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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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रविवार, 9 फ़रवरी 2025

श्री राधा जी किसका अवतार थी? – डॉ. श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

पुराण रहस्य----राधा रहस्य--

श्री राधा जी किसका अवतार थी? – डॉ. श्याम गुप्त

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भगवान श्रीकृष्ण के बारे में कई पुराणों में लिखा है कि वह भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं। देवी राधा को देवी लक्ष्मी का अवतार बताया गया है। सुदामा और श्रीदामा को श्रीकृष्ण के गोलोक का साथी कहा गया है।

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लेकिन महाभागवत पुराण में श्रीकृष्ण और देवी राधा के अवतार की जो कथा है वह अद्भुत है। इसी कथा में सुदामा और श्रीदामा के पूर्वजन्म का भी रहस्य छुपा हुआ है। इस पुराण में बताया गया है कि देवीराधा लक्ष्मी की अवतार नहीं हैं। इस पुराण में देवी राधा और भगवान कृष्ण के प्रेम का रहस्य भी बताया गया है।

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शिव ने रची लीला राधा कृष्ण के अवतार की|

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एकबार भगवान शिव माता पार्वती के साथ कैलाश पर विहार कर रहे थे। तभी भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि मेरी सभी इच्छाएं पूरी हो चुकी हैं सिवाय एक इच्छा के। जिसे केवल तुम ही उसे पूर्ण कर सकती हो। माता पार्वती ने शिव से पूछा कि आपकी ऐसी कौन सी इच्छा है, आप बताइए, मैं उसे अवश्य पूर्ण करूंगी।

****** शिव ने माता पार्वती से कहा कि अगर तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो एक बार तुम पृथ्वीलोक पर पुरुष के अवतार में जन्म लो और मैं तुम्हारी प्रियतम बनकर स्त्री के रूप में जन्म लूं। वहां तुम मेरे स्वामी और मैं तुम्हारी पत्नी बनकर रहूं, बस यही मेरी इच्छा है। माता पार्वती ने शिवजी की इस इच्छा को स्वीकृति दे दी।

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माता पार्वती ने कहा कि भद्रकाली का मेरा स्वरूप पृथ्वी पर कृष्ण का अवतार लेगा और आप अपने अंश से स्त्री का रूप धारण कर लीजिए।

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नौ रूपों में शिवजी हुए थे पृथ्वी पर अवतरित |

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शिवजी ने कहा कि मैं पृथ्वी पर नौ रूपों में प्रकट होउंगा। सबसे पहले वृषभानुपुत्री राधा के रूप में जन्म लूंगा। तब मैं तुम्हारे साथ प्राणप्रिय होकर प्रेम विहार करूंगा।

-----शिवजी ने माता पार्वती से कहा कि राधा के अतिरिक्त मैं कृष्ण की आठ पटरानियों के रूप में जन्म लूंगा। जिसमें रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवंती, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा मेरा ही अंश होंगी।

----इसके साथ ही जो मेरे भैरव रूप हैं वो भी पृथ्वी पर रमणीरूप धारणकर भूमि पर अवतरित होंगे। यह थे **श्रीदामा और सुदामा** |

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माता पार्वती ने कहा कि आपकी इच्छा अवश्य पूरी होगी। मैं इन सभी के साथ ऐसा विहार करूंगी, जो इतिहास में आजतक किसी ने नहीं किया होगा। इसके साथ ही..

----- मेरी **जया और विजया** नाम की दोनो सखियां पुरुष रूप में पृथ्वी पर जन्म लेंगी, जो **श्रीदामा और सुदामा** होंगी।

----- ***भगवान विष्णु ***भी पृथ्वी पर मेरे बड़े भाई बनकर पृथ्वी पर जन्म लेंगे, जो **बलराम और अर्जुन** के नाम से प्रसिद्ध होंगे। जो हर कार्य में मेरा साथ देंगे।

माता पार्वती ने कहा कि इस तरह मैं आपके साथ पृथ्वी पर पुरुष रूप में विरह करके वापस कैलाश पर लौट आउंगी।

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इसके बाद ब्रह्माजी से आज्ञा लेकर मां काली के रूप में श्रीकृष्ण और राधारानी के रूप में भगवान शिव धरती पर अवतरित हुए।

----- महाभारत काल में पांडवों ने मां भगवती की पूजा की थी, तब मां भगवती ने कहा था कि मैंने श्रीकृष्ण रूप में धरती पर अवतार लिया है और कंस का वध किया है। कौरवों के अंत तक मैँ कृष्ण रूप में तुम्हारे साथ रहूंगी।




बुधवार, 30 अगस्त 2017

राधाष्टमी के अवसर पर--डा श्याम गुप्त के पद-----

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

राधाष्टमी के अवसर पर--डा श्याम गुप्त के पद-----

१.
राधाजी मैं तो बिनती करूँ ।
दर्शन दे कर श्याम मिलादो,पैर तिहारे पडूँ ।
लाख चौरासी योनि में भटका, कैसे धीर धरूँ ।
जन्म मिला नर , प्रभु वंदन को,सौ सौ जतन करूँ ।
राधे-गोविन्द, राधे-गोविन् , नित नित ध्यान धरूँ ।
जनम जनम के बन्ध कटें जब, मोहन दर्श करूँ ।
श्याम, श्याम के दर्शन हित नित राधा पद सुमिरूँ ।
युगल रूप के दर्शन पाऊँ, भव -सागर उतरूँ ॥

२.
जनमु लियो वृषभानु लली |
आदि-शक्ति प्रकटी बरसाने, सुरभित सुरभि चली |
जलज-चक्र रवि-तनया विलसति, सुलसित लसति भली |
पंकज-दल सम खिलि-खिलि सोहे, कुसुमित कंज अली |
पलकन पुट-पट मुंदे श्याम’ लखि मैया नेह छली |
विहंसनि लागि गोद कीरति दा, दमकति कुंद कली |
नित नित चंद्रकला सम बाढ़हि, कोमल अंग् ढली |
बरसाने की लाड लड़ैती, लाड़न लाड़ पली ||
३.
कन्हैया उझकि उझकि निरखे |
स्वर्ण खचित पलना चित-चितवत केहि विधि प्रिय दरसै |
जहँ पौढ़ी वृषभानु लली, प्रभु दरसन कौं तरसै |
पलक पांवड़े मुंदे सखी के, नैन कमल थरकैं |
कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों, फर फर फर फरके |
तीन लोक दरसन कौं तरसें, सो दरसन तरसै |
ये तो नैना बंद किये हैं, कान्हा बैननि परखे |
अचरज एक भयो ताही छिन, बरसानौ सरसे |
खोलि दिए दृग भानुलली,मिलि नैन, नैन हरषे|
दृष्टिहीन माया, लखि दृष्टा, दृष्टि खोलि निरखे|
बिन दृष्टा के दर्श श्याम, कब जगत दीठ बरसै ||
४.
राधा रानी दर्पण निरखि सिहावैं |
आपुहि लखि, आपुहि की शोभा, आपुहि आपु लजावें |
आदि-शक्ति धरि माया छवि ज्यों माया भरम सजावै |
माया ही माया से लिपटे, माया भ्रम उपजावै |
माया ते जग-जीवन उपजे, जीवन मरम बतावै |
ताही छिन छवि श्याम की उभरी, राधा लखि सकुचावै |
इत-उत चहुँ दिशि ढूँढन लागी, कान्हा कतहु न पावै |
कबहु आपु छवि, कबहु श्याम छवि, लखि आपुहि भरमावै |
समुझ श्याम-लीला, भ्रम आपुन, मन ही मन मुसुकावै |
ब्रह्म की माया, माया नाचे, जीवन-जगत नचावै |
माया-ब्रह्म लीला-कौतुक लखि, श्याम’ सहज सुख पावै ||
५.
काहे न मन धीर धरे घनश्याम |
तुम जो कहत हम एक विलगि कब हैं राधे ओ श्याम ।
फ़िर क्यों तडपत ह्रदय जलज यह समुझाओ हे श्याम !
सान्झ होय और ढले अर्क, नित बरसाने घर-ग्राम ।
जावें खग मृग करत कोलाहल अपने-अपने धाम।
घेरे रहत क्यों एक ही शंका मोहे सुबहो-शाम।
दूर चले जाओगे हे प्रभु! छोड़ के गोकुल धाम ।
कैसे विरहन रात कटेगी, बीतें आठों याम ।
राधा की हर सांस सांवरिया, रोम रोम में श्याम।
श्याम', श्याम-श्यामा लीला लखि पायो सुख अभिराम ।
६.
राधे काहे न धीर धरो ।
मैं पर-ब्रह्म ,जगत हित कारण, माया भरम परो ।
तुम तो स्वयं प्रकृति-माया ,मम अन्तर वास करो।
एक तत्व गुन, भासें जग दुई, जगमग रूप धरो।
राधा-श्याम एक ही रूपक ,विलगि न भाव भरो।
रोम-रोम हर सांस सांस में, राधे ! तुम विचरो ।
श्याम, श्याम-श्यामा लीला लखि,जग जीवन सुधरो।







 

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण --- ----अंतिम -क़िस्त--- राधा ....डा श्याम गुप्त...

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 



ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण --- प्रेम, तपस्या एवं योग-ब्रह्मचर्य का उच्चतम आध्यात्मिक भाव-तत्व ----अंतिम -क़िस्त--- राधा .....
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३.राधा
                        एक प्रतिभावान, संपन्न व प्रियदर्शी पुरुष जिसके लिए विश्व की किसी भी महिला को वशीभूत कर लेना असंभव न हो, उसके लिए जो उसके सम्मुख प्रतिद्वंद्विता प्रस्तुत करे, मान करे, वह उसके लिए अधिक आकर्षक होगी अपेक्षाकृत जो सरलता से प्राप्य हो |
-------यद्यपि राधा का मान केवल प्राप्ति की इच्छा के लिए एक खेल नहीं है अपितु साथ में एक वात्सल्य भाव भी है क्योंकि वह जानती है कि कृष्ण के लिए क्या सबसे अच्छा है| वह कृष्ण के प्रति कोई भी अनपेक्षित अनावश्यक अन्यथा कृतित्व स्वीकार नहीं करती जो उनके लिए उत्तम नहीं है और जिससे श्रीकृष्ण को प्रसन्नता नहीं होगी |
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वृषभानु अपने साथी पडौसी राजा नंदराय व उनकी पत्नी यशोदा से मिलने होली के अवसर पर गोकुल गए वहीं पर कृष्ण व राधा की प्रथम मुलाक़ात हुई |
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------ जयदेव के अनुसार, जब श्री कृष्ण अन्य गोपियों को छोड़कर राधा के पीछे भागते हैं तो इसलिए कि राधा उस डोरी को थामे हुए रहती है जो उन्हें संसार / इच्छाओं के बंधन में बांधे रखती है |
-------- राधा कृष्ण से कहती है कि वे अपने आप को ईश्वर समझना छोड़ दें और स्वीकार करें कि उन्हें राधा की आवश्यकता है और वे उसके बिना नहीं रह सकते | यदि वे अपनी आत्मा की गहराई तक प्रेम में डूबना चाहते हैं तो उन्हें समर्पण करना ही चाहिए | भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आराधित होने के कारण उनका नाम 'राधिका'पडा |
------- चन्द्रावली स्वयं को समर्पित तो कर सकती है परन्तु उसमें उस सम्पूर्ण समर्पण भावतत्व की कमी है जो स्वयं पर आत्म-विश्वास से उत्पन्न होता है जिससे वह श्रीकृष्ण को भी स्वयं के सम्मुख झुका सके |
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                        कृष्ण जी के हाथों बछडा बन कर आये हुए असुर का वध होने की वजह से कान्हा पर गौहत्या का पाप लग गया, उसके प्रायश्चित के लिए राधा ने श्रीकृष्ण को मजबूर किया कि हम जब तक नहीं मिल सकते जब तक आप प्रायश्चित नहीं करोगे | इस पाप के प्रायश्चित के तौर पर श्रीकृष्ण ने अपनी बांसूरी से कुंड बनवाया और तीर्थ स्थानों के जल को वहां एकत्रित किया। \
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एक बार श्रीकृष्ण ने चन्द्रावली सखी से कहा कि आज अपने सम्पूर्ण श्रृंगार से मुझे सजा दो | चन्द्रावली सखी ने उनको सखी के रूप में सजा दिया| श्री कृष्ण सखी का रूप धारण करके राधाजी के पास पहुंचे|
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                                       वस्तुतः अन्य सभी सखियाँ तो विवाहिता थीं अतः एक सीमा थी, बंधन था | राधा ही अविवाहित थी, बंधनमुक्त, स्वतंत्र, महाराज वृषभानु की पुत्री, एक राजकुमारी, सर्वगुण संपन्न |
-------बृन्दावन-अधीक्षिका, रसेश्वरी श्री राधाजी का ब्रज में, जन-जन में, घर-घर में ,मन-मन में, विश्व में, जगत में प्राधान्य हुआ।
------- राधा अपनी माता के देहांत के बाद ननिहाल में रही, उसके पिता अपनी दूसरी पत्नी के साथ वृन्दावन आगये | राधा युवावस्था में आई और स्वच्छंदता से घूमती थी| संयोग से कृष्ण भी वृन्दावन आगये | अतः यह संयोग ही था कि राधा युवावस्था में वृन्दावन आई और सब पर छागई, वह इस तरह कृष्ण की ओर खिची कि कृष्ण का मन भी मोहित होगया|
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ब्रह्म संहिता के अनुसार राधा परमात्व तत्व कृष्ण की चिर सहचरी, चिच्छित-शक्ति हैं| राधा को कहीं कहीं कृष्ण की पत्नी भी बताया गया है | ब्रह्मा ने बाल्यावस्था में ही भांडीर वन में दोनों का विवाह करा दिया था |
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                               एक कथा के अनुसार विष्णु ने कृष्ण अवतार लेते समय अपने परिवार के सभी देवताओं से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा। राधा, जो चतुर्भुज विष्णु की अर्धांगिनी और लक्ष्मी के रूप में वैकुंठलोक में निवास करती थीं, राधा बनकर पृथ्वी पर आई।
------ जब राधाजी से कृष्णजी ने पूछा कि लोक-साहित्य में तुम्हारी क्या भूमिका होगी। तो राधाजी ने कहा मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए मैं तो आपके पीछे हूं। इसलिए कहा गया कि कृष्ण देह हैं तो राधा आत्मा हैं।
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भागवत महापुराण के प्रारंभ में व्यासजी ने लिखा है " श्रीकृष्णाय वयं नमः " अकेले कृष्ण को नहीं, श्री कृष्ण को वंदन किया गया है ।
-------सनातन धर्म में शक्ति-विशिष्ट ब्रह्म की पूजा है । निराकार ब्रह्म की पूजा नहीं हो सकती । वह मारता भी नहीं, तारता भी नहीं । वह कृपा नहीं कर सकता है । वही ब्रह्म जब शक्ति विशिष्ट बनता है, तब कृपा कर सकता है और तभी उसकी पूजा हो सकती है । 'श्री' का अर्थ है राधाजी । जगत का आधार कृष्ण हैं और कृष्ण का आधार राधा हैं |
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------- नारद पंचरात्र में आदि शक्ति राधा का एक नाम हरा या हारा भी है जिससे महामंत्र –
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
|   -----का आविर्भाव हुआ |
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            यह भी किम्बदन्ती है कि जन्म के समय राधा अन्धी थी और यमुना में नहाते समय जाते हुए राजा वृषभानु को सरोवर में कमल के पुष्प पर खेलती हुई मिली। शिशु अवस्था में ही श्री कृष्ण की माता यशोदा के साथ बरसाना में प्रथम मुलाक़ात हुई, पालने में सोते हुए राधा को कृष्ण द्वारा झांक कर देखते ही जन्मांध राधा की आँखें खुल गईं |


कन्हैया उझकि उझकि निरखे |
स्वर्ण खचित पलना चित-चितवत केहि विधि प्रिय दरसै |
जहँ पौढ़ी वृषभानु लली, प्रभु दरसन कौं तरसै |
पलक पांवड़े मुंदे सखी के, नैन कमल थरकैं |
कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों, फर फर फर फरके |
तीन  लोक दरसन कौं तरसें,  सो दरसन तरसै |
ये तो नैना बंद किये हैं,  कान्हा  बैननि परखे |
अचरज एक भयो ताही छिन,  बरसानौ सरसे |
खोली दिए दृग भानुलली,मिलि नैन, नैन हरषे| 
दृष्टिहीन माया, लखि दृष्टा, दृष्टि खोलि निरखे|
बिन दृष्टा के दर्श श्याम, कब जगत दीठ बरसै ||----पद डा श्याम गुप्त 



 
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------- रुक्मिणी व राधा ----- इसके साथ यह भी कथा है कि विदर्भ देश में भीष्मक की कुण्डिनपुर राजधानी थी। जब उनकी पुत्री रुक्मिणी का जन्म हुआजो लक्ष्मी का अवतार थी | शिशु अवस्था में ही पूतना उसे मारना चाहती थी अतः चील के रूप में उसे लेकर उड़ गयी, तो रुक्मिणी ने अपना भार अत्यधिक बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया, और भार न सह पाने के कारण वह उसकी पकड़ से छूट गयीं| उस समय चील बरसाना के ऊपर उडी रही थी और रुक्मिणी नीचे तालाब के किनारे कमल पर गिरीं जिसे राजा वृषभानु लेकर आये और राधा के नाम से पालन किया | श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने के उपरांत रुक्मिणी के पिता भीष्मक को यह तथ्य ज्ञात हुआ तो वे राधा को अपने देश में ले आये, और रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ |
------ रुक्मणी द्वारवत्याम तु राधा वृन्दावन वने ---मत्स्य पुराण -१३ 

------- राधा का विवाह कंस के एक सांसद रायाण से सुनिश्चित हुआ था परन्तु राधा ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों का उल्लंघन किया | कृष्ण की अनुपस्थिति में उनके प्रेमभाव में और वृद्धि हुई |

कृष्ण राधा को कभी नहीं भूले ..आदि पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—

त्रिलोक्ये पृथ्वी धन्या यत्र वृंदावनम पुरी ,
तत्रापि गोपिकाः पार्थ तत्र राधाभिधा मम |

--------हे अर्जुन !तीन लोक में वृन्दावन पुरी धन्य है, जहां गोपिकाएं रहती हैं और --जहां मेरी अभिन्न प्रिया राधा रहती है |
\
दोनों का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के अवसर पर हुआ जहां द्वारिका से कृष्ण व वृन्दावन से नन्द यसोदा व राधा गए थे| रूक्मिणी जी ने राधा जी का स्वागत सत्कार किया।
-------जब रूक्मिणी जी श्रीकृष्ण के पैर दबा रही थीं तो उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में छाले हैं। रुक्मणी जी ने विचार किया की प्रभु तो पैदल भी नहीं चलते। फिर छाला कैसे हो गया? जब रुक्मणी जी ने इस बात पर प्रभु से बहुत अनुनय-विनय किया तब श्रीकृष्ण ने बताया कि उनके चरण-कमल राधाजी के ह्रदय में विराजते हैं। रूक्मिणी जी ने राधा जी को पीने के लिए अधिक गर्म दूध दे दिया था जिसके कारण श्रीकृष्ण के पैरों में फफोले पड गए।
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                               एक बार श्री कृष्ण रुग्ण होगये तो उन्होंने नारद से कहा की यदि कोइ उन्हें अपने चरणों की धूलि दे तो वे स्वस्थ्य होजायंगे | रुक्मिणी सहित सभी रानियों, देवों, नारद , मुनियों सभी ने श्रीकृष्ण को अपनी चरण धूलि देकर यह महापाप उठाने से मना करा दिया|
--------जब नारद ने राधा को यह बताया तो उसने तुरंत ही अपनी चरणधूलि भिजवा दी, नारद के पूछने पर कि उन्हें महापातक का भय नहीं है, राधा का कथन था की यदि श्रीकृष्ण की कुशलता हेतु उसे हज़ार जन्मों तक भी कुम्भीपाक नरक में रहना पड़े तो स्वीकार है |
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            राधा के तोते भी कृष्ण कृष्ण कहते थे  | नारद जी ने श्रीकृष्ण से कहा कि जहाँ भी मैं जाता हूँ वहीं पूरे ब्रज मै हरे कृष्ण हरे कृष्ण कि गूँज सुनाई देती है । इस पर श्रीकृष्ण बोले पर मुझे तो राधे राधे नाम प्रिय है | यह सुनकर राधाजी कि आँखों से अश्रु –धारा बहने लगी, उन्होंने अपने तोतों से हरे कृष्ण कि जगह राधे राधे कहलाना शुरू कर दिया । जब सखियों ने कहा लोग तुम्हे अभिमानी कहेंगे कि तुम अपने नाम की जय बुलवाना चाहती हो । इस पर श्री जी ने कहा कि अगर मेरे प्रियतम को यही नाम पसंद है तो मैं तो यही नाम लूंगी चाहें लोग कुछ भी कहें ।
\
------तो ऐसी थी राधा |--------
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कृष्ण राधा से कहते हैं कि हे सुन्दरी राधा! मैं मथुरा चला जाऊंगा, आपके भाई श्रीदामा के श्राप के कारण हमें १०० वर्षों तक बिछुड़ना होगा किन्तु हम स्वपनों में बार बार मिलेंगे | मैं यह समय द्वारिका में बिताऊंगा |
\
कृष्ण के मथुरा जाने के बाद सभी थे उदास थे | उधर कृष्ण को राधा की चिंता सताने लगी, वे सोचने लगे कि जाने से पहले एक बार राधा से मिल लें इसलिए मौका पाते ही वे छिपकर वहां से निकल गए।
-------राधा-कृष्ण के इस मिलन की कहानी अद्भुत है। दोनों ना तो कुछ बोल रहे थे, ना कुछ महसूस कर रहे थे, बस चुप थे। राधा कृष्ण को ना केवल जानती थी, वरन् मन और मस्तिष्क से समझती भी थीं। कृष्ण के मन में क्या चल रहा है, वे पहले से ही भांप लेती, इसलिए शायद दोनों को उस समय कुछ भी बोलने की आवश्यक्ता नहीं पड़ी। अंतत: कृष्ण राधा को अलविदा कह वहां से लौट आए और आकर गोपियों को भी वृंदावन से उन्हें जाने की अनुमति देने के लिए मना लिया।
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अखिरकार वृंदावन कृष्ण के बिना सूना-सूना हो गया, ना कोई चहल-पहल थी और ना ही कृष्ण की लीलाओं की कोई झलक। बस सभी कृष्ण के जाने के ग़म में डूबे हुए थे।
-------परंतु दूसरी ओर राधा को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था,क्योंकि उनकी दृष्टि में कृष्ण कभी उनसे अलग हुए ही नहीं थे।
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समस्त भारतीय वाङग्मय के अघ्ययन से प्रकट होता है कि राधा प्रेम का प्रतीक थीं और कृष्ण और राधा के बीच दैहिक संबंधों की कोई भी अवधारणा शास्त्रों में नहीं है। इसलिए इस प्रेम को शाश्वत प्रेम की श्रेणी में रखते हैं। इसलिए कृष्ण के साथ सदा राधाजी को ही प्रतिष्ठा मिली। यहाँ तक की वृन्दावन में कृष्ण से अधिक राधा रानी की महत्ता है | राधाजी कृष्ण की गोलोक की अर्धांगिनी राधारानी हैं वे ईश्वरीय तत्व मी मूल आदि-शक्ति हैं |
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                           यद्यपि ललिता कहती है कि -------राधा को ज्ञात नहीं कि कृष्ण यहाँ से जाने वाले हैं, वे ललिता को बताते हैं राधा को नहीं कह पाते,
                    परन्तु ललिता नहीं जानती कि राधिका, राधा परमात्व तत्व कृष्ण की चिर सहचरी, चिच्छित-शक्ति हैं, वे मातृ-शक्ति हैं, भगवान श्रीकृष्ण के साथ सदा-सर्वदा संलग्न, उपस्थित, अभिन्न--परमात्म-अद्यात्म-शक्ति;
--------उन्हें सब ज्ञात है यह सब तो इस लीलाभूमि पर दोनों परमात्म तत्वों, लीला-युगल की लीला है जिसे सामान्य मनुष्य नहीं जान सकता |
         श्रीकृष्ण राधा की अनुमति व जानकारी में ही मथुरा गए, अन्यथा क्या यमुना पार से वे कभी एक बार वृन्दावन नहीं आ सकते थे, आना ही नहीं था | लीला युगल की लीला !
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यस्या रेणुं पादयोर्विश्वभर्ता धरते मूर्धिन प्रेमयुक्त :--(अथर्ववेदीय राधिकोपनिषद )
----राधा वह शख्शियत है जिसके कमलवत चरणों की रज श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक अपने माथे पे लगाते हैं।
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-आदि शक्ति,नीला देवी, अदिति - राधा ---नाप्पिंनई -----
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--------तमिल साहित्य के अनुसार ऋग्वेद की तैत्रीय संहिता में .....
----- नीला देवी सूक्त ( अदिति सूक्त ) के अनुसार --विष्णु की तीन पत्नियां श्रीदेवी, भूदेवी व नीला देवी हैं |
--------अदृश्य रूप में रहने वाली नीला देवी ही आदि-शक्ति राधा हैं जिन्हें अदिति भी कहा जाता है | नीला देवी का अवतार ही राधा हैं, जिन्हें दक्षिण में नप्पिनई पुकारा जाता है, जिसे श्रीकृष्ण ने सात बैलों को हराकर जीता था | यह एक अन्य कहानी है जो केवल तमिल साहित्य में ही वर्णित है|

 चित्र गूगल-----

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चित्र--१-राधा
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चित्र-२-कृष्ण राधा की सेवा करते हुए    
चित्र--१-राधा
चित्र-२-कृष्ण राधा की सेवा करते हुए
चित्र-३- मथुरा गमन से पहले अंतिम मुलाकात
चित्र -४-----राधा हैं या श्याम है या राधाजू के श्याम हैं या श्याम जू की राधा हैं




 

सोमवार, 29 अगस्त 2016

---प्रेम तत्वामृत---- डा श्याम गुप्त.....

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 




                                   ---प्रेम तत्वामृत----
               भारत ही नहीं अपितु विश्वभर में प्रेम के अधीक्षक श्रीकृष्ण ----राधा  व कृष्ण माने जाते हैं , वे प्रेम के पर्याय हैं अतः राधा व कृष्ण के तत्व द्वारा यहाँ पर प्रेम के दोनों  मूल भावों की विवेचना की जायगी .....

                                               ******राधा तत्वामृत*****
-------राधा ---व्युत्पत्ति व उदभव----
------राधा एक कल्पना है या वास्तविक चरित्र, यह सदियों से तर्कशील व्यक्तियों विज्ञजनों के मन में प्रश्न बनकर उठता रहा है| अधिकाँशतः जन राधा के चरित्र को काल्पनिक एवं पौराणिक काल में रचा गया मानते हैं | कुछ विद्वानों के अनुसार कृष्ण की आराधिका का ही रुप राधा हैं। आराधिका शब्द में से अ हटा देने से राधिका बनता है। राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था। यहाँ राधा का मंदिर भी है। राधारानी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है।
------- यह आश्चर्य की बात हे कि राधा-कृष्ण की इतनी अभिन्नता होते हुए भी महाभारत या भागवत पुराण में राधा का नामोल्लेख नहीं मिलता, यद्यपि कृष्ण की एक प्रिय सखी का संकेत अवश्य है। राधा ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों का उल्लंघन किया। कृष्ण की अनुपस्थिति में उसके प्रेम-भाव में और भी वृद्धि हुई। दोनों का पुनर्मिलन कुरूक्षेत्र में बताया जाता है जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृन्दावन से नंद, राधा आदि गए थे।
-------यहाँ पर हम वस्तुतः राधा शब्द व चरित्र कहाँ से आया इस प्रश्न पर कुछ प्रकाश डालने का प्रयत्न करेंगे | प्रयत्न ही कर सकते हैं, यद्यपि यह भी एक धृष्टता ही है क्योंकि भक्ति प्रधान इस देश में श्रीकृष्ण (श्री राधाजी व श्री कृष्ण ) स्वयं ही ब्रह्म व आदि-शक्ति रूप माने जाते हैं अतः सत्य तो वे ही जानते हैं |
****** राधा का चरित्र-वर्णन, श्रीमदभागवत में स्पष्ट नहीं मिलता ....वेद-उपनिषद में भी राधा का उल्लेख नहीं है....राधा-कृष्ण का सांगोपांग वर्णन ‘गीत-गोविन्द’ से मिलता है|
-----वेदों में राधा शब्द -----
-------सर्व-प्रथम ऋग्वेद के भाग-१ /मंडल १,२ ...में ...राधस शब्द का प्रयोग हुआ है ....जिसे वैभव के अर्थ में प्रयोग किया गया है......
-------ऋग्वेद के २/म.३-४-५ में ..सुराधा ...शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है...सभी देवों से उनकी अपनी संरक्षक शक्ति का उपयोग करके धनों की प्राप्ति व प्राकृतिक साधनों के उचित प्रयोग की प्रार्थना की गयी है|
ऋग्वेद-५/५२/४०९४..में -- राधो व आराधना शब्द ..शोधकार्यों के लिए प्रयुक्त किये गए हैं...यथा..
“ यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्वं म्रजे |”....
------अर्थात यमुना के किनारे गाय ..घोड़ों आदि धनों का वर्धन, वृद्धि, संशोधन व उत्पादन आराधना सहित करें या किया जाता है | एवं.....
“गवामप ब्रजं वृधि कृणुश्व राधो अद्रिव:
नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः |”
------कृष्ण = क्र = कार्य = कर्म -----राधो = अराधना, राधन ( गूंथना ), शोध, शोधन, नियमितता, साधना ...अर्थात ब्रज में गौ – ज्ञान, सभ्यता उन्नति की वृद्धि ...कृष्ण-राधा द्वारा हुई = ...कर्म व साधना द्वारा की गयी शोधों से हुई |
इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते पिवा त्वस्य गिर्वण (ऋग्वेद ३. ५ १. १ ०) ---ओ राधापति ( इंद्र – बाद में विष्णु ) वेद मन्त्र भी तुम्हें जपते हैं। उनके द्वारा सोमरस पान करो।
-------विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधस : सवितारं नृचक्षसं (ऋग्वेद १ २ २. ७). -------ओ सब के हृदय में विराजमान सर्वज्ञाता दृष्टा जो हमारी आराधना सुनें हमारी रक्षा करो।
त्वं नृचक्सम वृषभानुपूर्वी : कृष्नास्वग्ने अरुषोविभाही ...(ऋग्वेद )
--------इस मन्त्र में श्री राधा के पिता वृषभानु का उल्लेख किया गया है जो अन्य किसी भी प्रकार के संदेह को मिटा देता है ,क्योंकि वही तो राधा के पिता हैं।
------यस्या रेणुं पादयोर्विश्वभर्ता धरते मूर्धिन प्रेमयुक्त : ---(अथर्ववेदीय राधिकोपनिषद )
----राधा वह शख्शियत है जिसके कमलवत चरणों की रज श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक अपने माथे पे लगाते हैं।
******तमिलनाडू की गाथा के अनुसार --दक्षिण भारत का अय्यर जाति समूह, उत्तर के यादव के समकक्ष हैं | एक कथा के अनुसार गोप व ग्वाले ही कंस के अत्याचारों से डर कर दक्षिण तमिलनाडू चले गए थे | उनके नायक की पुत्री नप्पिंनई से कृष्ण ने विवाह किया --- श्रीकृष्ण ने नप्पिंनई को ७ बैलों को हराकर जीता था | तमिल गाथाओं के अनुसार नप्पिनयी नीला देवी का अवतार है जो ऋग्वेद की तैत्रीय संहिता के अनुसार ---विष्णु पत्नी सूक्त या अदिति सूक्त या नीला देवी सूक्त में राधा ही हैं जिन्हें अदिति –दिशाओं की देवी भी कहते हैं | नीला देवी या राधा परमशक्ति की मूल आदि-शक्ति हैं –अदिति ...|
---------श्री कृष्ण की एक पत्नी कौशल देश की राजकुमारी---नीला भी थी, जो यही नाप्पिनायी ही है जो दक्षिण की राधा है | एक कथा के अनुसार राधाके कुटुंब के लोग ही दक्षिण चले गए अतः नप्पिंनई राधा ही थी |
-----पुराणों में श्री राधे :-----
--------वेदव्यास जी ने श्रीमदभागवतम के अलावा १७ और पुराण रचे हैं इनमें से छ :में श्री राधारानी का उल्लेख है।
यथा राधा प्रिया विष्णो : (पद्मपुराण )
राधा वामांश संभूता महालक्ष्मीर्प्रकीर्तिता (नारद पुराण )
तत्रापि राधिका शश्वत (आदि पुराण )
रुक्मणी द्वारवत्याम तु राधा वृन्दावन वने (मत्स्य पुराण १३. ३७ )
राध्नोति सकलान कामान तेन राधा प्रकीर्तित :(देवी भागवत पुराण )
-----यां गोपीमनयत कृष्णो (श्रीमद भागवतम १०.३०.३५ )
---श्री कृष्ण एक गोपी को साथ लेकर अगोचर हो गए। महारास से विलग हो गए। गोपी, राधा का एक नामहै|
----अन्याअ अराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वर : -(श्रीमद भागवतम )
----इस गोपी ने कृष्ण की अनन्य भक्ति( आराधना) की है। इसीलिए कृष्ण उन्हें अपने (संग रखे हैं ) संग ले
गए, इसीलिये वह आराधिका ...राधिका है |

--------- वस्तुतः ऋग्वेदिक व यजुर्वेद व अथर्व वेदिक साहित्य में ’ राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति = रयि (संसार, ऐश्वर्य, श्री, वैभव) +धा (धारक, धारण करने वालीशक्ति) से हुई है; अतः जब उपनिषद व संहिताओं के ज्ञान मार्गीकाल में सृष्टि के कर्ता का ब्रह्म व पुरुष, परमात्मा रूप में वर्णन हुआ तो समस्त संसार की धारक चितशक्ति, ह्लादिनी शक्ति, परमेश्वरी राधा का आविर्भाव हुआ|
----भविष्य पुराण में--जब वेद को स्वयं साक्षात नारायण कहा गया तो उनकी मूल कृतित्व - काल, कर्म, धर्म व काम के अधिष्ठाता हुए—कालरूप- कृष्ण व उनकी सहोदरी (साथ-साथ उदभूत) राधा-परमेश्वरी......कर्म रूप - ब्रह्मा व नियति (सहोदरी).... धर्म रूप-महादेव व श्रद्धा (सहोदरी) .....एवम कामरूप-अनिरुद्ध व उषा ( सहोदरी )---- इस प्रकार राधा परमात्व तत्व कृष्ण की चिर सहचरी, चिच्छित-शक्ति (ब्रह्मसंहिता) है।
------वही परवर्ती साहित्य में.... श्रीकृष्ण का लीला-रमण व लौकिक रूप के आविर्भाव के साथ उनकी साथी, प्रेमिका, पत्नी हुई व ब्रजबासिनी रूप में जन-नेत्री।
------भागवत-पुराण ...मैं जो आराधिता नाम की गोपी का उल्लेख है ......
किसी एक प्रिय गोपी को भगवान श्री कृष्ण महारास के मध्य में लोप होते समय साथ ले गये थे जिसे ’मान ’ होने पर छोडकर अन्तर्ध्यान हुए थे; संभवतः यह वही गोपी रही होगी जिसे गीत-गोविन्द के रचयिता विद्यापति व सूरदास आदि परवर्ती कवियों, भक्तों ने श्रंगारभूति श्रीकृष्ण (पुरुष) की रसेश्वरी (प्रक्रति) राधा....के रूप मेंकल्पित व प्रतिष्ठित किया।
-------महाभारत में राधा ------
-------- उल्लेख उस समय आ सकता था जब शिशुपाल श्रीकृष्ण की लम्पटता का बखान कर रहा था| परन्तु भागवतकार निश्चय ही राधा जैसे पावन चरित्र को इसमें घसीटना नहीं चाहता होगा, अतः शिशुपाल से केवल सांकेतिक भाषा में कहलवाया गया, अनर्गल बात नहीं कहलवाई गयी|
-------- कुछ विद्वानों के अनुसार महाभारत में तत्व रूप में राधा का नाम सर्वत्र है क्योंकि उसमें कृष्ण को सदैव श्रीकृष्ण कहा गया है | श्री का अर्थ राधा ही है जो आत्मतत्व की भांति सर्वत्र अंतर्गुन्थित है, श्रीकृष्ण = राधाकृष्ण |
******श्री कृष्ण की विख्यात प्राणसखी और उपासिका राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थी। राधा कृष्ण शाश्वत प्रेम का प्रतीक हैं। राधा की माता कीर्ति के लिए 'वृषभानु पत्नी' शब्द का प्रयोग किया जाता है। राधा को कृष्ण की प्रेमिका और कहीं-कहीं पत्नी के रुप में माना जाता हैं। राधा वृषभानु की पुत्री थी। पद्म पुराणने इसे वृषभानु राजा की कन्या बताया है। यह राजा जब यज्ञ की भूमि साफ कर रहा था, इसे भूमि कन्या के रूप में राधा मिली। राजा ने अपनी कन्या मानकर इसका पालन-पोषण किया। यह भी कथा मिलती है कि विष्णु ने कृष्ण अवतार लेते समय अपने परिवार के सभी देवताओं से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा। तभी राधा भी जो चतुर्भुज विष्णु की अर्धांगिनी और लक्ष्मी के रूप में वैकुंठलोक में निवास करती थीं, राधा बनकर पृथ्वी पर आई। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की सखी थी और उसका विवाह रापाण अथवा रायाण नामक व्यक्ति के साथ हुआ था। अन्यत्र राधा और कृष्ण के विवाह का भी उल्लेख मिलता है। कहते हैं, राधा अपने जन्म के समय ही वयस्क हो गई थी।
---------यह भी किम्बदन्ती है कि जन्म के समय राधा अन्धी थी और यमुना में नहाते समय जाते हुए राजा वृषभानु को सरोवर में कमल के पुष्प पर खेलती हुई मिली। शिशु अवस्था में ही श्री कृष्ण की माता यशोदा के साथ बरसाना में प्रथम मुलाक़ात हुई, पालने में सोते हुए राधा को कृष्ण द्वारा झांक कर देखते ही जन्मांध राधा की आँखें खुल गईं |
****** महान कवियों- लेखकों ने राधा के पक्ष में कान्हा को निर्मोही जैसी उपाधि दी। दे भी क्यूँ न ? राधा का प्रेम ही ऐसा अलौकिक था...उसकी साक्षी थी यमुना जी की लहरें, वृन्दावन की वे कुंजवे गलियाँ वो कदम्ब का पेड़, वो गोधुली बेला जब श्याम गायें चरा कर वापिस आते वो मुरली की स्वर लहरी जो सदैव वहाँ की हवाओं में विद्यमान रहती थी ।
------राधा जो वनों में भटकती, कृष्ण कृष्ण पुकारती, अपने प्रेम को अमर बनाती, उसकी पुकार सुन कर भी ,कृष्ण ने एक बार भी पलट कर पीछे नही देखा। ...तो क्यूँ न वो निर्मोही एवं कठोर हृदय कहलाए ।
*******किन्तु कृष्ण के हृदय का स्पंदन किसी ने नहीं सुना। स्वयं कृष्ण को कहाँ कभी समय मिला कि वो अपने हृदय की बात..मन की बात सुन सकें। जब अपने ही कुटुंब से व्यथित हो कर वे प्रभास -क्षेत्र में लेट कर चिंतन कर रहे थे तब 'जरा' के छोडे तीर की चुभन महसूस हुई। उन्होंने देहोत्सर्ग करते हुए 'राधा' शब्द का उच्चारण किया। जिसे 'जरा' ने सुना और 'उद्धव' को जो उसी समय वह पहुँचे..उन्हें सुनाया। उद्धव की आँखों से आँसू लगतार बहने लगे। सभी लोगों को कृष्ण का संदेश देने के बाद जब उद्धव राधा के पास पहुँचे तो वे केवल इतना कह सके ---" राधा, कान्हा तो सारे संसार के थे ..”
--------किन्तु राधा तो केवल कृष्ण के हृदय में थी…....कान्हा के ह्रदय में तो केवल राधा थीं ....
******समस्त भारतीय वाङग्मय के अघ्ययन से प्रकट होता है कि राधा प्रेम का प्रतीक थीं और कृष्ण और राधा के बीच दैहिक संबंधों की कोई भी अवधारणा शास्त्रों में नहीं है। इसलिए इस प्रेम को शाश्वत प्रेम की श्रेणी में रखते हैं। इसलिए कृष्ण के साथ सदा राधाजी को ही प्रतिष्ठा मिली।
-------बरसाना के श्रीजी के मंदिर में ठाकुर जी भी रहते हैं | भले ही चूनर ओढ़ा देते हैं सखी वेष में रहते हैं ताकि कोई जान न पाये | महात्माओं से सुनते हैं कि ऐसा संसार में कहीं नहीं है जहाँ कृष्ण सखी वेश में रहते हैं | जो पूर्ण पुरुषोत्तम पुरुष सखी बने ऐसा केवल बरसाने में है |
अति सरस्यौ बरसानो जू |
राजत रमणीक रवानों जू ||
जहाँ मनिमय मंदिर सोहै जू |



                                           ****श्रीकृष्ण तत्वामृत*****
-----वो कृष्णा है ----.

****वो गाय चराता है, गोमृत दुहता है...दधि खाता है...उसे माखन बहुत सुहाता है ...वह गोपाल है.....गोविन्द है.....वो कृष्ना है .......
-------गौ अर्थात गाय, ज्ञान, बुद्धि, इन्द्रियां, धरतीमाता ....अतः वह बुद्धि, ज्ञान , इन्द्रियों का, समस्त धरती का (कृषक ) पालक है –गोपाल, वह गौ को प्रसन्नता देता है (विन्दते) गोविन्द है
..... दधि...अर्थात स्थिर बुद्धि, प्रज्ञा ...को पहचानता है...उसके अनुरूप कार्य करता है वह दधि खाता है ...
------माखन उसको सबसे प्रिय है .....माखन अर्थात गौदुग्ध को बिलो कर आलोड़ित करके प्राप्त उसका तत्व ज्ञान पर आचरण करना व संसार को देना उसे सबसे प्रिय है ..

***** “सर्वोपनिषद गावो दोग्धा नन्द नन्दनं “ ...सभी उपनिषद् गायें हैं जिन्हें नन्द नंदन श्री कृष्ण ने दुहा ....गीतामृत रूपी माखन स्वयं खाया, प्रयोग किया ....संसार को प्रदान करने हेतु.....
**** वह बाल लीलाएं करता हुआ कंस जैसे महान अत्याचारी सम्राट का अंत करता है ...
****वो प्रेम गीत गाता है वह गोपिकाओं के साथ रमण करता है, नाचता है , प्रेम करता है , राधा का प्रेमी है, कुब्जा का प्रेमी है ...मोहन है ...परन्तु उसे किसी से भी प्रेम नहीं है...निर्मोही है ...वह किसी का नहीं .. वह सभी से सामान रूप से प्रेम करता है ..वह सबका है और सब उसके ...
****वो आठ पटरानियों का एवं १६०० पत्नियों का पति है, पुत्र-पुत्रियों में, संसार में लिप्त है ...परन्तु योगीराज है, योगेश्वर है |
****वो कर्म के गीत गाता है एवं युद्ध क्षेत्र में भी भक्ति व ज्ञान का मार्ग, धर्म की राह दिखाता है ,,,गीता रचता है ....
---- वो रणछोड़ है ...वो स्वयं युद्ध नहीं करता, अस्त्र नहीं उठाता, परन्तु विश्व के सबसे भीषण युद्ध का प्रणेता, संचालक व कारक है |
---अपने सम्मुख ही अपनी नारायणी सेना का विनाश कराता है, कुलनाश कराता है...
---काल के महान विद्वान् उसके आगे शीश झुकाते हैं ...
------------वो कृष्णा, कृष्ण है श्री कृष्ण है ...............
****वह कोइ विशेषज्ञ नहीं अपितु शेषज्ञ है उसके आगे काल व ज्ञान स्वयं शेष होजाते हैं |
---------- वह कृष्ण है ..........
@@@@@ कर्म शब्द कृ धातु से निकला है कृ धातु का अर्थ है करना। इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ कर्मफल भी होता है।
-----कृ से उत्पन्न कृष का अर्थ है विलेखण......आचार्यगण कहते हैं..... ‘संसिद्धि: फल संपत्ति:’ अर्थात फल के रूप में परिणत होना ही संसिद्धि है और ‘विलेखनं हलोत्कीरणं ”
अर्थात विलेखन शब्द का अर्थ है हल-जोतना |..जो तत्पश्चात अन्नोत्पत्ति के कारण ..मानव जीवन के सुख-आनंद का कारण ...अतः कृष्ण का अर्थ.. कृष्णन, कर्षण, आकर्षक, आकर्षण व आनंद स्वरूप हुआ... | ----वो कृष्ण है
------ 'संस्कृति' शब्द भी ….'कृष्टि' शब्द से बना है, जिसकी व्युत्पत्ति संस्कृत की 'कृष' धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ है- 'खेती करना', संवर्धन करना, बोना आदि होता है। सांकेतिक अथवा लाक्षणिक अर्थ होगा- जीवन की मिट्टी को जोतना और बोना। …..‘संस्कृति’ शब्द का अंग्रेजी पर्याय "कल्चर" शब्द ( ( कृष्टि -कल्ट कल्चर ) भी वही अर्थ देता है। कृषि के लिए जिस प्रकार भूमि शोधन और निर्माण की प्रक्रिया आवश्यक है, उसी प्रकार संस्कृति के लिए भी मन के संस्कार–परिष्कार की अपेक्षा होती है।
____अत: जो कर्म द्वारा मन के, समाज के परिष्करण का मार्ग प्रशस्त करता है वह कृष्ण है... | 'कृष' धातु में 'ण' प्रत्यय जोड़ कर 'कृष्ण' बना है जिसका अर्थ आकर्षक व आनंद स्वरूप कृष्ण है..
---वो कृष्ना है...कृष्ण है .....
****शिव–नारद संवाद में शिव का कथन ---‘कृष्ण शब्द में कृष शब्द का अर्थ समस्त और 'न' का अर्थ मैं...आत्मा है .इसीलिये वह सर्वआत्मा परमब्रह्म कृष्ण नाम से कहे जाते हैं| कृष का अर्थ आड़े’.. और न.. का अर्थ आत्मा होने से वे सबके आदि पुरुष हैं |"..
-----..अर्थात कृष का अर्थ आड़े-तिरछा और न (न:=मैं, हम...नाम ) का अर्थ आत्मा ( आत्म ) होने से वे सबके आदि पुरुष हैं...कृष्ण हैं| क्रिष्ट..क्लिष्ट ...टेड़े..त्रिभंगी...कृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा का यही तत्व-अर्थ है...
**** कृष्ण = क्र या कृ = करना, कार्य=कर्म …..राधो = आराधना, राधन, रांधना, गूंथना, शोध, नियमितता , साधना....राधा....
गवामप ब्रजं वृधि कृणुश्व राधो अद्रिव:
नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः |...ऋग्वेद
---ब्रज में गौ – ज्ञान, सभ्यता उन्नति की वृद्धि ...कृष्ण-राधा द्वारा हुई = कर्म व साधना द्वारा की गयी शोधों से हुई ....साधना के बिना कर्म सफल कब होता है ... वो राधा है
****राध धातु से राधा और कृष धातु से कृष्ण नाम व्युत्पन्न हुये| राध धातु का अर्थ है संसिद्धि ( वैदिक रयि= संसार..धन, समृद्धि एवं धा = धारक )...
----ऋग्वेद-५/५२/४०९४-- में राधो व आराधना शब्द ..शोधकार्यों के लिए प्रयुक्त किये गए हैं...यथा..
“ यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्वं म्रजे |”....अर्थात यमुना के किनारे गाय ..घोड़ों आदि धनों का वर्धन, वृद्धि, संशोधन व उत्पादन आराधना सहित करें या किया जाता है |
****नारद पंचरात्र में राधा का एक नाम हरा या हारा भी वर्णित है...वर्णित है | जो गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय में प्रचलित है| अतः महामंत्र की उत्पत्ति....
**** हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे// ----
-------सामवेद की छान्दोग्य उपनिषद् में कथन है...
”स्यामक केवलं प्रपध्यये, स्वालक च्यमं प्रपध्यये स्यामक”....
----श्यामक अर्थात काले की सहायता से श्वेत का ज्ञान होता है (सेवा प्राप्त होती है).. तथा श्वेत की सहायता से हमें स्याम का ज्ञान होता है ( सेवा का अवसर मिलता है)....यहाँ श्याम ..कृष्ण का एवं श्वेत राधा का प्रतीक है |
****नास्ति कृष्णार्चंनम राधार्चनं बिना ......
------जय कन्हैयालाल की ...जय राधा गोविन्द की -----.

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