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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

बी टी बेंगन-- विविध तर्क व व्याख्याएं ---

एक तरफ हरित क्रान्ति के जनक जैव विशेषग्य बी टी बैंगन को हानिकारक कह रहे हैं तो दूसरी ओर किरण मजूमदार जैसे बिज़नेस बाले लोग ' भावनात्मक नहीं तर्क पूर्ण विवेचना हो' के माध्यम से बायोटेक को झटका, रिसर्च प्रभावित होना, अवैज्ञानिक तौर तरीके के बहाने सकी पक्षदारी कर रहे हैं।
वस्तुतः बिजेनेस वाले एसे लोग न तो विज्ञान को समझते हैं न सामाजिकता को ,भावना को, वे सिर्फ धंधे को समझते हैं, येन केन प्रकारेण--व्यवसाय बस।परम्परागत या भारतीय विज्ञान को ये लोग अवैज्ञानिक मानते है --अंग्रेज़ी व विदेशी एवं कमाई के चश्मे के कारण |वस्तुतः विज्ञान सिर्फ तर्क पर चलता है, व धंधा बाज़ार पर। पर जहां मानव व जीव की बात आती है वहां भावना आधारित तर्क पर विवेचना होनी चाहिए । सिर्फ तर्क केवल कुतर्क होता है । विज्ञान या तर्क -मानव के लिए हैं नाकि मानव -विज्ञान या तर्क के लिए । अतः ''भावनात्मक तर्क पूर्ण विवेचना" होनी चाहिए प्रत्येक बिंदु की । जैव विशेषग्य व कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रतीत होता है कि --
---१.महंगे विदेशी बीज के लिए किसानों को अपना बहुत सा धन खर्च करना होगा , अपना देशी बीज व्यर्थ होजाएंगे। देशी प्रजातियाँ भी कालान्तर में नष्ट होकर हम पूर्णतः विदेशों पर आश्रित होंगे। जो वही स्थिति है जब ईस्ट इंडिया कंपनी के ब्रिटिश -बुनाई की मशीनों के कारण भारतीय जुलाहों घरेलू उद्योग की हुई थी
---२। धन के लालच में एक ही फसल के बहु उत्पादन से अन्य फसलें चौपट होंगी , कीट-पक्षी-पशु जगत , वनस्पति जगत पर दुष्प्रभाव से ईकोलोजी प्रभावित होगी |
---३। और संवर्धन के लिए विदेशी तकनीक, विदेशी यंत्र, विदेशी मुद्रा के लिए देशी धन का उपयोग -->महंगाई??
---हमें होशियार रहना होगा

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