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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 27 अप्रैल 2014

श्रुतियों व पुराण-कथाओं वैज्ञानिक तथ्य--अंक-७.. राजा इल, शिखंडी व महर्षि च्यवन ...डा श्याम गुप्त ...

.                            ...कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                      श्रुतियों व पुराण-कथाओं में भक्ति-पक्ष के साथ व्यवहारिक-वैज्ञानिक तथ्य-

   राजा इल, शिखंडी व महर्षि च्यवन ....लिंग-परिवर्तन एवं पुनर्यौवन-प्राप्ति तथा अन्य 

चिकित्सकीय प्रकरण---


       (  श्रुतियों व पुराणों एवं अन्य भारतीय शास्त्रों में जो कथाएं भक्ति भाव से परिपूर्ण व अतिरंजित लगती हैं उनके मूल में वस्तुतः वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक पक्ष निहित है परन्तु वे भारतीय जीवन-दर्शन के मूल वैदिक सूत्र ...’ईशावास्यम इदं सर्वं.....’ के आधार पर सब कुछ ईश्वर को याद करते हुए, उसी को समर्पित करते हुए, उसी के आप न्यासी हैं यह समझते हुए ही करना चाहिए .....की भाव-भूमि पर सांकेतिक व उदाहरण रूप में काव्यात्मकता के साथ वर्णित हैं, ताकि विज्ञजन,सर्वजन व सामान्य जन सभी उन्हें जीवन–व्यवस्था का अंग मानकर उन्हें व्यवहार में लायें |...... स्पष्ट करने हेतु..... कुछ उदाहरण एवं उनका वैज्ञानिक पक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है ------ )



 सेक्स-चेंज अथवा लिंग-परिवर्तन---- -

          आज की वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति हारमोन और सर्जरी द्वारा लिंग परिवर्तन अर्थात  नर को मादा व मादा को नर में परिवर्तन कर देना सम्भव हो गया है। हिन्दू पुराणों में --- राजा इल का इला (स्त्री) और पुन: इल (पुरुष) बनने की कथा तथा शिखंडी की कथा इसी विषय को प्रस्तुत करती है|
                इल वाह्लीक देश (अरब ईरान क्षेत्र के जो इलावर्त क्षेत्र कहलाता था ) के राजा थे| एक समय शिकार खेलते हुये वे उस निर्जन स्थान पर जा पहुँचे, जहाँ कार्तिकेय का जन्म हुआ था। पार्वती को प्रसंन्न करने के लिए शंकर जीने नारी रुप धारण कर रखा था एवं  वहाँ के सब पशु-पक्षी भी मादा रुप में परिवर्तित होगये थे| इल और उसके साथी भी सुंदरियों में परिवर्तित हो गये। पार्वती ने उन्हें एक मास स्त्री और दूसरे मास पुरुष-रुप में रहने का वर दिया। स्त्री का रूप पाकर वे पुरुष की बातें भूल जाते थे। उन सुदरियों को मार्ग में तपस्यारत चन्द्र पुत्र बुध मिले। बुध इल के स्त्री रूप ‘इला’' पर आसक्त हो गये। बुध ने इला से विवाह कर लिया तथा  सेविकाओ को किंपुरुषी (किन्नरी) हो कर पर्वत के किनारे रहने और निवास करने को कहा कि .. आगे चल कर तुम सभी स्त्रियों को किंपुरुष प्राप्त होगे ...किंपुरुषी नाम से प्रसिद्ध हुयी सेविकाए जो संख्या में बहुत थी पर्वत पर रहने लगी  इस प्रकार किंपुरुष जाति का जन्म हुआ | इला ने कालांतर में बुध के पुत्र पुरुरवा  को जन्म दिया।  
                पिता के कष्ट को देख कर पुरुरवा ने अश्वमेध यज्ञ करवाया जिससे प्रसंन्न होकर शिव जी नेइला को पुन: पुरुष (इल) बना दिया। अपना भूतपूर्व नगर वाह्लीक अपने पुत्र शशबिंदु  को सौपकर राजा इल नेमध्य प्रदेश (गंगा यमुना संगम के निकट ) प्रतिष्ठानपुर '(इलाहाबाद ) बसाया। जो उनके बाद पुरुरवा को प्राप्त हुआ

------ शिव स्वयं सभी चिकित्सा विद्याओं के आदि -चिकित्सक है | वह प्रदेश शायद हिमालय के पार उत्तरी भाग में स्थित सुमेरु प्रदेश  रहा होगा, किम्बदंतियों के अनुसार अभी हाल के इतिहास में इसके किंपुरुष वर्ष नामक क्षेत्र के व्यक्ति वहां व्याप्त वनस्पतियों का सेवन कर इच्छानुसार  कभी स्त्री तो कभी पुरुष रूप धारण करने में सक्षम थे| और अपने जीवनकाल में ही कभी स्त्री होने का तथा कभी  पुरुष होने का अनुभव प्राप्त कर सकते थे| यह शायद प्रजनन-अंगों का एक दूसरे में ट्रांसप्लांट विधि का प्रयोग का उदाहरण है |

         शिखण्डी के जन्म के उपरान्त लिंग-परिवर्तन की बहुचर्चित-महाभारत की कथा मिलती है| काशीराज की पुत्री अम्बा जिसने भीष्म से बदला लेने प्रण किया था राजा द्रुपद के घर शिखंडी नाम से कन्या रूप पैदा हुई परन्तु वह किम्पुरुष थी ...अतः विवाह में यह भेद खुल जाने पर आत्महत्या हेतु वन में चली गयी वहां यक्ष स्थूलाकर्ण ने प्रसन्न होकर उसे अपना पुरुषत्व इस शर्त पर देदिया (क्योंकि वह स्वयं भी स्त्री बन कर देखना चाहता था ) कि अपना प्रतिशोध पूर्ण होने पर वह पुरुषत्व पुनः वापस ले लेगा|  इसी शिखंडी के पुरुष न होने का भेद ज्ञात रहने के कारण ही भीष्म ने उस पर अपना वार नहीं किया था और मृत्यु को प्राप्त हुए | शिखंडी का कार्य समाप्त होजाने पर भी शिवजी का अपने गण स्थूलाकर्ण से अप्रसन्न होजाने के कारण उसे अपना पुरुषत्व पुनः नहीं मिल पाया |

------ सम्भवत: यक्ष स्थूणाकर्ण ने उसका लिंग-परिवर्तन औषाधियों के माध्यम से कर दिया था। अथवा प्रजनन-अंगों का एक दूसरे में ट्रांसप्लांट विधि का प्रयोग किया गया होगा | अप्रसन्न होने पर शिवजी ने उसे पुनः यह क्रिया करने से रोक दिया होगा|


 महर्षि च्यवन को पुनर्यौवन की प्राप्ति ---

    भृगु पुत्र पोलोमी च्यवन महर्षि के तपस्या में रत होने पर दीमकों ने उनके शरीर पर बांबी बनाली थी राजाशर्याति की अप्रतिम सुन्दर कन्या सुकन्या द्वारा कौतूहलवश असावधानी में लकड़ी डालकर उनकी आँख फोड़ देने पर उसे वृद्ध ऋषि से विवाह करना पडा| सुकन्या मनोयोग से उनके सेवा करने लगी| देव वैद्य अश्विनी कुमारों की चिकित्सा से वृद्ध च्यवन-ऋषि का वार्धक्य दूर हुआ एवं स्वस्थ होकर उन्हें यौवन प्राप्त हुआ| अश्विनद्वय द्वारा यौवन-प्राप्ति हेतु जो औषधि दी गई थी, वह आज `च्यवनप्राश´ के नाम से प्रसिद्व है जो स्वास्थ्य, ओज एवं आयुवर्द्धक होने के साथ-साथ शरीर की प्रतिरोधी-क्षमता की भी वृद्धि करता है| 
        पारसागुंबा नामक एक जड़ी हिमालय की ऊंची चोटियों पर आज भी सुलभ है, इस जड़ी में पुनयौंवन उद्दीपन की शक्ति है जो आधुनिक शोध द्वारा सत्यापित की जा चुकी है। हो सकता है वही या समानधर्मा गुण वाली औषधि का प्रयोग अश्विनीकुमारों ने किया हो |
         अश्विनीकुमार  अंग-प्रत्योरोपण एवं संजीवनी विद्या में निपुण थे। वे कुशल पशु चिकित्सक भी थे| इन्द्र के अण्डकोशों को प्रत्यारोपण..... विशाला की टूटी टांग को ठीक करना, ..... अंधे कण्व को नेत्र ज्योति प्रदान करनासर्जरी के उत्तम उदाहरण हैं |
      वघिरमति का वंध्यात्व दूर कर पुत्रवती बनाना व राजा कक्षीवान की कन्या घोषा का कुष्ठ रोग दूर करना आदि प्रसिद्द काय-चिकित्सकीय उदाहरण हैं|

3 टिप्‍पणियां:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…



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अत्यंत गूढ़ गहन गंभीर विषयों का ज्ञान रखने वाले ही गिने-चुने होंगे...
फिर इन विषयों पर लेखनी चलाना , ...और शृंखलाबद्ध ज्ञान का प्रसाद रोचक शब्दावलि में निरंतर बांटते रहने का महनीय कार्य किसी और के वश का संभव नहीं लगता ।
वाह ! वाऽह…! वाऽऽह…!

आदरणीय श्याम गुप्त जी
हृदय से साधुवाद स्वीकार करें ।

आपके काव्य को पढ़ने की प्यास रहती है ,
आते रहेंगे बार-बार आपके यहां
:)

मंगलकामनाओं सहित...
-राजेन्द्र स्वर्णकार


shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद राजेन्द्र जी ....स्वागत है ....

shyam gupta ने कहा…

अत्यंत गूढ़ गहन गंभीर विषयों में आनंद लेने वाले भी गिने-चुने ही होते हैं ...