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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

गुरुवार, 16 जून 2011

मोडने समय की धारा ....डॉ श्याम गुप्त का गीत....

                                                                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

ह्रदय के खोल अवगुन्ठन,
छोड़ अंतस के गठबंधन |
तोड़ कर  मौन की कारा,
मोड़ने समय की धारा |

        चलें फिर नवल राहों पर,
        बसायें प्रीति के बंधन  ||

आज हर और छाई है,
धुंध कुंठा हताशा की |
हर तरफ छागया है इक,
निराशा का कुहासा ही |

तमस आतंक का फैला,
छागये अनाचारी घन |
आस्थाएं हुईं धूमिल,
नहीं सुरभित रहा सावन |

        अगर अब भी न जागे तो,
        बने विष-बिंदु चन्दन वन ||

मीत तुम आज फिर कोई,
सुहाना गीत इक गाओ |
आस्थाओं के, आशा के,
नीति-संगीत स्वर गाओ |

राष्ट्र गौरव के वे सुमधुर,
सुहाने सुखद सुरभित स्वर
जगे सोई धरा  संस्कृति ,
जगें  सोये हुए तन मन |

        अनय के नाग को नथने,
       हो फण फण पर पुनः नर्तन ||

10 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

यही नृत्य दिखानेवाला ही नाग को वश में ले आयेगा।

veerubhai ने कहा…

नागिया -नथन का आवाहन करती रचना ।रात्र प्रेम से संसिक्त ,चिंताओं से आप्लावित ,रास्ता आँजती .....
आज हर और छाई है ,धुंध कुंठा हताशा की ,
हर तरफ छा गया है इक,निराशा का कुन्हासा ही .

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद वीरू भाई व पांडे जी...कोइ आये तो नाग नथनिया...

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

डॉ श्याम जी साधुवाद

बहुत सुन्दर और प्यारे भाव रचना में -सुन्दर आवाहन

मीत तुम आज फिर कोई, सुहाना गीत इक गाओ |आस्थाओं के, आशा के,नीति-संगीत स्वर गाओ |

लेकिन आतंक को अनाचारी घन (घन अनाचारी होते हैं क्या ?) से जोड़ देना और आस्था को -नहीं सुरभित रहा सावन- से जोड़ना कुछ अटपटा लगा आस्था से सावन नहीं बदल जाता श्याम जी -प्रकृति की अपनी चाल होती है -

तमस आतंक का फैला,
छागये अनाचारी घन |
आस्थाएं हुईं धूमिल,
नहीं सुरभित रहा सावन |

शुक्ल भ्रमर ५

Dr. shyam gupta ने कहा…

-----भ्रमर जी यह कविता है ...कथा नहीं....काव्य में एक भाव होता है अर्थवत्ता....और ..गुण होते हैं अभिधा , लक्षणा, व्यंजना...व्यंजना में अन्योक्ति में बात कही जाती है...
---अनाचारी घन का अर्थ है..समाज (के आसमान पर) में अनाचार (के घन) छागया है.....वैसे सामान्य रूप में भी जब अति-वृष्टि होती है तो घन अनाचारी लगते हैं ...
--- यहाँ सावन का अर्थ भी सुहाना-सुखद जीवन है जो अनास्थाओं में अपनी समस्त सुगंध खो देता है....सामान्य रूप अर्थ में भी जब मन में आतंक भाव छाया हो, अनास्था हो तो सावन भी उतना सुहाना-सुरभित नहीं लगता.....
---मुझे प्रसंन्नता है कि आप काव्य-शास्त्र में रूचि ले रहे हैं....
----प्रकृति के अतिरिक्त विश्व में और है ही कौन व क्या..हम उसी से, उसी की चाल से उदाहरण, प्रेरणा, कथ्य-तथ्य -भाव सब कुछ लेते हैं ..

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

धन्यवाद श्याम जी व्याख्या और स्पष्टीकरण के लिए -काश इसी तरह की व्याख्या आप अन्य की रचनाओं में भी करते और समझते तो कहानी भी आप को काव्य लगता -इसी तरह से हर कवी या लेखक के अपने भाव होते हैं -वो क्या कहना चाहता है किस शैली या विधा में उसे प्रस्तुत कर देता है -वही जानता है
काव्य में एक भाव होता है अर्थवत्ता....और ..गुण होते हैं अभिधा , लक्षणा, व्यंजना...व्यंजना में अन्योक्ति- इस का धयान रखना जरुरी होता है -
शुक्ल भ्रमर ५
सब नीति नियम ही मेरी मानो
फूलों का दो हार हमें !!

Dr. shyam gupta ने कहा…

---कहानी ...काव्य नहीं .गद्य-साहित्य की एक विधा है...व्याख्या करने व समझने या किसी के मान लेने से उसे काव्य-रचना थोड़े ही मान लिया जायगा...
---निश्चय ही प्रत्येक व्यक्ति के अपने भाव होते हैं ..वह किसी भी विधा में रख सकता है...परन्तु उस विधा के साहित्यिक-गुण उस रचना में होने चाहिए जिसके अंतर्गत वह रचना रख रहा है.........

Dr. shyam gupta ने कहा…

---मैं तो सभी की रचनाओं की इसी तरह व्याख्या करता हूँ ....जैसी अच्छी या अन्यथा ..मुझे लगती है कह देता हूँ ...

Rakesh Kumar ने कहा…

चलें फिर नवल राहों पर, बसायें प्रीति के बंधन ||
सुन्दर प्रेरणापूर्ण प्रस्तुति.

Dr. shyam gupta ने कहा…

आभार ..राकेश जी....