ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शनिवार, 22 मई 2010

जीन व कृत्रिम जीवन की रचना...

जीवन की रचना---कृत्रिम जीवन -कोशिका की प्रयोगशाला में उत्पत्ति...

----अमेरिकी जीन वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोगशाला में जीवन की उत्पत्ति की सफलता , मानव की सफलताओं की कथा में एक और मील का पत्थर है | इस पर किसी धार्मिक आचार्य का कथन सटीक ही है कि सभी कुछ उस ईश्वर का ही कृतित्व है -मानव भी- अतः मानव द्वारा यह खोज भी ईश्वर की खोज का ही, ईश्वर द्वारा प्रदत्त, एक भाग हैजो मानव जीवन के ध्येयों में एक लक्ष्य है, अपने रचयिता की , विश्व के मूल प्रश्नों की खोज; एवं धर्म से इसका कोई विरोधाभाष नहीं है।
----इसके साथ ही विश्व भर में इस खोज की नैतिकता पर भी प्रश्न उठ खड़े हुए हैं, स्वयं वैज्ञानिक समुदाय द्वारा ही। इसके दुरुपयोग के भयंकर परिणामों, भयंकर अनुशासन हीन दुर्मानवों, अतिकाय मानव व जीवों की उत्पत्ति , मानवता के संकट के रूप में । यद्यपि टी वी समाचारों , समाचार पत्रों आदि में दिखाए गए अतिकाय मानवों के दृश्य , कथन आदि सिर्फ पाश्चात्य कथाएँ , सीरिअल्स , पिक्चर आदि से प्रभावित है जो स्वाभाविक है क्योंकि आज भारतीय प्राच्य ज्ञान की कोई पूछ ही नहीं है। जबकि भारतीय पुरा ज्ञान, वैदिक साहित्य में यह सब पहले से ही वर्णित है |
-----सृष्टा -ब्रह्मा का ही एक सहयोगी था 'त्वष्टा' जिसने यज्ञ द्वारा यह विद्या प्राप्त कर ली थी परन्तु वह उसकादुरुपयोग करने लगा था । वह यज्ञ द्वारा- हाथी का सिर -मानव का धड ; मानव का सर -जानवरों-पक्षियों का धड , विशालकाय मानव व पशु पक्षी उत्पन्न करने लगा था | त्रिशिरा नामक अति बलशाली दैत्य(तीन सिर वाला मानव=देव=दैत्य)
उसी का पुत्र था जिसका अत्याचार लिप्त होने पर इन्द्र ने वध किया था। तत्पश्चात ब्रह्मा द्वारा त्वष्टा ऋषि का ब्रह्मत्व ( ज्ञान ) छीन कर उसे निष्प्रभ कर दिया गया ।
----हमें सदुपयोग दुरुपयोग के मध्य की क्षीण रेखा का ध्यान रखना होगा , इतिहास से सबक लेकर।

4 टिप्‍पणियां:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

धन्य हों गुप्ता जी, जब यह सब भारतीय पुरा ज्ञान, वैदिक साहित्य में पहले से ही वर्णित है, तो फिर आपने इसे पहले ही क्यों नहीं सम्पन्न्‍ा कर डाला?

Arvind Mishra ने कहा…

achcha likha है !

Arvind Mishra ने कहा…

achcha likha है !

Dr. shyam gupta ने कहा…

---अरे भैया अच्छी तरह पढा करो,ध्यान से.. हमने पहले ही अनुभव करके, उसकी हानियां देखकर बन्द करा दिया.
---दुनिया भर के वैग्यानिकों का एक समूह इसीलिये तो इसे बन्द कराने के लिये आवाज़ उठा रहा है.
---आप किस वर्ग में है??