ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 21 सितंबर 2011

आ बसा है कौन ......गीत....ड़ा श्याम गुप्त.....

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



नयन  के द्वारे ह्रदय में,
आ बसा है कौन ?
खोल मन की अर्गलायें ,
आ छुपा है कौन ?          -----नयन के द्वारे......||


कौन है मन की धरोहर, 
यूं चुराए जारहा |
दिले-सहरा में सुगन्धित,
गुल खिलाए जारहा |
कौन सूनी राह पर,
प्रेमिल स्वरों में  ढाल कर ;
मोहिनी मुरली अधर धर,
मन लुभाए जारहा |
धडकनों की राह से,
नस नस समाया कौन ?        
लीन  मुझको  कर, स्वयं-
मुझ में समाया कौन |        ----नयन के द्वारे ...........||


जन्म जीवन जगत जंगम -
जीव जड़ संसार |

ब्रह्म सत्यं , जगन्मिथ्या ,
ज्ञान अहं अपार |
भक्ति-महिमा-गर्व-
कर्ता की अहं -टंकार |
तोड़ बंधन, आत्म-मंथन ,
योग अपरम्पार |
प्रीति के सुर-काव्य बन,
अंतस समाया मौन  ,
मैं हूँ यह या तुम स्वयं हो -
कौन मैं तुम कौन ?               -----नयन के द्वारे .....||

4 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

समर्पण व प्रेम का सुन्दर गीत।

Rakesh Kumar ने कहा…

ब्रह्म सत्यं , जगन्मिथ्या ,
ज्ञान अहं अपार |
भक्ति-महिमा-गर्व-
कर्ता की अहं -टंकार |
तोड़ बंधन, आत्म-मंथन ,
योग अपरम्पार |
प्रीति के सुर-काव्य बन,
अंतस समाया मौन ,
मैं हूँ यह या तुम स्वयं हो -
कौन मैं तुम कौन ? ---

अदभुत,अनुपम ,बेमिसाल.
आपकी सुन्दर प्रस्तुति से मन
मग्न हो गया है.

बहुत बहुत आभार.

veerubhai ने कहा…

मुग्धा भाव की श्रृंगारिक मृदुल रचना .आनुप्रासिक चहता ,दर्शन समझाती .प्रेम में मैं कौन ,तू कौन .

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद ...पांडे जी, समर्पण ही तो प्रेम-बेमिसाल है .....

----धन्यवाद राकेश जी....सिर्फ प्रेम ही सत्य है शेष सब कुछ असत्य है....सृष्टि की ईशत इच्छा ..एकोहं बहुस्याम ...उस ब्रह्म का अहैतुकी प्रेम-निरूपण ही तो है सृष्टि हेतु ..

---धन्यवाद वीरू भाई जी....दर्शन का मूल प्रेम ही तो है ...केनेषितं पतति प्रेषितं मन:...ईषत- प्रेम..इच्छा ही तो ...