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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

आलोचना ---विचार व कथन के गहन तत्वार्थ ----


---प्रस्तुत विचार प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार श्री हेमंत शेष के हैं । एसे विचार प्राय: हम सभी भावना वश, करूणावश कहाजाते हैं परन्तु उनकी वास्तविकता नहीं सोचपाते।
--क्या विद्वान् कवि या हम यह नहीं समझते कि मनुष्य पक्षी नहीं है जो झुण्ड या समुदाय या भीड़ तंत्र से चलते हैं , उनमें विवेक , प्रगति की इच्छा, सामाजिकता, उच्च कोटि के विचारों भावों के उचित चयन शक्ति एवं मौके नहीं होते । सिर्फ आत्म-सुविधा जीविता होती है। कोइ भी और जीवधारी चारों पुरुषार्थ के लायक नहीं है -धर्म, अर्थ, काम , मोक्ष के-; आपसबने युवा तोते( या पक्षी) को अपने बच्चे को दाना खिलाते देखा होगा , पर क्या कभी किसी युवा तोते को बूढ़े तोते के मुख में दाना देते देखा है ? मनुष्य की तरह । नहीं , मनुष्य के अलावा कहीं भावनाएं नहीं होतीं । वृद्ध होने का अर्थ -भूखा -प्यासा मरना। यदि हमें चिड़ियों से सीखना है तो प्रगति के पीछे जाकर चिड़िया ही बनना होगा । फिर हम प्रगति क्यों करें , जानवर ही न बने रहें । ये सारे कथन एकपक्षीय , सीमित दृष्टि वालों के हैं | उदाहरण देने का उचित तरीका यह है कि---"कुत्ता भी पूंछ हिला कर बैठता है " हम कुत्ते को महिमा मंडित नहीं वरन मनुष्य को कुत्ते से ऊंचा होने का स्मरण दिलारहे हैं। न कुत्ते से सीख लेने की बात हैअपितु स्वयं अपने प्रज्ञा-विवेक को जानने की बात है ।
--बच्चों से बड़ों को सीख लेना चाहिए या बच्चे भी बहुत कुछ बड़ों को सिखा सकते हैं --वाक्य भी इसी तरह का वाक्य है।

3 टिप्‍पणियां:

BrijmohanShrivastava ने कहा…

नहीं डाक्टर साहेब । उनका सीधा साधा मंतव्य यह था कि जब बिभिन्न प्रजाति के पक्षी एक साथ एक सीमित दायरे मे रह सकते है तो हम बिभिन्न जाति,धर्म सम्प्रदाय के लोग एक साथ क्यों नही रह पाते ।आपने तो मैटर को घुमा ही दिया ।चिडियों से सीखने की बात अगर है तो दत्तात्रेय जी ने २४ गुरु बनाये थे। बच्चो से सीख क्यों नही ली जा सकती कुये के पुराने मैढक को शहर का घूमा फ़िरा मैढक कुछ सिखा ही सकता है ।एक पढा लिखा छोटा बच्चा किसी अपढ बुजुर्ग को छोटा अ बडा आ क्यो नही सिखा सकता

Dr. shyam gupta ने कहा…

यही तो बताया जारहा है कि हम मानव हैं चिेडियां नहीं, उनमें सिलेक्टिव प्रग्या नहीं होती, धर्म सम्प्रदाय आदि का ग्यान नहीं होता, वे सिर्फ़ प्राणी की पहचान जानते हैं। मानव जैसी उच्च विचारशीलता-तत्विकता नहीं; कहावत है कि नहीं--भेड चाल-- एवम बहुत से मूर्ख एक बात पर सहमत होजायेंगे परन्तु दो विद्वान नहीं।
--गुरु दत्तात्रेय ने व्यक्तिगत स्तर पर गुरु बनाये थे, सामान्यीकरण नही।यूं तो पन्चतन्त्र व तमाम कथाओं में पशु पक्षियों की विद्वता की कथाएं है, कागभुशुन्डि-कौआ,सम्पाती, वानर, रीछ आदि हैं वे सब विशिष्ट भाव में हैं राम( मानव) के अनुचर-गुरु नहीं, आपके शहर का घूमा फ़िरा मेंढक मेढक को सिखाएगा आदमी को नहीं; विशिष्ट संदर्भ में शुकदेव ने भी अपने पिता को ग्यान दिया----ये सब विशिष्ट संदर्भ हैं इन्हें सामान्य, सार्वजनीन नियम बनाकर नहीं लिखा जासकता। बच्चे पढकर अहं से ग्रस्त होन्गे , जो अज होरहे हैं, स्कूलों में गोलियां चलाकर।

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

मेरी समझ से बाहर है..

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'पाखी की दुनिया' में इस बार माउन्ट हैरियट की सैर करना न भूलें !!