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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

रविवार, 27 मई 2012

पृथ्वी का संरचनात्मक इतिहास--- क्रमिक श्रृंखला -भाग-१- - सौर-मंडल की उत्पत्ति—डा श्याम गुप्त ...

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

             यह आदि-सृष्टि  कैसे हुई, ब्रह्मांड कैसे बना एवं हमारी अपनी पृथ्वी  कैसे बनी व यहां तक का सफ़र कैसे हुआ, ये आदि-प्रश्न सदैव से मानव मन व बुद्धि को निरन्तर मन्थित करते रहे हैं । इस मन्थन के फ़लस्वरूप ही मानव  धर्म, अध्यात्म व विग्यान रूप से सामाजिक उन्नति में सतत प्रगति के मार्ग पर कदम बढाता रहा आधुनिक विग्यान के अनुसार हमारे पृथ्वी ग्रह की विकास-यात्रा क्या रही इस आलेख का मूल विषय है । इस आलेख के द्वारा हम आपको  पृथ्वी की उत्पत्ति, बचपन  से आज तक की क्रमिक एतिहासिक यात्रा पर ले चलते हैं।...प्रस्तुत है  इस श्रृंखला का प्रथम भाग ....

      ( सृष्टि व ब्रह्मान्ड रचना पर वैदिक, भारतीय दर्शन, अन्य दर्शनों व आधुनिक विज्ञान  के समन्वित मतों के प्रकाश में इस यात्रा हेतु -- मेरा आलेख ..मेरे ब्लोग …श्याम-स्मृति  the world of my thoughts..., विजानाति-विजानाति-विज्ञान ,  All India bloggers association के ब्लोग ….  एवं  e- magazine…kalkion Hindi तथा  पुस्तकीय रूप में मेरे महाकाव्य  "सृष्टि -ईशत इच्छा या बिगबैंग - एक अनुत्तरित उत्तर" पर पढा जा सकता है| ) -----
सौर नीहारिका

 
                      भाग-१- - सौर-मंडल की उत्पत्ति—
       सौर मंडल (जिसमें पृथ्वी भी शामिल है) का निर्माण, पृथ्वी के इतिहास का पहला युग की शुरुआत लगभग 4.54 बिलियन वर्ष पूर्व एक सौर-नीहारिका  से द्वारा पृथ्वी के निर्माण के साथ हुई | इस को हेडियन युग कहा जाता है | इस दौरान, पृथ्वी की सतह पर लगातार उल्कापात होता रहा, और बड़ी मात्रा में ऊष्मा के प्रवाह के कारण ज्वालामुखियों का विस्फोट होता रहा |
आकाश गंगा

             पृथ्वी का निर्माणसौर नीहारिका जो अंतरतारकीय धूल तथा गैस की बनी हुई थी, के एक घूमते हुए बादल से हुआ, जो कि आकाशगंगा के केंद्र का चक्कर लगा रहा था. यह बिग-बैंग पिंड  हाइड्रोजन  हीलियम तथा अधिनव तारों द्वारा उत्सर्जित भारी तत्वों से मिलकर बना था.   किसी निकटस्थ महा-तारक  की आक्रामक-आकर्षण लहर के कारण सौर निहारिका एक सूक्ष्म-ग्रहीय चकरी के आकार में रूपांतरित हो गया,. इसका अधिकांश भार इसके केंद्र में एकत्रित हो गया और गर्म होने लगा, आवेग तथा टकराव के कारण सूक्ष्म-ग्रहों का निर्माण प्रारंभ हुआ, जो कि नीहारिका के केंद्र के चारों ओर घूमने लगे. केंद्र में अत्यधिक गतिज ऊर्जा का निर्माण के परिणामस्वरूप चकरी का केंद्र गर्म होने लगा. और  हीलियम में हाइड्रोजन के नाभिकीय गलन की शुरुआत हुई और अंततः, सूर्य का निर्माण हुआ, समय के साथ-साथ बड़े खण्ड एक-दूसरे से टकराये और बड़े पदार्थों का निर्माण हुआ, जो सूक्ष्म-ग्रह बन गये. इसमें केंद्र से लगभग 150 मिलियन किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक विशेष ग्रह भी शामिल था - पृथ्वी इस ग्रह की रचना लगभग 4.54 बिलियन वर्ष पूर्व हुई |  इसी प्रक्रिया से सौर-मण्डल के अन्य ग्रहों का उदय हुआ | यही प्रक्रिया पुनः पुनः ब्रह्माण्ड में नए नए तारों से चकरियों का निर्माण करती है, जिनमें से कुछ तारों से ग्रहों का निर्माण होता है |
ग्रहों का निर्माण
पृथ्वी के केंद्र तथा पहले वातावरण की उत्पत्ति---उत्पत्ति बाद पुरातन-पृथ्वी का विकास होता रहा, पुरातन-ग्रह पर पदार्थों के संचयन के दौरान, गैसीय सिलिका के एक बादल ने पृथ्वी को घेर लिया ये अधिकांश  हाइड्रोजन  हीलियम से बने थे, यह प्रारंभिक वातावरण था|  बाद में पृथ्वी का आंतरिक भाग पर्याप्त रूप से इतना  गर्म हो गया कि द्रव धातु, जिनका घनत्व अब उच्चतर हो चुका था, पृथ्वी के  केंद्र में एकत्रित होने लगे. परिणामस्वरूप पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण हुआ |  द्रव-धातु बाद में इसकी सतह पर ठोस चट्टानों के रूप में घनीभूत हो गया और गुरुत्वाकर्षण ने वातावरण को रोककर रखा, जिसमें पानी भी शामिल था. प्रारंभिक सतह के निर्माण के शीघ्र बाद, किसी अधिक प्राचीन-ग्रह की टक्कर, जिसे विशाल संघात कहा जाता है , का  पृथ्वी पर प्रभाव पड़ा, जिसने इसके आवरण व सतह के एक भाग को अंतरिक्ष में उछाल दिया और चंद्रमा का जन्म हुआ.  युवा पृथ्वी के लिये इस संघात के कुछ परिणाम बहुत महत्वपूर्ण थे. इससे ऊर्जा की एक बड़ी मात्रा निकली,  जिससे पृथ्वी व चंद्रमा दोनों ही पूरी तरह पिघल गए | इस संघात के कारण पृथ्वी के अक्ष में भी परिवर्तन हो गया व इसमें 23.5° का अक्षीय झुकाव उत्पन्न हुआ, तथा पृथ्वी की घूमने की गति भी तीब्र होगई जो कि पृथ्वी पर मौसम के बदलाव के लिये ज़िम्मेदार है|
महासागरों और द्वितीय वातावरण की उत्पत्ति---  चूंकि विशाल संघात के तुरंत बाद पृथ्वी वातावरण-विहीन हो गई थी, अतः यह शीघ्र ठंडी हुई | बेसाल्ट की एक ठोस सतह निर्मित हुई | यह आर्कियन युग (लगभग ३.८ बिलियन वर्ष पूर्व )का प्रारम्भ में हुआ | इस ऊपरी परत से भाप निकली और ज्वालामुखियों द्वारा और अधिक गैसों का उत्सर्जन किया गया, जिससे दूसरे वातावरण का निर्माण हुआ| उल्का के टकरावों के कारण अतिरिक्त पानी आयात हुआ, टकराने वाले धूमकेतुओं में बर्फ थी, जिनसे जल प्राप्त हुआ. इन पदार्थों की टक्कर से बुध, शुक्र, पृथ्वी तथा मंगल आदि ग्रहों पर जल, कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन, अमोनिया, नाइट्रोजन व अन्य वाष्पशील पदार्थों में वृद्धि हुई.
     ग्रह के ठंडे होते जाने पर, बादलों का निर्माण हुआ. वर्षा से महासागर बने. इस नए वातावरण में जल-वाष्प, कार्बन डाइआक्साइड, नाइट्रोजन तथा अन्य गैसें आदि ग्रीन-हाउस गैसों की बड़ी मात्राओं ने सतह पर मौजूद जल को जमने से रोका.  मुक्त आक्सीजन सतह पर हाइड्रोजन या खनिजों के साथ बंधी हुई रही |
प्रारंभिक महाद्वीप--- प्रारंभिक-परत का निर्माण तब हुआ था, जब पृथ्वी की सतह पहली बार सख़्त हुई, वर्तमान महासागरीय परत की तरह ही यह परत भी बेसाल्ट से मिलकर बनी| पृथ्वी के आतंरिक–पिघले हुए पदार्थ के भाग मेंटल  पर ये सख्त... प्लेटें—टेक्टोनिक प्लेट्स... प्राय:गति करती रहतीं थी |(तरल पदार्थ संवहन -Mantle convection)-केंद्र से पृथ्वी की सतह तक उष्मा के प्रवाह का परिणाम है जिससे ठोस टेक्टोनिक प्लेट्स तैरती हुई गति करती रहती थीं )  ये प्लेट्स रूपांतरित(मेटामोर्फिक-रोक्स) व तलछटीय (सेडीमेन्ट्री-रोक्स) कणों से बनी थीं अतः उस समय नदियों व सागरों का अस्तित्व था | 

पृथ्वी के वायुमंडल, सतह व महासागरों का निर्माण


















 ----चित्र -गूगल -साभार ...










गुरुवार, 24 मई 2012

पृथ्वी का संरचनात्मक इतिहास--- क्रमिक श्रृंखला .... डा श्याम गुप्त..

                 


 

          यह आदि-सृष्टि  कैसे हुई, ब्रह्मांड कैसे बना एवं हमारी अपनी पृथ्वी  कैसे बनी व यहां तक का सफ़र कैसे हुआ, ये आदि-प्रश्न सदैव से मानव मन व बुद्धि को निरन्तर मन्थित करते रहे हैं । इस मन्थन के फ़लस्वरूप ही मानव  धर्म, अध्यात्म व विग्यान रूप से सामाजिक उन्नति में सतत प्रगति के मार्ग पर कदम बढाता रहा आधुनिक विग्यान के अनुसार हमारे पृथ्वी ग्रह की विकास-यात्रा क्या रही इस आलेख का मूल विषय है । इस आलेख के द्वारा हम आपको  पृथ्वी की उत्पत्ति, बचपन  से आज तक की क्रमिक एतिहासिक यात्रा पर ले चलते हैं।
      ( सृष्टि व ब्रह्मान्ड रचना पर वैदिक, भारतीय दर्शन, अन्य दर्शनों व आधुनिक विज्ञान  के समन्वित मतों के प्रकाश में इस यात्रा हेतु -- मेरा आलेख ..मेरे ब्लोग …श्याम-स्मृति  the world of my thoughts..., विजानाति-विजानाति-विज्ञान ,  All India bloggers association के ब्लोग ….  एवं  e- magazine…kalkion Hindi  तथा  पुस्तकीय रूप में मेरे महाकाव्य " सृष्टि -ईशत इच्छा या बिगबैंग -एक अनुत्तरित उत्तर " पर पढा जा सकता है  | )
                         हमारी पृथ्वी 
                          पृथ्वी  सूर्य से तीसरा ग्रह  हैपृथ्वी  सौर मंडल  में व्यास, द्रव्यमान और घनत्व  में सबसे बड़ा स्थलीय ग्रह है ।  पृथ्वी के अलावा इसका पृथ्वी ग्रहसंसार ,धरती  और  टेरा के रूप में भी उल्लेख होता है।
                                  पृथ्वी मानव सहित लाखों प्रजातियों  का घर है, पृथ्वी ही ब्रह्मांड में एकमात्र वह स्थान है जो  जीवन  अस्तित्व के लिए जाना जाता हैवैज्ञानिक खोजें संकेत देती  हैं कि इस ग्रह का गठन ४.५४ अरब वर्ष (४.५ बिलियन ईयर्स) पहले और उसकी सतह पर जीवन लगभग एक अरब वर्ष पहले प्रकट हुआतब से, पृथ्वी के  जीवमंडल  (मानव सहित ) ने   ग्रह पर पर्यावरण और अन्य अजैवकीय ( जड़ ,प्राकृतिक  ) परिस्थितियों को बदल दिया है ताकि वायुजीवी जीवों  (एरोबिक लाइफ ) के प्रसारण, साथ ही साथ ओजोन परत ( ओजोन लेयर)  के छरण  को रोका जा सके जो पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र   ( मेग्नेटिक -फील्ड )   के साथ हानिकारक विकिरण को रोक कर जमीन पर जीवन की अनुमति देता है।
                
                    लगभग  4.6 बिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी ग्रह का निर्माण हुआ पृथ्वी की आयु ब्रह्माण्ड की आयु की लगभग एक-तिहाई है आज की स्थिति तक पहंचने के दौरान पृथ्वी में व्यापक भूगर्भीय  तथा जैविक  परिवर्तन हुए | संक्षिप्त में इस ऐतिहासिक का खंड को पांच  भागों  में  वर्णित किया जा  सकता है -----
   भाग १-- सौर मंडल की उत्पत्ति -४.५४ बिलियन वर्ष पूर्व ---, सूर्य ,पृथ्वी व अन्य ग्रहों की उत्पत्ति
पृथ्वी का केन्द्र व प्रथम वातावरण  की उत्पत्ति, पानी व चन्द्रमा की उत्पत्ति  | महासागरों  व पृथ्वी पर द्वितीय वातावरण की उत्पत्ति| महाद्वीपों  का बनना |
भाग २ - जीवन की उत्पत्तिअणु का प्रथम प्रतिलिपिकार व प्राकृतिक चयन का प्रारम्भ, जैविक सूप , प्रारंभिक कोशिकाएं, बहुकोशीय जीवन का विकास, ऑक्सीजन क्रान्ति व ओक्सीजन या  प्रकाश-संश्लेषण– पृथ्वी का तृतीय वातावरण ....ओजोन परत का निर्माण ....
भाग ३ - जीवन का विकास--- कोशिकीय सहजीविता , माइटोकोंड्रिया का विकास, क्लोरोप्लास्ट , पेरोक्सीजोम्स , कोशिका का नाभिक ...प्रथम कोशिकीय श्रम-विभाजन –वनस्पति व जंतु कोशिका ...विभिन्न जैव कालोनियों का निर्माण व सामूहिक विलोपन व म्यूटेशन......
भाग ४ -केम्ब्रियन-विस्फोट ....जीवन की तीब्र गति से वृद्धि ...प्रथम कशेरुकी जीव ...मछली का सागर में उद्भव ..संधिपाद प्राणी....चतुष्पाद प्राणी का अवतरण.....जल-स्थल( उभय) चर......पक्षियों व सरीसृपों की उत्पत्ति ....पृथ्वी पर जीवन....हिम-युग...विलोपन....डायनासोर्स.....स्तनधारियों का उद्भव....आवृत्त-बीजी-पुष्पों का विकास...
भाग ५- मानव का उद्भव व विकासभाषा, सभ्यता, संस्कृति, धर्म, अध्यात्म व विज्ञान .....

 
   सन्दर्भ--- Refrences….
1-The age of earth….Donlrymps G S, Newman williyam.et el..US geological society 1997.
2.-evidence for Ancient bombardment on earth…by Robert rock
3-Evolution of fossils & plants…taylor et el.
4-oigin of earth & moon..NASA .by taylor
5-Did life come from another world?...wanflesh david etc..scientific American press.
6-cosmic evolution…tufts university..by cherssan eric…
7-Trends in ecology & evolution…Xiao S, lafflame S…
8-A natural history of first 4 billions of life on earth., newyork, nature & earth..by forggy and richmand…
9- First step on land….mac newtan, Robert B and jeniffar M..
10-The mass Extinction  …science Aug 05…
11- पृथ्वी का इतिहास एवं चन्द्रमा की उत्पत्ति व विशाल संघात अवधारणा…..विकीपीडिया 
                ---क्रमश: भाग १-- सौर मंडल की उत्पत्ति...अगली पोस्ट में ...
                          

मंगलवार, 15 मई 2012

कविवर डी तन्गवेलन की हिन्दी कविता --मातृत्व की महक ... डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
          
                                      चित्तूर, आंध्रप्रदेश में जन्मे, तमिल भाषी ' बेंगलूर में कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति, में कार्यरत, प्रबंध व परिक्षा मंत्री (मानद)- कविवर श्री डी तन्गवेलन ' सहृदय'  ने बनारस हिन्दू वि वि , वाराणसी से एम ए (हिन्दी ) किया| वे तमिल, तेलगू .कन्नड़, हिन्दी व अंग्रेज़ी में नाटक, निबंध  लिखते थे| आपने ८१ वर्ष की उम्र में कविता लिखना प्रारम्भ किया और अपने ८१ वें जन्म दिन पर ८१ कविताओं का संग्रह 'जीवन-शोध' प्रकाशित किया |यह काव्य-संग्रह मुझे सौभाग्य से अपने उपन्यास 'इन्द्रधनुष' के लोकार्पण समारोह पर मेरे सम्मानार्थ प्रदत्त साहित्य के साथ  प्राप्त हुआ।  जीवन के सत्य से अनुप्राणित आपकी कवितायें सामान्य भाषा व उक्तियों में सशक्त अन्योक्तियों के माध्यम से व्यंजना गुण युक्त महत्वपूर्ण  सामाजिक सन्देश प्रसारित करती हैं ।  एक कविता 'मातृत्व की महक' प्रस्तुत है| ।

गमले के खिले गुलाब ने चलते
कविवर डी तंगवेलन 'सहृदय'
चंचल पवन से भरते अठखेलियाँ ,
अपने गमले की बंदी मिटते से,
सहज कुतूहलवश प्रश्न किया|

'क्या तुझे पास की मिट्टी से
 मिलजुल कर  सदा मोद  से,
मन  बहलाने की मह्दिच्छा मधुर 
कभी न मचली अंतराल से ।'

गमले की मिट्टी ने हंसकर कहा,
'क्यों नहीं होती ! रहती हर दम 
मैं अपने इर्द-गिर्द की सखियों से 
हिले-मिले मन फूले रहती ।

अब भी है मन होता, गले मिलूँ 
मगर मैं ने अपना घर अलग
बसालिया, जो मेरा बहु प्यारा
मानों, मन इससे चिपक गया ।

मेरी थी एक अदम्य कामना
मेरा स्तन्य पीता बालक
घुटनों के बल चलें इस आँगन में ,
दिन रात की मांग, भगवान से ।

मेरे इस सपने को चरितार्थ
करने तू आया आँगन में ।
जन्म देकर तुझे, मैं धन्य हुई,
सार्थक मेरा यह जन्म हुआ ।

कहता जिसे तू बंधन, वह है
वास्तव में मेरा सौभाग्य ,
जो करता स्वर्ग का अवहेलन
है मुक्ति को दूर से सलाम ।'

सुन मातृहृदय का उमडा उद्गार
स्नेह स्निग्ध कामना मंगल ,
फूल खिला, मिला जगत को सुगंध
अनन्य अन्वय अलंकार ।।