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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ ....भाव अरपन ..नौ ..अगीत .. ....डा श्याम गुप्त....

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



            ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ .......डा श्याम गुप्त ...
              
                     मेरे शीघ्र प्रकाश्य  ब्रजभाषा काव्य संग्रह ..." ब्रज बांसुरी " ...की ब्रजभाषा में रचनाएँ  गीत, ग़ज़ल, पद, दोहे, घनाक्षरी, सवैया, श्याम -सवैया, पंचक सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, अगीत, नवगीत आदि  मेरे अन्य ब्लॉग .." हिन्दी हिन्दू हिंदुस्तान " ( http://hindihindoohindustaan.blogspot.com ) पर क्रमिक रूप में प्रकाशित की जायंगी ... .... 
        कृति--- ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में विभिन्न काव्यविधाओं की रचनाओं का संग्रह )
         रचयिता ---डा श्याम गुप्त 
                     ---   सुषमा गुप्ता 
प्रस्तुत है .....भाव अरपन ..नौ....अगीत ....

सुमन १....सुख ..
इक दूजे सौं
दूरि है जावे ते 
हिया की दूरी घटि जावे है |
वियोग में देर लौं
राह देखिबे के बाद 
मिलन कौ सुख 
और हूँ अनूठौ है जावै है |
सुमन ३-तिहारे बोल....
तिहारे बोल 
बेरि बेरि काननि में आवैं हैं ;
रुबावत हैं
मनावत हैं
समुझावत हैं 
अबिनासी अनहद नाद की लौं 
बेरि बेरि
तिहारी सुधि दिलावें हैं  |
सुमन ५ - उपलब्धि ...
मन के कोरे कागद पै
तिहारी छवि
जोत किरन लौं लहराई 
एक नई कविता
खिलि  आई ,
पुष्पित है आई |
सुमन ८ -अमर ....
मरिबे  के बाद, जीव-
जदपि छूटि जावै है -
बंधन ते, जगत ते, पर -
कैद है जावै है,
मन में,
आत्मजननि के, अपुनि जनन के,
सुधि रूपी बंधनहाँ में, और-
है जावै है ...अमर |
 
 

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (06-07-2013) को <a href="http://charchamanch.blogspot.in/ चर्चा मंच <a href=" पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद शास्त्री जी....

Ankur Jain ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति।।।

shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद अंकुर.....