....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
सृष्टि के विकास में भाव-तत्व का अत्यधिक महत्त्व है | यही भाव तत्व -चेतन का महत्वपूर्ण गुण है | यद्यपि पाश्चात्य विचार-दर्शन व अधुना विज्ञान में चेतन सिर्फ शरीर में ही खोजा जा सकता है, परन्तु भारतीय विचारधारा व दर्शन में चेतन सदैव उपस्थित रहता है व जड़, जीव ,जंगम सभी में व्यक्त होता है | वह ब्रह्म की भाँति असद से सद, अव्यक्त से व्यक्त होता रहता है | 'कण कण में भगवान ' इसीलिये कहा गया| सृष्टि महाकाव्य में कहा गया है....
"श्रुति दर्शन अध्यात्म बताता ,
चेतन रहता सदा उपस्थित ;
इच्छा रूप में परब्रह्म की
मूल चेतना सभी कणों की,
जो गति बनकर करे सर्जना ;
स्वयं उपस्थित हो कण कण में ||" ......(.सृष्टि महाकाव्य -८/३१ )..
जीव व जड़-जंगम का मूल अंतर है जीव में भाव तत्व की उपस्थिति | विज्ञान के अनुसार -जीव की उत्पत्ति के बाद उसमें भावों आदि की अनुभव के उपरांत उत्पत्ति हुई | भारतीय विचार धारा के अनुसार -भाव तत्वों की सृष्टि पहले हुई, वे सदैव उपस्थित चेतन के रूप में प्रत्येक जीव में प्रवेश करते हैं | स्नेह इस भाव-तत्व समूह का सबसे मूल भाव है , जो 'एकोहं बहुस्याम ' के रूप में ब्रह्म की ईषत-इच्छा के रूप में सृष्टि का मूल आधार बनता है | यही स्नेह प्रकृति के विकास के क्रमिक प्रयोगों में मानव -विकास व सभ्यता के विकास का मूल आधार है |
गर्म जल के श्रोतों की गहराई में जीव की प्रथम आहट- गुनगुनाहट -फुनफुनाहट ( या अंतरिक्ष से जीव के पृथ्वी पर उतरने ) से लेकर मानव के विकास तक यह विकास सिर्फ शरीर में ही नहीं अपितु प्रवृत्तियों , मन व भावों का निर्माण व विकास भी हुआ | प्रकृति ने विभिन्न प्रयोग किये | एक कोशीय जीव से बहुकोशीय जीव ...जल से ....स्थल पर अवतरण ...कीट -कृमि के अवतरण तक प्रकृति ने संख्या व सामूहिकता के बल पर
विकास का ढांचा अपनाया परन्तु सामूहिकता से वैयक्तिक गुणों का ह्रास हुआ एवं जीव की मूल जैविक प्रेरणा समाप्त प्राय हुई जिसके कारण यंत्रवत कार्य से उनका विकास रुक गया | कीट व कृमि आज विद्यमान तो हैं परन्तु उनका विकास पचास करोड़ वर्ष पहक्ले रुक गया |
आगे रीढधारी जंतुओं में ...मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी व स्तनपायी हैं | प्रथम चार अंडज हैं , स्तनपायी पिंडज | प्रथम तीन -मत्स्य, उभयचर, सरीसृप आदि भी संख्या के बल पर विकास का प्रतिमान हैं , वे एक ही समय में हज़ारों अंडे देते हैं परन्तु माँ को पता नहीं होता की कहाँ दिए , कितने दिए, एक अंधी चेतना , अचेतन प्रवृत्ति के वश होकर....कई बार वह स्वयं अपने अंडे खाजाती है | वे अपने अनुभवों से सीखते हैं कुछ स्मृति भी होती है परन्तु सिर्फ स्वयं तक मृत्यु के उपरांत वह समाप्त होजाती है |
.तत्पश्चात प्रकृति ने एक अन्य प्रयोग किया...शक्ति के बल का ...कि शायद संघर्षमय संसार में शक्तिशाली जीव अधिक टिके....विशालकाय दांत- नख व जिरह-वख्तर युक्त जीव डायनासोरों का आविर्भाव हुआ जो सरीसृप वर्ग के ही थे , परन्तु समय के अनुसार वे भी नष्ट होगये | प्रयोग असफल रहा |
तब सृष्टि में प्रकृति ने एक नया आयाम उत्पादित किया, जो क्रांतिकारी था, एक अद्वित्तीय तत्व ....नए भाव तत्व स्नेह का आविर्भाव हुआ | जो पक्षी व स्तनपायी जीवों में हुआ | पक्षी घोंसला बनाकर अण्डों को सेते हैं, उनकी देखभाल -रक्षा करते हैं | बच्चा जन्म के समय कितना असहाय व निर्वल होता है परन्तु माँ-बाप की सुरक्षा में विकासमान रहता है | स्तनपायी चौपायों में भी यही भाव पाया जाता है | मनुष्य का बच्चा तो काफी समय तक निरीह रहता है, निर्बल ...पक्षी जिसतरह दाना छोड़कर घोंसले के लिए तिनका उठाकर दुगुना श्रम करते हैं, घूमना छोड़ अंडे को सेते हैं, स्वयं न खाकर बच्चे को देते हैं .....पशु उसे साथ साथ रखते हैं रक्षा करते हैं, खाना-चारा खिलाते हैं ...उसी प्रकार मनुष्य के माँ-बाप उसे पालते हैं, खाना देते हैं, जीना सिखाते हैं | बच्चे से यह लगाव, अभिन्नता का भाव उसको भी स्नेह, ममता ,त्याग आदि भाव-गुणों को सिखाता है | स्नेह भाव से ही अनेक भाव व गुण उत्पन्न होते हैं , ममता,परिवार , कुटुंब, समाज , राष्ट्र के भाव व समाज -निर्माण के साथ विकास के अनन्य भाव बनाते हैं |
पक्षी व स्तनपायी अपने अनुभव अगली पीढी को देजाते हैं , पीढी दर पीढी संचित होते हैं एवं भाव उनके साथ संलग्न होजाते हैं | यही संस्कार या जेनेटिक गुणबन जाते हैं | यह विकासवाद का क्रम है |
इसीलिये पुरा- भारतीय दर्शन में कर्मवाद व सदाचरण के उपाख्यान का महत्व है | हम जैसा कर्म व आचरण करते हैं वे संचित होकर पीढी-दर पीढी जाते हैं एवं समाज व सभ्यता के उन्नतोन्नत विकासवाद की सीढ़ी बनते हैं | मानव में यह भाव विभिन्न भाव-रूपों में अपने सर्वश्रेष्ठ उपादानों के रूप में विकसित हुआ है । इसीलिये मानव सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है ।
यूं तो यह मानव, प्रकृति के सर्वोच्च -गुण संपन्न जीव का विकास है , परन्तुं ' ऋग्वेद के ' नेति-नेति ...' के अनुसार देखें आगे प्रकृति क्या नवीन प्रयोग करती है....शायद महामानव के विकास का | परन्तु यह निश्चय है कि यह भी भाव तत्वों के विकास पर ही आधारित होगा ...शायद ..स्नेह...स्नेह ..और स्नेह ....प्राणी का प्राणी के प्रति ....ऋग्वेद के सर्वश्रेष्ठ मन्त्र----
" समानी अकूती समानी हृदयानि वा |
समामस्तु वो मनो यथा सुसहामती || "
के अनुसार |
सृष्टि के विकास में भाव-तत्व का अत्यधिक महत्त्व है | यही भाव तत्व -चेतन का महत्वपूर्ण गुण है | यद्यपि पाश्चात्य विचार-दर्शन व अधुना विज्ञान में चेतन सिर्फ शरीर में ही खोजा जा सकता है, परन्तु भारतीय विचारधारा व दर्शन में चेतन सदैव उपस्थित रहता है व जड़, जीव ,जंगम सभी में व्यक्त होता है | वह ब्रह्म की भाँति असद से सद, अव्यक्त से व्यक्त होता रहता है | 'कण कण में भगवान ' इसीलिये कहा गया| सृष्टि महाकाव्य में कहा गया है....
"श्रुति दर्शन अध्यात्म बताता ,
चेतन रहता सदा उपस्थित ;
इच्छा रूप में परब्रह्म की
मूल चेतना सभी कणों की,
जो गति बनकर करे सर्जना ;
स्वयं उपस्थित हो कण कण में ||" ......(.सृष्टि महाकाव्य -८/३१ )..
जीव व जड़-जंगम का मूल अंतर है जीव में भाव तत्व की उपस्थिति | विज्ञान के अनुसार -जीव की उत्पत्ति के बाद उसमें भावों आदि की अनुभव के उपरांत उत्पत्ति हुई | भारतीय विचार धारा के अनुसार -भाव तत्वों की सृष्टि पहले हुई, वे सदैव उपस्थित चेतन के रूप में प्रत्येक जीव में प्रवेश करते हैं | स्नेह इस भाव-तत्व समूह का सबसे मूल भाव है , जो 'एकोहं बहुस्याम ' के रूप में ब्रह्म की ईषत-इच्छा के रूप में सृष्टि का मूल आधार बनता है | यही स्नेह प्रकृति के विकास के क्रमिक प्रयोगों में मानव -विकास व सभ्यता के विकास का मूल आधार है |
गर्म जल के श्रोतों की गहराई में जीव की प्रथम आहट- गुनगुनाहट -फुनफुनाहट ( या अंतरिक्ष से जीव के पृथ्वी पर उतरने ) से लेकर मानव के विकास तक यह विकास सिर्फ शरीर में ही नहीं अपितु प्रवृत्तियों , मन व भावों का निर्माण व विकास भी हुआ | प्रकृति ने विभिन्न प्रयोग किये | एक कोशीय जीव से बहुकोशीय जीव ...जल से ....स्थल पर अवतरण ...कीट -कृमि के अवतरण तक प्रकृति ने संख्या व सामूहिकता के बल पर
विकास का ढांचा अपनाया परन्तु सामूहिकता से वैयक्तिक गुणों का ह्रास हुआ एवं जीव की मूल जैविक प्रेरणा समाप्त प्राय हुई जिसके कारण यंत्रवत कार्य से उनका विकास रुक गया | कीट व कृमि आज विद्यमान तो हैं परन्तु उनका विकास पचास करोड़ वर्ष पहक्ले रुक गया |
आगे रीढधारी जंतुओं में ...मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी व स्तनपायी हैं | प्रथम चार अंडज हैं , स्तनपायी पिंडज | प्रथम तीन -मत्स्य, उभयचर, सरीसृप आदि भी संख्या के बल पर विकास का प्रतिमान हैं , वे एक ही समय में हज़ारों अंडे देते हैं परन्तु माँ को पता नहीं होता की कहाँ दिए , कितने दिए, एक अंधी चेतना , अचेतन प्रवृत्ति के वश होकर....कई बार वह स्वयं अपने अंडे खाजाती है | वे अपने अनुभवों से सीखते हैं कुछ स्मृति भी होती है परन्तु सिर्फ स्वयं तक मृत्यु के उपरांत वह समाप्त होजाती है |
.तत्पश्चात प्रकृति ने एक अन्य प्रयोग किया...शक्ति के बल का ...कि शायद संघर्षमय संसार में शक्तिशाली जीव अधिक टिके....विशालकाय दांत- नख व जिरह-वख्तर युक्त जीव डायनासोरों का आविर्भाव हुआ जो सरीसृप वर्ग के ही थे , परन्तु समय के अनुसार वे भी नष्ट होगये | प्रयोग असफल रहा |
तब सृष्टि में प्रकृति ने एक नया आयाम उत्पादित किया, जो क्रांतिकारी था, एक अद्वित्तीय तत्व ....नए भाव तत्व स्नेह का आविर्भाव हुआ | जो पक्षी व स्तनपायी जीवों में हुआ | पक्षी घोंसला बनाकर अण्डों को सेते हैं, उनकी देखभाल -रक्षा करते हैं | बच्चा जन्म के समय कितना असहाय व निर्वल होता है परन्तु माँ-बाप की सुरक्षा में विकासमान रहता है | स्तनपायी चौपायों में भी यही भाव पाया जाता है | मनुष्य का बच्चा तो काफी समय तक निरीह रहता है, निर्बल ...पक्षी जिसतरह दाना छोड़कर घोंसले के लिए तिनका उठाकर दुगुना श्रम करते हैं, घूमना छोड़ अंडे को सेते हैं, स्वयं न खाकर बच्चे को देते हैं .....पशु उसे साथ साथ रखते हैं रक्षा करते हैं, खाना-चारा खिलाते हैं ...उसी प्रकार मनुष्य के माँ-बाप उसे पालते हैं, खाना देते हैं, जीना सिखाते हैं | बच्चे से यह लगाव, अभिन्नता का भाव उसको भी स्नेह, ममता ,त्याग आदि भाव-गुणों को सिखाता है | स्नेह भाव से ही अनेक भाव व गुण उत्पन्न होते हैं , ममता,परिवार , कुटुंब, समाज , राष्ट्र के भाव व समाज -निर्माण के साथ विकास के अनन्य भाव बनाते हैं |
पक्षी व स्तनपायी अपने अनुभव अगली पीढी को देजाते हैं , पीढी दर पीढी संचित होते हैं एवं भाव उनके साथ संलग्न होजाते हैं | यही संस्कार या जेनेटिक गुणबन जाते हैं | यह विकासवाद का क्रम है |
इसीलिये पुरा- भारतीय दर्शन में कर्मवाद व सदाचरण के उपाख्यान का महत्व है | हम जैसा कर्म व आचरण करते हैं वे संचित होकर पीढी-दर पीढी जाते हैं एवं समाज व सभ्यता के उन्नतोन्नत विकासवाद की सीढ़ी बनते हैं | मानव में यह भाव विभिन्न भाव-रूपों में अपने सर्वश्रेष्ठ उपादानों के रूप में विकसित हुआ है । इसीलिये मानव सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है ।
यूं तो यह मानव, प्रकृति के सर्वोच्च -गुण संपन्न जीव का विकास है , परन्तुं ' ऋग्वेद के ' नेति-नेति ...' के अनुसार देखें आगे प्रकृति क्या नवीन प्रयोग करती है....शायद महामानव के विकास का | परन्तु यह निश्चय है कि यह भी भाव तत्वों के विकास पर ही आधारित होगा ...शायद ..स्नेह...स्नेह ..और स्नेह ....प्राणी का प्राणी के प्रति ....ऋग्वेद के सर्वश्रेष्ठ मन्त्र----
" समानी अकूती समानी हृदयानि वा |
समामस्तु वो मनो यथा सुसहामती || "
के अनुसार |
1 टिप्पणी:
ये सब मौलिक गुण ही कहलाये जायेंगे। सुन्दर विवरण।
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