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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

पुस्तक---ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद ----- सप्तम मन्त्र का काव्य भावानुवाद ...डा श्याम गुप्त..

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...    



ईशोपनिषद के सप्तम मन्त्र ..- यस्मिन सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः |
                       तत्र को मोह: कः शोक: एकत्वंनुपयश्तः ||...का काव्य भावानुवाद ...

कुंजिका- यस्मिन =जिस अवस्था में... सर्वाणि भूतानि=सम्पूर्ण जगत को...आत्मन्येव अभूत= स्वयं के(परमात्मा के) समान ही हुआ ...विजानत: = जान लेता है ..तत्र =.. एकत्वं =एकत्व भाव से ... अनुपश्यत: = देखने वाले को...को मोह =क्या मोह...क: शोक =क्या शोक ..|

मूलार्थ- जब वह व्यक्ति, योगी यह मर्म जान लेता है कि आत्मतत्व ही समस्त चराचर जगत में प्रकट है उसका ईश्वर से एकत्व होजाता है, स्वयं परमात्म तत्व के सामान होजाता है| ऐसा ईश्वर से तादाम्य एवं एकत्व दृष्टि प्राप्त योगी या पुरुष स्वयं ब्रह्म ही होजाता है इस परमशान्ति अवस्था में उसे कोई मोह या शोक नहीं रह जाता|     



सकल जगत में वही ब्रह्म है,
उसी ब्रह्म में सब जग स्थित |
प्रेम भक्ति अनुभूति प्राप्त वह,
प्राणी ज्ञान भाव पाजाता |

जब संकुचित आत्मभाव हो,
सदा मोह का भाव उभरता |
मोह भ्रमित, दैहिक वियोग से,
शोक उभर कर माया रचता |

जब व्यापक हो आत्मभाव यह,
मन निर्विषय ध्यान में रमता |
अहंब्रह्म, खंब्रह्म भाव से,
व्यापक आत्मभाव होजाता |

तब परमार्थ भाव व्यापक हो,
तू ही मैं है, मैं ही तू हूँ |
यह एकत्व प्राप्त वह ज्ञानी,
मोह शोक अनुरक्त न होता |


भूत जगत परमात्म आत्म सब,
एक हुए उस योग दृष्टि में |
कहाँ आत्म का मोह मचलता,
वस्तु वियोग शोक कब रहता |

यह एकत्व का योग-भाव जब,
अनुभव, ज्ञान, आचरण युत हो |
सतत कर्म-भाव बन जाता,
योगी ज्ञान-मार्ग पा जाता |

भक्ति, कर्म और ज्ञान योग युत,
सर्वभूत, सर्वात्म दृष्टि युत |
खाते पीते उठते भजते,
तू ही तू, तू ही तू गाता |

तेरा मेरा का ममत्व तज,
समाधिस्थ वह आत्मलीन हो |
तदाकार हो आत्म, ब्रह्म लय,
आत्म स्वयं ब्रह्म होजाता ||













 

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