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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

श्याम स्मृति---२१ से २५ तक-----डा श्याम गुप्त ---

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

श्याम स्मृति---२१ से २५ तक-----
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श्याम स्मृति-२१. ईश्वर की आवश्यकता ....
      आखिर हमें उस ईश्वर की आवश्यकता ही क्या है जो अतनी सुन्दर दुनिया या समाज को त्याग कर मिले | ईश्वर की आवश्यकता उन्हें है जो ईश्वर के अभाव में दुखी हैं | यदि कोई संसार में रहकर, संसार को पाकर, संसार में लिप्त रहकर प्रसन्न है तो उसे ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है | जो सारा संसार पाकर दुखी नहीं है उसे भी ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है | सिर्फ समझना यह है कि हैं क्या वे सुखी हैं |
     हमें ईश्वर हरस्थान पर, हरपल प्राप्य है परन्तु संसार में सुखपूर्वक उलझे रहने के कारण उसकी आवश्यकता व उपस्थिति अनुभव नहीं करते|नास्तिक कहते हैं वे ईश्वर को नहीं मानते अपितु एक स्वचालित व्यवस्था की सत्ता है जो विश्व को चलाती है,वही तो भक्तजनों का ईश्वर है| ईश्वर को मानना भी तो उसके अस्तित्व का मन में होना ही है |

वो कहते हैं कि ईश्वर कहीं नहीं है |
कभी किसी ने कहीं देखा नहीं है |
मैं कहता हूँ ज़र्रे ज़र्रे में है काबिज़-
बस खोजने में ही कमी कहीं है |

श्याम स्मृति -२२. पुरुषवादी मानसिकता ....
          आजकल एक शब्द-समूह अधिकाँश सुना, कहा  लिखा जा रहा है वह है 'पुरुषवादी मानसिकता', प्राय: नारीवादी लेखिकाएं, सामाजिक कार्यकर्त्री, प्रगतिशील तेज तर्रार नारियां समन्वयक पुरुष सभी, स्त्री सम्बंधित घटनाओं, दुर्घटनाओं, अनाचार, अत्याचार, यौन उत्प्रीणन आदि सभी के सन्दर्भ में पुरुषवादी सोच मानसिकता का रोना रोया जाता है | यदि पुरुष में पुरुषवादी सोच मानसिकता नहीं होगी तो और क्या होगी, तभी तो वह पुरुष है | क्या स्त्री अपनी स्त्रियोचित सोच मानसिकता को बदल सकती है, त्याग सकती है, नहीं, यह तो प्रकृति-प्रदत्त है, .अपरिवर्तनशील
         यह असंगत है, समस्या के मूल से भटकना | किसी दुश्चरित्र पुरुष के कार्यकलापों का ठीकरा क्या समस्त आधी दुनिया, सारे पुरुष वर्ग पर फोड़ना क्या उचित है !
            वस्तुतः यह सोचहीनता का परिणाम है, कृत्य-दुष्कृत्य करते समय व्यक्ति यह नहीं सोच पाता कि वह स्त्री किसी की बहन, पुत्री, माँ, पत्नी है..ठीक अपनी स्वयं की माँ, बहन, पुत्री, पत्नी की भांति | निकृष्ट आपराधिक आचरणहीनता की विकृत मानसिकता युक्त व्यक्ति ऐसी सोचहीनता से ग्रस्त होता है एवं स्त्रियों को सिर्फ कामनापूर्ति, वासनापूर्ति, वासना की पुतली, सिर्फ यौन तुष्टि का हेतु समझता है| नारी का मान, सम्मान, स्वत्व का उसके लिए कोई मूल्य नहीं होता | यह चरित्रगत कमी अक्षमता का विषय है जो विविध परिस्थितियों, आलंबन उद्दीपन-निकटता, आसंगता, स्पर्शमयता, आसान उपलब्धता से उद्दीप्तता की ओर गमनीय होजाते हैं|
           आज स्त्रियों में पुरुष-समान कार्यों में रत होने के कारण उनमें स्त्रेंण भाव कम होरहा है पुरुष भाव की अधिकता है अतः उनमें पुरुष के पुरुष भाव की शमनकारी स्वयं के स्त्रेंण भाव के उत्कर्ष का भाव नहीं रहा, फलतः पुरुष में प्रतिद्वंद्विता भाव युत आक्रामकता बढ़ती जा रही है जिसे पुरुष मानसिकता से संबोधित किया जा रहा है |

श्याम स्मृति२३. साहित्य की विंडम्बना.....
        मुझे लगता है यह विडम्बना ही है, कि एक ओर तो हम एकाक्षरी-द्वयाक्षरी आदि छंद के रूप में हर छंद आखर-शब्द को ही छंद मानते हैं, बालक द्वारा प्रथम शब्द..माँ ..एकाक्षरी छंद ही है आदि आदि | दूसरी ओर मुक्तछंद, अतुकांत-छंद आदि को अछूत | वस्तुतः हमारी सनातन छंद परम्परा तो देववाणी संस्कृति के अतुकांत-छंदों से ही है | जब संस्कृत भाषा ज्ञान के तप, साधना, व धैर्य की कमी के कारण तालबद्धता व संगीतमयता की विलुप्ति से संस्कृत का जन साधारण द्वरा प्रयोग में ह्रास हुआ, जनभाषा प्राकृत व अपभ्रंश से होते हुए हिन्दी तक आई तो तुकांत छंदों का आविर्भाव हुआ और तुकांत कविता मुख्य हुई | परन्तु हिन्दी साहित्यकारों द्वारा मुक्तछंद काव्य व अतुकांत रचनाओं की प्रस्तुति भी होती रही| मैथिली शरण गुप्त जी के खंडकाव्यसिद्धराज में देखें
तो फिर-
सिद्धराज क्या हुआ
मर गया हाय,
तुम पापी प्रेत उसके |  
           कविता का पतन तकनीक के कारण नहीं हुआ अपितु भाव दोषों के कारण हुआ| कथ्यों व विषय-भाव का तादाम्य, तथ्यों की वास्तविकता व सत्यता, सहज भाषा-शैली व स्पष्ट सम्प्रेषणता का गौण होजाना एवं तकनीक छंद-तकनीक, तुकांत-अतुकांत के विवाद, विषय-ज्ञान की अल्पज्ञता, क्लिष्ट शिल्प व नए-नए शब्दों का आडम्बर आदि के कारण | स्वतन्त्रता के पश्चात हम काव्य के विषय चुनने में भटक गए कोई लक्ष्य ही नहीं रहा | पाश्चात्य हलचल की चकाचौंध में हम पूर्व व पश्चिम के जीवन तत्वों व व्यवहार में तादाम्य व समन्वय नहीं कर पाए | भौतिक सुखों व धनागम के ताने-बाने, उपकरण, साधन चुनते-बुनते हम साहित्य में भी अपने स्वदेशी विषय-भावों से भटककर जीवन के वास्तविक आनंद से दूर होते गए | विद्वानों, कवियों, साहित्यकारों, मनीषियों ने अपने कर्त्तव्य नहीं निभाये | समाज के इसी व्यतिक्रम ने व्यक्ति को कविता व साहित्य से क्या दूर किया जीवन से ही दूर कर दिया | और चक्रीय प्रतिक्रया-व्यवस्थानुसार स्वयं साहित्य भी व्यक्ति से दूर जाने लगा |  

श्याम स्मृति-२४. एकै साधे सब सधै...
    उद्धरणों सूक्तियों, लोकोक्तियों को पूर्णतया सम्पूर्ण रूप में तथा पूर्ण अर्थ-निष्पत्ति में लेना चाहिए | होता यह है कि प्रायः हम अपने मतलब के अर्थ वाले शब्द समूहों को प्रयोग में लाते रहते हैं जो आधा-अधूरा फल देते हैं| आजकल एकै साधे सब सधै...के  अर्थ-भाव को लेकर सभी चल रहे हैं अतः सेवासाहित्य के क्षेत्र में भी तमाम नयी नयी संस्थाएं, संस्थान, वर्ग, गुट आदि खड़े होते जा रहे हैं| कोई एक लाख बृक्ष लगाने का संकल्प लिए बैठा है, कोई धरती को हरित बनाने का, जल बचाने का, कोई पर्यावरण सुधार का तो कोई नारी उद्धार का झंडा उठाये हुए है | कोई वृद्धों की सेवा का तो कोई फुटपाथ के गरीब बच्चों के खाने पीने के प्रवंधन का | तमाम साहित्यिक बंधु, राजनैतिक व्यक्ति, पत्र-पत्रिकाएं विविधि विषयों पर चिंता व चिंतन कर रहे हैं |
           इससे उन सभी व्यक्ति, वर्ग, ग्रुप, संस्था व पत्र-पत्रिका आदि को नाम व प्रसिद्धि मिलती है, बड़े पुरस्कार भी प्राप्त हो जाते हैं, होते रहे हैं | वे समाज के सेलीब्रिटी बन जाते हैं, अर्थात उनका प्रायः सब कुछ सध जाता है | परन्तु क्या वे उद्देश्य व साध्य पूरे हो पाते हैं ? वर्षों-वर्षों से ये पेड़ लगाए जा रहे हैं परन्तु क्या भारत हरित होपाया है, क्या गरीबी कम हुई है, फुटपाथें खाली हुई हैं, स्त्री पर हिंसा व अत्याचार कम हुए हैं?
          वास्तव में हम उस दोहे की प्रथम पंक्ति में मस्त, आगे के कथन का अर्थ-भाव भूल जाते हैं ..’ जो तू सेवै मूल को.... | ये सारे कृतित्व व कार्य बृक्ष की शाखाएं ही हैं| शाखाओं को पनपने से रोकना, पनपने हेतु जलधार से सींचना भी एक उद्देश्य हो सकता है, परन्तु जब तक मूल के उच्छेद, सेवा या सिंचन का एक साध्य नहीं अपनाया जाएगा समस्याओं का उच्छेद कैसे होगा?
          मानव की समस्याओं का मूल क्या है ? निश्चय ही मानव-आचरण | खांचों में प्रयत्न की अपेक्षा यदि चिंता, चिंतन व कृतित्व इसी मूल, मानव के आचरण सुधार के प्रति हों तो सभी समस्याएं स्वयमेव ही समाप्ति की ओर प्रयाण करने लगेंगी | कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्रत्येक विज्ञजन मानव आचरण के बारे में जानता है, पर उसपर चिंतन नहीं करता, उसपर चलता नहीं है, उन्हें दैनिक जीवन के अभ्यास व कर्तव्यपालन का अंग नहीं बनाता |  

श्याम स्मृति -२५. आवश्यकता और प्रथा ...
       मैंने पूछा- अमेरिका कैसा लगा, वे बोले बहुत सुन्दर, बहुत उन्नत, वे बहुत आगे हैं हमसे, हम १०० साल में भी उन तक नहीं पहुँच सकते | ‘१०० क्या हम १००० वर्ष में भी उन तक नहीं पहुँच सकते’, मैंने कहा, क्यों पहुंचेंगे...क्यों पहुँचना चाहेंगे ?  

       सच ही कहते हैं वे पश्चिम वाले कि हम भारतीय मूर्तियाँ व मंदिर तो सजाते रहते हैं, सुरक्षित रखते हैं परन्तु अपनी भौतिक वस्तुओं, स्थानों, तथ्यों को सुरक्षित नहीं रखते | क्यों रखेंगे ? चित्र व मूर्तियों पर नाम नहीं होते जो कर्ता व कृतित्व का भ्रम व अहं प्रदर्शित करते हैं |  वह नया-नया देश है, नया इतिहास, कम आबादी, कम व नई नई समस्याएं व समाधान, सब कुछ सरल है | जिन्हें हम जाने कब के झेल व सुलझा चुके हैं, हमारी समस्याएं अन्य हैं गंभीर, पुरातन संस्कृति व समृद्धि से संवंधित, भिन्न आवश्यकताएं, भिन्न प्रथाएं, जाने कितने दर्शनीय व श्रृद्धा युक्तस्थल | वे नए हैं, न प्रथाओं का झंझट न संस्कृति का, छोटे-छोटे गड्ढों, दीवारों, जलाशयों को भी सजा संवार कर रखते हैं दर्शनीय स्थल बनाकर |  उद्दश्य ही है -खाओ-पीयो मौज करो और ‘नया मुल्ला प्याज अधिक खाता है’|

 

मंगलवार, 20 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त
----पूर्वा पर ----
          आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
          भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
          विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
             -------पोस्ट छह---- कथन २२ से २६ तक---
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   कथन २२---     यहाँ यह देखना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि ब्राह्मण परम्परा जो कि आर्यों की परम्परा है वह अपने आरंभिक संघर्ष में सर्वप्रथम कोयवंशी गोंडों के खिलाफ और बाद में फिर असुरों के खिलाफ कुछ ख़ास तरह के कुटिलतापूर्ण षड्यंत्र और समाज मनोवैज्ञानिक हथकंडे इस्तेमाल कर रही है। ठीक यही हथकंडे और षड्यंत्र ब्राह्मणवादी धर्म को उंचा दिखाने के लिए और उसे प्रतिष्ठित करने के लिए बाद में बुद्ध, बौद्ध धर्म और कबीर व रविदास के खिलाफ भी इस्तेमाल कर रही है। और चूँकि इतिहास और मिथक को ब्राह्मण परम्परा ने सहेजा और आकार दिया है इसलिए उन्होंने शत्रुओं को उनके उद्विकास (क्रमविकास या एवोल्यूशन) की अवस्था के अनुसार कई श्रेणियों में बाँट दिया है जिन्हें असुर और बौद्ध या अछूत कहा जा सकता है। लेकिन स्वयं को अलग अलग श्रेणियों में न रखकर आर्य ब्राह्मण ही घोषित किया है।लेकिन असल में डॉ. आम्बेडकर के विश्लेषण में ये असुर अछूत और बौद्ध अंत में क्षत्रिय ही साबित होते हैं। और देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय और स्वामी अछूतानन्द सहित भदंत बोधानन्द महास्थविर के अध्ययन में ये सब मूलनिवासी साबित होते हैं|
 समाधान २२ --गोंडों,  असुरों और बौद्धों को एक ही दर्शन कैसे हो सकता जबकि सभी में युगों का कालान्तर है | पहले ही कहा जाचुका है ब्राहमण परम्परा आर्यों की नहीं है आर्य सभी वर्गों के लोग थे क्षत्री, ब्राह्मण, शूद्र व वैश्य, वस्तुतः ब्राह्मण कोइ परम्परा ही नहीं है अपितु वे सब आर्य ही हैं, सनातन धर्मी | 
----गलत व अज्ञानी है ये सभी तथाकथित स्वयंभू दार्शनिक एवं विदेशी षडयंत्र के प्रभाव में भ्रमित हैं | बौद्ध, जैन, आदि लोग स्वयं ब्राह्मण व वैदिक परम्परा के विरोध में उठे व मुखर हुए थे न कि वैदिक परम्पराओं ने उनका विरोध किया | कबीर, रविदास तो स्वयं वैदिक परम्पराओं का अनुसरण करते थे वे केवल समाज में आयी हुई कुरीतियों का निराकरण करने हेतु तत्पर थे न की ब्राह्मण-शूद्र, असुर ,बौद्ध आदि के साथ थे | प्रखर आर्य व वैदिक रचयिता वेद व्यास ब्राह्मण नहीं शूद्र थे, श्रीकृष्ण जीवन भर निम्न जाति ग्वाला ही कहे जाते रहे | मूर्ख है ये लेखक एवं तथाकथित शोध करने वाले जिन्हें यह भी ज्ञान नहीं कि ..रावण असुर, राक्षस था परन्तु ब्राह्मण था, राम क्षत्रिय थे, उनके मन्त्रकार गुरु ब्राह्मण  ...बौद्ध धर्म के प्रवर्तक छत्रिय थे न असुर या अछूत एवं उसमें सभी वर्णों के लोग हैं |  
कथन-२३--हालाँकि डॉ. अंबेडकर आर्य आक्रमण थ्योरी में भरोसा नहीं रखते लेकिन फिर भी स्थानीय स्तर पर भारत में उंच नीच के निर्माण का जो षड्यंत्र चलाया गया है उसके सम्बन्ध में उनका विश्लेषण हमारे लिए बहुत उपयोगी है। डॉ. अम्बेडकर के बतलाये अनुसार अगर आर्य अन्य देश से न भी आये हों तो भी उनका अपना विश्लेषण ब्राह्मण श्रमण या ब्राह्मण क्षत्रिय संघर्ष को अपनी पूरी नग्नता में उजागर करता है। इसी को अगर प्राचीन भारतीय भौतिकवाद के विश्लेषण के साथ रखा जाए तो ये संघर्ष देव-असुर संग्राम को भी ब्राह्मण-क्षत्रिय संग्राम की तरह निरुपित कर सकता है। यह तर्क और यह तरीका बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसका ठीक इस्तेमाल करते हुए हम देख पाते हैं कि एक आततायी संस्कृति के प्रतिनिधियों ने मूलनिवासी संस्कृति को एक जैसे तरीकों और षड्यंत्रों से कमजोर कर परास्त किया है। यह तरीका क्या था? वह समाज मनोवैज्ञानिक, धार्मिक-दार्शनिक उपाय क्या था? इसका उत्तर असुरों, बौद्धों कबीर और रविदास के खिलाफ रची गयी मिथकीय कथाओं में मिलता है।
 समाधान २३--- अर्थात आंबेडकर के अनुसार आर्य बाहरी नहीं थे कोइ आताताये अन्कृति थी ही नहीं तो फिर यह सारा का सारा विरोध कहीं ठहरता ही नहीं | केवल विदेशी षडयंत्रों के प्रभाव में  अपनी राजनीति चमकाने हेतु यह सारा ताम झाम उठाया जा रहा है | हमें सावधान रहना चाहए | हमारी एकता को तोड़ने का षडयंत्र है | और भितरघात में हम भारतीय सदा से ही माहिर हैं |


कथन २४----गोंडी पुनेम दर्शन और ब्राह्मणी धर्म----- असुर जो कि लोकायतिक हैं, और जो चार महाभूत वाले इस लोकवादी दर्शन को मानते थे उन्हें उनके दर्शन सहित निन्दित ठहराया गया हैये दर्शन और ये समाज आत्मा या परमात्मा को नहीं बल्कि प्रकृति को मानता था।
    आज भी आदिवासी/मूलनिवासी समाज में आत्मा और परमात्मा की परलोकवादी धारणा की बजाय प्रकृति की शक्तियों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। असुरों की भाँति एक अन्य बहुत ही महत्वपूर्ण जनजातीय समुदाय है जिन्हें गोंड कहा जाता है। गोंड एक समय में बहुत शक्तिशाली राज्य व्यवस्था के संस्थापक रहे हैं और दलपतशाह जैसे महान गोंडी राजाओं ने बहुत विस्तृत भूभाग पर शासन किया है। आज भी उनके नाम पर मध्यप्रदेश के बालाघाट सहित अन्य अनेक जिलों में उनके व अन्य गोंड राजाओं के किलों, मंदिरों और अन्य भवनों के खंडहर मौजूद हैं। पुरातात्विक खोजें अब यह सिद्ध कर रही हैं कि भारत के प्रत्येक राज्य में प्राचीन मंदिरों और किलों के खंडहरों में गोंडी राज चिन्ह (हाथी पर बैठा शेर) पाया जाता रहा है। इससे आभास होता है कि गोंडी संस्कृति संभवतः पूरे भारत में फली-फूली होगी और बाद में आर्य या ब्राह्मणी षड्यंत्रों से उसी तरह नष्ट की गयी जिस तरह कि बाद में महिषासुर, रावण, बुद्ध, कबीर और उनके संप्रदायों को नष्ट किया गया।
समाधान -२४..क्या दलपत शाह, गोंडों के मौजूद किले व मंदिर व राज चिन्ह, या सुप्रसिद्ध गोंड रानी दुर्गावती आदि महिषासुर, रावण, बुद्ध कबीर सभी से प्राचीन हैं |  वस्तुतः ये लोग इतिहास व पुराणों से बिलकुल अनभिज्ञ है |
     सभी जानते हैं कि इन सभी गोंड राजाओं रानियों को भारत के वीरों में गिना जाता है, वे भारतीय थे न की केवल गोंड | गोंड जाति, जन जाति भारत की एक प्रसिद्द प्राचीन वंश है | शायद प्राचीनतम जिसके नाम पर आदि-कालिक पृथ्वी के दक्षिणी भूभाग का नाम गोंडवाना लेंड रखा गया जहां मानव का उद्भव हुआ |
      यह प्राचीन गोंड संस्कृति आदि मानव से लेकर ...वनांचल की संस्कृति थी जिसने पूर्व हरप्पा सभ्यता का निर्माण किया एवं सुमेरु लोक ( ब्रह्म लोक ), सरस्वती क्षेत्र , कैलाश-मानसरोवर क्षेत्र की सरस्वती सभ्यता के मानवों से( जो आदि-मानव काल में ही भारतीय भूखंड व सुमेरु पर्वतीय भूखंड के मध्य फैले टेथिस सागर(दिति सागर ) को पार करके सरस्वती –मानसरोवर क्षेत्र में पहुंचकर उन्नत मानव होचुके थे )  तादाम्य करके एक उच्च संस्कृति वैदिक संस्कृति को जन्म दिया | यह शंभू शिव एवं ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र द्वारा मानव समन्वय का प्रथम प्रयास था जिसके मूल विचारक व कर्ता शंभू सेक या शिव थे | इसीलिये वे महादेव कहलाये एवं विश्व की प्रत्येक संस्कृति में पूज्य हुए | क्योंकि यही मानव एवं संस्कृति समस्त विश्व में फ़ैली | आज भी यही मानव सारे विश्व में रहते हैं |

कथन २५--डॉ. कंगाली के अध्ययन से इस मान्यता को न केवल बल मिलता है बल्कि एक अर्थ में उनकी महान खोज इस बात को स्थापित ही कर देती है कि गोंडी पुनेम दर्शन या संस्कृति पहली अखिल भारतीय संस्कृति रही है। उनका अध्ययन स्पष्ट करता है कि किस तरह ब्राह्मणी धर्म ने गोंडी धर्म और संस्कृति को बुद्ध के उदय के बहुत पहले ही आत्मसात करके मूल गोंडी समुदायों को षड्यंत्रपूर्वक समाज व राज्य व्यवस्था में निचले पायदानों पर धकेलकर जंगलों में ही सीमित कर दिया था। यह देखना उपयोगी है कि लोकयातिकों और मूल सांख्य सहित तंत्र के समान ही गोंडी दर्शन भी इश्वर को नही मानता, बल्कि प्रकृति की शक्तियों को मानता है सृष्टि सृजन या सृष्टिकर्ता में वे विश्वास नहीं करते उनके लिए यह प्रकृति ही सब कुछ है जो न कभी पैदा हुई न कभी समाप्त होगी।
समाधान २५---निश्चय ही गोंडी संस्कृति सर्वप्रथम अखिल भारतीय संस्कृति रही होगी जो बनांचल संस्कृति थी | जैसा बिंदु २४ में स्पष्ट किया जा चुका है | सांख्य आदि दर्शन वैज्ञानिक, अध्यात्म, व मानवमनोविज्ञान, समाज विज्ञान के क्रमिक विकास की एक निम्न सौपान है जो भारतीय षड्दर्शन ( जिसमें आस्तिक व नास्तिक दर्शनों का क्रमिक विकास है ) का अंग है बौद्ध, जैन, लोकायत आदि भारतीय नास्तिक दर्शन के अंग हैं जो मानव व वैश्विक समाज-धर्म के क्रमिक बौद्धिक विकास के द्योतक हैं...  |
 कथन २६--मध्यप्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों के शिक्षित गोंड आज भी गर्व से कहते हैं कि भगवान् शब्द उनका दिया हुआ है जिसमे भ भूमि, गगन, वायु अ अग्नि और न नीर है।
     यह अर्थ असल में इस लोक के समर्थन में है,  इसमें कोई  अतिभौतिक या पारलौकिक तत्व शामिल नहीं है और यह अर्थ सृष्टिकर्ता या परमात्मा की सत्ता की बजाय प्रकृति की शक्तियों को महत्व देता है। सृष्टिकर्ता या सर्जक इश्वर को नकारने वाला यही सूत्र श्रमणों अर्थात बौद्धों और जैनों में भी है। असल में गहराई से देखें तो किसी पारलौकिक या अतिभौतिक तत्व के आधार पर ही ब्राह्मणों या आर्यों ने परलोक आत्मा और परमात्मा को आकार दिया है, इसीलिये हम देखते हैं कि बहुत बाद में आगे चलकर प्रथम गोंडी दार्शनिक कुपार लिंगों की ही तरह बुद्ध ने पारलौकिक तत्व की संभावना को ही मिटा डाला।

समाधान २६  ---यही तो भारतीय वैदिक दर्शन के पंचतत्व हैं---क्षिति जल पावक गगन समीरा हैं | यही तो सांस्कृतिक समन्वय है | भगवान् शब्द, मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है, बहुत बाद का है, यह प्रकृति या परमतत्व का समानार्थी नहीं है | गोंड शब्द को भी वे अपनी विशिष्ट शैली में भगवान् शब्द का ही अन्य रूप मानते हैं। अंग्रेज़ी का गॉड शब्द गौंड से ही आया है ?
   पर पारलौकिक संभावना मिती कहाँ, स्वयं बौद्ध दुनिया से मिट गए, आज बौद्ध धर्म दो एक देशों में सिमट कर रह गया है | जैन भी लघु रूप में है | वस्तुतः भौतिक,  अधिभौतिक तत्व अर्ध विक्सित सभ्यता का है,  बुद्धि-ज्ञान के आगे विकास में पारलौकिक व अधि-आत्मिक तत्व का विकास हुआ, केवल दिखने वाले प्रत्यक्ष भौतिक सुन्दरम के आगे शिव एवं सत्य का प्रादुर्भाव हुआ | और इन तीनों के समन्वित तत्व का नाम ईश्वर हुआ,  ब्रह्म,  परमात्मा  | भगवान्,  मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है बहुत बाद का है, ईश्वर का समानार्थी नहीं |


-----------क्रमश --पोस्ट सात--आगे
चित्र गूगल===
१,२अ ब--ब्रह्म-ईश्वर ...३, त्रिदेव,,,,४,५,६,७,८,...भगवान गणेश, परशुराम, कृष्ण,वरुणदेव , हनुमान ....

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