवार, 14 मई 2018

भारत में वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा की कट्टरता -एक ऐतिहासिक आईना ----भाग चार— केवल वैदिक हिन्दू धर्म ही जीवित रहा - –डा श्यामगुप्त

                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


भारत में वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा की कट्टरता -एक ऐतिहासिक आईना
================================================= - –डा श्यामगुप्त
भाग चार— केवल वैदिक हिन्दू धर्म ही जीवित रहा --(अंतिम क़िस्त )
======================================
-- हिन्दू धर्म जीवित रहा----
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                 जो कुछ ऊपर लिखा है वो अन्य देशों में भी हुआ वहां के मज़हब मिट गए और यह धर्म ज़िंदा है, सिर्फ बचे सनातन वैदिक धर्म को मानने वाले –--
यूनान मिस्र रोमा, सब मिट गये जहाँ से
पर अब तलक है बाकी, नामों निशाँ हमारा |

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                  पूरे के पूरे मज़हब ख़त्म हो गए दुनिया के नक़्शे से, कहाँ गया पारसी मज़हब अपनी जन्म भूमि ईरान से ? क्या क्या ज़ुल्म नहीं सहे यहूदियों और यज़ीदियों ने अपने आप को ज़िंदा रखने के लिए, कहाँ है वे ।
-------कहाँ है बौद्ध धर्म का वो वटवृक्ष जिसकी शाखाएँ बिहार से लेकर अफगानिस्तान मंगोल चीन इंडोनेशिया तक में फैली हुईं थीं ?
-------कौन सा मज़हब बचा मोरक्को से लेकर मलेशिया तक ?
--------सिर्फ और सिर्फ बचे तो सनातन वैदिक धर्म को मानने वाले।
\
                  यहाँ तक कि पं.जवाहरलाल नेहरू, जो मुस्लिमों के पक्षधर थे, ने भी अपनी पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया "में पूर्णतः आश्वस्त न होते हुए भी हिन्दू वर्णव्यवस्था के सम्बन्ध में लिखा है –
There is truth in that and its origin was probably a device to keep the foreign conquerors apart from and above the conquered people. Undoubtedly in its growth it has acted in that way, though originally there may have been a good deal of FLEXIBILITY about it.
-----यह सच्चाई लगती है कि इसकी उत्पत्ति विदेशी विजेताओं से स्वयं को पृथक रखने हेतु हुई | निश्चय ही प्रारम्भ में इसमें काफी लचीलापन रहा होगा |
Yet that is only a part of the truth and it does not explain its power and cohesiveness and the way it has lasted down to the present day.
----यह केवल एक सचाई है परन्तु इससे यह इसकी शक्ति एवं सबको जोड़कर रखने की क्षमता ज्ञात नहीं होती जिसके कारण ये आज तक वर्तमान स्थिति में मौजूद है |
It survived not only the powerful impact of Buddhism and Moughal rule and the spread of Islam.
-----यह व्यवस्था शक्तिशाली बौद्ध धर्म, मुग़ल शासन एवं इस्लाम के प्रसार के उपरांत भी जीवित रही |
\
                    और आज अपने को शूद्र कहने वाले, ब्राह्मणों या क्षत्रियों को दोष देने वाले अपने, स्वयं को तथाकथित भारत के आदि-निवासी कहने वाले, सेक्यूलर, काले अँगरेज़ आदि, मित्रों को ज़िम्मेदार कभी नहीं ठहराते और डा. सविता माई (आंबेडकर जी की ब्राह्मण पत्नी) के संस्कारों को ज़बरदस्ती छुपा लेते हैं|
-------- वे लोग अपने पूर्वजो के बलिदान को याद नहीं रख सकते, जिनकी वजह से वे आज भी हिन्दू हैं और उन्मुक्त कण्ठ से उन उच्चवर्णों ब्राह्मणो और क्षत्रियों को गाली भी दे सकते हैं जिनके पूर्वजों ने न जाने इस धर्म को ज़िंदा रखने के लिए क्या क्या कष्ट सहे।
\
                     शर्म आनी चाहिए उन लोगों को जो अपने पूर्वजों के बलिदानों को भूल कर, इस बात पर गर्व नहीं करते कि आज उनका धर्म ज़िंदा है, मगर वो रो रहे हैं कि वर्णव्यवस्था ज़िंदा क्यों है। क्या भील, गोंड, सन्थाल और सभी आदिवासियों के पिछड़ेपन के लिए क्या वर्णव्यवस्था जिम्मेदार है?
                    वस्तुतः आज जिस वर्णव्यवस्था में हम विभाजित हैं उसका श्रेय 1881 एवं 1902 की अंग्रेजों द्वारा की गयी जनगणना को है जिसने डेमोग्राफी को सरल बनाने के लिए हिंदू समाज
को इन तथाकथित चार वर्णों में वर्गीकृत कर दिया |
-----कौन ज़िम्मेदार है इस पूरे प्रकरण के लिए ---
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------समकालीन आवश्यकतावश, अनजाने या भूलवश धर्म में विकृतियाँ लाने वाले पंडित,
-----उच्च जातियां, या उन्हें मजबूर करने वाले मुसलमान आक्रांता या
-------आपसे सच्चाई छुपाने वाले तथाकथित छद्म सेक्यूलर एवं इतिहास के वामपंथी व हिन्दू विरोधी विचारधारा वाले लेखक |
-----हमें क्या करना चाहिए---
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                  कोई भी ज़िम्मेदार हो पर सभी हिन्दू भाइयो अब तो आपस में लड़ना छोड़ कर भविष्य की तरफ एक सकारात्मक कदम उठाओ। अगर एक पिछड़ी जाति के मोदी देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो उतने ही रास्ते तुम्हारे लिए भी खुले हैं, मान लिया कल तक तुम पर समाज के बहुत बंधन थे पर आज तो नहीं हैं ।
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                      अतः आज आवश्यकता है कि पुरानी, नई व अधुना पीढ़ी को चाहिए कि विदेशी शक्तियों के विभिन्न लालचपूर्ण, लुभावने, तथाकथित प्रगतिशील, भौतिक उन्नति के बहाने सहायता-सहयोग आदि के रूप में आपके धर्म, संस्कृति, राष्ट्रीय व जातीय एकता के विनाश व भविष्य की संतति के मानसिक व वैचारिक अप-परिवर्तन के षडयंत्रों को पहचानें व सकारात्मक विरोध व विरोध प्रदर्शन करें |
\
                   संज्ञान लेना चाहिए कि जिनके पूर्वजों ने ये सब अत्याचार किए, 800 साल तक राज किया, वो तो अल्पसंख्यकों के नाम पर आरक्षण व सभी सुविधाएं भी पा गये हैं और कटघरे में खड़े हैं, मूल देशवासी हिन्दू ---क्यों--- ??
\
------अगर आज हिन्दू एक होते तो कश्मीर घाटी में गिनती के 2984 हिन्दू न बचते और 4.50 लाख कश्मीरी हिंदू 25 साल से अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह न रह रहे होते, पार्लियामेंट पर हमला, तिरंगे का अपमान, स्वदेशी सेना पर पत्थरवाजी और 16 दिसंबर, निर्भया काण्ड, मेरठ काण्ड, हापुड़ काण्ड, जम्मू काण्ड आदि इस देश में न होते।
------इति---

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मेरी अतुकांत काव्य कृति -'काव्य मुक्तामृत. से एक रचना ----हम कब चेतेंगे----डा श्याम गुप्त

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

             मेरी अतुकांत काव्य कृति -'काव्य मुक्तामृत. से एक रचना ----हम कब चेतेंगे----




 

गुरुवार, 10 मई 2018

भारत में वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा की कट्टरता -एक ऐतिहासिक आईना -–भाग तीन – हिन्दू धर्म को जिन्दा कैसे रखा गया –डा श्यामगुप्त

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...    

भारत में वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा की कट्टरता -एक ऐतिहासिक आईना -–डा श्यामगुप्त
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भाग तीन – हिन्दू धर्म को जिन्दा कैसे रखा गया –
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====हिन्दुओं ने क्या किया और उसका परिणाम क्या हुआ ===
ऐसा नहीं कि हिंदुओं ने विरोध या मुकाबला नहीं किया, डटकर किया था, परन्तु अनीतिकारी, अनाचारी, अत्याचारी, क्रूर, खूनी-हिंसक, झूठे, कपटी, बेईमान मुस्लिम आक्रान्ताओं ने बुरी तरह दमनकारी नीति अपनाई | फिर भी सभी राजे-रजवाड़े लगातार मुकाबला करते ही रहे | कभी उन्हें चैन से नहीं बैठने दिया | जिन्होंने विरोध किया वे प्राकृतिक रूप से हिन्दू रहे |
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उसके बाद ही गुलाम हिन्दू चाहे मुसलमान बने या नहीं उन्हें नीचा दिखाने के लिए इनसे अस्तबलों का, हाथियों को रखने का, सिपाहियों के सेवक होने का और बेइज़्ज़त करने के लिए साफ सफाई करने के काम दिए जाते थे।
----- उच्च वर्ण के लोग जो गुलाम नहीं भी बने, वैसे ही सब कुछ लुटाकर, अपना धर्म न छोड़ने के फेर में जजिया और तमाम तरीके के कर चुकाते चुकाते समाज में वैसे ही नीचे की पायदान शूद्रता पर पहुँच गए।
------जो आतताइयों से जान बचा कर जंगलों में भाग गए जिन्दा रहने के उन्होंने मांसाहार खाना शुरू कर दिया और जैसी की प्रथा थी, अछूत घोषित हो गए।
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आज कई भारतीय मुसलमान वे हिन्दू हैं जिनके पूर्वज मुसलमानों के शासन में हिंदुत्व से इस्लाम में धर्मान्तरण कर चुके थे, वे परवर्तित लोग उन उच्च जातियों से थे जो वाणिज्य और व्यापार करते थे और यह जीवन के खतरे और दबाव के कारण हुआ|
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===कौन सी विकृति है जो मुसलमानों के अतिक्रमण से पहले इस देश में थी और उनके आने के बाद किसी देश में नहीं है।====
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===हिन्दू धर्म को जिन्दा कैसे रखा गया ===
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-------जिसका जैसा वर्ण था वो उसी को बचाने लग गया, अपने अपने ज्ञान, संस्कार व समझ के अनुसार तरीकों से ---- वर्ण से विविध प्रकार जाति प्रथा का प्रादुर्भाव ....
------ अपने धर्म को ज़िंदा रखने के लिए ज्ञान, धर्मशास्त्रों और संस्कारों को मुंह जुबानी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया गया ।
-------मलेच्छों का हिन्दू धर्म में अतिक्रमण एवं प्रवेश रोकना,--अंतरजातीय, अंतर्धर्मीय विवाह व अन्य आपसी व्यवहार पर रोक – धर्मकांडों व कर्मकांडों में कठोरता आई |
------लड़कियां मुगलों के हरम में न जाएँ ,इसलिए लड़की का जन्म अभिशाप लगा, बाल-विवाह ---
......छोटी उम्र में उनकी शादी इसलिए कर दी जाती थी की अब इसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी इसका पति संभाले |
---------मुसलमानों की गन्दी निगाह से बचने के लिए ***पर्दा प्रथा*** शुरू हो गयी। *********
--------विवाहित महिलाएं पति के युद्ध में जाते ही विधर्मियों के हाथों अपमानित होने से बचने के लिए ***जौहर ****करने लगीं,
-------विधवा स्त्रियाँ पति के मरने के बाद अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए सती होने लगीं ---*****सती प्रथा का आविर्भाव *****..|
------- घर से बेघर हुए हिन्दुओं को पेट पालने के लिए ठगी लूटमार का पेशा अपनाना पड़ा अथवा जो भी पेशा मिला अपनाया गया ।
-------हिन्दू धर्म में शूद्र कृत्यों वाले बहरूपिये आवरण ओढ़ कर इसे कुरूप न कर दें इसीलिए वर्णव्यवस्था कट्टर हुई, लचीलेपन की अपेक्षा , नियम आदि कठोर बनाए गए
\
इस पूरी प्रक्रिया में धर्म रूढ़िवादी हो गया और आज की परिभाषा के अनुसार उसमें विकृतियाँ आ गयी। मजबूरी में धर्म एवं वर्णों को कछुए की तरह खोल में सिकुड़ना पड़ा ।
\
-------यहीं से वर्णव्यवस्था का स्वाभाविक लचीलापन जो की धर्मसम्मत था ख़त्म हो गया-------
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---परन्तु इन सब प्रतिरोधों व प्रतिक्रियाओं के परिणामस्वरूप ही भारतीय उपमहाद्वीप के इस्लामीकरण की विफलता की गाथा लिखी गयी |

======= और इसी विफलता को पुनः प्रत्यारोपित करने हेतु देश की स्वतन्त्रता के समय विभाजन का बीज और साम्प्रदायिकता की राजनीति की उलझी हुयी परियोजना बनी, जो आज एक नासूर की भांति देश में उपस्थित है |
                               ------क्रमशः----भाग चार —- केवल वैदिक हिन्दू धर्म ही जीवित रहा --



 

बुधवार, 9 मई 2018

भारत में वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा की कट्टरता -एक ऐतिहासिक आईना -–भाग दो--वैदिक धर्म में कुरीतिया कैसे आईं डा श्यामगुप्त

                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



     भारत में वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा की कट्टरता -एक ऐतिहासिक आईना -–डा श्यामगुप्त
 
 


             भाग-दो---- वैदिक धर्म में कुरीतिया कैसे आईं

      == मुस्लिम व योरोपियन आक्रान्ताओं के आने से पहले की भारतीय स्थिति ==

       इस समय तक हिन्दू, वैदिक धर्म का पालन करते हुए, हवन यज्ञों द्वारा निर्गुण तथा निराकार परमेश्वर की पूजा किया करते थे | ध्यातव्य है कि मनु स्मृति इस काल से बहुत पहले  लिखी गयी थी जब निराकार ईश्वर को पूजा जाता था ।
      चातुर्वर्ण्य ---मुख से ब्राह्मण पैदा हुए थे मनु का सांकेतिक तात्पर्य था कि सुवचन और सुबुद्धि के गुणों के द्वारा ब्राह्मणो का जन्म हुआ। यह सांकेतिक तात्पर्य था कि भुजाओं के बल के द्योतक क्षत्रिय बने। और यही सांकेतिक तात्पर्य था कि जीविकोपार्जन के कर्मो से वैश्यों का जन्म हुआ और श्रम का काम करने वाले चरणो से शूद्रों का जन्म हुआ। या जिनमे ये गुण जैसे हैं वे उन वर्णों में गुणों और कर्मों के आधार पर विभाजित किये जाएँ।

    चन्द्रगुप्त मौर्य (340 BC -298 BC) ,---"मुद्राराक्षस" में उसे कुलविहीन बताया गया है। यदि उस समय वर्णव्यवस्था थी तो वह उसे तोड़ते हुए अपने समय का एक शक्तिशाली राजा बना। इसी समय "सेल्यूकस" के दूत "मैगस्थनीज़" के यात्रा वृतांत के अनुसार उस समय इसी चतुर्वर्ण में ही कई जातियाँ 1) दार्शनिक 2) कृषि 3)सैनिक 4) निरीक्षक /पर्यवेक्षक 5) पार्षद 6) कर निर्धारक 7) चरवाहे 8) सफाई कर्मचारी और 9 ) कारीगर हुआ करते थे।  
        चन्द्रगुप्त के प्रधानमंत्री "कौटिल्य" के अर्थशास्त्र एवं नीतिसार अनुसार, किसी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार की कठोर सज़ा थी।  यूं तो  उस समय दास प्रथा नहीं थी लेकिन चाणक्य के अनुसार यदि किसी को मजबूरी में खुद दास बनना पड़े तो भी उससे कोई नीच अथवा अधर्म का कार्य नहीं करवाया जा सकता था। सब अपना व्यवसाय चयन करने के लिए स्वतंत्र थे तथा उनसे यह अपेक्षा की जाती थी वे धर्मानुसार उनका निष्पादन करेंगे ।
 -------------मौर्य वंश के इतिहास में कहीं भी शूद्रों के साथ अमानवीय या भेदभावपूर्ण व्यवहार का लेखन पढ़ने में नहीं आया। जब दासों के प्रति इतनी न्यायोचित व्यवस्था थी, तो आम जन तो नीतिशास्त्रों से शासित किये ही जाते थे।
-------------इस समय तक अधिकांश लोग वैदिक भागवत धर्म का पालन करते थे |-------

     चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य   ---भारतवर्ष का स्वर्ण काल ----   चन्द्रगुप्त मौर्य के लगभग 800 वर्ष पश्चात चीनी तीर्थयात्री "फाहियान" चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय भारत आया उसके अनुसार वर्णव्यवस्था बहुत कठोर नहीं  थी, ब्राह्मण व्यापर ,वास्तुकला तथा अन्य प्रकार की सेवाएं दिया करते थे ,क्षत्रिय वणिजियक एवं औद्योगिक कार्य किया करते थे ,वैश्य राजा ही थे ,शूद्र तथा वैश्य व्यापार तथा खेती करते थे। कसाई, शिकारी ,मच्छली पकड़ने वाले, माँसाहार करने वाले अछूत समझे जाते थे तथा "वे" नगर के बाहर रहते थे। गंभीर अपराध न के बराबर थे, अधिकांश लोग शाकाहारी थे।
          "हुएंनत्सांग "ने वर्ष 631-644 AD तक अपने भारत भ्रमण के दौरान जो देखा उसके  अनुसार, उस समय विधवा विवाह पर प्रतिबन्ध नहीं था, सती प्रथा नहीं थी,  पर्दा प्रथा नहीं थी ,  दास प्रथा नहीं थी,  हिजड़े नहीं बनाये जाते थे,  जौहर प्रथा नहीं थी, ठगी गिरोह नहीं हुआ करते थे, क़त्ल-बलात्कार नहीं हुआ करते थे, सभी वर्ण आपस में बहुत सौहाद्रपूर्ण तरीके से रहते थे वर्ण व्यवस्था इतनी कट्टर नहीं थी। यह भारत का स्वर्णकाल कहलाता है।

=== फिर ये सारी कुरीतियां वैदिक धर्म में कहाँ से आ गयीं। यह एक यक्ष-प्रश्न है ?----  

  इसी स्वर्णकाल के समय  लगभग वर्ष 500 AD के आस-पास इसके जो ------
==(अ )तीन विशेष कारण-- जिनकी वजह से वैदिक धर्म का लचीलापन खत्म होना शुरू हुआ, और कुरीतियाँ पनपने लगीं हमारे विचार से वे हैं ----
--- बौद्ध तथा जैन धर्मों का उदय---  जो वैदिक धर्म के विरुद्ध नास्तिक धर्म थे | उनके  प्रवर्तकों द्वारा बुद्ध व महावीर आदि की  सुन्दर सुन्दर मूर्तियों की पूजा की देखा देखी वैदिक धर्म में मूर्तिपूजा का प्रार्दुभाव हुआ। इसी समय भगवानों के सुन्दर सुन्दर रूपों की कल्पना कर के उन्हें मंदिरों में प्रतिष्ठित किया जाने लगा।
          बौद्ध धर्म में "वज्रयान" सम्प्रदाय के भिक्षु एवं भिक्षुणियों ने अश्लीलता फैलाई तथा बौद्धों द्वारा वेद शिक्षा बिल्कुल नकार दी गई |
२.-"चार्वाक " सिद्धांत का प्रसार - पंच मकार - मांस, मछली, मद्य, मुद्रा और मैथुन को ही जीवन का सार मानने लगना एवं उनका जनसाधारण में लोकप्रिय होना।
३. हूणों के आक्रमण --मध्य एशिया से जाहिल हूणों के आक्रमण तथा उनका भारतीय समाज में घुलना मिलना |

== (ब) अन्यकारण----

१. तोड़ मरोड़ कर पढ़ाया गया इतिहास-- जो इतिहास हमें पढ़ाया गया है उसमे सोमनाथ के मंदिर को लूटना तो बताया गया है परन्तु—तमाम विविध कारणों को नहीं बताया गया है |  वर्णव्यवस्था में विद्रूपता और कट्टरपन क्यों कब और कैसे आया, कभी हिंदुत्व के विरोधी एवं विदेशी नक़्शे कदम के पूजक वामपंथियों द्वारा रचित इतिहास के इतर कुछ पढ़ने/पढाने की कोशिश की नहीं गयी  | जो और जितना पढ़ा/पढ़ाया गया उसी को सबकुछ  मान कर भेड़चाल में हम धर्मग्रंथों और उच्च जातियों को गलियां  देने लगे ।

      जवाहरलाल नेहरू की तथाकथित प्रसिद्द पुस्तक Glimpses of World History के सन्दर्भ में नेहरू और वामपंथियों पर भारतीय मूल के ब्रिटेन में रहने वाले प्रख्यात लेखक --V.S Naipaul ने कटाक्ष करते हुए "The Pioneer" समाचार पत्र में एक लेख लिखा था ---- " आप अपने इतिहास को नज़रअंदाज़ कैसे कर सकते हैं ?  स्वराज और आज़ादी की लड़ाई ने इसे नज़रअंदाज़ किया है।‘  इस पुस्तक में लेखक  भारतीय पौराणिक कथाओं के बारे में बताते बताते आक्रान्ताओं के आक्रमण पर पहुँच जाता है। फिर चीन से आये हुए तीर्थयात्री बिहार नालंदा और अनेकों जगह पहुँच जाते हैं। पर लेखक ( पं.नेहरू ) यह नहीं बताते कि फिर क्या हुआ | आज अनेकों जगह, जहाँ का गौरवपूर्ण इतिहास था खंडहर क्यों हैं ? वे यह नहीं बताते कि भुबनेश्वर, काशी और मथुरा को कैसे अपवित्र किया गया।
----महमूद ग़ज़नवी ने कंधार के रास्ते आते और जाते हुए मृत्यु का जो तांडव किया, कभी नहीं बताया जाता। ------
------उसमे 1206 के मोहम्मद गौरी से लेकर 1857 तक के बहादुर शाह ज़फर का अधूरा चित्रण ही किया गया है, पूरा सच शायद बताने से मुस्लिम वर्ग नाराज़ हो जाता।
२.फूट डालो राज करो कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण-------- लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने के लिए तत्कालीन कांग्रेस के नेताओं ने यही रणनीति बनायीं थी कि हिन्दुओं में फूट डाली जाये और मुस्लिमों का तुष्टिकरण किया जाये।
-------इसी का आज यह दुष्परिणाम है की न तो मुस्लिम आक्रान्ताओं का पूरा इतिहास ही पढ़ाया गया और आज हिन्दू पूरी जानकारी के आभाव में वर्णव्यवस्था के नाम पर आपस में ही भिड़ जाते हैं।

३.भारत की जनसंख्या का घटना व उसके कारण ----  हमारा यह तोड़ा मरोड़ा हुआ इतिहास यह नहीं बताता कि वर्ष 1000 AD की भारत की जनसँख्या 15 करोड़ से घट कर वर्ष 1500 AD में 10 करोड़ क्यों रह गयी थी ?
        के. एस. लाल द्वारा उनकी पुस्तक मध्यकालीन भारत में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि, उन्होंने दावा किया है कि 1000 CE और 1500 CE के बीच हिंदुओं की जनसंख्या में 80 करोड़ की कमी हुई.
       विश्व डेमोग्राफिक आंकड़ों के अनुसार --लगभग 300 ईसा पूर्व, भारत की आबादी 100 मिलियन और 140 मिलियन के बीच थी। 1600 में भारत की जनसंख्या लगभग 100 मिलियन थी। अर्थात 300 ईसा पूर्व से 1600 सीई तक भारत की जनसंख्या अधिक या कम स्थिर थी |
  -----जबरन धर्म परिवर्तन,  बलात्कार , कत्लेआम,  कम उम्र के लड़कों का हिजड़ा बनाया जाना, हिन्दू महिलाओं, लड़कियों को जबरन हरम में रखना आदि भयावह मुख्य कारण हैं, जिनका पूरा विवरण किसी इतिहासकार ने कभी नहीं दिया |
------इतिहासकार  'विल दुर्रांत' का तर्क है कि इस्लाम हिंसा के माध्यम से फैलाया गया था |
-----सर जदुनाथ सरकार का कहना है कि कई मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारतीय हिन्दुओं के खिलाफ एक व्यवस्थित जिहाद इस हद तक छेड़ रखा है |
-----हिंदू ऋषि पद्मनाभ ने अपने कान्हादादे प्रबंध 1456 ई. में 1298 ई. के गुजरात के मुस्लिम आक्रमण की कहानी का वर्णन किया है :----जीतने वाली सेना गांवों को जला देती थी, भूमि तबाह कर देती थी, लोगों के धन को लूटा, ब्राह्मणों और बच्चों और महिलाओं के सभी वर्गों को बंदी में लिया,अपने साथ एक चलती जेल लेकर चलते थे, और सारे कैदियों को चापलूस दासों में परिवर्तित कर दिया.
अबुल हसन उत्बी  फारुखी, महमूद गजनबी के सचिव, ने तारीख-इ-यामिनी में 11 वीं सदी में लिखा है----थानेसर में काफिरों का खून इतनी अधिकता से प्रवाहित होता था कि उसने धारा को बदरंग कर दिया, जो अपनी शुद्धता बरकरार न रख पाया , और लोगों को इसे पीने में असमर्थता होती थी. सुल्तान ने इतनी लूट मचाई जो की गिनती में असंभव थी |
        इस प्रकार महमूद गज़नवी (९९७ ई) से लेकर टीपू सुलतान( १७५०) तक गुलाम वंश, खिलजी ,तुगलक , तैमूर, सैयद, लोधी, मुगलवंश, नादिरशाह, अब्दाली , फर्रुखशियर आदि मुस्लिम आक्रान्ताओं के काल में सभी वर्णों के हिन्दुओं का लाखों की संख्या में नियमित क़त्ले आम, स्त्रियों से वलात्कार, ह्त्या आदि--- स्त्रियों, लड़कियां ,पुरुषों, बच्चों को गुलाम बनाकर विदेशी मंडियों में विक्रय एवं स्वयं के हरम में रखना एवं घरों में दासों का काम में लेना,  हिजड़ा बनाना, मुस्लिम बनाना, शूद्र, कामगार, दास, श्रेणियों में रखना नियमित, एवं हरमों में लाखों हिन्दू औरतों को रखना ...प्रायोजित कृत्य थे | अमीर  खुसरो के अनुसार " तुर्क जहाँ से चाहे हिंदुओं को उठा लेते थे और जहाँ चाहे  बेच देते थे।  गरीब से गरीब मुसलमान के पास भी सैंकड़ों हिन्दू  गुलाम हुआ करते थे ।

      इब्नबतूता " लिखते हैं की क़त्ल करने और गुलाम बनाने की वज़ह से गांव के गांव खाली हो गए थे। गुलाम खरीदने और बेचने के लिए खुरासान ,गज़नी, कंधार, काबुल और समरकंद मुख्य मंडियां हुआ करती थीं। वहां पर इस्तांबुल, इराक और चीन से भी गुलाम लाकर बेचे जाते थे।

        फ़िरोज़ शाह तुगलक -- के पास 180000 गुलाम थे जिसमे से 40000 इसके महल की सुरक्षा में लगे हुए थे।  तैमूर लंग --ने दिल्ली पर हमले के दौरान 100000 गुलामों को मौत के घाट उतरने के पश्चात , 2 से ढ़ाई लाख कारीगर गुलाम बना कर समरकंद और मध्य एशिया ले गया। बलबन  द्वारा राजाज्ञा के अनुसार - 8 वर्ष से ऊपर का कोई भी आदमी मिले उसे मौत के घाट उतार दो। महिलाओं और लड़कियों वो गुलाम बना लो, इसप्रकार  शहर के शहर हिन्दुओं से खाली कर दिए गए |अलाउद्दीन ख़िलजी ---- कम उम्र की 20000 हज़ार लड़कियों को दासी बनाया, और अपने शासन में उसने उसके गुलमखाने में 50000 लड़के थे और 70000 गुलाम लगातार इमारतें बनाने का काम करते थे। अकबर बहुत महान थे चित्तोड़ में इन्होने 30000 काश्तकारों और 8000 राजपूतों को मार दिया या गुलाम बना लिया, एक दिन 2000 कैदियों का सर कलम किया । इसके हरम में 5000 महिलाएं थीं | शाहजहाँ --के राज में कानून था, या तो मुसलमान बन जाओ या मौत के घाट उतर जाओ।  इसके हरम में सिर्फ 8000 औरतें थी। औरंगज़ेब-- तो बस जब तक सवा मन जनेऊ नहीं तुलवा लेता था पानी नहीं पीता था।  काशी मथुरा और अयोध्या इसी की देन हैं। टीपू सुल्तान ने कुर्ग में रहने वाले  70000 हिन्दुओं को मुसलमान बनाया था।
४.एक अन्य विशिष्ट कारण --- शिक्षा व धार्मिक स्थानों का नाश---
 -------वर्ष 497 AD से 1197 AD तक भारत में एक से बढ़ कर एक विश्वविद्यालय हुआ करते थे, जैसे तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला जगदाला आदि---नालंदा विश्वविद्यालय में ही 10000 छात्र, 2000 शिक्षक तथा नौ मंज़िल का पुस्तकालय हुआ करता था जहाँ विश्व के विभिन्न भागों से पढने के लिए विद्यार्थी आते थे।
------ ये सारे के सारे मुग़ल आक्रमणकारियों ने ध्वस्त करके जला दिए। बल्कि पूजा पाठ पर सार्वजानिक और निजी रूप से भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया।


        ---क्रमशः  भाग तीन–-- हिन्दू धर्म को जिन्दा कैसे रखा गया --