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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

सृष्टि महाकाव्य--षष्टम सर्ग, ब्रह्मान्ड खन्ड......डा श्याम गुप्त......

  


                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                             सृष्टि महाकाव्य-(ईषत- इच्छा या बिगबेंग--एक अनुत्तरित उत्तर )--

षष्टम सर्ग, ब्रह्मान्ड खन्ड....




     -------वस्तुत सृष्टि हर पल, हर कण कण में होती रहती है, एक सतत प्रक्रिया है , जो ब्रह्म संकल्प-(ज्ञान--ब्रह्मा को ब्रह्म द्वारा ज्ञान) ,ब्रह्म इच्छा-एकोहं बहुस्याम ...( इच्छा) सृष्टि (क्रिया- ब्रह्मा रचयिता ) की क्रमिक प्रक्रिया है --किसी भी पल प्रत्येक कण कण में चलती रहती है, जिससे स्रिष्टि प्रत्येक पदार्थ की उत्पत्ति होती है प्रत्येक पदार्थ नाश(लय-प्रलय- शिव ) की और प्रतिपल उन्मुख है
 
(यह महाकाव्य अगीत विधामें आधुनिक विज्ञान ,दर्शन वैदिक-विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथमरचित महाकाव्य है , इसमें -सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड जीवन और मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषयकोसरल भाषा में व्याख्यायित कियागया है | इस .महाकाव्य को हिन्दी साहित्य की अतुकांत कविता कीअगीत-विधा' के छंद - 'लयबद्ध षटपदी अगीत छंद' -में ' निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है).... ...... रचयिता --डा श्याम गुप्त ...
                      ---पन्चम सर्ग में जटिल भौतिक व रासायनिक क्रियाओं द्वारा मूल पदार्थ बनने की वैदिक विज्ञान व आधुनिक विज्ञान के मत वर्णित किये गए थे. -- .प्रस्तुत  षष्टम सर्ग -ब्रह्माण्ड खंड में बने हुए पंचौदन अजः ( मूल पदार्थ ) से आगे जड़ व जीव जगत की उत्पत्ति कैसे हुई  इसका प्रारम्भिक रूप वर्णित किया जाएगा.
१-
ईक्षण तपसे हिरण्यगर्भ के ,
भू, सावित्री भाव प्रकृति से-
सब जग रूप पदार्थ बन गए |
भुवः , गायत्रीभाव उसीका,
अपरा-परा अव्यक्त रूप में,
चेतन सृष्टि का मूल रूप था||
२-
पराशक्ति से परात्पर की,
प्रकट स्वयंभू, आदि शम्भु थे|
अपरा-शंभु संयोग हुआ जब,
व्यक्त भाव,महतत्व बन गया|
हुआ विभाजित व्यक्त पुरुष में,
एवं व्यक्त आदि-माया में ||
३-
पालक, धारक और संयोगक,
संहारक लय सृजक रूप में;
महाविष्णु,महाशिव और ब्रह्मा,
बन असीम संकल्प शक्ति सब,
प्रकट हुए उस असीम से वे,
व्यक्त पुरुष से, आदि-विष्णुसे ||
४ -
पालक, धारक, यौगिक ऊर्जा,
मूल, संहारक, सृज़क, स्फुरणा,
रमा  उमा  सावित्री७  रूपा;
सभी शक्तियां प्रकट होगईं |
स्वयं भाव में आदि-शक्ति से ,
व्यक्त आदि-माया, अपरा की ||
५-
महाविष्णु-रमा संयोग से,
प्रकट हुए चिद-बीज अनंत;
फैले थे जो परम-व्योम में,
कण कण में बन कर हेमांड |
उस असीम के, महाविष्णु के,
रोम रोम में बन ब्रह्माण्ड ||
६-
महाविष्णु के स्वांशतत्व से,
बाम भाग से विष्णु-चतुर्भुज,
विभिन्नांश१० भ्रू-मध्य भाग से,
शिव-ज्योतिर्लिंग, लिंग-महेश्वर |
दक्षिण विभिन्नांश से ब्रह्मा,
प्रकट हुए प्रत्येक अंड में ||
७-
यही ब्रह्म, अंगुष्ठ-ब्रह्म११, बन-
रूप, आत्मा  जीवात्मा   का |
स्थित  है,  प्रत्येक  देह में,
कहलाता है, सर्व-महेश्वर :
आत्म-तत्व प्रत्येक जीव का,
ह्रदयाकाश में , घटाकाश में ||
८-
महाविष्णु शिव ब्रह्मा माया,
दृव्य, प्रकृति, जल, वायु, ऊर्जा,
मन, आकाश सब देव निहित थे;
सूक्ष्म रूप प्रत्येक अंड में |
अपरा, परा, अहं सत्तामय ,
थी स्वतंत्र सत्ता१२ प्रत्येक की ||
९-
महाकाश ही  आदि-विष्णु है,
रोम-रोम कण रूप भुवन का |
प्रकृति,त्रिगुणमय-सत तम रज की,
माया जीव विष्णु ब्रह्मा शिव;
सूक्ष्म भाव हैं परम-तत्व के,
स्थित कण-कण, रोम-रोम में ||
१०-
अब विज्ञान भी यही मानता,
ऋणकण, धनकण, उदासीनकण;
शक्ति गति निर्वात परिधि के;
सहित बने , परमाणु कण सभी |
सूक्ष्म रूप हैं सभी तत्व के,
अखिल विश्व में,चिदाकाश१३के ||
११-
और असीम उस महाकाश में ,
हैं असंख्य ब्रह्माण्ड उपस्थित |
धारण करते हैं, ये सब ही,
अपने अपने सूर्य-चन्द्र सब,
अपने अपने गृह-नक्षत्र सब;
है स्वतंत्र सत्ता प्रत्येक की ||
१२-
"एको सद विप्राः वहुधा वदन्ति "
भिन्न -भिन्न सब रूप उसीके |
इसीलिये कहते हैं हम सब,
अखिल विश्व कण-कण में समाया |
कण-कण में भगवान बसा है,
कण-कण में भगवान की माया ||
१३-
सभी जीव में वही ब्रह्म है,
मुझमें- तुझमें वही ब्रह्म है |
उसी एक को मान के सब में,
जान उसी को हर कण, कण में;
तिनके का भी दिल न दुखाये ,
सो प्रभु को परब्रह्म को पाए || 
                                                 



{ कुंजिका -- १= व्यक्त ब्रह्म, हिरण्यगर्भ का सृष्टि संकल्प रूपी तप ; २= व्यक्त ईश्वर का सावित्री(भू) अर्थात प्रकृति भाव जिससे समस्त जड़ ( जीव व जंगम सभी में ) तत्वों का निर्माण होता है.. ; ३= गायत्री(भुव:) , अर्थात ईश्वर का चेतन प्राणमय जिससे सभी चेतन तत्वों का निर्माण होता है; ४= गायत्री , चेतन रूप के व्यक्त शक्ति (अपरा) और पुरुष (परा ) रूप ; ५= मूल व्यक्त तत्व ; ६= वही व्यक्त ईश्वर , व्यक्त आदि पुरुष ; ७= त्रिदेवों की प्रेरक त्रिविध शक्तियां ; ८= मूल ब्रह्माण्ड ,अंड हेमांड, आदि -बीज रूप में , जो सारे अंतरिक्ष में असंख्य ब्रह्माण्ड के रूप में फैले रहते हैं ; ९= मूल शरीर के तत्व से; १०= पर्वर्तिति या अन्य छाया शरीर से ; ११= अन्गुष्ठाकार ब्रह्म , जो लय व सृष्टि के बीच अश्वत्थ-पत्र पर महाअर्णव मेंतैरता हुआ स्थित रहता है | वही पुरुष में, ह्रदयाकाश में,अंतरात्मा के रूप में स्थित होता है|--श्वेताश्वरोपनिषद ३/१३..; १२=प्रत्येक बीजांड,अंड, या ब्रह्माण्ड -अपने अपने सम्पूर्ण सौरमंडल सहित स्वतंत्र सत्ता रूप, स्वतंत्र सृष्टि रूप , जो असंख्य संख्या में सारे अंतरिक्ष में फैले रहते हैं ; अब आधुनिक विज्ञान भी  स्वीकार करता है कि असंख्य ब्रह्माण्ड हैं जिनके समस्त सौर मंडल भी अपने अपने होते हैं | ; १३= अर्णव , महाकाश, अनंत अंतरिक्ष, शून्याकाश , सुन्न भवन, ईथर, क्षीर सागर .}



                                                   ---क्रमश : ..सप्तम सर्ग..अगले अंक में .







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