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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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गुरुवार, 28 मई 2020

काव्यनिर्झरिणी' की रचनाएँ ---रचना पांच ----निज भाषा उन्नति ....डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

मेरा द्वितीय काव्य संग्रह 'काव्यनिर्झरिणी' 1960 से 2005 तक रचित तुकांत काव्य-रचनाओं का संग्रह है |---सुषमा प्रकाशन , आशियाना द्वारा प्रकाशित , प्रकाशन वर्ष -२००५ ..
—नराकास , राजभाषा विभाग, गृहमंत्रालय, उप्र से "राजभाषा सम्मान व पुरस्कार -२००५," प्राप्त---रचना ५..





क्रमश रचना ६---
 

गुरुवार, 29 मार्च 2018

डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित, ई बुक ,,,काव्य-काँकरियाँ ...(.गीति व अगीत....तुकांत व अतुकांत लघुकाओं का संग्रह )

                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित,  ई बुक ,,,काव्य-काँकरियाँ ...(.गीति व अगीत....तुकांत व अतुकांत लघुकाओं का संग्रह ) 
----- वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा प्रकाशित ------







       काव्य-काँकरियाँ: काव्य संग्रह

डॉ श्यामगुप्त  26 मार्च 2018
वर्जिन साहित्यपीठ
  कंकड़ फैंकना एक सहज मानवी प्रवृत्ति है। कभी यूंही खेल खेल में अपनों पर या दूसरों पर। बचपन में पोखर-तालावों में, मेंढ़कों, पक्षियों, कुत्ते-बिल्लियों पर, पेड़ों पर फलों को तोड़ने हेतु ढेले फैंकना किसे नहीं सुहाया। बालिकाओं के आदि-खेल कंकड़गुटके और बालकों के रंग-बिरंगे कंचों का खेल कौन नहीं जानता।








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25 March 2018---by Dr Shyam Gupt


2008
by Harivanshrai Bachchan


15 March 2018---by सिल्वा बैरोस, विलियम
Subscribers read for free.Learn more.
27 February 2018----by सिंह, जगमोहन

14 March 2018
by सिल्वा बैरोस, विलियम
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 --------गूगल बुक्स स्टोर पर उपलब्ध -----









 

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

पर्यावरण संदेषित काव्य गोष्ठी ---डा श्याम गुप्त

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

पर्यावरण संदेषित काव्य गोष्ठी -----
\\
कल दिनांक २२-१०- १७ को कविवर श्री राजेन्द्र वर्मा के आवास ३/२९, विकास नगर पर एक कविगोष्ठी हुई, जिसमें पटना से पधारे पर्यावरणविद डॉ. मेहता नगेन्द्र सिंह के अलावा स्थानीय कवियों ने भाग लिया।
------कवि-गोष्ठी की शुरुआत प्रसिद्ध कवि-गज़लकार देवकीनंदन शांत के काव्यपाठ से हुई । उन्होंने प्रकृति और मानव के रिश्ते को उजागर करते हुए एक ग़ज़ल पढ़ी :
आग-पानी-हवा है, माटी है----
-----
तन का दीपक है, मन की बाती है ।
दूसरों के लिए जो जीते हैं
उनको ही ज़िन्दगी सुहाती है ।

------ ग़ज़ल-पाठ के क्रम को आगे बढ़ाया जाने-माने ग़ज़लगो श्री कुँवर कुसुमेश ने । अपनी ग़ज़ल में उन्होंने उदात्त भावों को इस प्रकार रखा :
न अमीर है, न ग़रीब है ,
मेरा यार अहले-नसीब है ।
------ इसी भावभूमि पर डॉ. सुरेश उजाला ने एक रचना पढ़ी :
हर कठिन कार्य को आसाँ बनाइए,
ज़िन्दगी के बोझ को हँस के उठाइए ।
-------प्रसिद्ध हास्यकवि डॉ. डंडा लखनवी ने उद्बोधन देते हुए कहा :
धीरे चलते रहिए, थकन लगे, पग मलते रहिए ।
जड़ता लोकतंत्र की बैरन, नायक सदा बदलते रहिये |
जड़ता लोकतंत्र की बैरन, नायक सदा बदलते रहिये |
जड़ता लोकतंत्र की बैरन,नायक सदा बदलते रहिए ।
----------कवि अमरनाथ ने दोहों से गोष्ठी में यथार्थ का रंग भरा :
गूँज उठी थी रात में, सन्नाटे की चीख ।
गुंडों ने क़ब्ज़ा किया, रोजी जिसकी भीख ।।
--------प्रसिद्ध कथाकार-कवि अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’ ने अपनी रचना में पर्यावरण के प्रति सचेत रहने को कहा अन्यथा उसके दुष्परिणाम हमें भुगतने होंगे :
ख्वाहिशों का, लालचों का यह सिला हो जाएगा,
दूर तक बरबादियों का सिलसिला हो जाएगा ।
पेड़-परबत-नदी-धरती चीखकर कहने लगे,
गर नहीं चेतेगा इंसाँ, ज़लज़ला हो जाएगा ।
---------देश के प्रसिद्ध कवि वाहिद अली वाहिद ने भी पर्यावरण तथा अन्य विषयों पर अपनी कविताओं के सस्वर पाठ से गोष्ठी को कवि-सम्मलेन जैसी ऊँचाई प्रदान की ।
--------संचालक राजेन्द्र वर्मा ने एक ग़ज़ल पढ़ी जो केवल काफ़िये और रदीफ़ पर आधारित थी । मतला था :
चाँदनी में हैं सभी, मैं ही नहीं हूँ,
तिश्नगी में हैं सभी, मैं ही नहीं हूँ ।
--------अतिथि डॉ. मेहता ने प्रकृति को बचाने हेतु आत्ममंथन का आह्वान किया :
हवा हुई ज़हरीली कैसे, मैं भी सोचूँ, तू भो सोच |
फ़ज़ा बनी ये नशीली कैसे, मैं भी सोचूँ, तू भो सोच !
नदी उतरती जब पर्वत से, निर्मल रहती है लेकिन,
नदी हुई मटमैली कैसे, मैं भी सोचूँ, तू भो सोच !
--------गोष्ठी के अध्यक्ष डॉ. श्याम गुप्त ने अपने अध्यक्षीय भाषण में गोष्ठी में प्रस्तुत कविताओं पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ करते हुए पर्यावरण के बचाने की बात कही । काव्यपाठ में उन्होंने ज़माने के व्यवहार पर टिपण्णी करते हुए एक आगी एवं एक ग़ज़ल से कहा :
कम संसाधन/ अधिक दोहन/
न नदिया में जल/ न बाग़ न्गीचों का नगर /
न कोकिल की कूक/ न मयूर की नृत्य सुषमा/
कहीं अनावृष्टि, कहीं अति वृष्टि
किसने किया भ्रष्ट /
प्रकृति सुन्दरी का यौवन |
-------
दर्दे-दिल सँभालकर रखिए,
ज़ख्मेदिल सँभालकर रखिए ।
----------गोष्ठी के अन्त में सभी कवियों ने पर्यावरण को प्रदूषित न करने तथा उसे संरक्षित करने की शपथ ली ।
बाएं से- डॉ मेहता, डॉ डंडा लखनवी, मैं (राजेन्द्र वर्मा), डॉ श्याम गुप्त, अमरनाथ, कुंवर कुसुमेश, वाहिद अली वाहिद, सुरेश उजाला तथा कैलाशनाथ तिवारी।



 

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न ---डा श्याम गुप्त ...

               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न \\
प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली काव्यगोष्ठी दि.६-७-१७ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में अगीत परिषद् के अध्यक्ष साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य , नव-सृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त, डा श्याम गुप्त, श्रीमती सुषमा गुप्ता, अनिल किशोर शुक्ल ‘निडर’, श्री रामदेव लाल विभोर महामंत्री काव्य कला संगम , प्राची संस्था के अध्यक्ष डा सुरेश प्रकाश शुक्ल, श्री बिनोद कुमार सिन्हा उपस्थित थे | विशेष अतिथि एवं श्रोता के रूप में रेलवे अस्पताल लखनऊ के पूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. पुरुषोत्तम सिंह एवं पूर्व रेडियो व टीवी सिंगर श्रीमती पुरुषोत्तम सिंह ने गोष्ठी को शोभायमान किया |
\\
श्री बिनोद सिन्हा द्वारा अपनी कृति –पांडुलिपि में गणेश वंदना पहले लिखे जाने पर चर्चा हुई | सिन्हा जी का कथन था कि उनके विचार से गणेश भगवान हैं अतः वन्दना पहले की जानी चाहिए | श्याम गुप्त का मत था की गणेश प्रथम पूज्य देव हैं परन्तु भगवान् नहीं हैं | इस प्रकरण में ब्रह्म, भगवान् व ईश्वर पर भी संक्षिप्त चर्चा हुई |
\
डा.योगेश के अनुसार गणेश प्रथम पूज्य हैं, उनकी प्रथम पूजा विभिन्न धार्मिक आदि कार्यों में तो की ही जानी चाहिए परन्तु साहित्यिक कृतियों में वाग्देवी माँ सरस्वती की ही वन्दना पहले होनी चाहिए | डा श्याम गुप्त ने सहमत होते हुए कहा कि दोनों की वंदना करते समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी ‘वन्दे वाणी विनायकौ’ कहा है |
\
श्री अनिल किशोर निडर की जिज्ञासा पर डा श्यामगुप्त ने बताया की संयुक्ताक्षर से पूर्व आने वाले लघु अक्षर को मात्रा गणना हेतु दीर्घ माना जाता है |
\
बिनोद सिन्हा जी का कथन था की कविता स्वयंभू उद्भूत होती है , यदि सप्रयास लिखा जाय तो ता वह बनावटी कविता ही होती है |
\
डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित रचना ;ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद; एवं बिनोद कुमार सिन्हा की शीघ्र प्रकाश्य कृति ‘गीता सारांश, अगीत में’ के तादाम्य में गीता पर ईशोपनिषद का प्रभाव दोनों की विषय समनुरूपता पर डा श्यामगुप्त व सिन्हा जी में चर्चा हुई |
\\
सुप्रसिद्ध दार्शनिक कवि डा योगेश गुप्त ने अपनी कई दार्शनिक रचनायें प्रस्तुत की, अपने अपने नाम को ढूँढने में व्यस्त हम ---

हम सब मानते थे / हमारा नाम ही
पहचान है ,/ और विडम्बना यह थी कि,
हम स्वयं को भी / अपने नाम से ही पहचानते थे |
--------श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर ने वर्षा गीत इस प्रकार प्रस्तुत किया---
नभ पर काले बादल छाते,
कभी रंगीले बनकर आते
वसुधा को रसमय कर जाते |
------- श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने महाकवि विद्यापति की शब्दावली निहित तान में गिरधर गोपाल का वर्णन किया---
गले वैजन्ती कनक मोर मुकुट अति भावन
अंग गगन सम कान्ति श्यामल श्यामल
अलक भ्रमर सी तिलक कस्तूरी माल सुहावन,
झलक चन्द्र छवि श्यामल गिरिधर गोवर्धन |
------- डा श्याम गुप्त ने वर्षा गीत, श्रृंगार गीत एवं एक ग़ज़ल यूं पढी –
पुरस्कार की तो थी हमको भी चाहत बहुत
मगर कभी शर्त पूरी हम नहीं कर पाए |
--------श्री रामदेव लाल विभोर ने अपनी रचना प्रस्तुत की ----
मर्ज़ एस दावा बेअसर,
नब्ज़ बोले की मीठा ज़हर है |
------- डा सुरेश प्रकाश शुक्ल ने किसान से तादाम्य बिठाते हुए गाया –
किसना होईगे चतुर किसान / पैदा करत हैं गेहूं धान |
गन्ना आलू बोवें नकदी की आशा मा,
आल्हा बिरहा गावैं झूमें चौमासा मा |
------ श्रीमती सुषमा गुप्ता ने पावस गीत सुनाया ...
आई सावन की बहार
बदरिया घिर घिर आये
---------अगीताचार्य डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने कई रचनाये व गीत प्रस्तुत किये, एक मुक्तक देखिये ....
‘शील से बोझिल झुका हो वह नयन है,
हो न सीमा जिस पटल की वह गगन है |
रोकने पर भी न रुकता हो कभी जो ,
नित्य नूतन पंथ शोधे वह चरण है ||
\
डा सत्य द्वारा दो शब्द बोलने के अनुरोध पर विशिष्ट अतिथि व श्रोता डा पी सिंह ने कहा आप लोग विज्ञजनों के सान्निध्य का अवसर मिला, काव्य रस का आनंद मिला | श्रीमती सिंह ने रचनाओं की प्रशंसा करते हुए इसे आनंददायक क्षण बताया |
जलपान के उपरांत सुषमा गुप्ता जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी का समापन हुआ |

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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग आठ ---डा श्याम गुप्त के कुछ अगीत ------





                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


अगीत - त्रयी...---- भाग आठ ---डा श्याम गुप्त के कुछ अगीत ------


|
--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-
\\
----- डा श्यामगुप्त के श्रेष्ठ अगीत ----
--- अगीत ---
\
१.टोपी
वे राष्ट्र गान गाकर
भीड़ को देश पर मर मिटने की,
कसम दिलाकर;
बैठ गए लक्सरी कार में जाकर ;
टोपी पकडाई पी ऐ को
अगले वर्ष के लिए
रखे धुलाकर |

२.अगीत .....
प्रेम विह्वलता, विरह, भावातिरेक की धारा ,
बहती है जब मन में ,
अजस्र, अपरिमित, प्रवाहमान; तब-
गीत निस्रत होते हैं.
सरिता की अविरल धारा की तरह |
वही धारा, प्रश्नों को उत्तरित करती हुई
व्याख्या, विश्लेषण, सत्य को
जन -जन के लिए उद्घाटित करती हुई,
निस्रत निर्झरिणी बन कर -
अगीत बन जाती है | 

३.प्रकृति सुन्दरी का यौवन....
कम संसाधन
अधिक दोहन,
न नदिया में जल,
न बाग़-बगीचों का नगर |
न कोकिल की कूक
न मयूर की नृत्य सुषमा ,
कहीं अनावृष्टि कहीं अति-वृष्टि ;
किसने भ्रष्ट किया-
प्रकृति सुन्दरी का यौवन ?
 
४. संतुलन....
विकास हेतु,
संसाधन दोहन की नासमझ होड़,
अति-शोषण की अंधी दौड़,
प्रकृति का संतुलन देती है बिगाड़;
विकल हो जाते हैं-नदी सागर पहाड़,
नियामक व्यवस्था तभी करती है यह जुगाड़|
चेतावनी देती है,
सुनामी बनकर सब कुछ उजाड़ देती है,
अपना संतुलन सुधार लेती है |
 
५. माँ और आया
"अंग्रेज़ी आया ने,
हिन्दी मां को घर से निकाला;
देकर, फास्ट-फ़ूड ,पिज्जा, बर्गर -
क्रिकेट, केम्पा-कोला, कम्प्यूटरीकरण ,
उदारीकरण, वैश्वीकरण
का हवाला | "
 
६.अमर
"मरणोपरांत जीव,
यद्यपि मुक्त होजाता है ,
संसार से , पर--
कैद रहता है वह मन में ,
आत्मीयों के याद रूपी बंधन में ,
और होजाता है अमर | "
 
७.बंधन-मुक्ति
वह बंधन में थी
धर्म संस्कृति सुसंस्कारों का
चोला ओढ़कर,
अब वह मुक्त है, स्वतंत्र है
लाज व शर्मो-हया के वस्त्रों का
चोला छोड़कर |
 
८.कालपात्र
किसलिए काल
रचता है रचनाएँ
सम-सामयिक, तात्कालिक,
व सामयिक इतिहास के
सरोकारों को निबद्ध करता है ,
तथ्यों को बढ करता है |
एक कालपात्र होता है
साहित्य
तभी वह होता है कालजयी |
 
९. अनास्था
अपना दोष
ईश्वर के सिर
इंसान क्यों है इतना तंग नज़र !
क्या केवल कुछ पाने की इच्छा से थी, भक्ति-
नहीं थी आस्था, बस आसक्ति |
जो कष्टों के एक झटके से ही
टूट जाए ,
वह अनास्था
आस्था कब कहलाये |
 
१०. अर्थ
अर्थ स्वयं में एक अनर्थ है |
मन में भय चिंता भ्रम की
उत्पत्ति में समर्थ है |
इसकी प्राप्ति, रक्षण व उपयोग में भी
करना पड़ता है कठोर श्रम,
आज है, कल होगा या नहीं या होगा नष्ट
इसका नहीं है कोइ निश्चित क्रम|
अर्थ मानव के पतन में समर्थ है,
फिर भी जीवन के -
सभी अर्थों का अर्थ है |
\\
-----लयबद्ध अगीत----
\
११.
तुम जो सदा कहा करती थीं
मीत सदा मेरे बन रहना |
तुमने ही मुख फेर लिया क्यों
मैंने तो कुछ नहीं कहा था |
शायद तुमको नहीं पता था ,
मीत भला कहते हैं किसको |
मीत शब्द को नहीं पढ़ा था ,
तुमने मन के शब्दकोश में ||
१२.
" यह कंचन सा रूप तुम्हारा
निखर उठा सुरसरि धारा में;
अथवा सोनपरी सी कोई,
हुई अवतरित सहसा जल में ;
अथवा पद वंदन को उतरा,
स्वयं इंदु ही गंगाजल में |
१३.
तेरे मन की नर्म छुअन को,
बैरी मन पहचान न पाया|
तेरे तन की तप्त चुभन को,
मैं था रहा समझता माया |
अब बैठा यह सोच रहा हूँ
तुमने क्यों न मुझे समझाया |
ज्ञान ध्यान तप योग साधना,
में मैंने इस मन को रामाया |
यह भी तो माया संभ्रम है ,
यूंही हुआ पराया तुमसे |
\\
-----नव-अगीत ----
\
१४.प्रश्न
कितने शहीद ,
कब्र से उठकर पूछते हैं-
हम मरे किस देश के लिए ,
अल्लाह के, या-
ईश्वर के |
 
१५..बंधन
वह बंधन में थी ,
संस्कृति संस्कार सुरुचि के
परिधान कन्धों पर धारकर ;
अब वह मुक्त है ,
सहर्ष , कपडे उतारकर ||
 
१६.. दिशाहीन
मस्त हैं सब -
अपने काम काज, या -
मनोरंजन में; और -
खड़े हैं हर मोड़ पर
दिशाहीन ||
 
१७.. मेरा देश कहाँ
यह अ जा का ,
यह अ ज जा का ,
यह अन्य पिछड़ों का ,
यह सवर्णों का ;
कहाँ है मेरा देश ?

१८..तुम्हारी छवि
" मन के अंधियारे पटल पर ,
तुम्हारी छवि,
ज्योति-किरण सी लहराई;
एक नई कविता,
पुष्पित हो आई |
\\
-----त्रिपदा अगीत ----
\
१९..
खडे सडक इस पार रहे हम,
खडे सडक उस पार रहे तुम;
बीच में दुनिया रही भागती।
२०..
चर्चायें थीं स्वर्ग नरक की,
देखी तेरी वफ़ा-ज़फ़ा तो;
दोनों पाये तेरे द्वारे।।
२१..
क्यों पश्चिम अपनाया जाए,
सूरज उगता है पूरब में;
पश्चिम में तो ढलना निश्चित |
२२..
" पायल छनका कर दूर हुए,
हम कुछ ऐसे मज़बूर हुए ;
उस नाद-ब्रह्म मद चूर हुए |"
२३..
" मिटा सके भूखे की हसरत,
दो रोटी भी उपलब्ध नहीं ;
क्या करोगे ढूँढ कर अमृत | "
\\
-----लयबद्ध षटपदी अगीत----
\
२४..
पुरुष-धर्म से जो गिर जाता,
अवगुण युक्त वही पति करता;
पतिव्रत धर्म-हीन, नारी को |
अर्थ राज्य छल और दंभ हित,
नारी का प्रयोग जो करता;
वह नर कब निज धर्म निभाता ? ...
२५..
वह समाज जो नर-नारी को,
उचित धर्म-आदेश न देता |
राष्ट्र राज्य जो स्वार्थ नीति-हित,
प्रजा भाव हित कर्म न करता;
दुखी, अभाव-भाव नर-नारी,
भ्रष्ट, पतित होते तन मन से ||
२६..
माया-पुरुष रूप होते हैं,
नारी-नर के भाव जगत में |
इच्छा कर्म व प्रेम-शक्ति से ,
पुरुष स्वयं माया को रचता |
पुनः स्वयं ही जीव रूप धर,
माया जग में विचरण करता || …… शूर्पणखा से
२७..
" परम व्योम की इस अशान्ति से ,
द्वंद्व भाव कण-कण में उभरा ;
हलचल से गति मिली कणों को ,
अप:तत्व में साम्य जगत के |
गति से आहत नाद बने ,फिर -
शब्द वायु ऊर्जा जल और मन | .
२८.
" जग की इस अशांति-क्रंदन का,
लालच लोभ मोह-बंधन का |
भ्रष्ट पतित सत्ता गठबंधन,
यह सब क्यों, इस यक्ष -प्रश्न का |
एक यही उत्तर सीधा सा ;
भूल गया नर आप स्वयं को || " …. सृष्टि से
२९.
बालू से सागर के तट पर ,
खूब घरोंदे गए उकेरे |
वक्त की ऊंची लहर उठी जब,
सब कुछ आकर बहा ले गयी |
छोड़ गयी कुछ घोंघे-सीपी,
सजा लिए हमने दामन में | …प्रेम काव्य से
\\

-----त्रिपदा अगीत ग़ज़ल.----
\..
 
३०. बात करें
भग्न अतीत की न बात करें ,
व्यर्थ बात की क्या बात करें ;
अब नवोन्मेष की बात करें |
यदि महलों में जीवन हंसता ,
झोपडियों में जीवन पलता ;
क्या उंच-नीच की बात करें |
शीश झुकाएं क्यों पश्चिम को,
क्यों अतीत से हम भरमाएं ;
कुछ आदर्शों की बात करें |
शास्त्र बड़े-बूढ़े और बालक ,
है सम्मान देना, पाना तो ;
मत श्याम’व्यंग्य की बात करें |
---------------


 

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग सात---डा श्याम गुप्त का वक्तव्य व परिचय----डा श्याम गुप्त

                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 अगीत - त्रयी...---- भाग सात---डा श्याम गुप्त---------



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|
--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---

अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-



                     भाग सात------ डा श्याम गुप्त का वक्तव्य व परिचय ----




---वक्तव्य --
------- “काव्य सौन्दर्य प्रधान हो या सत्य प्रधान, इस पर पूर्व व पश्चिम के विद्वानों में मतभेद हो सकता है, आचार्यों के अपने अपने तर्क व मत हैं | सृष्टि के प्रत्येक वस्तु-भाव की भाँति कविता भी ‘सत्यं शिवं सुन्दरं‘ होनी चाहिए | साहित्य का कार्य सिर्फ मनोरंजन व जनरंजन न होकर समाज को एक उचित दिशा देना भी होता है, और सत्य के बिना कोइ दिशा, दिशा नहीं हो सकती | केवल कलापक्ष को सजाने हेतु एतिहासिक, भौगोलिक व तथ्यात्मक सत्य को अनदेखा नहीं करना चाहिए | ---काव्य निर्झरिणी से
\
-------- “साहित्य व काव्य किसी विशेष समाज, शाखा व समूह या विषय के लिए न होकर समग्र समाज के लिए, सबके लिए होता है| अतः उसे किसी भाषा, गुट या शाखा विशेष की संकीर्णता की रचनाधर्मिता न होकर भाषा व काव्य की समस्त शक्तियों, भावों, तथ्यों, शब्द-भावों व सम्भावनाओं का उपयोग करना होता है | प्रवाह व लय काव्य की विशेषताएं हैं जो काव्य-विषय व भावसम्प्रेषण क्षमता की आवश्यकतानुसार छंदोबद्ध काव्य में भी हो सकती है एवं छंद-मुक्त काव्य में भी| अतः गीत-अगीत कोई विवाद का विषय नहीं है |”
--शूर्पणखा अगीत काव्य उपन्यास से
\
-------- “ समाज में जब कभी भी विश्रृंखलता उत्पन्न होती है तो उसका मूल कारण मानव मन में नैतिक बल की कमी होता है भौतिकता के अतिप्रवाह में शौर्य, नैतिकता, सामाजिकता, धर्म, अध्यात्म, व्यवहारगत शुचिता, धैर्य, संतोष, समता, अनुशासन आदि उदात्त भावों की कमी से असंयमता पनपती है | अपने इतिहास, शास्त्र, पुराण, गाथाएँ, भाषा व ज्ञान को जाने बिना भागम-भाम में नवीन अनजाने मार्ग पर चल देना अंधकूप की और चलना ही है | आज की विश्रृंखलता का यही कारण है |” ------- शूर्पणखा से
\
--------- ‘ मेरे विचार से समस्या-प्रधान व तार्किक विषयों को मुक्त-छंद रचनाओं में सुगमता से कहा जा सकता है, जो जनसामान्य के लिए सुबोध होती हैं|’ --काव्य मुक्तामृत से

\\
.
----जीवन परिचय
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------------- चिकित्सा व साहित्य जगत में जाना पहचाना नाम, चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक डा एस बी गुप्ता व साहित्यकार डा श्याम गुप्त का जन्म पश्चिमी उत्तरप्रदेश के ग्राम मिढाकुर, जिला आगरा में १० नवंबर १९४४ ई में हुआ | आपके पिता का नाम स्व.जगन्नाथ प्रसाद गुप्त व माता स्व.श्रीमती रामभेजी देवी हैं; पत्नी का नाम श्रीमती सुषमा गुप्ता है जो हिन्दी में स्तानाकोत्तर हैं एवं स्वयं भी एक कवियत्री व गायिका हैं | आपके एक पुत्र व एक पुत्री हैं | पुत्र श्री निर्विकार बेंगलोर में फिलिप्स कंपनी में वरिष्ठ प्रोजेक्ट प्रवन्धक व पुत्रवधू श्रीमती रीना गुप्ता क्रीडेन्शियल कंपनी की फाइनेंशियल सलाहकार व प्रवन्धक हैं | पुत्री दीपिका गुप्ता प्रवंधन में स्नातकोत्तर व दामाद श्री शैलेश अग्रहरि फिलिप्स पूना में महाप्रवन्धक पद पर हैं |
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------- डा श्याम गुप्त की समस्त शिक्षा-दीक्षा आगरा नगर में ही हुई | सेंट जांस स्कूल आगरा, राजकीय इंटर कालिज आगरा व सेंट जांस डिग्री कालिज आगरा से अकादमिक शिक्षा के उपरांत उन्होंने सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय आगरा ( आगरा विश्वविद्यालय ) से चिकित्सा शास्त्र में स्नातक की उपाधि एम् बी बी एस व शल्य-क्रिया विशेषज्ञता में स्नातकोत्तर ‘मास्टर आफ सर्जरी’ की उपाधि प्राप्त की | इस दौरान देश- विदेश की चिकित्सा पत्रिकाओं व शोध पत्रिकाओं में उनके चिकित्सा आलेख व शोध आलेख छपते रहे | चिकित्सा महाविद्यालय में दो वर्ष तक रेज़ीडेंट-सर्जन के पद पर कार्य के उपरान्त आप भारतीय रेलवे के चिकित्सा विभाग में देश के विभिन्न पदों व नगरों में कार्यरत रहे एवं उत्तर रेलवे मंडल चिकित्सालय, लखनऊ से वरिष्ठ चिकित्सा-अधीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए | सम्प्रति उनका स्थायी निवास लखनऊ है |
--- संपर्क— सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२ (उ प्र), भारत, मो-०९४१५१५६४६४, ईमेल- drgupta04@gmail.com 

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-----साहित्यिक परिचय ---
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--------धर्म, अध्यात्म के वातावरण -- रामायण के सस्वर पाठ से दिनचर्या प्रारम्भ करने वाली व चाकी-चूल्हे से लेकर देवी-देवता, मंदिर की पूजा-अर्चना करने वाली माँ व झंडा-गीत एवं देशभक्ति के गीतों के गायकों की टोली के नायक, देश-भक्ति व सर्व-धर्म, सम-भाव भावना प्रधान पिता के सान्निध्य में वाल्यावस्था में ही कविता-प्रेम प्रस्फुटित हो चुका था |
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--------शिक्षाकाल से ही आगरा नगर की पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें व आलेख प्रकाशित होते रहे | आगरा से प्रकाशित " युवांतर" साप्ताहिक के वे वैज्ञानिक-सम्पादक रहे एवं बाद में लखनऊ नगर से प्रकाशित -“निरोगी संसार " मासिक के नियमित लेखक व सम्पादकीय सलाहकार |
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---------- आप हिन्दी भाषा में खड़ी-बोली व ब्रज-भाषा एवं अंग्रेज़ी भाषाओं के साहित्य में रचनारत हैं | ब्रज क्षेत्र के होने के कारण वे कृष्ण के अनन्य भक्त भी हैं उनके पद एवं अन्य तमाम रचनाएँ कृष्ण व राधा पर आधारित हैं एवं ब्रजभाषा में काव्य-रचना भी करते हैं |
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---------हिन्दी-साहित्य की गद्य व पद्य दोनों विधाओं की गीत, अगीत, नवगीत .छंदोवद्ध-काव्य, ग़ज़ल, कथा-कहानी, आलेख, निवंध, समीक्षा, उपन्यास, नाटिकाएं सभी में वे समान रूप से रचनारत हैं |
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-------आप कविता की अगीत विधा के सशक्त अगीतकार कवि, सन्घीय समीक्षा पद्धति के समीक्षक व सन्तुलित कहानी के कहानी कार के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं | वे लखनऊ की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से सम्वद्ध हैं, एवं अगीत परिषद, प्रतिष्ठा व चेतना परिषद के आजीवन सदस्य हैं| आप अनेक काव्य रचनाओं के सहयोगी रचनाकार हैं व कई रचनाओं की भूमिका के लेखक भी हैं|
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--------अंतरजाल ( इंटरनेट ) पर विभिन्न ई-पत्रिकाओं हिन्दी साहित्य मंच, रचनाकार, हिन्दी-कुन्ज, हिन्द-युग्म, कल्किओन-हिन्दी व कल्किओन-अन्ग्रेज़ी आदि के लेखक एवं सहयोगी रचनाकार हैं | श्याम स्मृति The world of my thoughts .., साहित्य श्याम, हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व विजानाति-विजानाति-विज्ञान उनके स्वतंत्र चिट्ठे (ब्लॉग) हैं एवं कई सामुदायिक चिठ्ठों के सहयोगी रचनाकार व सलाहकार |
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-----उनके अपने स्वयं के विशिष्ट विचार-मंथन के क्रमिक विचार-बिंदु ‘श्याम स्मृति’ के नाम से अंतरजाल पर प्रकाशित होते हैं| अब तक उनके द्वारा लगभग १५० गीत, १५० ग़ज़ल, १५० गीत-अगीत छंद, ६० कथाएं व अनेक आलेख, वैज्ञानिक-दार्शनिक, वैदिक-पौराणिक विज्ञान व धर्म-दर्शन एवं भारतीय पुरा इतिहास तथा विविध विषयों पर आलेख और निवंध तथा कई पुस्तकों की समीक्षाएं आदि लिखी जा चुकी हैं |
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-------उनकी शैली मूलतः उद्बोधन, देशप्रेम, उपदेशात्मक व दार्शनिक है जो यथा-विषयानुसार होती है| श्रृंगार की एवं ललित रचनाओं में रीतिकालीन अलंकार युक्त शैली में शास्त्रीय छंद घनाक्षरी, दोहे, पद, सवैये आदि उन्होंने लिखे हैं| भावात्मक एवं व्यंगात्मक शैली का भी उन्होंने प्रयोग किया है स्पष्ट भाव-सम्प्रेषण हेतु| मूलतः वे अभिधात्मक कथ्य-शैली का प्रयोग करते हैं| आपको व आपकी विभिन्न कृतियों को विभिन्न संस्थाओं व संस्थानों द्वारा अनेक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं|
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-------------डा गुप्त ने कई नवीन छंदों की सृष्टि भी की है ..उदाहरणार्थ...अगीत-विधा के ..लयबद्ध-अगीत, षटपदी अगीत, त्रिपदा अगीत , नव-अगीत छंद व त्रिपदा अगीत ग़ज़ल...तथा गीति विधा के " श्याम सवैया छंद " व पंचक श्याम सवैया छंद |
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----------आपकी प्रकाशित कृतियां---काव्य-दूत, काव्य निर्झरिणी, काव्यमुक्तामृत (सभी काव्य-संग्रह), सृष्टि-अगीत विधा महाकाव्य, प्रेम काव्य—गीति-विधा महाकाव्य, शूर्पणखा-अगीत-विधा काव्य-उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास --नारी विमर्श पर एवं अगीत विधा कविता के विधि-विधान पर शास्त्रीय-ग्रन्थ "अगीत साहित्य दर्पण तथा ब्रजभाषा में विभिन्न काव्य-विधाओं का संग्रह ‘ब्रज बांसुरी’ एवं शायरी काव्य विधा में ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ हैं | अन्य शीघ्र प्रकाश्य कृतियाँ में ---गीत संग्रह, ग़ज़ल संग्रह, अगीत संग्रह, कथा-संग्रह, श्याम दोहा संग्रह, काव्य-कंकरियाँ व श्याम-स्मृति एवं ईशोपनिषद का काव्य-भावानुवाद आदि हैं |




                                                       -----क्रमश भाग आठ----डा श्याम गुप्त के कुछ अगीत----


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बुधवार, 12 अप्रैल 2017

मेरा एक कथाचित्र--- डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

 मेरा एक कथाचित्र--- जल रंग ...


 

मंगलवार, 21 मार्च 2017

डा श्याम गुप्त की दो साहित्यिक पुस्तकों का लोकार्पण

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                    १९६४ बैच, चिकित्सा महाविद्यालय आगरा का पूर्व छात्र सम्मिलन, मार्च १५-१८ ,२०१७ – चंडीगढ़-शिमला ...

दि.१७-३-१७ –डा श्याम गुप्त की दो साहित्यिक पुस्तकों का लोकार्पण --

             दिनांक १७-३-१७ को शिमला हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों में होटल आचमन रीजेंसी में, इसी बैच के लखनऊ के चिकित्सक डा एस बी गुप्ता, सर्जन एवं पूर्व चिकित्सा अधीक्षक, उत्तर रलवे, लखनऊ, (जो साहित्य जगत में कवि साहित्यकार, लेखक, उपन्यासकार, कथाकार, समीक्षक, निबंधकार,  साहित्य-विभूषण डा श्यामगुप्त के नाम से जाने जाते हैं ) की दो पुस्तकें- “तुम तुम और तुम” “ तथा “ ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद “ का लोकार्पण एवं विवेचन देश विदेश से आये हुए प्रसिद्ध चिकित्सकों एवं उनकी पत्नियों की उपस्थिति में,----- डा संध्या अग्रवाल—पूर्व प्रोफ एंड हेड –स्त्री चिकित्सा विभाग, सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय, आगरा..एवं डा राजीव शरण –पूर्व.प्रोफ एंड हेड, बाल विभाग, मेडीकल .कालेज, इलाहाबाद . द्वारा किया गया |

-----चित्र में -डा श्याम गुप्त, श्रीमती सुषमा गुप्ता, चिकित्सक एवं पत्नियां –
उपस्थित --
१.डा केके शर्मा –पूर्व चिकित्सा महानिदेशक, पंजाब...होशियारपुर
२.डा सुरिंदर कुमार शुंड—फिजीसियन –यू. एस.
३ डा राजीव शरण –पूर्व.प्रोफ एंड हेड, बाल विभाग, मेड.कालेज, इलाहाबाद
४.डा केसी श्रीवास्तव— फिजीसियन, इलाहाबाद
५.डा जसबीर सिंह – नेत्र चिकित्सक –कानपुर
६.डा संध्या अग्रवाल—पूर्व प्रोफ एंड हेड –स्त्री चिकित्सा विभाग, सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय, आगरा
७.डा सी एस पसरीचा –चिकित्सक – गुड़गांव,
८.डा बी एम् अग्रवाल – पूर्व प्रोफ. पेथोलोजी विभाग, एस एन मेडीकल कालिज, आगरा
९. डा गुलशन सचदेव –पूर्व कर्नल, भारतीय आर्मी, -चंडीगढ़
१० डा कमलेश वाही, चिकित्सक, नई दिल्ली
११. डा सुरेन्द्र खन्ना , त्वचा रोग विशेषज्ञ , नई दिल्ली
श्रीमती मनोरमा श्रीवास्तव, श्रीमती सुषमा गुप्ता, श्रीमती राजीव शरण, श्रीमती पसरीचा, श्रीमती सुरिंदर कुमार
---पीछे ---शिमला रात की बाहों में ---