ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

हल्दी, कढ़ी, फोटोथीरेपी,..विज्ञान और अंधविश्वास ...डा श्याम गुप्त

<------ नीले प्रकाश से पीलिया का इलाज़...फोटोथीरेपी यूनिट... हल्दी , ,कढी, फोटोथीरेपी --विज्ञान व अंधविश्वास..... इन में आपस में क्या सम्बन्ध हो सकता है ! वस्तुतः यह पोस्ट लिखने का मुझे अचानक ही विचार आया क्योंकि मैंने अनुभव किया कि--
- जब भी कोई जन- समस्या व आन्दोलन की बात चलती है तो हर व्यक्ति समाज का ठेकेदार बन कर उसे भुनाने लगता है बिना उसके दूरगामी निहितार्थ व प्रभाव जाने , चाहे बात नारी आन्दोलन की हो, या एन जी ओ या भारतीय ज्ञान , धर्म , शास्त्रों की बातों की , प्रथाओं की, अंधविश्वासों की हो , चाहे वह उसका ज्ञान व उचित विषय भाव रखता हो या नहीं ।
२- आजकल वैसे भी भारतीयता, शास्त्र , धर्म की बातें तुरंत अंधविश्वास के दायरे में आजाती हैं , खासकर हिन्दू धर्म ,शास्त्र, पुराण , दादी नानी के नुस्खे , पुरा ज्ञान की बातें आदि...(अब राहुल गांधी की हिन्दू-कट्टरता के वक्तव्य पर कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि यह राजनैतिक आलेख नहीं है। )
३-पिछले काफी समय से विज्ञान के प्रसार व तथाकथित अंधविश्वास के उन्मूलन हेतु साहित्य, समाचार-पत्र, संस्थाएं, स्वयंभू ब्लोग्स आदि मेरे संज्ञान में आते रहे हैं जो मूलतः हिन्दू आस्थाओं व विश्वासों के अंधविश्वास की बातें होती हैं, पाश्चात्य प्रभाव के अनुकूलन सहित ।
वास्तव में पाश्चात्य विचार धारा --प्रत्येक नवीन वस्तु- विचार -तथ्य को तीब्रता से अपना लेने व उसी शीघ्रता से छोड़ देने की है जो आकर्षण की प्रमुखता व अनुभव की अप्रमुखता के कारण है....जबकि पौर्वात्य भारतीय विचार धारा प्रत्येक नवीन को लम्बे समय तक देख- परखकर , अनुभव सिद्ध करके स्वीकार करने की है
और उसी प्रक्रिया से तुरंत की अपेक्षा लम्बे समय बाद छोड़ने की भी है इस विचार धारा का प्रभाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर दिखाई पड़ता है और इस मूल अंतर में सदियों व युगों में भी ताल-मेल नहीं होता हाँ कुछ पाश्चात्य प्रभावित लोग अवश्य प्रभावित दिखाई पड़ते हैं और सभी भारतीय -बातों को दकियानूसी समझ कर उस पर नाराजी प्रकट करते दिखते हैं | इसीलिये किसी विचारक ने सही कहा है --"ईस्ट इस ईस्ट , वेस्ट इस वेस्ट नेवर ट्विन शेल मीट"...अब हम एक अंधविश्वास के बारे में बात रखेंगे....
-----अब ---हल्दी , कढी, फोटोथीरेपी --विज्ञान अंधविश्वास..... इन में आपस में क्या सम्बन्ध हो सकता है ? यह एक अंधविश्वास माना जाता है कि पीलिया ( जांडिस )के रोगी को पुरातन-पंथी या दादी केनुस्खे के हिसाब से पीली बस्तुएं( हल्दी की, बेसन की व अन्य पीले रंग की खाद्य व कपडे आदि का प्रयोग ) खाने / पहनने को मना किया जाता है । मैं स्वयं आधुनिक प्रभाव वश फिर विज्ञानका क्षात्र , फिर चिकित्सा विग्यान का क्षात्र , फिर चिकित्सक होने तक इसे पीलिया पीली वस्तु के खाने में आपस में कोई सम्बन्ध नहीं
समझता रहा हूँ। यद्यपि इस प्रकार के तथ्य को जो लोग सदियों से मान रहे हैं सदैव मेरी उत्कंठा व मनन का विषय रहे । इसीके साथ विज्ञानं के आधुनिक आविष्कार पीलिया रोग के इलाज़ में सूर्य का प्रकाश फोटोथीरेपी का खूब प्रयोग भी करता रहा व होते हुए जानता रहा हूँ , परन्तु दोनों बातों को कभी एक करके नहीं देख पाया ।
अभी हाल में ही एक नवजात शिशु को फोटोथीरेपी के दौरान नीले प्रकाश को देखकर अचानक ही जब मैंने दोनों बातों को सम्मिलित किया देखा। पीलिया में बिलीरूबिन के पीले रंग के कणों को रक्त में से निकालने में नीले रंग का प्रकाश ही सबसे अधिक प्रभाव कारी क्यों है। ( यह आधुनिक चिकित्सकीय सिद्ध खोज है और फोटोथीरेपी का मूल सिद्धांत )। .....तो स्वतः ही पुरातन बात -पीलिया में पीली वस्तु खाने के परहेज़ का कारण समझ में आने लगा ।
अवश्य ही यह रंग -विज्ञान के गहन गूढ़ वैज्ञानिक तथ्य हैं जो अभी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान नहीं जान सका है। पीले रंग का खाद्य-पदार्थ अवश्य ही मोलेक्यूलर चिकित्सा विज्ञान का उन्नत ज्ञान है जो आयुर्वेद केअनुभव ज्ञान द्वारा भारतीय मानस में पैठ कर गया , जिसका कोई कारण आदि उन्हें ज्ञात नहीं । नीला रंग अवश्य ही पीले रंग का विरोधी होने के कारण रक्त से पीले कण हटाता है और पीले खाद्य पदार्थ उसे बढाते होंगे। प्राकृतिक चिकित्सा का एक भाग--रंग चिकित्सा -जिसमें विभिन्न रंग के कांच की बोतलों में सूर्य के जल से चिकित्सा की जाती है उसका भी शायद यही आधार है ।
अतः यह वास्तव में हमें हर पुरातन तथ्य को अंधविश्वास की भांति-अंधविश्वास नहीं कह देना चाहिएअपितु उन्हें जानकार, व्याख्या व अनुभव द्वारा परख कर उसे आधुनिक तथ्यों से तादाम्य द्वारा समझना चाहिए ।

4 टिप्‍पणियां:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

समझ में नहीं आता कि आप कहना क्‍या चाहते हो।

---------
आपका सुनहरा भविष्‍यफल, सिर्फ आपके लिए।
खूबसूरत क्लियोपेट्रा के बारे में आप क्‍या जानते हैं?

Dr. shyam gupta ने कहा…

यही कि...--- हमें हर पुरातन तथ्य को अंधविश्वास की भांति (यदि आप बिना तथ्य व्याख्यायित किये झट से अन्धविश्वास कहेंगे तो स्वयं उसी प्रकार नये अन्धविश्वास को बढावा देंगे)-अंधविश्वास नहीं कह देना चाहिए अपितु उन्हें गहराई से जानकर, व्याख्या व अनुभव द्वारा परख कर उसे आधुनिक तथ्यों से तादाम्य द्वारा समझना चाहिए । यह प्रगतिशीलता है....

सुरेन्‍द्र ने कहा…

गुप्‍ता जी ठीक कह रहे हैं आप लोग-बाग समझ नहीं पाते जैसे दयानन्‍द जी की ज्ञान की बात में विज्ञान नहीं ढूंड पा रहे

सत्यार्थ प्रकाशः लडके और लडकियों की पाठशाला दो कोश एक-दूसरे से दूर होनी चाहिए , ,,, स्त्रीयों की पाठशाला में पांच वर्ष का लडका भी, जाने न पावे

Dr. shyam gupta ने कहा…

सही ही है स्त्रियों की पाठशाला में कोई लडका जाये ही क्यों...