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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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बुधवार, 4 अप्रैल 2018

गुरुवासरीय साहित्यिक-गोष्ठी –इतिहास के आईने से ....डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

गुरुवासरीय साहित्यिक-गोष्ठी –इतिहास के आईने से ....
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                          काफी समय पश्चात वयोवृद्ध कविवर श्री प्रेमचन्द्र सैनी जी से मैंने उनके घर पर मुलाक़ात की | मैं भी पर्याप्त समय से नगर के बाहर था एवं विभिन्न कार्यक्रमों में व्यस्त था, वे भी अमेरिका गए हुए थे | सैनी जी वहां के संस्मरण सुनाते रहे| वहां रचित एक कविता भी उन्होंने सुनाई | एक अन्य कविता जो सैनी जी ने डा रामाश्रय सविता के लिए लिखी थी वह भी सुनाई, मेरी प्रतिक्रया एवं साहित्यिक समीक्षात्मक सम्मति भी पूछी | मैंने भी उन्हें अपनी पुस्तक ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ भेंट की एवं उनके अनुरोध पर दो गज़लें भी सुनाईं |
--------यह एक संक्षिप्त द्विपक्षीय गोष्ठी थी | सैनी जी यद्यपि अपने अन्तरंग मित्रों प्रतिष्ठा संस्था के अध्यक्ष श्री स्व. रामाश्रय सविता, वीरेन्द्र अंशुमाली एवं जगत नारायण पांडे के स्वर्गारोहण के पश्चात गोष्ठियों में कम ही आते जाते हैं परन्तु उम्र के इस मुकाम पर भी वे साहित्य सृजन में व्यस्त हैं| पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं|
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श्री प्रेमचन्द्र सैनी जी आशियाना व आलमबाग क्षेत्र में प्रत्येक गुरूवार को होने वाली साहित्यिक गोष्ठी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं|
-------वर्ष सन २००५ में प्रतिष्ठा संस्था, आलमबाग के महामंत्री (स्व)  श्री वीरेन्द्र प्रकाश गुप्ता’अंशुमाली’ एवं महाकवि( स्व.)प. जगतनारायण पांडे ने विचार-विमर्श के उपरांत एक एसी गोष्ठी-वर्ग बनाने का निश्चय किया जो अनौपचारिक हो एवं संस्थाओं के विविध प्रोटोकोल अध्यक्ष, नियम–कायदे आदि से स्वतंत्र केवल सृजनात्मकता को बढ़ावा देने का हेतु हो, जिसमें अधिक कवि भी न हों |
--------यह एक अन्तरंग गोष्ठी की परिकल्पना थी जिसमें एक दूसरे की रचनाओं पर पारस्परिक विमर्श एवं कमियों व विशेषताओं पर विचार हो, जिसका मूल उद्देश्य केवल कविता पढ़कर चल देने की अपेक्षा साहित्यक-सामाजिक श्रेष्ठता पर भी ध्यान दिया जाना था|
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दोनों मनीषियों ने श्री प्रेमचन्द्र सैनी को साथ लिया एवं जगत नारायण पांडे जी के घर पर प्रथम गोष्ठी का आयोजन किया एवं मुझे भी सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया गया |
------इस प्रकार यह चार कवियों द्वारा प्रारंभ यह गोष्ठी अपने विशिष्ट साहित्यिक कार्यक्रम के साथ प्रारंभ हुई| तत्पश्चात श्री मधुकर अष्ठाना, रामदेवलाल विभोर को भी शामिल किया गया | --------बारी बारी से सदस्यों के आवास पर आयोजित होने वाली गोष्ठी में बसंत राम दीक्षित, स्व.पंकज श्रीवास्तव, स्व. निर्मला साधना व अन्य कवि भी शामिल होते गए और अपना वर्तमान संस्थागत रूप लेती गयी |
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इस प्रकार लखनऊ के साहित्यिक क्षेत्र में यह एक विशिष्ट गोष्ठी के रूप में स्थापित हुई जिसमें न कोइ अध्यक्ष, न अतिथि न संचालक है | न कोइ चन्दा, न मासिक अंशदान इत्यादि | सभी के घर पर बारी बारी से अनवरत रूप से होती रहती है | सभी एक क्रम से अपनी अपनी रचनाओं को प्रस्तुत करते हैं, उन पर सामाजिक-साहित्यिक रूप से विचार विमर्श भी होता है |
----लखनऊ में प्रायः गोष्ठियां रविवार को ही होती हैं एक या दो को छोड़कर जो शनिवार को या फिर अनियातिकालीन , जो कभी भी होजाती हैं |
-------अतः इस गोष्ठी को प्रत्येक गुरूवार को होना सुनिश्चित किया गया एवं कोइ विशिष्ट औपचारिक नाम न रखकर इसे ***गुरुवासरीय गोष्ठी*** का नाम दिया गया |
----अनौपचारिकता, उच्च कोटि की साहित्यिक प्रगति एवं साहित्य के सामाजिक सरोकार जिसका मुख्य उद्देश्य है |
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चित्र में---गुरुवासरीय गोष्ठियों के दृश्य ------
श्री अंशुमाली व जगत नारायण पांडे .....डा रामाश्रय सविता व प्रेम चन्द्र सैनी मेरे आवास पर गोष्ठी में .......प्रेम चन्द्र सैनी --कुछ शायरी की बात होजाए --पढ़ते हुए ........गुरुवासरीय गोष्ठी के विविध दृश्य ..
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मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार---डा श्याम गुप्त

                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



            गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार
       प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली विशिष्ट गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, नवसृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त, कविवर श्री बिनोद कुमार सिन्हा,अनिल किशोर शुक्ल निडर, श्री रामदेवलाल विभोर,  प्रदीप कुशवाहा, महेश अस्थाना, प्रदीप गुप्ता, श्रीमती पुष्पा गुप्ता, विजयलक्ष्मी महक , मंजू सिंह एवं श्रीमती सुषमागुप्ता व डा श्यामगुप्त ने भाग लिया |
       वाणी वंदना डा श्याम गुप्त, सुषमागुप्ता व श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने की | गोष्ठी का प्रारंभ करते हुए श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर ने तम्बाकू की हानियों पर प्रकाश डालते हुए दोहे प्रस्तुत किये---
तम्बाकू से फेफड़े होने लगते ग्रस्त |

उल्टी होती जब कभी गिरने लगता रक्त |
       डा.योगेशगुप्त ने नदी रेत व सागर के अंतर्संबंध की दार्शनिक व्याख्या करते हुए अतुकांत रचना प्रस्तुत की ---बाँध बांधने से भी क्या होगा

          नदी को तो खोना ही है ;

          रेत के विस्तार में

          या सागर के प्यार में |
       श्रीमती पुष्प गुप्ता ने गृहस्थ जीवन को अग्निपथ बताते  हुए कहा—
गृहस्थ जीवन अग्निपथ, गृहणी की कर्मभूमि,

तपोभूमि, निष्ठा परिपक्व, सहज मन, अच्युत थिर हो | 
      श्रीमती मंजू सिंह ने फूलों की विशिष्टता पर गीत सुनाते हुए कहा-
फूल कभी रोते नहीं ,

फूलों को तो बस हंसना आता है |
       श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने बेटी व दुल्हन समन्वित गीत प्रस्तुत किया—
बेटी वाला क्या देगा, क्या लोगो तुम,

बेटी से बढकर कोइ सौगात नहीं होती
      कविवर  श्री महेश अस्थाना प्रकाश ने दिल से दिल को राहत पर गुनगुनाया---
आओ हम गुनगुनालें, दिल से दिल मिला हम लें |

ना शिकवा हो ना शिकायत, दिल से दिल को राहत मिले |
    कवि प्रदीप गुप्ता ने भी फूलों की नाजुकता यूं बयाँ की---
फूल आहिस्ता फैंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,

होजाते हैं खुद तो घायल, पर औरों को सुख देते हैं|
    प्रदीप कुशवाहा ने जीवन के बारे में अपना अभिमत प्रस्तुत करते हुए कहा –

जीवन स्वयं एक प्रश्न है,सबको हल करना है |

हंसकर या रोकर, प्रदीप जीवन जीना है |
      
      बिनोद कुमार सिन्हा ने पुराने ज़माने को याद करते हुए गुनगुनाया—
वे भी क्या ज़माने थे  हर क्षण खुश के तराने थे |

मेरी हसरत भरी निगाहें, बेसब्र रही थी दीदार के |
    श्री रामदेव लाल विभोर ने अँधेरे और जुगनूं की बात की –
चमकना गर न आता हो, तो पूछो उस अँधेरे से,

उड़ा करता जहां जुगनूं, है खुद की रोशनी लेकर |
     सुषमागुप्ता जी ने मुरलीधर कान्हा को करुणा का सागर बताते हुए गीत प्रस्तुत किया—
हे करुणा के सागर श्याम,

मुरलीधर कान्हा घनश्याम |
       डा श्यामगुप्त ने आजकल चिकित्सकों व अस्पतालों में हो रही लापरवाही पर जन सामान्य को भी दोषी बताते हुए एक नवीन तथ्य की प्रस्तुति की ---
पैसा आज बहुत पब्लिक पर, सभी चाहते, ‘वहीं’ दिखाएँ |

चाहे जुकाम या कुछ खांसी, विशेषज्ञ ही हमको देखे |.......
    तथा उन्होंने नारी की त्रासदी को इंगित करते हुए एक प्रश्न उठाया---–
औरत आज भी डर डर कर जिया करती है ,

जाने किस बात की कीमत अदा करती है |
        अगीत विधा के प्रवर्तक एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद् के संस्थापक अध्यक्ष साहित्यभूषण साहित्यमूर्ति डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने गोष्ठी की समीक्षात्मक सराहना करते हुए अपना सुप्रसिद्ध गीत सुनाया....
जगमगाता हुआ दीप मैं बन सकूं

स्नेह इतना ह्रदय में भरो आज तुम |
      द्वितीय सत्र में कविगण पुष्पा गुप्ता, विजय लक्ष्मी महक, मंजू सिंह, प्रदीप कुशवाहा, महेश अष्ठाना, श्री रामदेव लाल विभोर एवं सुषमा गुप्ता को सम्मान पात्र देकर को सम्मानित भी किया गया |
      संक्षिप्त जलपान एवं डा श्याम गुप्त द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के पश्चात् गोष्ठी समाप्त हुई |

गोष्ठी का दृश्य

साहित्यकारों का सम्मान


 

शनिवार, 4 मार्च 2017

गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास पर ----डा श्याम गुप्त

                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


गुरुवासरीय गोष्ठी दि.२-३-१७ गुरूवार 

             प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास के-३४८, आशियाना , लखनऊ पर सायं ३ बजे से ६ बजे शाम को आयोजित हुई |

                   गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, डा श्याम गुप्त, श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर , श्रे बिनोद कुमार सिन्हा व सुषमा गुप्ता श्री मनीष श्रीवास्तव, पूजा गुप्ता ने भाग लिया | गोष्ठी का प्रारंभ डा श्याम गुप्त की वाणी वन्दना---

माँ हमारी चेतना में नवल सुर लय धुन सजादो ,
भाव की ऊंची शिखाएं, मन ह्रदय में जगामगा दो |.....से प्रारंभ हुआ| श्रीमती सुषमा गुप्ता , अनिल किशोर निडर एवं बिनोद कुमार सिन्हा ने भी वाणी वन्दना की ----

                       चर्चा सत्र में काव्य गोष्ठी के आकार –प्रकार पर संक्षिप्त चर्चा में डा श्याम गुप्त व अनिल किशोर जी का कथन था कि गोष्ठी का आकार अधिक बड़ा नही होना चाहिये अन्यथा उसमें काव्य चर्चा व गुणदोष विवेचन जैसा महत्त्व का विषय नहीं हो पाता, बस कविता पढ़ने के कर्म की इतिश्री ही हो पाती है |
श्री बिनोद कुमार सिन्हा की सद्य –प्रकाशित काव्य संग्रह ‘इन्द्रधनुष-एक प्रयास’ की रचनाओं एवं साहित्यकारों के दायित्व पर संक्षिप्त चर्चा की गयी तथा इस कृति के लोकार्पण की भूमि-रेखा पर विचार किया गया |


        श्री बिनोद कुमार सिन्हा को सम्मान -पत्र, प्रतीक चिन्ह व व पुष्प गुच्छ देकर श्री कुमार विजय सम्मान प्रदान किया गया |

कविता सत्र में ----- श्री अनिल किशोर निडर ने प्रस्तुत किया—

हैं धन्य धन्य भारतवासी, है यहाँ बनी नगरी काशी |
काशी में मिलता परम धाम,भोले का मंदिर है ललाम ||

            श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने दर्द और बेदर्द का समायोजन करते हुए गीताज्ञान, गोविन्द और दर्द का रिश्ता गुनगुनाया ---
लोग कहते मुझे बेदर्द हूँ,/ केवल दर्द हूँ बेदर्द नहीं ;
दो दिलों को मिलाता, / हमदर्द हूँ, दिले दर्द नहीं |
दर पर मेरे जो आता / याद करता गोविन्द को ;
होता ज्ञान सहज में /दुख भोगता शरीर, आत्मा नहीं |
देता हूँ ज्ञान गीता, दर्द नहीं / बिनोद कहते दर्द हूँ बेदर्द नहीं ||

          डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने राम-गिलहरी, रत्ना-तुलसी, राधा-कृष्ण के प्रेम को रंजित करते हुए सुनाया—
दुष्टों के दलन हेतु, जीवन शमन हेतु,
राधे राधे, श्याम श्याम, राधे श्याम कहिये |

             श्रीमती सुषमा गुप्ता ने ---कहा---
मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं
मन का दर्पण है ये , मुस्कुराते रहो |..
.तथा—
होली खेली लाल ने, उड़े अबीर गुलाल,
सुर मुनि ब्रहमा विष्णु सब, तीनों लोक निहाल |

                डा श्याम गुप्त ने ---सुनाया ---
हे मन लेचल सत की ओर,
लोभ मोह लालच न जहां हो, लिपट सके ना माया |
मन की शान्ति मिले जिस पथ पर, प्रेम की शीतल छाया || ...

तथा होली के प्रसंग में—

एरी सखी जियरा के प्रीति रंग ढारि देउ
श्याम रंग न्यारो चढ़े , सांवरो नियारो है |


                          गोष्ठी के अंत में गुरुवारीय गोष्ठी के सदस्य वयोवृद्ध वरिष्ठ कवि स्व.श्री कौशल किशोर श्रीवास्तव को स्मरण किया गया | डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने स्मरण सुनते हुए बताया के श्री कौशल जी चुपचाप मुस्कुराया करते थे तथा कभी कभी किसी विशेष बात पर अड़ भी जाया करते थे| डा श्यामगुप्त ने बताया कि वे अत्यंत स्वाभिमानी एवं परम शिव भक्त थे और गोष्ठी में सदैव एक शिवजी से सम्बंधित रचना एवं एक सम-सामयिक रचना प्रस्तुत करते थे | श्री कौशल किशोर एवं गुजराती नाटकाकार श्री तारक मेहता के निधन पर दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत साहित्यकारों को श्रृद्धांजलि दी गयी |

              -श्री सिन्हा का सम्मान करते हुए डा श्याम गुप्त, डा रंगनाथ मिश्र सत्य , व अनिल किशोर शुक्ल व सुषमा गुप्ता

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रविवार, 4 दिसंबर 2016

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी ०१दिसम्बर २०१६ गुरूवार...डा श्याम गुप्त...

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 


----प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को आयोजित होने वाली गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी ०१दिसम्बर २०१६ गुरूवार को डा श्याम गुप्त के आवास सुश्यानिदी, के-३४८ , आशियाना , लखनऊ पर आयोजित की गयी |

---------गोष्ठी का प्रारंभ डा श्याम गुप्त द्वारा हरिगीतिका छंद में की गयी माँ शारदे की वन्दना से हुआ ..
"हम हैं शरण में आपकी माँ ज्ञान के स्वर दीजिये |
सुख शान्ति का वातावरण जग में रहे वर दीजिये |
कवि हों सुहृद समर्थ सात्विक सौम्य स्वर परिपूर्ण हों |
साहित्य हो सुन्दर शिवं सत तथ्य शुचि सम्पूर्ण हों ||"


----अशोक विश्वकर्मा गुंजन ने कई रचनाएँ प्रस्तुत कीं| नारी के जीने के अधिकार की बात प्रस्तुत करते हुए कहा--
"जीने का अधिकार चाहती हूँ ,
पर स्वाभिमान नहीं छोड़ना चाहती |"

----कविवर अनिल किशोर शुक्ल निडर ने पर्यावरण के प्रति आव्हान करते हुए कई रचनाये प्रस्तुत की एवं कहा---
"चलो सभी मिल वृक्ष लगाएं ,
घुटन तपन सब दूर भगाएं |"

-----कवयित्री सुषमागुप्ता ने ..मन पापी नहीं माने...जो कुछ भी है मैंने सुनाया आदि गीतों से वातावरण को योग ध्यान मय करते हुए सुनाया --
" हे मन ! क्या अभिमान करे |
क्या लाया, क्या लेजायेगा,
किसका मान धरे ..|"

---श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने राष्ट्रपर्व, विमुद्रीकरण आदि पर विभिन्न रचनाये प्रस्तुत करते हुए नोटबंदी व कालाधन पर व्यंग्य प्रस्तुत किया तथा काले धन को काले नाग से संबोधित करते हुए एक अगीत प्रस्तुत किया --
"बजी बीन संपेरे की
गूंजा स्वर ,
शहर गाँव गली गली
काले नाग निकल पड़े |"

---डा श्याम गुप्त ने कालजयी कविता एवं छंदों पर प्रस्तुत अतुकांत गीतों के साथ अपनी रचना 'श्याम मधुशाला' प्रस्तुत की जिसका काव्यांश प्रस्तुत है ---

" पीने वाला क्यों पीता है,
समझ न सकी स्वयं हाला |"
"मंदिर मस्जिद सच्चाई पर
चलने की हैं राह बताते |

और लड़खड़ाकर नाली की,
राह दिखाती मधुशाला ||"

-----श्री गिरीश कुमार मिश्र ने गज़लों के गुलदस्ते पेश करते हुए कहा--
"दरअसल अपना अमन खोते चले जाते हैं हम |
ख्वाहिशों के ढेर को ढोते चले जाते हैं हम | "

---साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने राधाकृष्ण का प्रेम की छंदीय रचना प्रस्तुत की --
"दुष्टों के दालान हेतु, जीवन शमन हेतु,
राधे राधे , श्याम श्याम, राधे श्याम कहिये |"

-----चाय सत्र में चर्चा पर हरिगीतिका छंद के विधान व छंद सौन्दर्य पर चर्चा की गयी |

-- श्याम मधुशाला की हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला से तुलनात्मक तथ्य प्रस्तुत किये गए कि बच्चन की मधुशाला में दार्शनिक तथ्य समुचित है जबकि श्याम मधुशाला में वैज्ञानिक व उसके सामाजिक नकारात्मक प्रभावों पर अधिक जोर दिया गया है |

---डा श्याम गुप्त के वक्तव्य कि गीतों की अधिक लम्बाई एक दुर्गुण है, श्रोता सुनते सुनते यह भूल जाता है कि कहाँ से प्रारम्भ हुआ व किस पर समाप्त हुआ , पर चर्चा हुई कि इसमें गीत का उद्देश्य भी भ्रमित होने का अंदेशा रहता है | नीरज युग के बाद उनकी गीतों की परम्परा आगे न चलने का एक प्रमुख कारण यह भी है |

----श्रीमती सुषमागुप्ता के धन्यवाद ज्ञापन के पश्चात गोष्ठी अगले आयोजन तक स्थगित की गयी |

 







शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

गुरुवासरीय गोष्ठी दि.४-८-१६ वृहस्पतिवार को संपन्न ----- डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

                            ******गुरुवासरीय गोष्ठी दि.४-८-१६ वृहस्पतिवार*****

------प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली गुरुवासरीय गोष्ठी दि.४-८-१६ वृहस्पतिवार को डा श्याम गुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, डा श्याम गुप्त, श्री बसंत राम दीक्षित, कौशल किशोर, श्रीमती विजय लक्ष्मी महक, मंजू सिंह, अनिल किशोर शुक्ल निडर, अशोक विश्वकर्मा, गुंजन, श्रीमती सुषमा गुप्ता एवं श्री विनोद कुमार सिन्हा ने काव्यपाठ में भाग लिया |
---काव्य-गोष्ठी के प्रारम्भ से पहले अनौपचारिक वार्ता में श्री विनोद कुमार सिन्हा के उठाये विषय ‘कविता बनती है या बनाई जाती है‘ पर विवेचना की गयी, सभी उपस्थित साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किये |
------ गोष्ठी का प्रारम्भ करते हुए डा श्यामगुप्त ने सरस्वती वन्दना में कहा ..
" माँ लिखती तो सब कुछ तुम हो. नाम मुझे ही देदेती हो |
आप लिखातीं सारे जग से,लिखा श्याम ने कहा देती हो |..."
श्रीमती विजय लक्ष्मी महक एवं अनिल किशोर शुक्ल द्वारा भी माँ की वन्दना की गयी |
------श्री अशोक विश्वकर्मा ‘गुंजन’ के अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा-
"आयेंगे याद हम तुम्हें एक बार फिरसे,
जब तेरे अपने फैसले तुझे सताने लगेंगे |"
-------अनिल किशोर शुक्ल निडर ने भारत के सपूतों को ललकारा—
‘"भारत माँ के अमर सपूतो,
आगे बढाकर आना होगा |"
------- कवयित्री श्रीमती विजय लक्ष्मी ने ज़िंदगी से शिकवा करते हुए कहा...
"काश ए ज़िंदगी ! हम भी तेरी निगाहों में चढ़े होते |
नामचीनों की कतार में हम भी खड़े होते |"
-------श्रीमती मंजू सिंह ने भोले शंकर की अभ्यर्थना करते हुए इच्छा प्रकट की----
"मेरे भोले भाले शंकर को , किसी की नज़र न लगे |’
-------- श्रीमती सुषमा गुप्ता जी ने एक सुन्दर जीवन गीत प्रस्तुत किया ---
“तुम ही मेरे अंग संग हो,तुम ही तो रस रीति रंग हो |
उपमा रूपक उत्प्रेक्षाएं भी तुझको कब पा सकती हैं |
तुम श्लेष माधुर्य ओज हो, भाव व्यंजनायें तुम ही हो |"
एवं सावन के ऋतु के अनुरंजन में ब्रजभाषा में एक मल्हार भी गीत प्रस्तुत किया...
"आई सावन की बहार,
बदरिया घिर घिर आवै | "
------- श्री कौशल किशोर ने शिवकी अर्चना करते हुए कहा-
"दुनिया में देव हज़ारों हैं महादेव की महिमा क्या कहने |
सबको प्यारे, तनुधारी भूत पिशाच भी हैं इनके |"
-------श्री विनोद कुमार सिन्हा ने सावन में प्रिय से वार्तालाप करते हुए सुन्दर गीत प्रस्तुत किया –
‘सावन को प्रिय आजाने दो ,
मधुमय नभ रस बरसेंगे |"
------- कविवर बसंत राम दीक्षित ने श्रृगार गीत प्रस्तुत करते हुए कहा—
"रूपसी बोली नयन से, देखलो भरपूर मुझको ,
और अपनी प्यास को चहक कर बुझालो |"
------ डा श्याम गुप्त ने एक कवित्त द्वारा इसे घनाक्षरी क्यों कहते हैं इस छंद की परिभाषा प्रस्तुत की....
" घनन घनन घन घन के समान करें,
श्रोता को भावें करें घन जैसी गर्जना |" .... तथा
---कुछ देव घनाक्षरी छंद प्रस्तुत किये ---
“मन बाढ़े प्रीती ऐसी तन में अगन श्याम,
साजन बजावै द्वार-खिड़की खनन खनन |’
------विवेचित विषय ‘कविता बनती है या बनाई जाती है’ को संदर्भित करते हुए डा श्याम गुप्त ने गीत प्रस्तुत किया –
“बीज कविता का सदा मन में बसा होता है,
कोइ सींचे तो ये अंकुर हरा होता है |’
---------समापन व्याख्या व विवेचना करते हुए साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने आतंकवाद पर चोट करते हुए एक प्रस्तुत किया –
सीमा पार से आते हैं आतंकी सदा,
इसलिए मित्र की मिताई में न रहिये |
तथा यादों के घन से संदर्भित करते हुए सुन्दर गीत सुनाया –
मचल रहे गरज गरज यादों के घन.....
.यादों के घन |
---- इस अवसर पर श्रीमती सुषमा गुप्ता व विजय लक्ष्मी जी को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के सन्दर्भ में प्रभावी व उल्लेखनीय सेवा का प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया ...
------अंत में जलपान के पश्चात डा श्यामगुप्त व श्रीमती सुषमा गुप्ता ने सभी उपस्थित विद्वानों का आभार व्यक्त किया |
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 अनिल किशोर शुक्ल निडर का काव्यपाठ
Drshyam Gupta's photo.
सुषमा गुप्ता द्वारा प्रस्तुत एक गीत 
चित्र में ---१.श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर का काव्यपाठ...२.सुषमा गुप्ता द्वारा प्रस्तुत एक गीत ...३.वयोवृद्ध कवि कौशल किशोर की भोले वन्दना...४.विनोद कुमार सिन्हा काव्यापाठ करते हुए ...५.बसंत राम दीक्षित का गीत....६.डा श्याम गुप्त का काव्य पाठ....७.श्रीमती विजय लक्ष्मी डा रंगनाथ मिश्र को अपनी पुस्तकें भेंट करती हुईं ....८.सुषमाजी व विजय लक्ष्मी जी का सम्मान ९. डा सत्य का काव्य पाठ ....

डा श्याम गुप्त का काव्य पाठ

श्रीमती विजय लक्ष्मी डा रंगनाथ मिश्र को अपनी पुस्तकें भेंट करती हुईंसाथ में कवि अशोक विश्वकर्मा गुंजन एवं सुषमा गुप्ता व् मंजू सिंह

.सुषमाजी व विजय लक्ष्मी जी का सम्मान

डा सत्य का काव्य पाठ ...
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कवि कौशल किशोर की भोले वन्दना
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विनोद कुमार सिन्हा काव्यापाठ करते हुए
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बसंत राम दीक्षित का गीत.