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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

उस गुलाबी धूप का...ग़ज़ल---- डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


उस गुलाबी धूप का...ग़ज़ल----

इक शमा यादों की मन में चाह बन जलती रही,
फिर मुलाकातें भी होंगीं आस इक पलती रही |

उस गुलाबी धूप का क्या वाकया कोई कहे,
जो हमारे आपके थी दरमियाँ छलकी रही |

रूह में छाई हुई इक धुंध वर्फीली उसे,
गुनगुनाया वो पिघलकर गीत बन ढलती रही |

क्या कहें क्या ना हुआ अब उस सुहानी शाम को,
नयन नयनों में ही बातें नेह की चलती रहीं |

नयन नयनों से मुखातिब हुए तो ये क्या हुआ,
मौन की मधुरिम मुखरता रूह में फलती रही |

गुनुगुनाने लग गए कलियाँ बहारें चमन सब,
शोखियाँ अठखेलियाँ तन मन को यूं छलती रहीं |

धूप अपने दरमियां जो उस अजानी शाम थी,
नयन से होठों पे आने से सदा टलती रही |

आ न पायी नयन से ओठों पे वो धुन प्रीति की
श्याम’ इक मीठी व्यथा बन हाथ यूं मलती रही ||


 

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