
1.
श्याम अगीतिका का कथ्य
अधुना युग में छोटी कविता महत्वपूर्ण है । क्योँकि भावना प्रधान कविता छोटी ही हो सकती है, अन्यथा कवि के अपने भावोँ का पिष्ट्पेषण होने लगता है। सर्जना के क्षण लम्बे नहीँ होते। लम्बी कविता मेँ भाव की सँहति व तीब्रता नहीँ होपाती। काव्य सौंदर्य के तीन स्तर होते है, बाहरी, आंतरिक और तीसरा आंतरिक आलोक में अंतर्भूत होता हुआ, जिसे कवि स्वयँ की संवेदना से मूर्त कर लेता हे। आधुनिक कविता पर वैज्ञानिक युग की अति-भौतिकता, समयाभाव , तार्किकता व मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण व्यक्ति व परिस्थिति में सामन्जस्य नहीँ होपाता, अत: कवि सीधे सीधे व्यक्त करने की अपेक्षा ध्वनित करता है अथवा संकेत देता है जो छोटी कविता में ही हो सकता है ।
यद्यपि परम्परागत काव्य में शिल्पगत विशेषताओं के अंतर्गत छंद-विधान योजना, पद्यात्मक भाषाशैली व अलंकार सौष्ठव आदि का महत्वपूर्ण स्थान है| अगीत काव्य में परम्परागत छंदों के स्थान पर मुक्त-छंद व गद्यात्मक शैली को अपनाया है| भाषा पर भी नए प्रयोग किये हैं| अगीत-काव्य में यह स्वीकारा गया है कि संक्षिप्तता के माध्यम से कवि अपनी बात कह सकता है ।
स्वतन्त्रता पूर्व की कविता यद्यपि सार्वभौम प्रभाववश छन्दमय ही है तथापि उसमें देश, समाज़, राष्ट्र को बन्धनमुक्ति की छटपटाहत व आत्मा को स्वच्छंद करने की, जन-जन प्रवेश की इच्छा है। निराला जी से पहले भी आल्हखंड के जगनिक, टैगोर की बांगला कविता, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, हरिओध, पन्त आदि कवि सान्त्योनुप्रास-सममात्रिक कविता के साथ-साथ; विषम-मात्रिक-अतुकान्त काव्य की भी रचना कर रहे थे यद्यपि वह पूर्ण रूप से प्रचलित छन्दविधान से मुक्त, मुक्त-छन्द कविता नहीं थी। यथा—
2.
तो फ़िर क्या हुआ,
सिद्ध राज जयसिंह;
मर गया हाय,
तुम पापी प्रेत उसके।——मैथिली शरण गुप्त
निराला युग या स्वयं अतुकांत कविता के प्रेरक निराला जी की अतुकान्त कविता, मुख्यतयाः छायावादी, यथार्थ वर्णन, प्राचीनता की पुनरावृत्ति,सामाजिक सरोकारों का वर्णन, सम-सामयिक वर्णन, राष्ट्र्वाद तक सीमित थी। क्योंकि उनका मुख्य उद्धेश्य कविता को मुक्तछन्दमय करना तथ हिन्दी का उत्थान व प्रतिष्ठापन था। वे कवितायें लम्बी-लम्बी, वर्णानात्मक थीं| उनमें वस्तुतः आगे के युग की आधुनिक युगानुरूप आवश्यकता, सन्क्षिप्तता के साथ तीव्र भाव-सम्प्रेषणता, सरलता का अभाव था यथा— “अबे सुन बे गुलाब….”वह तोडती पत्थर…..” आदि में उत्कृष्टता,यथार्थता,सुलक्षित काव्य-सौन्दर्य के साथ समाधान का प्रदर्शन नहीं है। उस काल की मुख्य-धारा की नयी-नयी धाराओं- अकविता,यथार्थ-कविता, प्रगतिवादी कविता में भी समाधान प्रदर्शन का यही अभाव है। इनमें आक्रोश, विचित्रमयता, चौकाने वाले भाव तो है,अंग्रेज़ी व योरोपीय काव्य के अनुशीलन में, परन्तु विशुद्ध भारतीय चिन्तन व मंथन से आलोडित व समाधान युक्त भाव नहीं हैं। यथा–
तीन टांगों पर खडा,
नत ग्रीव,
धैर्य-धन गदहा ।
इन्हीं सामयिक व युगानुकूल आवश्यकताओं के अभाव की पूर्ति व हिन्दी भाषा ,साहित्य, छंद-शास्त्र व समाज के और अग्रगामी, उत्तरोत्तर व समग्र विकास की प्राप्ति हेतु नवीन धारा “अगीत” का आविर्भाव हुआ, जो निराला-युग के काव्य-मुक्ति आन्दोलन को आगे बढाते हुए भी उनके मुक्त-छंद काव्य से प्रथक अगले सोपान की धारा है। यह धारा,
3.
सन्क्षिप्तता,सरलता, तीव्र-भाव सम्प्रेषणता व सामाजिक सरोकारों के उचित समाधान से युक्त युगानुरूप कविता की कमी को पूरा करती है। उदाहरणार्थ—-
“कवि चिथडे पहने,
चखता सन्केतों का रस,
रचता-रस,छंद, अलंकार,
ऐसे कवि के,
क्या कहने।”— ————डा रंगनाथ मिश्र ’सत्य’
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“अज्ञान तमिस्रा को मिटाकर,
आर्थिक रूप से समृद्ध होगी,
प्रबुद्ध होगी,
नारी!
तू तभी स्वतन्त्र होगी।”—— श्रीमती सुषमा गुप्ता
संस्कृत छंद अतुकांत होते हुए भी लय एवं गेयता से पूर्ण होते हैं | अगीत, अतुकांत, तुकांत एवं अगेय अथवा लयबद्ध एवं गेय होते हैं|अगीत पांच से दस पंक्तियों के बीच अपने आकार को ग्रहण करके भावगत-तथ्य को सम्पूर्णता से प्रेषित करता है| अगीत वह जुगनू है जो बंद मुट्ठी में भी अपने प्रकाश को उद्भाषित करता रहता है, अर्थात अगीत मौन रहते हुए भी मुखर रहता है जो मन व बुद्धि के सम्यक अनुशीलन से उत्पन्न एक विधा है, एक धारा है | समस्या-प्रधान व तार्किक विषयों को मुक्त-छंद रचनाओं में से कहा जा सकता है,जो जनसामान्य के लिए सुबोध होती हैं|
भाव-संपदा अगीत का प्राण है | भाषा की नई सम्वेदना व संवेग, कथ्य की विविधता व अनूठा प्रयोग, परिमाप की पोषकता, विश्वधर्मी प्रयोगों के साथ सहज एवं सर्वग्राही भाव सम्प्रेषणीयता अगीत का गुण धर्म है | कम से कम शब्दों व पंक्तियों में पूरी बात कहने का श्रेय अगीत रचनाओं को ही है | युग की हर संभावना का समावेश, विषय व कथ्य वैविध्यता अगीत की अपनी
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अभिज्ञानता का प्रतीक है | अतः अगीत प्रमुखतः अर्थ व भाव प्रधान काव्य संपदा विधा है |
लय व गति काव्य-विधा के अपरिहार्य तत्व व विशेषताएं हैं जो इसे गद्य-विधा से पृथक करती है | यति --काव्य को संगीतमयता के आरोह-अवरोह के साथ कथ्य व भाव को अगले स्तर पर परिवर्तन की स्पष्टता से विषय सम्प्रेषण को आगे बढाती है | तुकांत बद्धता ..काव्य के शिल्प सौंदर्य को बढाती है परन्तु संक्षिप्तता, शीघ्र भाव सम्प्रेषणता व अर्थ प्रतीति का ह्रास करती है | अतः वैदिक छंदों व ऋचाओं की अनुरूपता व तादाम्य लेते हुए अगीत मूलतः अतुकांत छंद है | हाँ लय व गति इसके अनिवार्य तत्व हैं तथा तुकांत, यति, मात्रा व गेयता का बंधन नहीं है | अगीत वस्तुतः अतुकांत गीत है | --यथा --
" अन्तर्निहित गीत है,
गति है,
लय यति गति व्यति वह अगीत है |
अ, असीम है,परिधि अपरिमित ,
अ का अर्थ वह नहीं , नहीं है |
त्रिपदा, सप्तपदी या षटपद ,
है अगीत वह नव-अगीत भी ||" ----डा श्याम गुप्त ..
अगीत कविता का मुख्य अभिप्राय: है राष्ट्र, समाज व जमीन से जुडी वह छोटी अतुकांत कविता जो पांच से दस पंक्तियों से कम या अधिक की न हो | जिसमें लय व गति हो, गेयता का बंधन न हो एवं मात्रा-बंधन भी आवश्यक नहीं| यह 6से10 पंक्तियों की संक्षिप्त अतुकांत काव्य रचना है जिसने संस्कृत के अनुसरण में हिन्दी काव्य की तुकांत अनिवार्यता का त्याग किया है, संस्कृत के गति व लय को, दोहे की संक्षिप्तता, मारक संवेदी भाव व तुलसी की शब्दमिति को धारण किया है। यथा---
मानव व पशु मॆं यही है अन्तर,
पशु नहीं करता ,
छ्लछन्द और जन्तर- मन्तर।
शॆतान ने पशु को,
माया सन्सार कब दिखाया था;
ज्ञान का फ़ल तो ,
सिर्फ़ आदम ने ही खाया था। –डा. श्याम गु्प्त
5.
साहित्य व काव्य में कवि व सृजनकर्ता की नवीनता व प्रयोगात्मकता की ललक विविध विधाओँ की सृजनकारी रही है। गोस्वामी तुलसी दास जी द्वारा रामचरित मानस की रचना हेतु संस्कृत की अपेक्षा भाख़ा, हिंदी का प्रयोग, निराला जी के अतुकांत छंदोँ का प्रचलन, डॉ रंगनाथ मिश्र सत्य द्वारा अगीत कविता का प्रतिष्ठापन इसके उदाहरण हैँ। इसी ललक में मैंने अगीत कविता के विभिन्न छंदोँ का सृजन किया व उन्हेँ अपनी रचनाओँ में प्रयोग किया। इस प्रकार वर्तमान मॆं अगीत अविता में में निम्न प्रकार के छन्द प्रयोग में हैं-
१.अगीत छन्द—२.लयबद्ध-अगीत 3. षटपदी अगीत छन्द 4.नव-अगीत ५.त्रिपदा-अगीत ६.त्रिपदा अगीत गज़ल । इन सभी छंदोँ का प्रस्तुत कृति ‘ श्याम अगीतिका’ में विवरण व छंद विधान सहित प्रयोग किया गया है।
मेरे द्वारा पूर्व रचित अगीत ग्रंथ, अगीत साहित्य दर्पण’ व अगीत-त्रयी-अगीत काव्य विधा के ऐतिहासिक दस्तावेज तो हैँ ही, साठोत्तरी दशक की काव्य-प्रगति को समझने के लिए भी उपयुक्त हैँ सिद्ध हुए हैँ । प्रस्तुत रचना “ श्याम अगीतिका “ इसी काव्य प्रगति का एक और प्रगतिगामी दस्तावेज है। आशा व विश्वास है कि यह रचना काव्य प्रेमियोँ, शास्त्रज्ञोँ व विद्वानोँ को आकर्षित करेगी ।
लखनऊ
-- डॉ.श्याम गुप्त
10. नवम्बर 2025 ई.

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