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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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बुधवार, 14 जून 2017

ईशोपनिषद के तृतीय व चतुर्थ मन्त्र- का काव्य भावानुवाद ---डा श्याम गुप्त

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



ईशोपनिषद के तृतीय मन्त्र .. ”असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता |
                      तांस्ते प्रेत्यभिगच्छन्ति ये के च आत्महनो जनाः ||”---का काव्य भावानुवाद .
कुंजिका- असुर्या नाम =प्रकाश रहित अन्धकार वाले लोक व योनियाँ है.. ते=जो...अन्धेन: तमसा = गहन अन्धकार से..आवृता= आच्छादित हैं...तास्ते=उन योनियों को...अभिगच्छन्ति = प्राप्त होते हैं...ये के च = जो कोइ भी, आत्महन: = आत्मा का हनन करने वाले,...जना: =मनुष्य....प्रेत्य= मरकर  | 
मूलार्थ- केवल इन्द्रियों व शरीर के सुख पर निर्भर रहने वाले, आत्मा की आवाज़ के विरुद्ध आचरण करने वाले जो मनुष्य हैं वे मृत्यु उपरांत ( या प्रेत की भांति, अतृप्त, असंतुष्ट ) घोर अन्धकार युक्त, अज्ञान युक्त (रौरव नरक) की योनियों य लोकों में पड़ते हैं (अज्ञान के कारण सदा कष्टमय जीवन भोगते हैं– परवर्ती पौराणिक काल में यही स्वर्ग-नरक अवधारणा का मूल बना ) |




आत्मज्ञान के आत्मभाव के,
सद्पथ से विपरीत मार्ग पर |
आत्मा की आवाज न सुनकर,
चले जो आत्मघात के पथ पर |

आत्मतत्व के स्वयं प्रकाशित,
सहज सरल ऋजुमार्ग त्यागकर |
स्वविवेक, सदइच्छा, सदगुण,
सदाचरण की उपेक्षा कर |

भक्तिहीन वह लोभी भोगी,
अकर्मण्य वह आत्महीन जन |
अन्धकार अज्ञान तमस रत,
अंधकूप में गिरता जाता |  

विविध अकर्म, अधर्म पापमय
कृत्यों में हो लिप्त वह मनुज |
जाने कितने असुरभाव युत,
पापपंक में घिरता जाता |

इन्द्रियवश कायासुख लोभी,
लिप्त अदा तेरे मेरे हित |
विविध प्रपंचों में रत, होता-
वंचित सुख आनंद शान्ति से |


विविध मोह माया में फंसकर,
भवबंधन में उलझा प्राणी |
कष्ट, दुखों के महाचक्र में,
भंवरजाल में घिरता जाता |

  
इसीलिये कहते ज्ञानी जन,
शास्त्र पुराण उपनिषद् सब ही |
विविध आसुरीवृत्ति धार वह,
प्राणी प्रेतयोनि  पाता  है |

मृत्यु प्राप्ति पर आत्महीन वह,
आत्महननकारी स्वघाती |
अन्धकारतम युक्त गहनतम,
योनि व लोकों में जाता है ||








ईशोपनिषद के चतुर्थमन्त्र----अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन पूर्वमर्षत |


         तद्धावतोsन्यानत्येति तिष्ठन्तिस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति || का काव्य भावानुवाद ..

कुंजिका--तद=वह ब्रह्म...अनेज़त=अचल...एकम=अकेला...मनसो जवीयो=मन से भी अधिक वेग वाला..पूर्वम=प्रत्येक स्थान पर पहले से ही..अर्षत =पहुचा हुआ है...नैन=नहीं..आप्नुवन =प्राप्त है...देवा= इन्द्रियों को..तत=वह ब्रह्म...धावत:=दौड़ते हुए...अन्यान=अन्य सभी को...अत्येति= पीछे छोडे हुए है ..तिष्ठति= (स्वयं) अचल होते हुए भी ..तस्मिन्न = उस ( ब्रह्म के ) भीतर...मातरिश्वा=वायु..अपो=जलों को..दधाति=धारण किये हुए है | 
मूलार्थ- वह एकमात्र ब्रह्म अचल,स्थिर होते हुए भी मन से भी अधिक वेग वाला है अतःप्रत्येक स्थान पर सबसे पहले पहुंचा हुआ रहता है, सदा उपस्थित है, सर्वदा सर्वत्र व्याप्त है | वह इन्द्रियों का विषय नहीं है, इन्द्रियों द्वारा नहीं प्राप्त/अनुभव नहीं किया जा सकता | उस ब्रह्म के भीतर उपस्थित वायु (मूल ऊर्जा तत्व ) जलों अर्थात समस्त जग-जीवन को धारण करता है |      





वह एक अकेला अचल अटल
गतिहीन न चलता फिरता है |
स्थिर है न कोई चंचलता ,
सब में ही समाया रहता है |

पर मन से अधिक वेग उसका,
सबके आगे ही है चलता |
हर जगह पहुंचता सर्वप्रथम,
सबको ही पीछे छोड जाता |

गतिवान है मन के वेग से भी,
अतः स्थिर सा लगता है |
हर जगह है पहले ही पहुंचा,
सब में ही समाया लगता है |

गति को भी स्थिर किये हुए,
सबको बांधे स्थिर रखता |
सब कहीं सब जगह सदा व्याप्त,
जग के कण-कण में सदा प्राप्त |

सब देव शक्तियां इन्द्रिय मन,
भी उसको नहीं जान पाते |
उन सबका पूर्वज वही एक,
फिर कैसे उसे जान जाते |

  
वह ब्रह्म ज्ञान का विषय नहीं,
जो स्वयं ज्ञान का सृष्टा है |
इन्द्रियों को भी वह प्राप्त कहाँ,
वह स्वयं सभी का दृष्टा है |

स्थिर है किन्तु श्रेष्ठ धावक,
सब जग को जय कर लेता है |
दौड़ते हुए जग कण कण को,
अपने वश में कर लेता है |

सारे जल एवं सभी वायु,
जल वायु अग्नि पृथ्वी और मन |
हैं स्थित उसके अंतर में,
वह स्थित सभी चराचर में |

सब प्राण कर्म प्रकृति-प्रवाह ,
उससे ही सदा प्रवाहित हैं|
वह स्वयं प्रवाहित है सब में,
कण कण में वही समाहित है |

सारे जग का वह धारक है,
जग उसको धारण किये हुए |
कण कण के कारण-कार्यों का,
वह एक ब्रह्म ही कारक है ||


 




 

सोमवार, 15 मई 2017

ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र . के प्रथम भाग..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद...... \---डा श्याम गुप्त

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----
\\
ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र ..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |”
                                           ”तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध कस्यविद्धनम "
के प्रथम भाग..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद......
\
कुंजिका- इदं सर्वं =यह सब कुछ...यदकिंचित=जो कुछ भी ...जगत्याम= पृथ्वी पर, विश्व में ...जगत= चराचर वस्तु है ...ईशां =ईश्वर से ..वास्यम=आच्छादित है |
\
मूलार्थ- इस समस्त विश्व में जो कुछ भी चल अचल, जड़,चेतन वस्तु, जीव, प्राणी आदि है सभी ईश्वर के अनुशासन में हैं, उसी की इच्छा /माया से आच्छादित/ बंधे हुए हैं/ चलते हैं|
\
1.
ईश्वर माया से आच्छादित,
इस जग में जो कुछ अग-जग है |
सब जग में छाया है वह ही,
उस इच्छा से ही यह सब है |
2.
ईश्वर में सब जग की छाया,
यह जग ही है ईश्वर-माया |
प्रभु जग में और जग ही प्रभुता,
जो समझा सोई प्रभु पाया |
3.
अंतर्मन में प्रभु को बसाए,
सबकुछ प्रभु का जान जो पाए |
मेरा कुछ भी नहीं यहाँ पर,
बस परमार्थ भाव मन भाये |
4.
तेरी इच्छा के वश है नर,
दुनिया का यह जगत पसारा |
तेरी सद-इच्छा ईश्वर बन ,
रच जाती शुभ-शुचि जग सारा |
5.
भक्तियोग का मार्ग यही है ,
श्रृद्धा भाक्ति आस्था भाये |
कुछ नहिं मेरा, सब सब जग का,
समष्टिहित निज कर्म सजाये |
6.
अहंभाव सिर नहीं उठाये,
मन निर्मल दर्पण होजाता|
प्रभु इच्छा ही मेरी इच्छा,
सहज-भक्ति नर कर्म सजाता ||

क्रमश.........ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र .
के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद......



 

शुक्रवार, 12 मई 2017

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद -- वन्दना ----डा श्याम गुप्त . .....




पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त .
\\
वन्दना
१.
रे मन अब कैसी ये भटकन |
क्यों न रमे तू श्याम भजन नित, कैसी मन अटकन |
श्याम कृपा बिन जगत-जुगति नहिं, मिले न भगति सुहानी |
श्याम भगति बिनु क्या जग-जीवन कैसी अकथ कहानी |
श्याम की माया, श्याम ही जाने, और न जाने कोय |
माया मृग-मरीचिका भटकत जन्म वृथा ही होय |
श्याम भगति रस रंग रूप से सींचे जो मन उपवन |
श्याम,श्याम की कृपा मिले ते सफल होय नर जीवन ||
२.
हे मन ! ले चल सत की राह |

लोभ, मोह ,लालच न जहां हो,
लिपट सके ना माया ....|
मन की शान्ति मिले जिस पथ पर ,
प्रेम की शीतल छाया ....|
चित चकोर को मिले स्वाति-जल ,
मन न रहे कोई चाह | -----हे मन ले चल.....||
यह जग है इक माया नगरी ,
पनघट मन भरमाया ...|
भांति- भांति की सुंदर गगरी,
भरी हुई मद-माया...|
अमृत गागर ढकी असत पट,
मन क्यूं तू भरमाया...
मन काहे भरमाया ....|
सत से खोल ,असत -पट घूंघट ,
पिया मिलन जो भाया......|
अन्तर के पट खुलें मिले तब,
श्याम पिया की राह ....|
रे मन ! ले चल सत की राह ,
ले चल प्रभु की राह .....हे मन!....||
-----क्रमश

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------------आत्म- कथ्य –डा श्याम गुप्त ..भाग एक---

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...





पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त ....
\
------आत्म- कथ्य –डा श्याम गुप्त -----
\\
------छात्र जीवन में आर्य समाज के ग्रन्थों एवं स्वामी दयानंद रचित ‘सत्यार्थ प्रकाश’ से वैदिक साहित्य एवं उसकी परंपरा से परिचय हुआ, क्योंकि भारतीय संस्कृति के पुजारी पूज्य पिताजी, स्वामी जी से अत्यंत प्रभावित थे | ------तत्पश्चात वेदों के एक प्राचीन संस्करण से उनके पारंपरिक कर्मकांडीय तथा बहु-अर्थीय अर्थार्थ से परिचय हुआ एवं गोरखपुर से प्रकाशित वेदों के पारंपरिक संस्करण तथा गायत्री परिवार के आचार्यवर श्रीराम शर्मा जी के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी परिचय हुआ|
-------इस विशाल एवं बहु-आयामी, बहुमुखी ज्ञान का तनिक सा आस्वादन ही ज्ञान चक्षुओं को विभोर कर देता है | विभिन्न उपनिषदों से परिचय होने पर मुझे प्रतीत हुआ कि मानव-जीवन के सद-आचरण एवं उचित-जीवन व्यवहार ही समस्त वैदिक साहित्य के ज्ञान का मूलभाव है | ईशोपनिषद उस समस्त ज्ञान का मूल है |
--------महात्मा नारायण स्वामी के ‘उपनिषद् रहस्य’ एवं सस्ता साहित्य प्रकाशन द्वारा प्रकाशित आचार्य विनोवा भावे जी के ‘ईशावास्यवृत्ति’ के अध्ययन से यह धारणा और पुष्ट हुई |
--------बस इन्हीं समस्त विचारों, भावों के आधार पर मुझे सरल हिन्दी में ईशोपनिषद के १८ मन्त्रों के काव्यभावानुवाद लिखने की अन्तःप्रेरणा प्राप्त हुई प्रस्तुत कृति के रूप में |
\\
--------- विश्व के प्राचीनतम व सर्वश्रेष्ठ ज्ञान के भण्डार 'वेद' , जिनके बारे में कथन है कि जो कुछ भी कहीं है वह वेदों में है और जो वेदों में नहीं है वह कहीं नहीं , के ज्ञान ...परा व अपरा विद्या के आधार उपनिषद् हैं जो भारतीय मनीषा, ज्ञान, विद्या, संस्कृति व आचरण-व्यवहार के आधार तत्व हैं | उपनिषद् भवन की आधार शिला 'ईशोपनिषद ' है जिसमें समस्त वेदों व उपनिषद् शिक्षा का सार है | ईशोपनिषद यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय है जो परा व अपरा ब्रह्म-विद्या का मूल है अन्य सभी उपनिषद् उसी का विस्तार हैं |
\\
---------वेदों के मन्त्रों का भाव मूलतः दो रूपों में प्राप्त होता है ...
१. उपदेश रूप में --जहाँ मानव अपने कर्म में स्वतंत्र है वह उपदेश उस रूप में ग्रहण करे न करे...
२. नियम रूप में -- जो प्राकृतिक नियम रूप हैं एवं अनुल्लंघनीय हैं |
--------ईशोपनिषद में ईश्वर, जीव, संसार, कर्म, कर्त्तव्य, धर्म, सत्य, व्यवहार एवं उनका तादाम्य 18 मन्त्रों में देदिया गया है, जो आज भी प्रासंगिक हैं , समीचीन हैं एवं अनुकरणीय व पालनीय हैं | इसकी सैकड़ों टीकाएँ --- विधर्मी दाराशिकोह, जिसे इसके अध्ययन के बाद ही शान्ति मिली द्वारा फारसी में.... जर्मन विद्वान् शोपेन्हावर को अपनी प्रसिद्ध फिलासफी त्याग कर इसी से संतुष्टि प्राप्त हुई| शंकराचार्य की अद्वैतपरक...रामानुजाचार्य की विशिष्टाद्वेतपरक एवं माधवाचार्य की द्वैतपरक टीकाएँ इस उपनिषद् की महत्ता का वर्णन करती हैं |
\\
ईशोपनिषद के 18 मन्त्रों में चार भागों में सबकुछ कह दिया गया है | ये हैं--
१.प्रथम भाग...मन्त्र १ से ३ .... कर्तव्य-पंचक -मानव जीवन के मूल कर्त्तव्य ..
२.द्वितीय भाग....मन्त्र ४ से ८... ईश्वर के गुण -ब्रह्म विद्या मूलक सिद्धांत व ईश्वर के गुण व ईश्वर क्यों ...
३.तृतीय भाग....मन्त्र ९ से १४ ...मानव कर्तव्य एवं ब्रह्म प्राप्ति विधि ज्ञान-अज्ञान, यम-नियम, मानव के कर्त्तव्य, विद्या-अविद्या, संसार, ब्रह्म-विद्या प्राप्ति, प्रकृति, कार्य-कारण, मृत्यु-अमरत्व ....आत्मा-शरीर…..
४.चतुर्थ भाग ..... मन्त्र १५ से १८....आत्मरूपता, ईश्वर से तादाम्य, ईश्वर प्राप्ति-.सत्य, धर्म, कर्म, ईश्वर-जीव का मिलन, आत्मा-शरीर का अंतिम परिणाम |
\\
----- प्रथम भाग ------
\ ( मन्त्र १ से ३ तक )
ईशावास्यं इदं सर्वं यत्किंच जगात्याम् जगत|
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधःकस्यस्विद्धनम || १....
-------इस जगत में अर्थात पृथ्वी पर, संसार में जो कुछ भी चल-अचल, स्थावर, जंगम , प्राणी आदि वस्तु है वह.ईश्वर की माया से आच्छादित है अर्थात उसके अनुशासन से नियमित है | उन सभी पदार्थों को त्याग से अर्थात सिर्फ उपयोगार्थ दिए हुए समझकर उपयोग रूप में ही भोगना चाहिए, क्योंकि यह धन किसी का भी नहीं हुआ है अतः किसी प्रकार के भी धन व अन्य के स्वत्व-स्वामित्व का लालच व ग्रहण नहीं करना चाहिए |
\
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतम समाः |
एवंत्वयि नान्यथेतो sति न कर्म लिप्यते नरः ||..२..
-------यहाँ मानव कर्मों को करते हुए १०० वर्ष जीने की इच्छा करे, अर्थात कर्म के बिना, श्रम के बिना जीने की इच्छा व्यर्थ है | कर्म करने से अन्य जीने का कोई भी उचित मार्ग नहीं है क्योंकि इस प्रकार उद्देश्यपूर्ण, ईश्वर का ही सबकुछ मानकर, इन्द्रियों को वश में रखकर आत्मा की आवाज़ के अनुसार जीवन जीने से मनुष्य कर्मों में लिप्त नहीं होता.... अर्थात अनुचित कर्मों में, ममत्व में लिप्त नहीं होता, अपना-तेरा, सांसारिक द्वंद्व दुष्कर्म, विकर्म आदि उससे लिप्त नहीं होते |
\
.असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता |
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ||-३ ...
------ जो आत्मा के घातक अर्थात ईश्वर आधारित व आत्मा के विरुद्ध , केवल शरीर व इन्द्रियों आदि की शक्ति व इच्छानुसार सद्विवेकआदि की उपेक्षा करके कर्म ( या अपकर्म आदि ) करते हैं वे अन्धकारमय लोकों में पड़ते हैं अर्थात विभिन्न कष्टों, मानसिक कष्टों, सांसारिक द्वेष-द्वंद्व रूपी यातनाओं में फंसते हैं |
\\
-------- निश्चय ही मानव का आत्म... स्वयं शक्ति का केंद्र है उस शक्ति के अनुसार चलना, मन वाणी शरीर से कर्म करना ही उचित है यही आस्तिकता है, ईश्वर-भक्ति है, अन्य कोई मार्ग नहीं है| इस ईश्वर .. श्रेष्ठ -इच्छा एवं आत्म-शक्ति से ही समस्त विश्व संचालित है, आच्छादित है, अनुशासित है ..
तू ही तू है ,
सब कहीं है |
सब वस्तु ईश्वर की न मानना अर्थात धन एवं अपने स्वत्व को ईश्वर से पृथक मानना.. मैं ,ममत्व..ममता, मैं -तू का द्वैत ही समस्त दुखों, द्वंद्वों, घृणा आदि का मूल है| ...
सब कुछ ईश्वर के ऊपर छोडो यारो ,
अच्छे कर्मों का फल है अच्छा ही होता |
----------कर्म- संसार का अटूट नियम है ..जगत में कोई भी वस्तु क्रिया रहित नहीं होती, अतः कर्मनिष्ठ होना ही मानव की नियति है | परन्तु जो लोग अपनी आत्मा ( सेल्फ कोंशियस ) के विपरीत, मूल नियम के विरुद्ध, ईश्वरीय नियम के विरुद्ध अर्थात प्रतिकूल कर्म करते हैं वे विविध कष्टों को प्राप्त होते हैं|
"" मिलता तुझको वही सदा जो तू बोता है |""
--------यही आत्मप्रेरणा से चरित्र निर्माण का मार्ग है |


क्रमश ---- द्वितीय भाग----मन्त्र ४ से ८ तक-----
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रविवार, 26 फ़रवरी 2017

मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद---डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद---डा श्याम गुप्त -----

----------------मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद ----इस कृति में ईशोपनिषद जो यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय है जिसमें उपनिषदकार ने १८ मन्त्रों में , मानव आचरण व व्यवहार हेतु भारतीय, वैदिक ज्ञान एवं जीवन व्यवहार के सिद्धांतों का मूल प्रस्तुत कर दिया है, उसका सरल हिन्दी में काव्य भावानुवाद प्रस्तुत किया गया है -----


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 प्रस्तुत है----
ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र ..ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |”
                                                    तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध कस्यविद्धनम "
 के प्रथम भाग..ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद......
कुंजिका- इदं सर्वं =यह सब कुछ...यदकिंचित=जो कुछ भी ...जगत्याम= पृथ्वी पर, विश्व में ...जगत= चराचर वस्तु है ...ईशां =ईश्वर से ..वास्यम=आच्छादित है |
मूलार्थ- इस समस्त विश्व में जो कुछ भी चल अचल, जड़,चेतन वस्तु, जीव, प्राणी आदि है सभी ईश्वर के अनुशासन में हैं, उसी की इच्छा /माया से आच्छादित/ बंधे हुए हैं/ चलते हैं|
ईश्वर माया से आच्छादित,
इस जग में जो कुछ अग-जग है |
सब जग में छाया है वह ही,
उस इच्छा से ही यह सब है |
ईश्वर में सब जग की छाया,
यह जग ही है ईश्वर-माया |
प्रभु जग में और जग ही प्रभुता,
जो समझा सोई प्रभु पाया |
अंतर्मन में प्रभु को बसाए,
सबकुछ प्रभु का जान जो पाए |
मेरा कुछ भी नहीं यहाँ पर,
बस परमार्थ भाव मन भाये |
तेरी इच्छा के वश है नर,
दुनिया का यह जगत पसारा |
तेरी सद-इच्छा ईश्वर बन ,
रच जाती शुभ-शुचि जग सारा |
भक्तियोग का मार्ग यही है ,
श्रृद्धा भाक्ति आस्था भाये |
कुछ नहिं मेरा, सब सब जग का,
समष्टिहित निज कर्म सजाये |
अहंभाव सिर नहीं उठाये,
मन निर्मल दर्पण होजाता|
प्रभु इच्छा ही मेरी इच्छा,
सहज-भक्ति नर कर्म सजाता ||