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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

संघात्मक समीक्षा.... पुस्तक ---अगीतमाला

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                                              संघात्मक समीक्षा.... पुस्तक ---अगीतमाला





                     
पुस्तक नामअगीत-माला (अगीत काव्य संग्रह), लेखकश्री पार्थो सेन, मूल्य १००/- रुपये
प्रकाशक अखिल भारतीय अगीत परिषद् , -३८८५, राजाजी पुरम,लखनऊ, दू भा.-०५२२-२४१४८१७
प्रकाशन वर्ष२०१३ ., पृष्ठ संख्या -४८ ...आवरण -डा योगेश गुप्त, समीक्षकडा श्याम गुप्त  |

               संस्कृत साहित्य की तादाम्यता में जब निराला जी ने जब कविता को तुकान्तबद्धता की अनिवार्यता से मुक्त किया तो विधिवत मुक्त-छंद अतुकांत कविता की स्थापना हुई | यद्यपि तत्कालीन कवि -महाकवि मुक्तछंद कविता की ओर कदम बढा चुके थे | मैथिलीशरण गुप्त जी का सिद्धराज इसका उदाहरण है| निराला युग में अतुकांत कवितायें लम्बी-लम्बी वर्णनात्मक होती थीं | उनके छंदों को रबरछंद, केंचुआछंद आदि कहा गया| बढ़ती हुई आधुनिकता, भौतिकता, यांत्रिकता के काल में लम्बी-लम्बी कविता के पठन-पाठन समझने का समय जनसाधारण के पास नहीं रहा अतः संक्षिप्तता, अभिधेयता स्पष्ट भाव-सम्प्रेषणता कविता की आवश्यकता बनी|  छंदीय-काव्य में भी मुक्तकों आदि का अधिकाधिक चलन होने लगा| इसी आधुनिक आवश्यकता को अतुकांत कविता में ग्रहण करते हुए डा रंगनाथ मिश्रसत्य ने १९६६ मेंअगीत को जन्म दिया जो -से १० पंक्तियों का अतुकांत मुक्त-छंद है | जिसे अनेक अगीतकर कवियों द्वारा अनेक रचनाओं द्वारा  एवं श्री जगतनारायण पांडे डा श्याम गुप्त द्वारा खंड-काव्य महाकाव्यों की रचना द्वारा समृद्ध किया गया| डा श्याम गुप्त द्वारा अगीत छंद विधानअगीत साहित्य दर्पण लिख कर अगीत-विधा के शास्त्रीय पक्ष को बल प्रदान किया गया|
           समीक्ष्य पुस्तक अगीतमाला के रचनाकार, अगीतकार समीक्षक पार्थोसेन का अगीत की स्थापना अग्रगामिता में विशिष्ट सहयोग है| डा सत्य के प्रमुख सहयोगियों में से एक, अगीत गोष्ठियों के संयोजक संघात्मक-समीक्षा पद्धति के समीक्षक के रूप में उनका कृतित्व किसी से छिपा नहीं है | वे क्रांतिकारी तारकनाथ के भतीजे हैं अतः साहित्य कविता में क्रांतिकारी, प्रगतिवादी सामयिक सामजिक परिप्रेक्ष्य से सम्बंधित विचार उनकी कविता के मूल में हैं एवं वही विचार भाव प्रस्तुत कृति अगीतमाला में भी मुखर हुए हैं| जो प्रथम मुख पृष्ठ पर ही आव्हान उद्बोधन से प्रकट होता है ---
अगीत ,
गीतों का पहला मीत
शुरू हुई जहां से
रचनाओं की रीत
आओ रचें
आज एक अगीत
                  समर्पण में अतुकांत कविता के प्रणेता महाप्राण निरालाजी एवं अपने काव्यगुरु अगीत के संस्थापक डा रंगनाथ मिश्र सत्य के चित्र एवं नमन है.. शीर्षक से अगीत-विधा में प्रथम खंड-काव्य के रचयिता स्व.जगत नारायण पांडे एवं प्रथम अगीत छंद विधान के रचयिता डा श्याम गुप्त के चित्र दिए गए हैं जो रचयिता के अगीत के प्रति निष्ठा, लगन, श्रृद्धा समर्पण के परिचायक हैं| डा उषा गुप्ता पूर्व रीडर हिन्दी विभाग, .वि.वि द्वारा लिखी गयी भूमिका में स्पष्ट कथन है कि प्रयोगवाद के उपरांत हिन्दी कविता में ...अगीत ने एक जोरदार धमाके के साथ एक प्रवाह, एक आन्दोलन के रूप में अपनी पहचान बनाई है |” डा रंगनाथ मिश्र का कथन है कि .. मैं उनके अगीतों से पूरी तरह संतुष्ट हूँ ... संतुलित समीक्षा पद्धति पर अपनी पुस्तक गुण-दोष कहानी संग्रह कमली के रचनाकार पार्थोसेन का प्रस्तुत रचना में अपनी बात मेंविचार है कि .....हमारे वेदों में ऋचाएं अतुकांत ही हैं |‘
                  अगीतमाला में लगभग १०८ अगीत रचनाएँ हैं जो पारंपरिक अगीत-छंद नवीन-सृजित नव-अगीत छंदों में हैं एवं जीवन की विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के रंगों से उत्कीर्ण किये गए हैं जिनमें उनकी अपनी स्वानुभूति की अभिव्यक्ति अभिव्यंजना है| उनमें समस्याओं के समाधान की दिशा भी प्रस्तुत की गयी है जो अगीत का एक प्रमुख गुण है |
व्यवहार,
कभी चूकने वाला अस्त्र
मानव समाज में |”

               बंगला-भाषी होते हुए भी आपकी हिन्दी मंजी हुई है, उर्दू के शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं| मूलतः बोलचाल की सामान्य सरल भाषा का प्रयोग है जो विषयानुसार कथ्य कविता को गति उचित भाव सम्प्रेषण प्रदान करती है| नए शब्द, नए अर्थ नवीन भाव भे परिलक्षित होते हैं| दूरस्थ भाव को भी देखिये कितनी स्पष्टता सक्षमता से कहा गया है ---
निहारूंगा
मैं तुझे अपलक,
जैसे एक अबोध तकता है
इन्द्रधनुष एकटक |”
                  विभिन्न विषयों पर रचे गए अगीत उनकी दार्शनिक मान्यताओं को भी प्रदर्शित  करते हैं ..
रूप,
पड़ा हुआ केले का छिलका
जिसका पाँव पड़ा
वह फिसला |”
                  बहुत से क्रांतिकारी विचार समाज व्यक्ति के अंतर्संबंधों नैतिकता को कितनी सहज़ता से कहा गया है...जो अगेत की विशेषता कृतिकार की सफलता है...
समाज
दीमक लगी लकड़ी 
मनुष्य
घुना गेहूं |”
                नव-प्रगति, नवोन्नति  पर स्पष्ट  व्यंजना है कि ....
तिमिर का शिविर
अब यहाँ नहीं लगता
क्योंकि ,
अब भोर होगई है|”   
             शक्ति ज्ञान, बुद्धिजीवी लोग,शासन-जनता, राजा-प्रजा के अमंवय से ही उचित समाधान होगा----कलम,
यदि माँ सरस्वती का वरदान है, तो
तलवार
माँ दुर्गा की आन है;
दोनों का मिलाप ही
महायज्ञ है |” 
               कवि की स्थापना है कि आतंकवाद के चक्रीय दुश्चक्र है, इसे तोड़ना ही होगा, एक ही पक्ष दोषी नहीं, सामाजिक अन्याय विषमता भी दोषी हैं ....
आतंक से
आतंकवादी
फिर आतंकबादी से
आतंक |” 
                  भाषा अभिधात्मक होते हुए भी अर्थ लक्षणा अर्थ-व्यंजना का यथास्थान प्रयोग हुआ है जो कथ्य अर्थप्रतीति की स्पष्टता प्रदान करती है | यथास्थान भाषालन्कारों का भी प्रयोग हुआ है| अनावश्यक ठूंसे हुए अलंकारों, व्यंजनाओं का प्रयोग नहीं है जो विषयगत दुरूहता अस्पष्टता को प्रश्रय देते हैं| पुस्तक की छपाई, कम्पोजिंग एवं उत्तम श्रीवास्तव द्वारा शब्द-संयोजन, डा योगेश द्वारा मुख-पृष्ट चित्रांकन प्रभावी है | लेखक के सम्मान से सम्बंधित चित्र भी स्पष्ट समीचीन हैं| पीछे के पृष्ठ पर सूर्यप्रसाद मिश्र हरिजन द्वारा कृतिकार का विवेचनपूर्ण परिचय भी उल्लेखनीय है |
                  विषय वैविध्य से परिपूर्ण, कला भाव पख की आवश्यकतानुसार प्रस्तुति अगीत की विशिष्टताओं से परिपूर्ण यह कृति अगीतमाला एक सुन्दर प्रभावशाली सार्थक कृति है आशा है हिन्दी जगत में इसका स्वागत होगा | 
                                                 डा श्याम गुप्त
                                       सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२ 



 

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