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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 8 मई 2013

ये कौन सा अमृत है व कौन सी साधना है ...डा श्याम गुप्त

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



ये कौन सा अमृत है व कौन सी साधना है?

         .वस्तुतः मेरे विचार से जैसे आजकल जाने कितने गली गली में, तम्बू तम्बू में आश्रम 
बनाए बाबाजी बैठे हैं उसी भांति समाचार पत्रों के कालमों, ब्लागों में साइबर संसार के कालमों में भी 
जाने कितने बाबाजी टाइप के लिक्खाड़, प्रायोजित कालम साधक, कलम के साधक..सिर्फ लिखने के लिए लिखने वाले, आचरण-साधना, अमृत साधना, अध्यात्म आदि पर आधे अधूरे ज्ञान रूपी अज्ञान के आधार पर ..अपने अपने स्वयं के मत साध रह हैं | उदाहरण स्वरुप में ..
       
.हिन्दुस्तान के मनसा वाचा कर्मणा शीर्षक के अंतर्गत अमृत साधना देखिये ....उसके वाक्यों, शब्दों व अर्थों की निरर्थकता देखिये....कटिंग के चित्र पर १ से 10 तक लगाए गए चिह्नित देखें...

१,रचनात्मकता का अर्थ..’हर पल कुछ नया करना’.....वह नया यदि सकारात्मक नहीं है परमार्थ साधक नहीं है, नवोन्नत-कारक नहीं है, विध्वंसक है  तो क्या उसे रचनात्मकता कहा जायगा ??? ...नहीं वह अकर्म होगा विकर्म व दुष्कर्म भी हो सकता है ...किसी विशिष्ट सार्थक रचना को रचनात्मकता कहा जाता है |

२,किसने कहा है कि  सिर्फ चित्र बनाना, संगीत व कविता ही रचनात्मकता है......अनुचित कथ्य है |

.ये तो बौद्धिक रचनाएँ हुईं.....क्या संगीत, कला, मूर्तिकला सिर्फ बौद्धिक रचनाएँ हैं इनमें शारीरिक श्रम नहीं ...अज्ञानता है लेखक की...फिर क्या बौधिक रचनाएँ ..रचनात्मक कार्य नहीं हैं ...

४. यदि हर पल व हर काम रचनात्मकता है ..तो मनुष्य सिमट कैसे गया ..क्या उसने कर्म करना बंद कर दिया जो हो ही नहीं सकता ...अनर्गल कथ्य है अपने है कथ्य के विपरीत ...

५.त्याग वादी धर्म...नकार व त्याग...एसा कौन सा धर्म है जो त्याग का सन्देश नहीं देता...क्या लेखक का इशारा किसे विशेष धर्म से है ?.....अथवा धर्म होना ही नहीं चाहिए फिर वह आगे ओशो का जिक्र क्यों करता है ..

६.ध्यान करना है तो व संसार का आनंद नहीं ले सकता ....किस धर्म में एसा कहा गया है ... धर्म सांसारिक आनंद को लेने के साथ सच्चे ईश्वरीय आनंद की बात करते हैं  ...

७. ध्यान है अंतर्जगत की  यात्रा बाहर के प्रति तिरस्कार .....किस धर्म में एसा लिखा है ....बाहर से भीतर की ओर ..ही धर्म का उद्देश्य है ..

८.जिसे बाहर का तिरस्कार है भीतर का भी तिरस्कार करेगा ......क्यों व कैसे ?

९.ओशो ने पहली बार कहा कि रचना को ठुकराओगे तो रचयिता का अपमान होगा....लेखक ने इतिहास व साहित्य नहीं पढ़ा लगता है ...ओशो से युगों पहले एक वारांगना, वैशाली की नगरवधु ने यही कहा था...

१०. छोटे से छोटा काम भी ....आनंद ... इसमें नया क्या है सभी यही कहते हैं...मनोयोग से किये काम को हे तो योग कहते हैं जो आनंद देता है वशर्ते वह सकारात्मक हो .....

                   यह कौन सी अमृत साधना है, भ्रांतियों पर आधारित  एवं समाचार पत्र भी कौन सी साधना परोस रहा है .....अंध-विश्वास...अकर्म...भ्रान्ति....  
 

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