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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शनिवार, 23 मई 2009

एक अफ़्साने में नेहरू की ह्कीकत-- हि.समा.

राम चन्द्र गुहा को अचानक नेहरू जी याद कैसे आगये? इसे कहिये वक्त ी नव्ज़ पकडना ।एक अन्ग्रेज़ी पुराना उपन्यास--में ये पढ कर समझ में आता है ्कि सारा  उपन्यास एक बात कहने के लिये लिखा गया है कि--अन्ग्रेज़ ही भारतअच्छी चीज़ें छोड गये थे(भारत तो तब भी अनपढ ,ज़ाहिल था ,अब भी है व रहेगा अगर हिन्दू की ज़िद पर अडा रहा तो ) जिन के बल पर भारत ,नेहरू,व सर्कार ठीक काम कर रही थी,व कर सकती है, जो हें--लोक्तन्त्र,ब्रिटिश शाशन प्रणाली,अभिव्यक्ति ओर धर्म की स्वतन्त्रता ,औरतों की आज़ादी,देश भक्ति(जैसे भारत तो इन से सदैव अन्जान ी है ओर ये अन्गरेज़ों की ईज़ाद हें) ---यह बात गुहा जैसे लोगों के दिमाग में नहीं आयेगी--अन्ग्रेज़ी  चश्मे के कारण।--अन्ग्रेजों व अन्गरेज़ी  केप्रचार का ठेका जो्ले रखा हे.। अपने मुंह मियां -मिट्ठू ??  
      वही हाव-भाव क्या अब भी जोर-शोर से नहीं चलरहे?
  ये ग्यान (या अग्यान) की पराकाष्ठा है ।

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