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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग पांच ------------श्री जगत नारायण पांडे---- डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



अगीत - त्रयी...---- भाग पांच ------------श्री जगत नारायण पांडे----
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--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-


महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
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वक्तव्य ..
“अहंकार की संतुष्टि न होने से संशय, भ्रम, लोभ मोहादि का जन्म होता है जिनकी पूर्ति न होने से क्रोध होता है जो अंततः विनाश का कारण बनता है | अहंकारजन्य विकार अनुशासन, सामाजिक-समरसता और लोक मंगल को नष्ट करते हैं और सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता है |”
“संस्कृत छंद अतुकांत होते हुए भी लय एवं गेयता से पूर्ण होते हैं | अगीत, अतुकांत, तुकांत एवं अगेय अथवा लयबद्ध एवं गेय होते हैं|”
"अगीत पांच से दस पंक्तियों के बीच अपने आकार को ग्रहण करके भावगत-तथ्य को सम्पूर्णता से प्रेषित करता है|”
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जीवन परिचय....
साहित्य की प्रत्येक विधा ...गद्य-पद्य, गीत-अगीत, छंद-ग़ज़ल सभी में समान रूप से सिद्धहस्त एवं रचनारत तथा कविता की अगीत-विधा के गति-प्रदायक महाकवि श्री जगत नारायण पांडे का जन्म लखनऊ के कान्यकुब्ज परवार में सं. १९३३ में हुआ| कुछ अपरिहार्य कारणों से आपकी शिक्षा-दीक्षा बिलम्ब से प्रारम्भ हुई| आलमबाग, लखनऊ के अमरूदही बाग़ मोहल्ले में घर के समीप ही प्राइमरी स्कूल से आपने चहर्रुम तक शिक्षा पाई परन्तु उर्दू में भी ज्ञान प्राप्त कर लिया | स्कूल के हेडमास्टर श्री वृन्दाबख्स ने उनकी लगन देख कर उन्हें अंग्रेज़ी की शिक्षा देकर ‘कान्यकुब्ज कालेज में दाखिले योग्य बनादिया| जहां से आपने हाईस्कूल व इंटर की परीक्षा पास की | वे अपने पिता के साथ रामायण की मंडली में रामायण पाठ, भजन-कीर्तन भी किया करते थे, जिसने उन्हें देवी-देवताओं के प्रति भक्ति भावना प्रधान बना दिया| इसी परिवेश के चलते उन्होंने बी ऐ, एल एल बी तक शिक्षा प्राप्त की | कालिज की हिंदी गतिविधियों में वे बराबर भाग लेते रहे|
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आपका विवाह सीतापुर निवासी स्व. शिवनारायण मिश्र की की पुत्री मालती से हुआ | आपके चार संताने हैं बड़े पुत्र विजय का व्यवसाय है, छोटे पुत्र केशव पांडे एम् ऐ एल एल बी,एडवोकेट है व तीसरे पुत्र राजीव जेसी आईएसएफ़ में इन्स्पेक्टर हैं| सबसे बड़ी पुत्री हैं जो बीऐ हैं एवं उनका विवाह डा रमेश चन्द्र शर्मा से हुआ है|
अधिवक्ता के रूप में आप दीवानी व फौजदारी के मुकदमों में निष्णात थे एवं अन्य अधिवक्ता भी उनसे परामर्श लेते थे| न्यायालय में होने वाले सांस्कृतिक कार्यों में उनका योगदान रहता था| आप विधिक सेवा प्राधिकरण के मानद सदस्य भी रहे| ऐसी महान विधिक व साहित्यिक विभूति महाकवि पं .जगत नारायण पांडे १६ फरवरी २००७ ई. को भगवदधाम प्रयाण कर गए |
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साहित्यिक परिचय—
आपकी साहित्यिक यात्रा का सूत्रपात कालिज के दिनों से ही होचुका था| तत्पश्चात वकालत के व्यवसाय के साथ साथ ही वे काव्यसाधना में भी रत रहे| हिन्दी, अंग्रीजी, उर्दू पर उनका अच्छा अधिकार था एवं संस्कृत भाषा का भी अच्छा ज्ञान था| काव्य की हर विधा-- गद्य-पद्य, गीत अगीत, छंद , हाइकू ,ग़ज़ल, मुक्तक, संतुलित कहानियां, व्यंग्य आलेख आदि पर उनका समानाधिकार था| देश की विभिन्न पात्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशन के अतिरिक्त ,आकाशवाणी से काव्यपाठ के अतिरिक्त दूरदर्शन पर पत्रोत्तर कार्यक्रम को भी स्थान दिया गया | लगभग २० काव्य-कृतियों की भूमिकाएं भी उन्होंने लिखी है जिनमें श्री वीरेन्द्र अंशुमाली की ‘तात्याटोपे’ मधुकर अस्थाना की ‘वक्त आदमखोर’, डा योगेश गुप्ता की कृति’ अंतर-क्षितिज’ एवं महाकवि डा श्याम गुप्त के अगीत महाकाव्य ‘सृष्टि’ व अतुकांत काव्यसंग्रह ‘काव्य-मुक्तामृत‘ उल्लेखनीय हैं |
अगीत काव्य विधा को उन्होंने पूरे मनोयोग से अपनाया एवं निखारने व गति प्रदान करने में अतुलनीय सहयोग दिया| अगीत विधा में अगीत के नवीन छंद गतिमय सप्तपदी अगीत की रचना की जिसमें आपने प्रथम खंडकाव्य ‘मोह व पश्चाताप’ एवं प्रथम महाकाव्य ‘सौमित्र गुणाकर‘ की रचना करके आपने अगीत-विधा को निखारने एवं अग्रगामी होने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| आपके ३३१ अगीतों का संग्रह ‘अगीतिका’ भी प्रकाशित है| शिव-पार्वती विवाह के विषय पर सवैया व बरवै छंदों में आपने ‘इदम शिवाय’ कृति की भी रचना की है|
पता--५६५/१०, अम्ररूदही बाग़,
आलमबाग ,लखनऊ
              .क्रमश ---भाग छः ---श्री जगत नारायण पांडे के कुछ अगीत ...
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