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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

श्याम स्मृति ----- -- डा श्याम गुप्त

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                       
 श्याम स्मृति -१----कहानी की कहानी  व भावी पीढी   ---- 
                           पहले वेद-उपनिषद् आदि में  घटनाओं का सत्य वर्णन किया जाता था, पौराणिक काल में सत्य को सोदाहरण कथारूप में लिखा जाने लगा, ताकि सामान्य जन समझ सके व उचित राह पर चल सके |  आगे चलकर कथाओं-गाथाओं का जन्म  हुआ जो सत्य-व वास्तविक घटनाओं, पात्रों, चरित्रों के आधार पर कहानियां थीं--'एक राजा था', 'एक समय..', 'एक राजकुमार ...' , 'एक दिवस....' , 'काम्पिल्य नगरी में एक धनी सेठ...' , 'एक सुंदर राज कुमारी '.आदि-आदि, जो समाज व व्यक्ति का दिशा निर्देश करती थीं |  बाद में कल्पित चरित्र ,घटनाओं आदि को आधार बनाकर कल्पित कथाएँ व गल्प, फंतासी आदि लिखी जाने लगीं जिनमें सत्य से आगे बढ़ा चढ़ा कर लिखा जाने लगा परन्तु वह किसी न किसी समाज, देश,काल की स्थिति-वर्णन होती थीं और बुराई पर अच्छाई की विजय |
                         परन्तु आज क्या लिखा-दिखाया जारहा है, पूर्ण असत्य  कथा-कहानी,  'इस सीरियल -कहानी के पात्र, घटनाएँ, किसी भी देश-काल, समाज, जाति का प्रतिनिधित्व नहीं करते'  अर्थात पूरी तरह से झूठी कहानी;जब ये सब कहीं हो ही नहीं रहा है हुआ ही नहीं, कहीं मानव-मात्र से संवंधित ही नहीं, तो कहानी किस बात की |                               
                       क्या-क्या  मूर्खताओं के साए में पल रहे हैं आज-कल हम, हमारा साहित्य, साहित्यकार व समाज ..... कैसे सत्य को पहचाने  हमारी भावी पीढी  |

  


श्याम स्मृति - २ --आधुनिकता व  प्रगतिशीलता .... 
                   आधआधुनिकता व  प्रगतिशीलता ....  सिर्फ समयानुसार ...भौतिक बदलाव --ओडना-पहनना, खाने-पीने के तरीके अर्थात उठने-बैठने के भौतिक-सुख रूपी सुविधाओं के नवीन-ढंगों को ही नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि वे तो सदा ही बदलते रहेंगे,अपितु  समाज व  मानवता  के उत्थान हेतु चिंतन व सोच के नए तरीकों, आयामों  को ही कहा जा सकता है जो पुरा-ज्ञान से समन्वित होते हों ....संस्कृति  ज्ञान, दर्शन , कला, धर्म आदि के मूल तथ्य तो शाश्वत हैं ...सर्वदा वही रहते हैं  सदैव प्रकाश देते रहे हैं  और आज भी हमें प्रकाश दे रहे हैं  | जो मील के पत्थर बनते हैं उनसे आगे नए पत्थर तो बनाए जा सकते हैं परन्तु उन मील के पत्थरों को हटाया नहीं जासकता , हटाने को प्रगति नहीं कहा जा सकता ...कृष्ण ने गीता तो कही परन्तु यह भी कहा कि वेदों में मैं सामवेद हूँ....यही प्रगतिशीलता व आधुनिकता है ...|

4 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आज जो लोगों को अच्छा लगे और बेचा जा सके, उसी दिशा सारा सृजन बढ़ चला है।

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद पांडे जी ..सत्य बचन...

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

सार्थक सामयिक आलेख . यह है इस कचरे के प्रति लोगों की सनक बहुत बढ़ी हुई है .

shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद शर्माजी...