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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 4 जून 2017

पुस्तक -ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद --ईशोपनिषद के द्वितीय मन्त्र ....के द्वितीय भाग...का काव्य भावानुवाद -डा श्याम गुप्त -----

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                पुस्तक -ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद ---डा श्याम गुप्त -----


ईशोपनिषद के द्वितीय मन्त्र .... 

                                 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि  जिजीविषेच्छतम समा |
                                     एवंत्वयि नान्यथेतो S स्ति न कर्म लिप्यते नरे ||'


के द्वितीय भाग...'एवंत्वयि नान्यथेतो Sस्ति न कर्म लिप्यते नरे ||'  का काव्य-भावानुवाद ....

कुंजिका –...नान्यथेतो =इससे अन्य मार्ग...नास्ति= नहीं है... एवं =इसप्रकार, त्वयि= तुझ...नरे = मनुष्य में ....न कर्म लिप्यते = कर्म लिप्त नहीं होता..|

मूलार्थ - उपरोक्त प्रकार से सत्कर्म करते हुए जीने की इच्छा से मनुष्य कर्म में लिप्त नहीं होता, विकारग्रस्त नहीं होता| इससे अन्य मानव-कल्याण का कोइ मार्ग नहीं है, यही कल्याणकारी जीवन जीने का समुचित उपक्रम है |   



सदकर्मों की इच्छा ले यदि ,

मानव, सेवा-धर्म निभाये |

जीवन अल्प हो चाहे जितना ,

शत शत शरद का जीवन पाए |



इसी भावयुत कर्म किये जा ,

यही एक बस उचित पंथ है |

अन्य न जीवन राह है कोई ,

यह जीवन का सत्य मन्त्र है |



कन्टकीर्ण है राह कर्म की,

पग पग पर बाधाएं मग में |

जाने कितने तृष्णा-लालच ,

के पल आते हैं इस पथ में |



कर्म लिपट ही पाते हैं कब,

उससे जो त्यागी अलिप्त है|

लिप्सा तृष्णा उसे बांधती,

अपकर्मों में नर जो लिप्त है |



कर्म भाव के सत्य मार्ग पर,

चलता दृड़ता से जो कोई |

लिप्त न होता उसे न होती ,

कर्मों में आसक्ति न कोई |



लिप्सा लालच स्वार्थ भावना,

नहीं लिपट पाती तन मन से |

ईश्वर प्राप्ति, मोक्ष क्या होगी,

सुन्दर उस पावन जीवन से ||



 

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