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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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शुक्रवार, 12 मई 2017

ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद -- आत्म कथ्य -भाग चार -डा श्याम गुप्त ....

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

                     ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद -- आत्म कथ्य --डा श्याम गुप्त


                                                                 भाग चार
           भाग तीन में उपनिषदकार .....ने विद्या-अविद्या, ज्ञान व कर्म, भौतिक संसार एवं आत्मिक जगत के समन्वय से उत्तम, उचित सत्कर्म करने  व अकर्मों से दूर रहने पर प्रकाश डाला था कि वह क्यों व कैसे इस ब्रह्म
६.
विद्या को  प्राप्त करे ताकि उचित व सही दिशा में किये गए अपने कर्मों से समाज व मानवता को प्रगति की ओर दिशा प्रदान करे |
            प्रस्तुत अंतिम भाग में मन्त्र १५ से १८ तक , बताया गया है कि उचित कर्मों व कर्तव्य पालन व कार्यों में सत्यता व  वास्तविकता होनी चाहिए अन्यथा उस कर्म की उपयोगिता नहीं रहेगी | और इस जगत में सत्य को छिपाने के लाखों साधन व बहाने हैं  | मनुष्य को उनसे सावधान रहना चाहिए |
हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखं |
तत्वं पूषन्न पावृणु सत्यधर्माय दृष्टये  ||...१५ ..
             सत्य का मुख सुवर्णमय पात्र से ढंका हुआ है,  हे पूषन! उस सत्य धर्म के दिखाई देने के हेतु तू उस आवरण को हटा दे |  अर्थात चमक-धमक वाली वस्तुएं, धन, सुख-सुविधाएं आदि प्रलोभन मनुष्य को सत्य से अवगत होने नहीं देते एवं उसे  सत्य के कर्तव्य पथ से विमुख कर देते हैं और विविधि अकर्मों व दुष्कर्मों में धकेल देते हैं | अतः हे ईश्वर ! इस प्रलोभन का आवरण सत्यता के ऊपर से हट जाय ताकि हम सत्य पर चल सकें|
               सत्य क्या है व सत्य को इतनी महत्ता क्यों दी जारही है | क्योंकि सत्य का ही दूसरा  नाम धर्म है  मूल कर्त्तव्य है ...... स: ति य: ..... अर्थात जिसमें  स: अर्थात अनश्वर जीव्  एवं ति अर्थात तिरोहितकारी विनाशशील संसार ...य:...दोनों का समन्वय है ..वह सत्य |.......ब्रह्म का नाम 'सत्यम' कहा  गया है |...स+ति+यम ...अर्थात  स: = जीव ...ति = तिरोहित ..विनाशयोग्य संसार ...यम = अनुशासन ....अर्थात जो  जीव व ब्रह्माण्ड दोनों को अनुशासन में रखने वाला है....धर्म है., कर्त्तव्य है ..ईश्वर है...ब्रह्म है वही  सत्य है |  ऐसी महत्वपूर्ण वस्तु आवरण रहित ही रहनी चाहिए अतः मानव सत्य के ऊपर से प्रलोभनों का आवरण हटाकर कर्तव्यपथ पर चले | तभी सारे कार्य उद्देश्यपूर्ण व सफल होते हैं |

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन समूह
तेजो यत्ते  रूपंकल्याणतम तत्ते पश्यामि,
योs सावसौ  पुरुष:  सो sहमस्मि ||....१६ ...
                     हे सब के पालक, अद्वितीय, अनुशासक-न्यायकारी,  प्रकाश स्वरुप ( ज्ञान दायक ) प्रजापति ( ईश्वर ) ...दुखप्रद ताप  किरणों  ( रश्मीन) को दूर करें एवं सुखप्रद तेज समूह( तेज ) को प्राप्त करा | आपका जो कल्याणकारी, मंगलमय रूप है मैं उसे  देख रहा हूँ अतः जो वह पुरुष (ईश्वर ) है वही मैं हूँ |
                वास्तव में जब मनुष्य ईश्वर के उन गुणों------ पूषन ......सबका पोषक बिना भेद-भाव के कर्तव्य कारक, ---एकर्षि.....अपने विशेष गुणों के कारण अद्वितीय  सब में समानरूप से प्रसिद्ध व सब को उपलब्ध, --- यम.... अटल न्यायकारी,---सूर्य .. अन्तःकरण से अज्ञान का अन्धकार हटाकर  हृदय में  ज्ञान का प्रकाश  देनेवाला,---- प्रजापति ....अपने प्रजा, परिवार, देश, समाज ,राष्ट्र व मानवता का रक्षक आदि .....को आत्मसात कर लेता है तो उसका सरल-सहज, भक्त-प्रेमी हृदय अपने प्रभु का दर्शन कर लेता है एवं स्वयं ईश्वर रूपमय होजाता है|  इसप्रकार  सत्य से आवरण हटने पर जब सत्य सम्मुख होता है तो ज्ञात होता है कि जो ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है वही मैं हूँ |
                            "मैं वही हूँ,
                              तू वही है | "..... ग़ज़ल- डा श्याम गुप्त

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम् |
ओम क्रतो स्मर क्लिवे स्मर कृतं स्मर  ||...१७.....
                 वायु: अर्थात शरीर में आने जाने वाला जीव ( अनिलं.=.जीव. शक्ति, प्राण, तेज, आत्मा  )  अमर है  परन्तु यह शरीर स्वयं केवल भस्म पर्यंत है अर्थात मर्त्य है, नाशवान है अतः अंत समय में हे जीव ओम का अर्थात उस ईश्वर
७.
का स्मरण कर, मन की निर्बलता, मृत्यु का भय आदि दूर करने के लिए ईश्वर का स्मरण कर एवं अपने किये हुए कर्मो का स्मरण कर |

                 उपनिषदकार का कथन है कि मनुष्य को अपना जीवन इस प्रकार व्यतीत करना चाहिए कि जब अमर आत्मा व नश्वर शरीर के वियोग अर्थात अपने अंतिम  समय में, वह ओम का उच्चारण अर्थात ईश्वर का ध्यान कर सके | अंतिम समय में मन में कोई  तृष्णा-- व एषणा ---लोकेषणा, पुत्रेषणा, वित्तेषणा  आदि न रहे अन्यथा उसे ईश्वर के ध्यान की बजाय पुत्रादि, धन, अधूरे कर्म आदि का ध्यान रहेगा एवं अंतिम समय कष्ट प्रदायक होगा |

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् |
  युयोध्य स्मज्जुहुराणमेन भूयिष्ठान्तेनाम उक्तिं विधेम ||..१८...
                    हे अग्ने ..प्रकाशमय सर्वशक्तिमान, तेजस्वी ईश्वर आप हमारे सम्पूर्ण कर्मों को जानने वाले हैं अतः हमें एश्वर्य अर्थात उचित ज्ञान व कर्म की प्राप्ति के अच्छे मार्ग ...सुकर्मों, सत्कर्मों पर चलाइये | हमें उलटे, टेड़े-मेडे, विकृत मार्ग पर चलने  रूपी  पाप से बचाइये | हम आपको बारम्बार प्रणाम करते हैं
                   वेदों के मन्त्रों -ऋचाओं का भाव  मूलतः दो रूपों  में प्राप्त होता है ...१. उपदेश रूप में --जहाँ मानव को अनेक शिक्षाएं दी गयी हैं ताकि वह अपने आचरण व कर्म से जीवन को उच्चकोटि का बनाए परन्तु वह अपने कर्म में स्वतंत्र है वह उपदेश उस रूप में ग्रहण करे न करे...२. नियम रूप में -- जो प्राकृतिक नियम रूप हैं एवं अनुल्लंघनीय हैं |   अंत में ईश्वर की दया का सहारा ही उचित है| पुण्य के पथ पर चलने में ईश्वर का सहारा ही आवश्यक है | मन्त्र १७ में .....'ओम क्रतोस्मर'....  उपदेश रूप में हैं  परन्तु ...'कृतं स्मर '....नियम रूप में है जीवन के अंतिम समय उसे अपने कृत्यों का स्मरण आयेगा ही एवं उन्हीं के अनुसार उसे अंत समय में दुःख या सुख का अनुभव होगा |.... उपनिषदकार ने इस अंतिम नमस्कार मन्त्र में पाप का मूल रूप उलटे मार्ग पर चलना ही कहा है | यही  संब अकर्मों, विकर्मों व दुष्कर्मों की जड़ है |
                             आज हम सभी उलटे मार्ग पर अग्रसर हैं |  स्वयं के भौतिक लाभ,  अति-सुखाभिलाषा, अनावश्यक  मनोरंजन, धनागम के अनावश्यक व अन्याय से प्राप्त श्रोत, अनावश्यक  धन-संचय, धन-आधारित व्यवथाएं ..स्कूल, कालेज, अस्पताल, संस्थाएं, खेल, मनोरंजन ....गली गली में गुरुओं,  साधू-संतों के मठ रूपी आलीशान  महल, चेलों की फौज, वोट की राजनीति आदि  सभी उलटे मार्ग अंतत दुष्कर्मों को प्रश्रय देते हैं जिनके कारण आज समाज में भ्रष्टाचार,  लूट-खसोट,  अनाचार, अत्याचार, बलात्कार आदि फैले हुए हैं |
                                    "अब तो हर ओर घना छाया धुंआ लगता है
                                      आदमी आजकल खुद  से भी खफा लगता है ||"डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल
                    निश्चय ही वेदों के अतिरिक्त विश्व के किसी भी धर्म,  संस्कृति,  समाज,  इतिहास,  दर्शन,  साहित्य, ज्ञान में इतनी अधुना-वैज्ञानिक  तार्किकता के साथ मानवीय कर्म व स्वयं में निष्ठा, श्रृद्धा,  भक्ति,  दर्शन,  आस्था, ईश्वर पर धार्मिक विश्वास के समन्वय के साथ मानव आचरण व कर्तव्यों के प्रति शिक्षाएं व ज्ञान का भण्डार देखने को नहीं मिलता |
               अत: वैदिक शिक्षा ....ईशोपनिषद के मन्त्र आज भी व्यक्ति समाज, राष्ट्र व मानवता को कर्म की वास्तविक राह दिखने में सक्षम  हैं,  सजग हैं,  तत्पर हैं समीचीन व सन्दर्भित हैं ...आवश्यकता है इन पर चलने की |
८.
                                "जब से उड़ने लगे हम श्याम प्रगति के पथ पर ,
                                   अपनी संस्कृति से ही मानव नट  गया यारो | "
                                   'खोलकर देखिये फलसफे की किताबों को,
                                    अब भी हर वर्क पे उलफत ही लिखा लगता है |'

                                 'चल दिये जब से  हम गैर की  राहों पर श्याम,
                                   दर्द भी अपनों का भी हमको खता लगता है |
                                                                                                                 ---डा श्याम गुप्त



 

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

नारी और मुक्ति... कहानी.... डा श्याम गुप्त...

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...






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                               नारी विमर्श व्याख्यान-माला गोष्ठी प्रारम्भ होने में अभी कुछ समय था। पधारे हुए सभी विज्ञजन विचार-विमर्श करने लगे। पांडेजी ने अभी हाल में ही पढ़ी हुई उर्वशी-पुरुरवा की कथा पर अत्यंत तार्किकता व सतर्कता से सौन्दर्यपूर्ण समीक्षा करते हुए अंत में कहा, ’उर्वशी पुरुरवा के लिए वरदान है’।
                             ‘हाँ, निश्चय ही, क्योंकि नारी, पुरुष का मुक्ति-पथ है, मुक्ति-सेतु है।’ ड़ा शर्मा बोले।
                             ‘और नारी की मुक्ति ?’ युवा लेखक राघव ने प्रश्न उठाया।
                             ‘पथ की भी कभी मुक्ति होती है ! वह तो सदा मुक्ति हेतु दीप की भांति कार्य करता है। स्त्री तो स्वयं ही पथ है मुक्ति का, इस पथ पर चले बिना कौन मुक्त होता है। संसार के हितार्थ कुछ तत्व कभी मुक्त नहीं होते मूलतः प्रकृति-तत्व, अन्यथा संसार कैसे चलेगा।’ ड़ा शर्मा ने अपना पक्ष रखा।
                           ‘अर्थात आपका कथन है कि नारी की मुक्ति होती ही नहीं। अमित जी ने हैरानी से पूछा,’ यह तो बड़ा अन्याय हुआ नारी के साथ।’
                          'नारी प्रकृति है, माया है। स्त्री द्विविधा भाव है। वही मोक्ष से रोकती भी है अर्थात संसारी भाव में जीव अर्थात पुरुष का जीना हराम भी करती है और और वही मोक्ष का द्वार भी है जीना आरामदायक भी करती है। काली के रूप में शिव को शव बनादेती है, सती के रूप में शिव को उन्मत्त करती है तो पार्वती बन कर शिव को चन्द्रचूड बना देती है और तुलसी को तुलसीदास। नारी को गौ रूप कहा जाता है अर्थात वह प्रकृति में पृथ्वी है, गाय है, इन्द्रिय है, संसार हेतु अविद्या है तो तत्व रूप में विद्या, ज्ञान व बुद्धि। बंधन में तो पुरुष अर्थात जीव रूप में ब्रह्म या पुरुष रहता है| उसी को मुक्त होना होता है। नारी, प्रकृति, माया तो बद्ध-पुरुष को मुक्ति के पथ पर लेजाती है| ड़ा. शर्माजी ने स्पष्ट किया। तभी तो ईशोपनिषद में मोक्ष मन्त्र कहा गया है.......
                                                  ” विद्या चा विद्या यस्तत वेदोभय स:
                                                   अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृमनुश्ते।|”
                          ‘तो फिर नारी के जीवन का उद्देश्य ही क्या रह जाता है। जब मुक्ति ही नहीं ?’ राघव ने पुनः प्रश्न उठाया।
                          ‘नारी की मुक्ति पुरुष से जुड़ी है। यदि नारी पुरुष को मुक्ति की ओर लेजाती है। वह पुरुष को मुक्ति-पथ पर चलने को तैयार कर पाती है अपने प्रेम, तप, साधना, त्याग, चातुर्य से तो वह अनाचारी, अत्याचारी, समाज एवं नारी पर भी अत्याचार का कारण नहीं बनेगा। समाज सम व द्वंद्वों से रहित रहेगा। क्योंकि मूलतः द्वंद्वों का कारण पुरुष ही होता है जो माया-बद्ध जीव है माया से भ्रमित। मेरे विचार से यही नारी की मुक्ति है।’ ड़ा शर्मा कहने लगे।
                         ‘आखिर यह मुक्ति है क्या ?’ अमित जी कहने लगे, ‘ जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होना या सांसारिक बंधन से मुक्ति ...या संसार से ?’
                          ‘और ये बंधन क्या है? ड़ा शर्मा ने प्रति-प्रश्न किया, पुनः स्वयं ही कहने लगे,’ द्वेष, द्वंद्व, झगड़े, लाभ-हानि, लोभ-लालच में लिप्तता ही बंधन है। यदि नारी पुरुष को सहज रखने में सफल रहती है तो सारा समाज ही सहज रहता है। यही नारी का नारीत्व है और यही उसकी मुक्ति। पुरुष भी नारी को पूर्णता प्रदान कर उसे मुक्ति-पथ की ओर ले जाता है। अंत में मुक्ति तो जीव–तत्व की ही होती है वह न पुरुष होता है न स्त्री वह तो आत्म-तत्व है। तभी तो कहा जाता है...
                                                       ’देहरी लौं संग बरी नारि और आगे हंस अकेला।
                            ‘पर जीव तो नारी भी है , फिर वह मुक्त क्यों नहीं हो सकती ?’ पांडे जी ने पूछा।
वास्तव में तत्व व्याख्या में नारी जीव नहीं है। वह तो शक्ति का रूपांतरण है। अतः नारी तो सदा मुक्त है। वह बंधन में होती ही कब है। वह तो स्वयं बंधन है। जीव, पुरुष रूपी ब्रह्म को बांधने वाली। पुरुष ही बंधन में होता है। ब्रह्म पुरुष रूप में, जीव रूप में आकर स्वयं ही माया-बंधन में बंधता है ताकि संसार का क्रम चलता रहे। नारी तो स्वयं ही माया है, प्रकृति है। पुरुष –ब्रह्म को बाँध कर नचाने वाली| यद्यपि माया स्वयं ब्रह्म की इच्छा पर ही कार्य करती है स्वतंत्र रूप से नहीं क्योंकि वह उसी का अंश है.......
                                                        “ ब्रह्म की इच्छा माया नाचे जीवन जगत सजाये।
                                                           जीव रूप जब बने ब्रह्म फिर माया उसे नचाये।
                           ‘यह तो विचित्र सा तर्क लगता है।’ राघव ने कहा।
                           ‘हाँ, तभी तो पाश्चात्य जगत में एक समय ‘नारी जीव है भी या नहीं का प्रश्न उपस्थित था अपितु नारी को मानवी माने जाने में भी संदेह था। यह बड़ा ही क्रूड व क्रूर ढंग है वस्तुस्थिति को प्रकट करने का जो अति-भौतिकतावादी सभ्यता के अनुरूप ही हो सकता है। भारतीय सनातन सभ्यता , ब्राह्मण, जैन आदि में भी नारी को मुक्ति या मोक्ष का अधिकारी नहीं माना जाता रहा है परन्तु उसे मोक्ष के पथ पर ले जाने वाला माना जाता रहा है। इसीलिये उसे नर का, पुरुष का, ब्रह्म-जीव का बंधन कहा गया। यह कथन का तात्विक व सात्विक रूप है।’ ड़ा शर्मा जी ने बताया।
                          ‘और ये अवतारों को क्या कहेंगे आप, हमारे यहाँ सारे अवतारों के साथ सदा नारी भी होती है या कोई भी शक्ति अवश्य अवतार लेती है जिनकी सहायता की अवश्य ही आवश्यकता पडती है इन अवतारों को; उसका क्या उत्तर देंगें आप ?’ सुषमा जी पूछने लगीं।
                        ‘आपने बड़ी देर में भाग लेने का कष्ट किया बातचीत में’, ड़ा शर्मा हंसते हुए बोले ,’एक विचार भाव से वैज्ञानिक-अध्यात्म के अनुसार तो ये अवतार, चाहे सत्य हों या कल्पित.... जीवन व प्राणी की क्रमिक विकास यात्रा प्रतीत होते हैं....मत्स्य से जीवन की उत्पत्ति, जल से पृथ्वी पर आना, लघु मानव—मानव तक की उत्पत्ति, शारीरिक शक्ति-धनु, परशु, गदा आदि विविध हथियार,.. मानसिक शक्ति..तप, त्याग, मर्यादा व प्रकृति रूप के समन्वयक राम और शक्ति, ज्ञान, व्यवहार के समन्वयक कृष्ण तक। आगे अभी भविष्य के गर्भ में है।’ ये मानव प्रगति-व्यवहार की युग-संधियां भी कही जा सकती हैं|'
                      ‘आप सही कह रही हैं सुषमा जी, सभी के साथ उनकी मूल-शक्ति रूप में या नारी-पत्नी रूप में प्रकृति या माया अवश्य अवतार लेती है..जन्म लेती है। जैसे ही बद्ध-जीव या अवतार का पृथ्वी-संसार पर कार्य समाप्त हो जाता है वह मुक्ति के पथ पर अग्रसर होता है, उसकी शक्तियां, माया, प्रकृतिरूपा शक्ति-अवतार भी उससे पहले या बाद में जगत से प्रस्थान कर जाती हैं। इसीलिये तो हमारे यहाँ शक्ति-रूपा पत्नी सदैव पति से पहले मृत्यु की कामना करती है ताकि गोलोक में जाकर वहाँ की व्यवस्था भी संभाली जाय कुछ अपनी स्वेच्छा से भी और आशीर्वाद भी सदा सुहागन रहो का दिया जाता है। ड़ा शर्मा हंस कर कहने लगे।’ ....‘और सती प्रथा जैसी कुप्रथा शायद भी इस तात्विक बात का अर्थ-अनर्थ करने से उत्पन्न हुई।’ उन्होंने पुनः कहा।
                        ‘परन्तु अवतार तो सर्व-समर्थ होते हैं, ब्रह्म रूप, ईश्वर का अवतार ; तो फिर शक्तियों को, प्रकृति को साथ आने की क्या आवश्यकता ?’ राघव ने तर्क किया।
                        पुरुष या ब्रह्म या ईश्वर स्वयं अकेला कहाँ कार्य कर पाता है, वह तो अकर्मा है कार्य तो प्रकृति ही करती है। अवतार भी प्रकृति, शक्ति, योगमाया द्वारा ही कार्य कराते हैं। ड़ा शर्मा बोले।
                       ‘तो फिर प्रकृति ही सब कुछ हुई, और स्त्री भी ...फिर पुरुष, ईश्वर, ब्रह्म, अवतार की क्या आवश्यकता है यदि हैं और यदि कल्पित हैं तो भी इनकी परिकल्पना की क्या आवश्यकता है।’ पांडे जी ने तर्क दिया।
                          ‘परन्तु शक्ति स्वेच्छा से कहाँ कार्य करती है। वह तो पुरुष या ब्रह्म की इच्छानुसार ही क्रियाशील होती है। एकोहं बहुस्याम की ईषत इच्छा से ही तो प्रकृति चेतन होकर संसार रचती है| अर्थात...ब्रह्म–प्रकृति, नर-नारी, दोनों ही आवश्यक हैं सृष्टि हेतु, संसार के लिए, संसार के सहज सामंजस्य के लिए। यदि संसार के इस द्वैत, द्विविधा- भाव के तात्विक ज्ञान को सभी स्त्री-पुरुष समझ कर जीवन में उतारें यथानुसार कार्य करें तो समाज-संसार में द्वंद्वों का प्रश्न ही खडा नहीं होगा।’
                        ‘तो फिर संसार कैसे चलेगा, क्यों रचा जायेगा, क्यों बनेगा ? किसलिए, किसके लिए ?’ प्रश्न उठाया गया।
                        ‘तभी तो दोनों अलग अलग जन्म लेते हैं, आकर्षण-विकर्षण के चलते मिलते हैं..प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी बनते हैं...संसार-चक्र बनता व चलता है| एक दूसरे को मुक्ति पथ पर ले जाते हैं| तभी तो कहा गया है कि नारी के बिना मुक्ति नहीं, बिना संसार को जाने मुक्ति कैसी, बिना संसार रूपी वैतरिणी पार किये कहाँ मोक्ष और उसके लिए गाय की पूंछ अर्थात पृथ्वी का, प्रकृति का, नारी का, ज्ञान-बुद्धि का पल्लू पकड़ना अत्यावश्यक है।’ ड़ा शर्मा कहते गए।
                       “उर्वशी कहती है कि तुम सौ वर्ष तक भी प्रेम करते रहो तो भी नारी प्रेम नहीं करेगी, स्त्रियाँ निर्मोही होती हैं।” पांडेजी हंसते हुए कहने लगे।
                      ‘ वैसे तो यह स्वर्ग की अर्थात सिद्धि-प्रसिद्धि के शिखर की बात है, जहां ममता-मोह-बंधन आदि नहीं होते परन्तु संसार में, पृथ्वी पर नारी प्रेम का प्रतीक है| तभी तो उर्वशी भूलोक पर आती है परन्तु भूलोक की नारी का पूर्ण धर्म नहीं निभा पाती| प्रकृति व माया की भांति नारी भी शक्ति है, ऊर्जा है ...पावर है, और शक्ति वास्तव में निर्मोही होती है उसके साथ नाजायज़ छेड़खानी से धक्का, शाक अर्थात करेंट लगने का सदैव अंदेशा रहता है| नर को भी समाज को भी, और परिणाम ..पंगु हो जाना ..नर का भी, समाज काभी..'सावधान.’ कहते हुए ड़ा शर्मा मुस्कुराये।
                 ‘बडी देर से नारी-निंदा पुराण कहा-सुना जा रहा है।’, अमृता जी जो बड़ी देर से सोफे पर बैठी हुईं सब सुन रहीं थीं, बोलीं।
               ‘ निंदा या प्रशंसा-स्तुति, पांडे जी बोले, ’ फिर, यह तो हम पुरुषों के मंतव्य हैं। आप लोग अपने मंतव्य प्रस्तुत करें।’
                 सुना नहीं है , अमृता जी बोलीं.....
                                                 “ नारी निंदा मत करो, नारी नर की खान।
                                                    नारी से नर होत हैं, ध्रुव, प्रहलाद समान।|”
                  बिलकुल सत्य है अमृता जी, ड़ा शर्मा कहने लगे, पर इसके लिए नारी को ध्रुव, प्रहलाद की माँ के समान भी तो होना पड़ेगा।’

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

अंधविश्वास व विज्ञान क्या हैं ......

आजकल कुछ स्वयंभू ब्लॉग, सम्पादक व विद्वान् - अंधविश्वास को हटाने व वैज्ञानिक सोच का प्रसार करने का तमगा लगाए हुए हैं व छोटी-छोटी बातों को लिख कर विज्ञान-विज्ञान चिल्ला रहे हैं | वस्तुतः अंधविश्वास है क्या ---
---अंधविश्वास कोई वस्तुनिष्ठ या तथ्य निष्ठ बात नहीं है जिसे आप हटायेंगे ; अंधविश्वास --अंधे होकर अर्थात विना सोचे समझे किसी बात या तथ्य , घटना पर विश्वास कर लेना । यह एक व्यक्तिनिष्ठ तथ्य है ,मानव के अज्ञान- पर आधारित। कहावत है की अन्धेरा-अन्धेरा चिल्लाने व वर्णन करने से अन्धकार दूर नहीं होता |इसलिए शास्त्र ज्ञान की बातें , रीति-रिवाजों की भर्तसना नही करनी चाहिए , कुरीतिओं का वर्णन नही करें इससे जिन कुरीत्यों को लोग भूलते जा रहे हैं (आज कल अधिकतर कुरीतियों को पढ़े likhe log naheen maanate -jaanate )ve punah jaagrat ho jaateen hain । अतः एक दीपक जलाइये , इतना उजाला कर दीजिये , अन्धेरा स्वयं ही दूर होजायेगा। क्योंकि अन्धेरा कभी सदैव को नष्ट नहीं होता ( क्योंकि वह भी एक सृष्टि है ताकि मानव सदैव सृष्टि कर्ता को, संयम सदाचरण को सदगुणों को न भूले व कर्म में प्रवृत्त रहे ) अतः लगातार दीप जलाए रखना आवश्यक है, चाहे प्रकाश का,ज्ञान का,शास्त्र, संयम ,विवेक का ,विज्ञान का |
----अब विज्ञान क्या है ?---एक होता है ज्ञान , अर्थात विवेक, प्रज्ञा बुद्धि की उत्पत्ति ( अनुभव, प्रमाण , शास्त्र ज्ञान द्वारा उत्पन्न ) जिससे व्यक्ति प्रत्येक वस्तु, तथ्य व घटना आदि के पीछे की वास्तविकता को जान सकता है ,जिसे आँखें खुलना,अन्तर्विश्वास , अंतर्बुद्धि, अंतर्ज्ञान,अतीन्द्रिय ज्ञान,तृतीय - नेत्र, सिक्स्थ सेन्स कहा जासकता है, त्रिकाल दर्शिता,ईश्वर, सत्य, न्याय, संयम,सदाचरण व ईश्वरीय ज्ञान इसकी पराकाष्ठा है |
दूसरा होता है विज्ञान -अर्थात विशिष्ट ज्ञान; प्रत्येक वस्तु व भाव आदि के बारे में भौतिक जानकारी , उसके भौतिक जीवन में उपयोग के बारे में जानकारी ---जीवन में प्रत्येक क्षेत्र स्तर पर विज्ञान है , रसायन, जीव , चिकित्सा, धातु ,कला-विज्ञान , साहित्य का विज्ञान, शिल्प-विज्ञान ,समाज, मनो विज्ञान आदि-आदि --जिसे दर्शन में -अज्ञान- कहा गया है -क्योंकि ये शाश्वत व ईश्वरीय ज्ञान नहीं हें लौकिक हें,भाव समन्वयता का इसमें स्थान नहीं होता ,यह अन्तिम ज्ञान नहीं है ; अतः ज्ञान का ज्ञान होने पर ही अज्ञान- को जानना चाहिए ,ताकि मानव को ज्ञान का दंभ , कर्ता पन का दंभ न उत्पन्नं हो व दोनों में समन्वय रहे , यही मानव जीवन की सफलता है | तभी ईशोपनिषद में कहा गया है --
"""विद्या अविद्या यस्तद वेदोभय सहअविद्यया मृत्युम तीर्त्वा विद्यया अमृतं अनुश्ते ॥ """
अर्थात शास्त्र, ईश्वरीय ज्ञान व विज्ञान का साथ-साथ ज्ञान होना चाहिए अविद्या (विज्ञान-सांसारिक ज्ञान-) से संसार अर्थात मृत्यु को जीत कर(सफल जीवन जी कर ) ,विद्या ( ज्ञान) से अमृतत्व (मानसिक शान्ति , वास्तविक शान्ति,मुक्ति,कैवल्य ,परम धाम, ईश्वर प्राप्ति आदि ) प्राप्त करना चाहिए | आँखें खुलने पर मानव अंधविश्वास से स्वतः ही दूर रहेगा |