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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 3 अप्रैल 2011

वैदिक साहित्य में आधुनिक विज्ञान के तथ्य...डा श्याम गुप्त ......

                                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                                                            वैदिक  एवं उसके परवर्ती साहित्य में आधुनिक विज्ञान के बहुत से तथ्य सूत्र रूप में मौजूद हैं , उनमें से कुछ को यहाँ रखा जारहा है....
१- जीवाणु ( बेक्टीरिया )--- महाभारत , शान्ति पर्व १५/२६ ..में कथन है....

      "सूक्ष्म्य योनानि भूतानि तर्कागम्यानि कानिचित |

       पक्ष्मणो इति निपातेन येषां स्यात स्कंधपर्यय  ||"   ----अर्थात ..इस जगत में ऐसे सूक्ष्म जंतु हैं जिनका अस्तित्व यद्यपि नेत्रों से दिखाई नहीं पड़ता परन्तु वे तर्कसिद्ध हैं | ये इतने हैं क़ि आँखों की पलक हिलाएं उतने से ही उनका नाश होजाता है |
२- प्राणवायु आक्सीजन ---  ऋग्वेद १/३८/४६० में मरुद्गण( वायु देव ) की स्तुति में कहा है---
          "यद्यूयं पृश्निमातरो मर्तासिः सयाति | स्तोता यो अमृत स्यात ||"---हे मरुद्गन ! आप यद्यपि मरणशील हैं परन्तु आपकी स्तुति करने वाला अमर हो जाता है |---- वायु  ( आक्सीजन के रूप में ) यद्यपि मानव शरीर के अन्दर स्वांस रूप में जाकर स्वयम मृत (कार्बन डाई आक्साइड बन कर अशुद्ध रूप ) हो जाती है परन्तु व्यक्ति को जीवन देकर अमर कर जाती है |
३- मरुभूमि की स्थानीय वर्षा ---  ऋग्वेद ४/३८/४६९ में कथन है क़ि....
         "सत्य्त्नेणां अभवंतो धन्वंचिद रुद्रियामांण | मिंह क्रिन्वात्या वाताम ||"  ---यह सत्य है क़ि रुद्रदेव के पुत्र मरुत मरुभूमि में भी आवात ( वात रहित -वायु रहित ) स्थिति में भी वर्षा करते हैं | निम्न वायु दाब में स्थानीय वर्षा का वर्णन है |
४- विद्युत् गर्जन -नाइट्रोजन-चक्र -- ऋग्वेद १/३८/४६४  में कथन है .....
          "वाश्रेव विद्युन्मिमाति वत्सं न माता सिषक्ति | यदेषां वृष्टि  रसर्जि ||" ---जब मरुद्गन वर्षा की सृष्टि करते हैं तो विद्युत् रंभाने वाली गाय की भांति शब्द करती है , और गाय द्वारा बछड़े की भांति पृथ्वी का पोषण करती है | --- वायु द्वारा गतिशील मेघों के परस्पर घर्षण से उत्पन्न विद्युत ( आकाशीय -तडित) तीब्र गर्जन करती है  और भूमि को उर्वरक प्रदान करके( नाइट्रोजन चक्र द्वारा ) पोषण देती है |
५- जल चक्र --- ऋग्वेद १/१३४/१४८९ के अनुसार---ऋषि कहता है---
              "अजनयो मरुतो वक्षणाम्यो दिव आ वक्षणाभ्य: ||"  ---इन्हीं अजन्मा हवाओं से नदियों समुद्रों का जल ऊपर आकाश में जाता है और बरसकर पुनः नदियों में आता है | 

                                                                  ----क्रमश: .....

3 टिप्‍पणियां:

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

आभार इस जानकारी के लिये।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पता नहीं क्यों आधुनिक शिक्षा हमारे ग्रन्थों को कपोल कल्पित मानकर बैठी है।

Dr. shyam gupta ने कहा…

--धन्यवाद बवेजा जी. व पान्डे जी....वास्तव में आधुनिक शिक्षा का मूल ही -भारतीय ग्रन्थों व ग्यान को छिपा कर, नष्ट करके, उसके बारे में भ्रान्ति फ़ैला कर -अस्तित्व में आया है...