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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शनिवार, 2 मई 2009

छंद का विस्तृत आकाश -

वे जो छंदोबद्ध कविता ही की बात करते हैं , वस्तुतः छंद,कविता ,काव्य-कला व साहित्य का अर्थ ही नहीं जानते, एवं संकुचित अर्थ व विचार धारा के पोषक हैं। वे केवल तुकांत कविता को ही छंदोबद्ध कविता कहते हैं। कुछ तो केवल वार्णिक छंदों -कवित्त,सवैया ,कुण्डली -को ही छंद समझते हैं।छंद क्या है ?, कविता क्या है?
वस्तुतः कविता,काव्य-कला, गीत आदि नाम तो बाद मैं आए । आविर्भाव तो छंद -नाम ही हुआ है। छंद ही कविता का वास्तविक सर्व प्रथम नाम है।श्रृष्टि महाकाव्य- में श्रृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में कवि कहता है--
चतुर्मुख के चार मुखों से ,
ऋक,यजु ,साम ,अथर्व वेद सब ;
छंद शास्त्र का हुआ अवतरण ,
विविध ज्ञान जगती मैं आया। ----श्रृष्टि खंड से।
वास्तव में प्रत्येक कविता ही छंद है। प्राचीन रीतियों के अनुसार आज भी विवाहोपरांत ,प्रथम दिवस पर दुल्हा -दुल्हिन को छंद -पकैया खेल
खिलाया जाता है (कविता नहीं)। इसमें दौनों कविता मैं ही बातें करते हैं। इसके दो अर्थ हैं --१.कविता का असली नाम छंद है.,छंद ही कविता है। २ काव्य -कला जीवन के कितने करीब है । जो छंद बनाने मैं प्रवीणता ,ज्ञान की कसौटी है ,वह संसार -चक्र में जाने के लिए उपयुक्त है । आगे आने वाला जीवन छंद की भांति अनुशाषित परन्तु निर्बंध ,लालित्य पूर्ण ,विवेक पूर्ण ,सहज ,सरल ,गतिमय व तुकांत -अतुकांत की तरह प्रत्येक आरोह-अवरोह को झेलने में समर्थ रहे।
अतः छंद ही कविता है ,हर कविता छंद है -तुकांत,अतुकांत ;गीत-अगीत आदि। छंद का अपना विस्तृत आकाश है । आकाश को छोटा न कर।

1 टिप्पणी:

KANISHKA KASHYAP ने कहा…

aapki baatein.. mere sahitya par bhari padti hain dr, sahab
hamara kya ..
akshar akshar chura kar shahibe kitab ho gaye...
jara apne blog pe jayein.. dekhein apne kya likhwa diya..