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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

मेरी नवीन ओन लाइन प्रकाशित पुस्तक--विविध वंदनायेँ --डॉ. श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 





मेरी नवीन कृति--- ओन लाइन
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-- विविध वंदनायेँ ---
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** 2
वंदनाएँ ( डॉ.श्याम गुप्त, सुषमा गुप्ता द्वारा रचित वंदनाएँ )
प्रकाशक—सुषमा प्रकाशन, लखनऊ
प्रथम संस्करण--मार्च 2026ई.
मूल्य –250/-
सर्वाधिकार—लेखकाधीन
रचयिता--- डॉ.श्यामगुप्त, सुषमा गुप्ता
सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना कोलोनी,
लखनऊ-२२६०१२
मो-९४१५१५६४६,
ईमेल – drgupta04@gmail.com
मुखपृष्ठ –डॉ.श्यामगुप्त
---------------------
Vandanaye( Hymns in praying to GODS )
Writer--- Dr Shyam Gupta , Sushama Gupta
Sushyanidi, k-348, Ashiyana ,
Lucknow-226012 UP (India) Mo.9415156464,
Email-drgupta04@gmail.com –
Blog-https//shyamthot.blogspot.com
Published by—Sushama prakashan, Lucknow .

3.
आभार
जिनकी वंदना से हम वंदना करने योग्य हो पाते हैँ
उस तेजपुन्ज परब्रह्म की प्रेरणा एवं माँ वाग्देवी की कृपा-भिक्षा के आभार से कृत-कृत्य हम उनकी सुप्रेरणा द्वारा इस कृति की परिकल्पना व कृतित्व में सहायक हुए सभी पुरा, पूर्व व वर्तमान कवियों, आचार्यों, साहित्याचार्यों, काव्याचार्यों, विद्वानों व रचनाकारों का गुरुवासरीय गोष्ठी के संगी साथियोँ के आभारी हैँ जिनके विचारों व भावों ने इस कृति में समाहित होकर हमेँ कृत-कृत्य किया ।
डॉ.श्याम गुप्त
सुषमा गुप्ता
4. समर्पण
प्रथम वंदनीय देव माता- पिता को
जिनकी कृपा आश्रय में प्रथम शब्द मुखोच्चारित हुआ तथा अक्षर ज्ञान की प्राप्ति हुई ।
पूज्य पिताजी श्री जगन्नाथप्रसाद गुप्ता
एवं
पूज्य माताजी श्रीमती रामभेजी देवी गुप्ता




5. अनुक्रमणिका
समर्पण
आभार
वंदनाएँ –
अ. देवी माँ की वंदनाएँ
1. माँ का आवाहन
2. माँ ! तेरे दर हम आये
3. तेरे पूजन को हे मैया
4. तुम तुम और तुम
5. माँ का वंदन --- दोहे
6. वंदना के स्वर --हरिगीतिका छंद—
ब. सरस्वती वंदनाएँ
1. माँ करो अवतरण
2. भारती सरस्वती शारदा
3. वाग्देवी
4. मंगला चरण
5. माँ शारदे! कृपा दृष्टि बरसाओ
6. वन्दना के स्वर ग़ज़ल में
7. वाणी वंदना
8. वाणी वंदना – अतुकांत गीत
9. वैदिक वाणी वंदना
10. सरस्वती वंदना - आगमन करिये
11. माँ लिखती तो सब कुछ तुम हो
12. सरस्वती वंदना –चौपाई
13. वन्दना -हंसवाहिनी वीणा वादिनि
14. हे मानस की देवि
15. हे मातु ज्ञान दायिनी
16. सरस्वती वंदना - धवल मराल पै
17. माँ वाणी! माँ सरस्वती! माँ शारदे
18. वन्दना –नव कल्पना
स. अन्य वंदनाएँ
1. गणेश वंदना
2. परम सत्ता नमन
3. आवाहन
4. वन्दनायेँ 11 .
5. ईश प्रार्थना
6. अरचना
7.अर्चन अर्पण
8. प्रभु वंदना
9.ईषत अहँ वंदना
10.उमा-महेश वंदना....
11.शम्भु –वंदना
12. राधाकृष्ण वंदना -1
13. राधा-कृष्ण वन्दना –दोहे
14. कार्तिकेय वन्दना
15. पवन कुमार
16.माँ भारती वन्दना ...
17.रति-अनंग वन्दना ......
18.मेरा कान्हा
19.मानस वन्दना ....
20.प्रेम तत्व वंदना ...
21.प्रेमी युगल वन्दना
22. मेरे गीत तुम्हारा वंदन

 

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

फिर उठी बात गीतों की --- सुषमा गुप्ता.----

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

   -फिर उठी बात गीतों की --- सुषमा गुप्ता.----


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             -डा श्याम गुप्त के  -गीत संग्रह ---"तुम तुम और तुम "में लिखा गया प्राक्कथन ---

                

----------- काव्य में सदैव नवीनता व सत्य के आग्रही डा श्यामगुप्त द्वारा सृजित कृतियों में सर्वदा एक अपनी विशिष्टता होती है | कृति-विषय एक विशिष्ट तारतम्यता लिए हुए होते हैं एवं प्रत्येक बार एक नवीनता लिए हुए |
---------उनके कृति-विषय मूलतः लौकिक तथ्य से होते हुए आध्यात्मिक स्तर पर उठते हुए पारलौकिकता तक पहुँचते हैं| वे मूलतः प्रेम के कवि हैं, साहित्यकार हैं| प्रेम उनके लिए संसार है, जीवन है, स्वांस हैं, उच्छवास है, सामाजिकता है , ईश्वर है, उनका प्रेम-रथ लौकिकता से होते हुए दिव्यता, दर्शन व अध्यात्म तक प्रयाण करता है,
-------------यथा प्रथम कृति ---‘काव्यदूत----‘ बालमन की स्मृतियों से कैशोर्य, युवावस्था, गृहस्थ, प्रौढावस्था की जीवन भंगिमाओं की कविताओं-गीतों से होते हुए दर्शन, अध्यात्म, पारलौकिकता से मुक्ति, मोक्ष तक की ऊंचाई तक जाते है |
------काव्य की विभिन्न विधाओं में रचित महाकाव्य ---प्रेमकाव्य---- में प्रेम के सभी रूपों का सांगोपांग वर्णन करते हुए उनका काव्य, लोक से होकर जीवन, दर्शन, अध्यात्म से मोक्षदा एकादश तक प्रयाण करता हुआ वेदान्त के अनुसार प्रेम के मूल “ मा विदिष्वावहै” तक जाता है |
---सृष्टि-महाकाव्य---- तो दर्शन, आधुनिक विज्ञान, वैदिक ज्ञान-विज्ञान, जीवन मूल्य व आदर्शों की समन्वित गाथा ही है | ----शूर्पणखा काव्य-उपन्यास---- में खलनायिका को चारित्रिक बुराइयों से नारी चरित्र की मानसिक भावभूमि की ऊंचाइयों तक पहुंचाया गया है| -----उपन्यास इन्द्रधनुष में----- नायक-नायिका प्रेम व आदर्श एवं स्त्री-पुरुष मैत्री के आध्यात्मिक व दार्शनिकता एवं निष्कामता के उच्च स्तर तक पहुँचते हैं|
--------हम दोनों द्वारा सम्मिलित रूप से रचित प्रथम कृति, ब्रजभाषा काव्य, ‘-----ब्रजबांसुरी----’ के १८ अध्याय, गीता के १८ अध्याय व ईशोपनिषद के १८ मन्त्रों से तादाम्य करते हैं|
----‘कुछ शायरी की बात होजाये’---- में भी दिल की बात से लेकर शब्द-ब्रह्म होते हुए ग़ज़ल व शायरी के भाव ‘वो कौन है’ व ‘नाद-अनाहत’ तक जाते हैं|
--------------------- नवीनता की बात करें तो सृष्टि-महाकाव्य में दुष्टजनों एवं तमाम अमूर्त भावों, अपरामाया, चिदाकाश, त्रिदेव, शास्त्र आदि की वन्दना करते हुए दिखाई देते हैं| प्रेमकाव्य में अध्यायों को सुमनांजलि एवं ब्रजबांसुरी में भाव-अरपन एवं उप-विषयों को सुमन आदि नए नाम से संबोधित करते हैं| शूर्पणखा खंडकाव्य को काव्य-उपन्यास का नवीन नाम दिया गया है |
-----काव्यजगत में बहुचर्चित, नकारात्मक व सकारात्मक दोनों रूपों में ही बहु-आलोचित अगीत-कविता को स्थिरता प्रदान हेतु आपने अगीत महाकाव्य, खंडकाव्य सृजन के साथ साथ ‘अगीत साहित्य दर्पण’ नाम से अगीत छंद-विधान का शास्त्रीय ग्रन्थ ही लिख डाला जो हिन्दी कविता में एक मील का पत्थर है |
------- ड़ा श्याम गुप्त द्वारा रचित प्रेम व श्रृंगार गीतों का प्रस्तुत संग्रह ----‘तुम तुम और तुम’---- इसी श्रृंखला की अगली कड़ी है | प्रस्तुत कृति में प्रेम व श्रृंगार के संयोग, वियोग भावों के साथ-साथ प्रेम, प्रेमी व प्रेमिका की विभिन्न मनोदशाएँ, स्मृतियां, भावों के संगम, अंतर्मन की संवेदनाओं का गीतों द्वारा सांगोपांग वर्णन किया गया है |
----- मानव वय की विविध अवस्थाओं के विभिन्न सोपानों बालमन, कैशोर्य, युवा व प्रौढ़ मन के, जीवन की विभिन्न परिस्थितियों, स्थितियों, घटनाओं, गार्हस्थ्य भावनाओं आदि के सभी रूमानी, रूहानी भाव, तात्विक प्रेमभाव, मनोभावों की सरस, सरल अभिव्यक्ति है|
-----वस्तुतः यह जीवन का काव्य है जिसमें प्रेम व श्रृंगार गीत होते हुए भी सदैव की भाँति लौकिकता के साथ अध्यात्म, दर्शन व जीवन तत्व-दर्शन की गहनता भी सर्वत्र बिखरी हुई है|
------------- जहां तक गीतों की बात है, आधुनिक युग में पारंपरिक गीतों पर प्रश्न चिन्ह लगाए जाते रहे हैं परन्तु प्रश्न उठाने वाले भूल जाते हैं कि प्रेम, श्रृंगार, भक्ति, पीड़ा आदि भाव मानव की मूलवृत्ति हैं
----प्रकृति में जब तक सौंदर्य है, नदियों में प्रवाह है, पक्षियों, पशु, बादलों, झरनों व जीवन-जगत में संवेदना का प्रवाह है, तब तक पारंपरिक गीतों का अस्तित्व रहेगा। भक्त कवियों ने आम जनता के भावों को वाणी दी।
-----यही कारण है कि कबीर रैदास, सूर, मीरा एवं तुलसी के भक्तिपरक गीत, बुल्लेशाह, बिहारी , रहीम के श्रृंगारपरक काव्य जिनमे प्रेम व आत्मिक श्रृंगार की झलक सर्वत्र विद्यमान है आज भी लोक जनमानस में समादृत हैं।

---------------------------भारतवर्ष में कजरी, होली, चैती, बिरहा आदि हिन्दी भाषी क्षेत्रों के प्रमुख प्रेम व श्रृंगार के लोकगीत हैं। सदियों से ये ग्रामगीत श्रुति परम्परा से एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को अवदान के रूप में मिलते गए हैं।
-----आज भी न तो इन गीतों के शब्दों एवं भावों में कोई विशेष परिवर्तन हुआ है और न ही इनकी गायन शैली में। ये गीत पारम्परिक धरोहर हैं जो भारतीय समाज व मानव-मन के कण्ठहार हैं।
-----कल भी ये गीत अपने इसी सहज रूप में भी बने रहेंगे। इनकी लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण कारण प्रेम अभिव्यक्ति के साथ साथ इनका गीत-तत्व भी रहा है।
--------------------- मेरे विचार में जहाँ तक प्रेम व श्रृंगार की बात है तो साहित्य मर्यादित श्रृंगार का पोषक होना चाहिए | श्रृंगार केवल मांसलता नहीं है अपितु हृदयाकाश की गहराइयों में उत्पन्न भावनाएं व विहरित सौन्दर्यमय अनुभूतियाँ हैं |
---- श्रृंगारिक रचना में नायिका द्वारा घरेलू वर्णन, लरिका, बिटिया, टूटी छान-छप्पर- मढैया आदि संवेदना का गीत तो हो सकता है परन्तु रसमयता व श्रृंगार नहीं | अत्यधिक खुलापन भी मर्यादाविहीन व असाहित्यिक प्रतीत होता है एवं श्रृंगार का आनंद भी तिरोहित ही रहता है |
-----श्रृंगार में शब्दावली, तथ्य, कथ्य इस प्रकार प्रस्तुत हों कि श्रृंगार का आनंद भी मिले एवं खुलापन भी न हो, न इतनी क्लिष्ट शब्दावली कि श्रृंगार का पता ही न चले | प्रस्तुत कृति में रचनाकार द्वारा इस तथ्य का यथासंभव सर्वत्र ध्यान रखने का प्रयास किया गया है |

----------------------- तकनीकी दुनिया, कम्प्यूटर, इंटरनेट, टेलीफोन, मोबाइल आदि के व्यवहार में आनेवाली शब्दावलियों के प्रयोग से गीत की रागात्मक कोमलता और संगीतात्मक तरलता की काफी क्षति हुई है |
----आज नयी कविता में ग्राम्य-जीवन, मजदूर, किसान, शोषण, दमन, बाजारवाद, भूमंडलीकरण, आर्थिक उदारीकरण, उपभोक्तावाद, सांप्रदायिकता-विरोध, आतंकवाद-विरोध, दलित चेतना, स्त्री-विमर्श, शासन विरोध, दिन-प्रतिदिन के सामायिक घटना-तत्वों-समाचारों के वर्णन, व्यक्तिगत दुखानुभूतियाँ जैसी तमाम समस्याओं की जटिल अनुभूतियों की अत्याधिक अभिव्यक्ति के कारण कविता से आज भावुक मन की अभिव्यक्ति या गाने गुनगुनाने की सौन्दर्यमय भावना की तरलता अंतर्धान होगई है जो पारंपरिक प्रेमगीतों, श्रृंगार-गीतों के रूप में मानव के मानसिक विश्रांति, सामाजिक श्रान्ति का उपाख्यान रूप थीं |
----------मेरा विश्वास है कि प्रस्तुत कृति इस शाश्वत गीत भावों की कमी को पूरा करने हेतु एक सक्षम प्रयास सिद्ध होगी |
                                                                                                              ---सुषमा गुप्ता




 

बुधवार, 23 मार्च 2016

आशियाना परिवार होली २३-३-१६ ...आशियाना, लखनऊ -- डा श्याम गुप्त...


                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

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आशियाना परिवार होली २३-३-१६ ...आशियाना, लखनऊ --


१. राधा कृष्ण पर फूलों से होली वर्षा करती हुई सुषमा गुप्ता ...२.राधा -कृष्ण के साथ सुषमा व नीलम का नृत्य ....३.डा श्याम गुप्त .....४.राधा-कृष्ण के साथ सुषमा व अन्य का होली नृत्य ....५. राधा-कृष्ण का माल्यार्पण ---सुषमा गुप्ता

 Drshyam Gupta's photo.

शुक्रवार, 29 मई 2015

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी २८-५-१५.... डा श्याम गुप्त ...

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                               साप्ताहिक गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी दी.२८-५-१५ को डा श्याम गुप्त के आवास , सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना कोलोनी, लखनऊ पर संपन्न हुई | 
                 घनाक्षरी छंदों में  वाणी वन्दना से गोष्ठी का प्रारम्भ करते हुए डा श्याम गुप्त ने सातवें दशक में काव्य एवं गीत की दिशाहीनता की एतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए अतुकांत कविता में अगीत के  प्रादुर्भाव एवं आगे बढ़ने पर तथा गीत के नए कलेवर नवगीत के प्रादुर्भाव पर चर्चा की एवं अपना अगीत-गीत सुनाया--
मीत तुम गाओ  न गाओ अगीत हम गाकर रहेंगे |
मीत  मानो  या न मानो , छंद भावों में सजेंगे |

               श्री डा रंगनाथ मिश्र सत्य, श्री शीलेन्द्र चौहान, श्रीमती सुषमागुप्ता, रामदेव लाल विभोर, डा सुरेश प्रकाश शुक्ल, डा अखिलेश , श्री श्याम जी श्रीवास्तव, रवीन्द्र अनुरागी, मधुकर अस्थाना, श्री दुबे , श्री कृपाशंकर विश्वास, श्री अग्निहोत्री एवं डा श्याम गुप्त ने काव्य पाठ किया |

सुषमा गुप्ता काव्यपाठ करते हुए
श्री श्याम जी श्रीवास्तव का गीत
                उपस्थित कवियों द्वारा गंगा दशहरा, मानव आचरण एवं सामाजिक सरोकार के  विभिन्न विषयों पर गीत , गज़लें ,घनाक्षरी, सवैया  छंद , अगीत , नवगीत प्रस्तुत किये गए |
             श्रीमती सुषमा गुप्ता ने अपने उद्बोधन गीत द्वारा कवियों को नारियों के मान-सम्मान के प्रति गीत लिखने को प्रेरित करते हुए कहा--
नारियों के मान के हित , जग उठे अभिमान नर में |
आत्म के सम्मान की इच्छा उठे हर एक मन में |

            श्री अग्निहोत्री जी ने अपने गद्य में लिखे जाने वाले काव्य 'महाभारत' के अंश प्रस्तुत किये | डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने समापन काव्यपाठ के साथ सभी कवियों के काव्य पाठ की  संक्षिप्त समीक्षा सहित भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए  आभार प्रकट किया |
डा श्याम गुप्त  काव्य पाठ करते हुए साथ में -डा सुरेश शुक्ल, मधुकर अस्थाना, रामदेव लाल विभोर, डा श्याम गुप्त, शीलेन्द्र चौहान, डा रंगनाथ मिश्र सत्य,व डा अखिलेश
रवीन्द्र अनुरागी का काव्य पाठ --श्री


.दुबे, डा श्याम गुप्त, शीलेन्द्र चौहान, डा सत्य, डा अखिलेश, कृपाशंकर विश्वास ,श्याम जी श्रीवास्तव, रवीन्द्र अनुरागी
डा सुरेश शुक्ल का काव्य पाठ
संचालन श्री मधुकर अष्ठाना द्वारा किया गया | धन्यवाद ज्ञापन  श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा किया गया |

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

अगीत साहित्य दर्पण,( क्रमश:) अध्याय प्रथम (समाप्त )... डा श्याम गुप्त ..

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


   ....पिछले  अंक के शेष से आगे....

                 अगीत कविता के छंदों की संक्षिप्तता के बावजूद कथ्य की सम्पूर्णता के साथ भाव-संप्रेषणीयता मुझे 'सतसैया के दोहरे ज्यों नाविक के तीर " एवं उर्दू के शे'र की भांति 'गागर में सागर' के भाव में सुस्पष्टता से संप्रेषणीय, सुग्राह्य व मनमोहक लगी |  मैंने अनुभव किया कि अगीत में जन-जन की कविता बनने तथा सामान्य जन के लिए भी भाव-सम्प्रेषण की अपार क्षमता के साथ-साथ अग्रगामी युगानुकूल संभावनाएं भी हैं|  अतः मैंने स्वयं ( डा श्याम गुप्त ) सन २००६ ई. में शाश्वत आध्यात्मिक रहस्यमय विषय - 'सृष्टि, ईश्वर व जीवन-जगत के प्रादुर्भाव ' पर , विज्ञान व अध्यात्म पर समन्वित महाकाव्य " सृष्टि ( ईषत इच्छा या बिगबैंग-एक अनुत्तरित उत्तर )". अगीत विधा में  लिखा जिसमें अगीत व साहित्य के इतिहास में प्रथम बार किसी मूर्त व्यक्तित्व के स्थान पर अमूर्त ने नायकत्व का निर्वाह किया है|   इस कृति की सफलता व पत्रकारों, विद्वानों, समीक्षकों द्वारा आलेखों से यह सिद्ध हुआ कि अगीत में आध्यात्मिक, वैज्ञानिक व गूढ़ विषयों पर भी रचनाएँ की जा सकती हैं | सन-..२००८ में अगीत विधा पर मेरी द्वितीय कृति "शूर्पणखा" खंड काव्य प्रकाशित हुई जिसे मैंने "  काव्य-उपन्यास"   का नाम दिया  है |

              सृष्टि महाकाव्य के प्रणयन के लिए मैंने अतुकांत, सममात्रिक, लयबद्ध गेय 'अगीत षटपदियों' का निर्माण किया जो अगीत में एक और नवीन छंद की सृष्टि थी | सृष्टि महाकाव्य के लोकार्पण के समय इन अगीत  षटपदियों को भातखंडे संगीत महाविद्यालय ,लखनऊ की प्राचार्या श्रीमती कमला श्रीवास्तव द्वारा संगीतमयता से गाकर बड़े सुन्दर एवं मनमोहक ढंग से प्रस्तुत किया गया | एक उदाहरण देखें....


" नए तत्व नित मनुज बनाता ,
जीवन कठिन प्रकृति दोहन से |
अंतरिक्ष आकाश प्रकृति में,
तत्व, भावना, अहं व ऊर्जा ;
के नवीन नित असत कर्म से,
भार धरा पर बढता जाता ||"              ---सृष्टि महाकाव्य से ....

   इसी वर्ष कवयित्री श्रीमती सुषमागुप्ता के एक छोटे से अगीत से प्रेरित होकर मैंने अगीत के एक अन्य छंद
 " नव-अगीत" का सूत्रपात किया जो पारंपरिक अगीत से भी  लघु है....यथा...
" बेडियाँ तोडो , 
ज्ञान दीप जलाओ;
नारी  अब,
तुम्ही राह दिखाओ ,
समाज को जोड़ो |"                      ---- नव अगीत ( श्रीमती सुषमा गुप्ता )

अगीत छंद को और आगे बढाते हुए , क्रांतिकारी, स्वतन्त्रता सेनानी ,पत्रकार, साहित्यकार पद्मश्री पं. बचनेश त्रिपाठी  के निधन पर श्रृद्धांजलि स्वरुप मेरे द्वारा एक नवीन अगीत-छंद- "त्रिपदा अगीत छंद"  का प्रयोग किया गया | वह प्रथम छंद श्री बचनेश जी की स्मृत-श्रृद्धांजल स्वरुप था....

" सादा जीवन औ विचार से,
उच्च भावना से पूरित मन;
सच्चे निष्प्रह युग-ऋषि थे वे |"

            इस प्रकार अगीत की यह अल्हड निर्झरिणी , आज पूर्ण-रूप से  युवा होकर अगीत काव्य की विभिन्न धाराओं से समाहित कालिंदी का रूप धरकर कल-कल प्रवहमान है तथा उत्तरोत्तर नवीन धाराओं -उपधाराओं से आप्लावित होरही है| सिर्फ भारत में ही नहीं सारे विश्व में अगीत की गूँज है | एक वार्तालाप में डा सत्य का कथन था कि --" यद्यपि अगीत कवि किसी 'वाद ' का सहारा नहीं लेता; परन्तु इतने लंबे समय तक चलने वाला व स्थायी होने वाला आंदोलन स्वयं एक वाद का रूप ले लेता है , अतः काव्य की इस धारा को 'अगीतवाद" की संज्ञा दी जा सकती है |
          साहित्य की यह अगीत धारा, प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को 'अखिल भारतीय अगीत परिषद, राजाजी पुरम, लखनऊ के तत्वावधान में गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों , कवि-मेला, कवि-कुम्भ व एक मार्च को 'साहित्यकार दिवस' मनाकर तथा 'अगीतायन' नामक समाचार पत्र के प्रकाशन द्वारा नए-नए व युवा कवियों को प्रोत्साहन देकर, हिन्दी भाषा, व साहित्य की अतुलनीय सेवा में लगी हुई है| अगीत के कवि-पुष्प, काव्य-वाटिका में अपना अपना सौरभ विखेर रहे हैं जो अन्य कवियों, साहित्यकारों व जनमानस को विविध रूपों से हर्षित व आंदोलित करते जारहे हैं | इस प्रकार उपन्यासकार प्रोफ. यशपाल के वाक्य "... अगीत का भविष्य उज्जवल है "...श्री अमृत लाल  नागर के कथन "...यदि अगीत फैशन के लिए नहीं है तो उसका भविष्य उज्जवल है"..एवं श्री सूर्यप्रसाद दीक्षित के शब्द ..." अगीत वस्तुत: गीति काव्य का ही अभिकल्प है "...वस्तुतः सत्य सिद्ध होरहे हैं और कहा जा सकता है कि ---

"रंगनाथ की कविता का रंग,
ज्यों  ज्यों समय बीतेगा ,
धुलेगा नहीं वरन निखरेगा |
क्योंकि समय के शूलों को,
झेलना, फूलना, भूलना -
यह सत्य का स्वभाव है |"       ---- कवि पाण्डेय रामेन्द्र ( सफर नामा से )

तथा---
" पौधा जो अगीत का सत्य ने लगाया था,
तन मन का रंग रूप जन जन को भाया था |
बना सुमन-वल्लरी, काव्य शिखर चूमता ,
श्रम, श्रृद्धा , सत्य-भाव सींचा औ सजाया था ||"       ---- डा श्याम गुप्त ..


                                           --- इति प्रथम अध्याय----
              ----क्रमश, अगीत साहित्य दर्पण,  द्वितीय अध्याय...अगली पोस्ट में... 
                                          -----अगीत साहित्य दर्पण  पुस्तक के आगे के अध्याय .....मेरे ब्लॉग ..अगीतायन ( http://ageetayan.blogspot.com )  पर देखें |